इसराइल की जंग उसकी अर्थव्यवस्था को कैसे नुक़सान पहुंचा रही है?

ग़ज़ा में एक इसराइली सैनिक.

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इमेज कैप्शन, हमास और हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ युद्ध ने इसराइल की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है.
    • Author, जेरेमी हॉवेल
    • पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

पिछले एक साल में इसराइल ग़ज़ा और दक्षिणी लेबनान में हज़ारों सैनिकों को भेज चुका है. वहाँ अपने दुश्मनों पर हज़ारों हवाई हमले कर चुका है.

और इसके अलावा इसराइल अपनी ओर आने वाली मिसाइलों और ड्रोन्स को एयर डिफ़ेंस सिस्टम के ज़रिए नष्ट करने में लाखों डॉलर ख़र्च कर चुका है.

इसराइली सरकार ने अनुमान लगाया है कि हमास और हिज़्बुल्लाह के ख़िलाफ़ जारी जंग की लागत 60 अरब डॉलर से ज़्यादा हो सकती है.

इस युद्ध ने पहले ही इसराइल की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है.

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इसराइल को इस युद्ध की कितनी क़ीमत चुकानी पड़ रही?

एक प्रेस वार्ता के दौरान इसराइल के वित्त मंत्री बेज़ालेल स्मोट्रिच.

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इमेज कैप्शन, इसराइल के वित्त मंत्री बेज़ालेल स्मोट्रिच का कहना है कि वर्तमान में जारी जंग की लागत 60 अरब डॉलर से ज़्यादा हो सकती है.

इसराइल के वित्त मंत्री बेज़ालेल स्मोट्रिच ने सितंबर 2024 में इसराइली संसद नेसेट से कहा था, “हम इसराइल के इतिहास के सबसे लंबे और सबसे महँगे युद्ध में हैं.”

इस दौरान उन्होंने यह भी कहा था कि इस सैन्य ऑपरेशन की लागत 200 बिलियन से 250 बिलियन शेकेल (54 बिलियन डॉलर से 60 बिलियन डॉलर) के बीच आ सकती है.

इसराइल का लेबनान पर बमबारी करना, दक्षिणी लेबनान में सैनिकों की मौजूदगी को बढ़ाना, ईरान के हमलों के जवाब में वहां हवाई हमले करना, इस जंग की लागत को और बढ़ाता रहेगा.

ब्रिटेन में शेफ़ील्ड हॉलम यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री डॉक्टर ए अल्ग्रही कहते हैं कि इसराइल के युद्ध को और आगे बढ़ाने के बाद यदि यह जंग 2025 तक जारी रहती है तो मोटे तौर पर इसकी अनुमानित लागत 350 बिलियन शेकेल्स (93 बिलियन डॉलर) तक बढ़ सकती है.

ये इसराइल के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का छठवाँ हिस्सा है, जो 1.99 ट्रिलियन शेकेल्स (530 बिलियन डॉलर) है.

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इसराइल जंग के लिए रकम कैसे जुटा रहा है?

तेल अवीव स्टॉक एक्सचेंज का दफ़्तर.

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इमेज कैप्शन, तेल अवीव स्टॉक एक्सचेंज और दुनिया भर के स्टॉक एक्सचेंज पर इसराइली सरकार के बॉन्ड ज़्यादा बेचे जा रहे हैं.
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बैंक ऑफ़ इसराइल ने सरकारी बॉन्ड्स की बिक्री को बढ़ा दिया है. ऐसा युद्ध के लिए पैसा जुटाने के लिए किया जा रहा है.

बैंक ने मार्च 2024 में एक इश्यू के बॉन्ड की बिक्री से 8 बिलियन डॉलर की राशि जुटाई, जो कि एक रिकॉर्ड है.

इसराइल अपने बॉन्ड्स इसराइल और विदेश में मौजूद कर्ज़ देने वालों को बेच रहा है. इनमें “डायस्पोरा बॉन्ड” भी शामिल हैं, जो इसराइल के बाहर यहूदी लोगों को बेचे जा रहे हैं.

बैंक ऑफ़ इसराइल के आंकड़े बताते हैं कि इसराइली सरकार के बॉन्ड ख़रीदने के लिए विदेशी लोग कम दिलचस्पी दिखा रहे हैं.

बैंक का कहना है कि केवल 8.4 फ़ीसदी बॉन्ड विदेशों में रखे गए थे, जबकि सितंबर 2023 में यह आंकड़ा 14.4 फ़ीसदी था. इसके बाद अक्टूबर महीने में इसराइल की हमास से जंग शुरू हुई थी.

विदेशी लोगों के इसराइली बॉन्ड ख़रीदने में बेरुख़ी को लेकर तेल अवीव यूनिवर्सिटी के एक अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर मैन्युअल ट्रेलेनबर्ग कहते हैं, “इसका परिणाम यह हुआ कि इसराइली बॉन्ड्स की ब्याज दर को बढ़ा दिया गया, ताकि विदेशी लोगों को इन्हें ख़रीदने के लिए आकर्षित किया जा सके.”

ट्रेलेनबर्ग कहते हैं, “इस कारण सरकार द्वारा चुकाए जाने वाले कर्ज़ की लागत में 1.5 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है.”

इसके अलावा, तीन बड़ी अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों- मूडी, फ़िच और स्टैंडर्ड एंड पुअर ने अगस्त 2024 की शुरुआत से इसराइली सरकार के कर्ज़ को लेकर रेटिंग घटा दी है.

एजेंसियों के इसराइल की रेटिंग घटाने के मामले पर तेल अवीव में इंस्टीट्यूट ऑफ़ नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज़ के डॉक्टर टॉमर फ़ेडलॉन का कहना है कि एजेंसियों ने अपनी रेटिंग इसलिए नहीं घटाई कि उनको डर है कि इसराइली सरकार बॉन्ड्स के लिए भुगतान नहीं कर पाएगी.

बल्कि उन्होंने कहा, “क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट्स में कहा है कि उनकी चिंता सरकार के राजकोषीय घाटे पर रणनीति की कमी को लेकर है, क्योंकि सरकार को 2025 तक होने वाले ख़र्च को भी मैनेज करना है.” उन्होंने यह भी बताया कि इसराइल में पब्लिक फ़ाइनेंस की स्थिति बेहतर है.

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''सरकार टैक्स बढ़ा सकती है''

“असमानता के कारण और उसके परिणाम” विषय पर हुई कॉन्फ़्रेंस में शामिल कार्निट फ़्लग.

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इमेज कैप्शन, बैंक ऑफ़ इसराइल की भूतपूर्व गवर्नर कार्निट फ़्लग कहती हैं कि सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए टैक्स को बढ़ा सकती है.

प्रोफ़ेसर कार्निट फ़्लग इसराइल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट में एक अर्थशास्त्री और बैंक ऑफ़ इसराइल में गवर्नर रह चुकी हैं.

वो कहती हैं कि सरकार बजट के घाटे को कम करने के लिए 37 बिलियन शेकल्स (9.9 बिलियन डॉलर) के बजट में कटौती और टैक्स को बढ़ाने पर विचार कर सकती है.

वह कहती हैं, “हालांकि, सरकार की कुछ योजनाओं को लेबर यूनियंस और सरकार के कुछ सहयोगियों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है.”

कई अर्थशास्त्रियों ने सरकार से यह अपील की है कि 2025 को लेकर बजट पेश करें, इसमें बढ़ते हुए सैन्य ख़र्च का एक निश्चित सेट भी बताया जाए.

हीब्रू यूनिवर्सिटी ऑफ़ यरुशलम की प्रोफ़ेसर इस्टबन क्लोर कहती हैं, “युद्ध के ख़र्च के लिए पैसा जुटाने को लेकर बजट में कटौती को लेकर कोई योजना नहीं है.”

वह कहती हैं, “जंग के लिए सैन्य रणनीति के साथ कोई आर्थिक रणनीति नहीं है.”

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इसराइल की अर्थव्यवस्था पर जंग का क्या असर हुआ है?

प्रोफेसर के फ़्लग

इसराइल की अर्थव्यवस्था अक्तूबर 2023 तक मज़बूती से बढ़ रही थी. मगर, जब युद्ध की शुरुआत हुई तो इसमें तेज़ी से गिरावट आई है.

वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, इस पूरे साल में इसराइल की जीडीपी में 0.1 फ़ीसदी की कमी आई है.

बैंक ऑफ़ इसराइल का अनुमान है कि 2024 में इसराइल की अर्थव्यवस्था केवल 0.5 फ़ीसदी की दर से बढ़ेगी.

यह उस अनुमान से भी ख़राब है, जो बैंक ऑफ़ इसराइल ने जुलाई में लगाया था. तब बैंक ने कहा था कि इसराइल की अर्थव्यवस्था 2024 में 1.5 फ़ीसदी की दर से बढ़ेगी.

इस एक साल में, इसराइल में कई फ़र्म्स ने स्टाफ़ में कटौती की है, इस कारण उनका व्यापार भी सीमित हो गया है.

इसकी वजह हमास के साथ युद्ध शुरू होने के बाद इसराइल डिफ़ेंस फ़ोर्सेस का 3 लाख 60 हज़ार रिज़र्विस्टो (सैन्य आरक्षित बल के सदस्य) को बुलाना है.

उनमें से कई लोगों को हटा दिया गया है, लेकिन वर्तमान में लेबनान में 15 हज़ार रिज़र्विस्टो (सैन्य आरक्षित बल के सदस्य) को फ़िर बुलाया गया है.

इसराइल में मजदूरों की कमी

इसराइल में काम करता एक मजदूर.

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इमेज कैप्शन, इसराइल का कंस्ट्रक्शन सेक्टर बुरी तरह प्रभावित हुआ है, क्योंकि फ़लस्तीनी मजदूरों का प्रवेश अब इसराइल में बंद कर दिया गया है.

सरकार ने ग़ज़ा और वेस्ट बैंक से लगभग 2 लाख 20 हज़ार फ़लस्तीनियों के इसराइल में प्रवेश करने पर रोक लगा दी है.

ये लोग यहां काम करने आते थे, मगर सुरक्षा कारणों के चलते इसराइल ने यह फ़ैसला लिया है.

इस कारण विशेषकर कंस्ट्रक्शन सेक्टर प्रभावित हुआ है, जिसमें लगभग 80 हज़ार फ़लस्तीनी काम करते थे. इनकी जगह भारत, श्रीलंका और उज़्बेकिस्तान से हज़ारों मजदूरों को अब लाया जा रहा है.

प्रोफ़ेसर फ़्लग युद्ध के दौरान इसराइली अर्थव्यवस्था में आई मंदी को लेकर कहती हैं, “ऐसी संभावना है कि अर्थव्यवस्था मज़बूत ढंग से वापसी करेगी” बस एक बार जंग ख़त्म हो जाए.

वो इसकी वजह इसराइल के हाई-टेक सेक्टर को मानती हैं, जो देश की अर्थव्यवस्था में पांचवाँ हिस्सा है.

हालांकि, वह कहती हैं, “तथ्य यह है कि पहले हुए युद्ध के मुकाबले यह जंग ज़्यादा लंबी हो गई है और इसने जनसंख्या के बड़े हिस्से को प्रभावित किया है, ऐसे में हो सकता है कि इससे उबरने में ज़्यादा समय लगे.”

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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