डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल में क्या है और विपक्ष को इससे आपत्ति क्यों है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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सोमवार को संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, 2023 ध्वनि मत से पास हो गया है.

तीन अगस्त को केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी एवं दूरसंचार मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बिल को लोकसभा में पेश किया था.

वोटिंग के दौरान विपक्षी सांसद लगातार मणिपुर के मुद्दे पर चर्चा की मांग करते हुए नारेबाजी कर रहे थे और बिल का विरोध भी कर रहे थे.

विपक्ष का कहना है कि यह बिल निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है और इससे सूचना का अधिकार (आरटीआई) क़ानून भी कमजोर होगा.

जबकि सत्ता पक्ष की तरफ़ से लगातार इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि बिल सिर्फ़ व्यक्तिगत डेटा को सुरक्षा देगा और आरटीआई पर इससे कोई असर नहीं पड़ेगा.

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डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) बिल में क्या है?

तीन अगस्त को लोकसभा में बिल पेश करते हुए केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी एवं दूरसंचार मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा था कि ये इस बिल के जरिए भारतीय नागरिकों की डिजिटल प्राइवेसी को बनाए रखने वाला देश का पहला कानून बनेगा.

बिल में भारतीय नागरिकों के डेटा के इस्तेमाल से लेकर डेटा के ग़लत इस्तेमाल को न रोक पाने पर जुर्माने तक के प्रावधान शामिल है.

संसद संबंधी डेटा रखने वाली संस्था पीआरएस के मुताबिक़ आसान भाषा में इन बिन्दुओं के जरिए बिल की रूपरेखा समझी जा सकती है.

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प्रासंगिकता - बिल भारत के अंदर डिजिटल पर्सनल डेटा इकट्ठा करने की प्रक्रिया पर लागू होता है. डेटा या तो ऑनलाइन लिया जाता है या फिर ऑफलाइन लेकर उसका डिजिटलीकरण किया जाता है. यह भारत से बाहर पर्सनल डेटा प्रोसेसिंग पर भी लागू होगा, अगर इस डेटा के जरिए भारत में वस्तुओं और सेवाओं को इस्तेमाल करने दिया जाता है.

सहमति - व्यक्ति की सहमति लेने के बाद ही सिर्फ़ वैध उद्देश्य के लिए पर्सनल डेटा को प्रोसेस किया जा सकता है. सहमति लेने से पहले एक नोटिस देना होगा और यह सहमति किसी भी समय वापस ली जा सकती है. 18 साल से कम उम्र के व्यक्तियों के लिए माता-पिता या लीगल गार्जियन की सहमति लेनी होगी.

हालांकि कुछ मामलों में सहमति की जरूरत नहीं होगी. ये मामले हैं-

  • ख़ास उद्देश्य जिसके लिए व्यक्ति ने अपनी मर्जी से डेटा दिया है.
  • सरकार द्वारा लाभ या सेवा का प्रावधान.
  • मेडिकल इमरजेंसी.
  • रोजगार.

अधिकार और कर्तव्य - जिस व्यक्ति का डेटा इकट्ठा किया जा रहा है, उसके निम्नलिखित अधिकार होंगे-

  • डेटा प्रोसेसिंग के बारे में जानकारी हासिल करना.
  • डेटा में करेक्शन और उसे हटाने की मांग करना.
  • विशेष परिस्थितियों में किसी दूसरे व्यक्ति को नामित करना.

कर्तव्य के रूप में व्यक्ति को झूठी शिकायत और गलत विवरण नहीं देने हैं. अगर किसी ने ऐसा किया तो उस पर दस हज़ार रुपए तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.

डेटा फिड्यूशरी के दायित्व- डेटा प्रोसेसिंग के उद्देश्य और तरीके को निर्धारित करने वाली संस्था डेटा फिड्यूशरी होती है. बिल में डेटा फिड्यूशरी के दायित्व हैं-

  • डेटा की सटीकता और पूर्णता सुनिश्चित करने के लिए उचित प्रयास करना.
  • डेटा ब्रीच को रोकने के लिए उचित सुरक्षात्मक उपाय करना.
  • उल्लंघन होने पर भारतीय डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड और प्रभावित व्यक्तियों को जानकारी देना.
  • उद्देश्य पूरा होने और क़ानूनी उद्देश्यों के लिए जरूरी न होने पर पर्सनल डेटा को मिटा देना.

हालांकि सरकारी संस्थाओं के मामले में, स्टोरेज लिमिटेशन और डेटा प्रिंसिपल का डेटा मिटाने का अधिकार लागू नहीं होगा.

बच्चों के पर्सनल डेटा की प्रोसेसिंग- बच्चों के पर्सनल डेटा को लेते समय ऐसा कुछ नहीं करना होगा जिससे बच्चों पर कोई हानिकारक प्रभाव पड़ने की आशंका हो और डेटा से बच्चों को ट्रैक करना या टार्गेटेड एडवर्टाइजिंग भी नहीं करनी है.

भारतीय डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड- बिल के तहत केंद्र सरकार भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड की स्थापना करेगी. इसके सदस्यों की नियुक्ति दो साल के लिए की जाएगी और वे पुनर्नियुक्ति के पात्र होंगे. बोर्ड के प्रमुख कार्य होंगे-

  • डेटा इकट्ठा करने वालों की निगरानी करना और जुर्माना लगाना.
  • डेटा ब्रीच की स्थिति में जरूरी उपाय के लिए निर्देश जारी करना.
  • प्रभावित व्यक्तियों की शिकायतों को सुनना.

सजा - बिल में अलग-अलग अपराधों के लिए जुर्माने का प्रावधान शामिल है. जैसे-

  • बच्चों से संबंधित दायित्वों को पूरा न करने पर 200 करोड़ रुपए का जुर्माना.
  • डेटा ब्रीच को रोकने के लिए सुरक्षात्मक उपाय न करने पर 250 करोड़ रुपए का जुर्माना.
असदुद्दीन ओवैसी

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बिल को लेकर क्या हैं चिंता

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल को लेकर राजनीतिक पार्टियों से लेकर अलग-अलग संस्थाएं चिंता जाहिर कर चुकी हैं.

एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने डीपीडीपी बिल के कुछ प्रावधानों पर चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि ये प्रेस की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं. एडिटर्स गिल्ड ने अपने बयान में कहा है कि यह बिल पत्रकारों, उनके सूत्रों और नागरिकों की निगरानी के लिए एक ढांचा तैयार करता है.

एडिटर्स गिल्ड ने कहा, ''जाहिर तौर पर बिल डेटा संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए है लेकिन हम निराशा के साथ यह कहना चाहते हैं कि बिल ऐसा प्रावधान करने में विफल रहा है जो निगरानी के स्तर में सुधार लाए. असल में यह पत्रकारों के साथ उनके सूत्रों और नागरिकों की निगरानी के लिए एक ढांचा तैयार करता है.''

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एडिटर्स गिल्ड ने आरटीआई क़ानून का जिक्र करते हुए उसे इस बिल के जरिए कमजोर करने की बात भी कही है.

एडिटर्स गिल्ड ने कहा, ''बिल के कुछ प्रावधान आरटीआई आवेदनों को अस्वीकार करने के लिए सरकारी मंत्रालयों और विभागों के सूचना अधिकारियों को उपलब्ध छूट के दायरे को अनुचित रूप से बढ़ाते हैं. यह प्रावधान सूचना के सार्वजनिक न करने के पक्ष में संतुलन बनाते हैं, इसमें वह जानकारी भी शामिल है जो पत्रकारों द्वारा सार्वजनिक हित में मांगी जा रही है और इससे जवाबदेही कम हो जाती है. यह ज़रूरी है कि आरटीआई क़ानून को कमजोर न किया जाए.'

दरअसल बिल में आरटीआई अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(जे) में संशोधन और सभी निजी सूचनाओं को आरटीआई अधिनियम के दायरे से बाहर रखने के लिए प्रावधान जोड़ने का प्रस्ताव शामिल है. इस तरह के प्रावधान को पिछले साल नवंबर में जारी किए गए मसौदे में जोड़ा गया था और तभी से इसका विरोध हो रहा है.

वर्तमान क़ानून की यह धारा किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण को किसी की व्यक्तिगत जानकारी साझा करने से रोकती है, जिसका सावर्जनिक हित से कोई लेना-देना नहीं है.

गुरुवार को कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने लोकसभा में बिल पर बोलते हुए कहा,''यह विधेयक सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को कुचलने के लिए एक भयानक कदम है. यह बदलाव 'भ्रष्टाचार के युग' की शुरुआत करेगा क्योंकि व्यक्तिगत डेटा संपत्ति की तरह है.''

इसके अलावा टीएमसी सांसद सौगत रॉय, एआईएमआई सांसद असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी समेत दूसरे विपक्षी नेताओं ने ऐसे ही मिलते-जुलते तर्क देकर बिल का विरोध किया और इसे स्थायी समिति में भेजने की बात कही है.

इन सबके अलावा सूचना के अधिकार के लिए राष्ट्रीय अभियान (एनसीपीआरआई) और इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने भी आरटीआई क़ानून को कमजोर करने और नागरिकों की निगरानी को लेकर आपत्ति दर्ज़ कराई है.

डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल

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आपत्तियों पर सरकार ने क्या कहा?

आरटीआई क़ानून को कमजोर करने और निजता पर असर डालने जैसे आरोपों पर सरकार की तरफ़ से संसद और संसद के बाहर दोनों जगहों पर जवाब दिया गया है.

केंद्रीय आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने आरटीआई क़ानून को कमजोर करने वाले आरोप पर लोकसभा में बताया, ''जब पुट्टास्वामी जजमेंट आया था तो इस जजमेंट में तीन सिद्धांत दिए गए हैं उन तीनों सिद्धांतों को इस बिल में शामिल किया गया है. बिल पुट्टास्वामी जजमेंट पर एकदम खरा उतरता है.''

साल 2017 में, सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने जस्टिस केएस पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) बनाम भारत संघ मामले में सर्वसम्मति से अपना फैसला सुनाया और कहा था कि गोपनीयता एक संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकार है.

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केंद्रीय सूचना और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने न्यूज़ चैनल एनडीटीवी से बातचीत में कहा है कि इस बिल में सूचना के अधिकार को कमजोर नहीं किया गया है.

उन्होंने कहा, ''सूचना का अधिकार निश्चित रूप से व्यक्तिगत जानकारी का अधिकार नहीं है इसलिए सूचना के अधिकार को बिल्कुल भी कमजोर नहीं किया गया है. बिल इस बात पर ज़ोर देता है कि प्रत्येक भारतीय नागरिक का व्यक्तिगत डेटा उसकी सहमति के अधीन है और उसकी सहमति के बिना किसी के द्वारा इसका उपयोग या दुरुपयोग नहीं किया जा सकता है.''

लोकसभा से पारित होने के बाद डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, 2023 को राज्यसभा में मंजूरी मिलना बाकी है. राज्यसभा में पारित होने के बाद बिल के क़ानून बनने की राह आसान हो जाएगी.

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