रासायनिक हमले में खुद को कैसे बचाएं?

इमेज स्रोत, Andy Weekes/Loughborough University
- Author, रिचर्ड ग्रे
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
आतंकवाद पूरी दुनिया के लिए बहुत बड़ी चुनौती बन गया है. आतंकवादी संगठन नित नए तरीक़े अपनाकर इंसानियत को ज़ख़्मी कर रहे हैं. आतंकवादी तकनीकी हुनर के साथ-साथ साइंस के वो नुस्खे भी सीख चुके हैं, जो बहुत ख़तरनाक हो सकते हैं.
ख़तरा है कि आतंकवादी संगठन केमिकल या जैविक हथियार से भी हमला कर सकते हैं. वो ऐसी ज़हरीली गैसों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं, जो इंसान को या तो ज़िंदगी भर के ज़ख़्म दे जाती हैं या फिर सीधे मौत के घाट उतार देती हैं.
सीरिया और इराक़ समेत कई देशों में तो हुकूमतों ने ही अपने नागरिकों पर केमिकल हथियारों से हमला किया है. हालांकि दुनिया के कई देशों के बीच केमिकल हथियारों के इस्तेमाल न करने पर सहमति है. लेकिन, चरमपंथी इन बंदिशों की क़ैद में कहां रहते हैं.
ऐसी बहुत-सी गैस हैं जिनका हमला घातक हो सकता है. इसमें सरिन, वीएक्स और नोविचोक जैसी गैसें शामिल हैं, जिन्हें रसायन विज्ञान की भाषा में ऑर्गेनोफ़ास्फ़ेट के नाम से भी जाना जाता है.
ज़हर के मामले में सरिन गैस, सायनाइड के मुक़ाबले 20 से 25 फ़ीसद ज़्यादा ज़हरीली है. वहीं वीएक्स गैस जिसे वेनम एजेंट ऑफ़ एक्स भी कहा जाता है, वो भी सायनाइड से दो गुना ज़्यादा ज़हरीली हैं.
जबकि नोविचोक गैस सायनाइड से पांच से आठ गुना ज़्यागा जानलेवा है. ये ख़तरनाक गैसें हमारे दिमाग में नर्व सेल तक संदेश पहुंचाने वाले एंज़ाइम को निष्क्रिय कर देते हैं.

इमेज स्रोत, Andy Weekes/Loughborough University
सरिन गैस से हमला
पीड़ित की आंख से पानी निकलने लगता है, तेज़ पसीना आता है, मतली होती है और घुटन इतनी ज़्यादा होती है कि दम घुटने से मौत तक हो जाती है. ज़रा सोचिए अगर आज कोई केमिकल अटैक हो जाए तो क्या हम उससे निपटने के लिए तैयार हैं?
कई देशों में इस दिशा में काम शुरू हो चुका है. ब्रिटेन की लॉफबोरॉफ़ यूनिवर्सिटी में एनालिटिकल केमिस्ट पॉल थॉमस टॉक्सी-ट्राइएज नाम के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं.
दरअसल साल 1995 में जापान के शहर क्योटो में अउम शिनरिक्यो संप्रदाय ने लोगों से भरी एक ट्रेन में सरिन गैस छोड़ दी थी. जिससे 13 लोगों की मौत हो गई थी और हज़ारों ज़ख़्मी हो गए थे.
इस हमले से ठीक एक साल पहले भी इसी संप्रदाय के लोगों ने सरिन गैस से हमला कर दिया था, जिसमें आठ लोगों की मौत हुई थी और 600 लोग घायल हुए थे. हमले के बाद अस्पतालों में लोगों की भारी भीड़ थी.
ज़्यादातर तो वो लोग थे जिन्हें तुरंत मेडिकल मदद की ज़ररूत थी. लेकिन एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी थी जो घर पर ही देसी तरीक़ों से ख़ुद अपना इलाज कर सकते थे.
तभी रिसर्चर पॉल थॉमस ने सोचा कि क्यों ना ऐसी तकनीक खोजी जाए, जिसके इस्तेमाल से भविष्य में रासायनिक हमले में ख़ुद को सुरक्षित रखा जा सके.

इमेज स्रोत, Getty Images
बचाव के तरीके
जर्मनी की फ़र्म गैस फ़ॉर शॉर्ट ने एक ब्रेथ एनालाइज़र विकसित किया जिसका नाम है ब्रेथ स्पेस डिवाइस जो बायोकेमिकल के हल्के से हल्के असर को भांप सकता है. इसके ज़रिए महज़ 40 सेकेंड के समय में सैकडों पीड़ितों को जांचा जा सकता है.
नई तकनीक के ज़रिए अब ऐसा ड्रोन विकसित किया गया है, जिसमें बहुत छोटी-छोटी ऐसी डिवाइस लगाई गई हैं जिन से पता लगाया जा सकता है कि हमले में कौन सी गैस का इस्तेमाल हुआ है और हवा में ही वो इमरजेंसी क्रू को इसकी रिपोर्ट भी मुहैय्या करा देगा. इस ड्रोन को टी4आई नाम की एक कंपनी बना रही है.
टॉक्सी-ट्राइएज कंसर्शियम भी कुछ इसी तरह की डिवाइस पर काम कर रही है. ये अपने उपकरणों में कुछ ख़ास तरह के कैमरों का इस्तेमाल कर रहे हैं जो अल्ट्रावाएलेट और इंफ़्रारेड किरणों की तस्वीर ख़ींचने में सक्षम होंगे.
इस तरह की तस्वीरों को हाईपरस्पेक्ट्रल इमेज कहते हैं. इन तस्वीरों के ज़रिए हमले के बाद किसी भी तरह के केमिकल एजेंट के काम का तरीक़े तुरंत पकड़ा जा सकता है.
वॉर ज़ोन में इस तरह की तकनीक हवाई जहाज़ों पर फिट करके इस्तेमाल की जाती रही है. लेकिन अब सैटेलाइट में इसे फिट करने योग्य बनाया जा रहा है.
जानकारों का मानना है कि केमिकल अटैक का असर कम करने या उसे पूरी तरह नियंत्रित करने के लिए ये जानना बहुत ज़रूरी है कि हमले में कौन सी गैस इस्तेमाल हुई है.

इमेज स्रोत, Andy Weekes/Loughborough University
सबसे अधिक दिमाग पर असर
इंग्लिश चैनल दक्षिण इंग्लैंड और उत्तरी फ़्रांस के बीच पानी वाली सरहद का काम करता है. इसे यूरोप में शिपिंग का सबसे बड़ा इलाक़ा कहा जाता है. 2018 में इंग्लिश चैनल में अचानक अजीब क़िस्म की गैस का रिसाव होने लगा.
जिसकी वजह से आस-पास के लोगों को घुटन और आंखों में जलन की शिकायत होने लगी.
शुरूआत में इसे जहाज़ से रिसने वाली गैस ही माना गया लेकिन असल में ये गैस थी कौन सी, ये पता लगाने में जांच एजेंसियों को महीनों का समय लगा.
रिसर्चर थॉमस का कहना है अगर उन जांच एजेंसियों के पास अच्छी मशीनें होतीं, तो लोगों को बड़ी परेशानी से बचाया जा सकता था.
हरेक तरह के केमिकल अटैक से बचने और एहतियात बरतने के तरीक़े अलग-अलग हैं. मिसाल के लिए कीटनाशकों से फैले ज़हर और केमिकल एजेंट से फैले ज़हर के उपचार में एंट्रोपिन दी जाती है.
लेकिन कई तरह के केमिकल एजेंट ऐसे हैं, जिसमें एंट्रोपिन का इस्तेमाल घातक साबित हो सकता है.
चूंकि केमिकल एजेंट सबसे ज़्यादा हमारे दिमाग़ पर असर करते हैं, इसलिए अमरीका की मिसीसिपी यूनिवर्सिटी में ऐसी दवाएं तैयार की जा रही हैं जिनके इस्तेमाल से दिमाग़ को कम से कम नुक़सान पहुंचे.

इमेज स्रोत, Getty Images
महीनों तक असर
केमिकल अटैक की सूरत में अगर 15 मिनट के अंदर कपड़े उतार कर बदन को साबुन से धो लिया जाए तो वीएक्स जैसे ख़तरनाक केमिकल एजेंट का असर काफ़ी हद तक कम हो जाता है.
त्वचा पर मौजूद केमिकल एजेंट की पहचान के लिए भी गैस डिटेक्टर विकसित किया जा रहा है. जिस जगह पर केमिकल हथियार का इस्तेमाल किया जाता है, वहां लंबे समय तक इसका असर रहता है.
हमले की जगह वाली मिट्टी में सल्फ़र मस्टर्ड, वीएक्स जैसे केमिकल एजेंट महीनों तक अपनी मौजूदगी दर्ज किए रहते हैं.
ऐसे में हमले वाले इलाक़े में जाना ख़तरे से खाली नहीं होता. प्रथम विश्व युद्ध के बाद फ़्रांस में लिली और वर्दों के बीच एक बड़े हिस्से को नो-गो रेड ज़ोन घोषित कर दिया गया था.
यानी इस इलाके में खेती करने और आम लोगों के वहां जाने पर पाबंदी लगा दी गई थी.
पूरे इलाक़े की घास उखाड़ कर नए सिरे से इसे उर्वरक बनाया गया. लेकिन ये समय लगने वाला और मुश्किल काम है. इस परेशानी के हल के लिए भी कोशिशें जारी हैं.

इमेज स्रोत, Getty Images
आने वाली पीढ़ी पर असर
अमरीका की डिफ़ेंस एडवांस रिसर्च प्रोजेक्ट एक पोर्टेबल सॉइल स्क्रबर तैयार कर रहा है जोकि गैस की ही मदद से ज़हरीली घास को ख़त्म कर देगा.
केमिकल अटैक या हादसे का असर समझने के लिए भारत की भोपाल गैस त्रासदी बेहतरीन मिसाल है.
हादसे के 30 साल बाद भी वहां बच्चे कई तरह की बीमारियों के साथ पैदा हो रहे हैं. हड्डियों की तकलीफ़ होना आम बात है.
बहुत से डॉक्टरों की रिसर्च रिपोर्ट भी बताती है कि जो लोग रासायनिक हथियारों के हमले में बच जाते हैं, उनके बच्चे भी बहुत तरह की बीमारियां विरासत में लेकर पैदा होते हैं.
1998 में इराक़ ने जब कुर्दों पर रासायनिक हथियारों से हमला किया था, तो इसका असर इराक़ ही नहीं, उसके आसपास के कई देशों में देखने को मिला था.
इराक़ में इस हमले में बहुत से कुर्द नागरिक बच भी गए थे, जो शारीरिक और मनोवैज्ञानिक दोनों ही स्तर पर बीमारियों का समाना कर रहे थे. बहुत से लोगों को अनिद्रा की परेशानी हो गई थी.
तो, किसी की आंखों की रोशनी चली गई. वहीं कोई हर समय दूसरे किसी हमले की दहशत में घिरा रहा. सेहत और दिमाग़ी सुकून दोनों बर्बाद थे.

इमेज स्रोत, Getty Images
1995 में जापान में जो केमिकल अटैक हुआ था, उसमें अत्सुशी साकाहारा नाम के एक व्यक्ति बच गए. आज इस हादसे को क़रीब 24 साल हो चुके हैं.
लेकिन साकाहारा के ज़हन में आज भी उस हादसे की याद ताज़ा है. उन्हें आज भी खांसी की समस्या है. घर से बाहर निकलने में आज भी उन्हें डर लगता है.
चूंकि ज़हरीली गैस के संपर्क में आने के कुछ ही समय बाद उन्होंने अपने कपड़े उतार कर साबुन से नहा लिया था. इसलिए उन पर हानिकारक गैसों का घातक असर नहीं हुआ था.
साकाहारा अब डॉक्यूमेंट्री डायरेक्टर हैं और 1995 के उस हमले के पीछे ज़िम्मेदार अउम शिनरिक्यो संप्रदाय पर डॉक्यूमेंट्री बना रहे हैं.
(बीबीसी फ़्यूचर पर मूल अंग्रेज़ी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. आप बीबीसी फ़्यूचर को फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो कर सकते हैं )
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)













