सोमालिया का फ़ुटबॉल मैदान जहां खुले में दी जाती है क़ैदियों को मौत की सज़ा

मोगादिशू

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    • Author, नाइमा सईद सलाह
    • पदनाम, मोगादिशू, सोमालिया

(चेतावनीः इस कहानी का कुछ विवरण विचलित कर सकता है.)

सोमालिया की राजधानी मोगादिशू के तट पर छह बड़े कंक्रीट के खंभे खड़े हैं. पास ही चमकीले नीले हिंद महासागर की लहरें हिलोरे मारती हैं, लेकिन ये लहरें कुछ हृदय विदारक घटनाओं की गवाह भी हैं.

जब भी सुरक्षा बल लोगों को पकड़कर यहां लाते हैं, उन्हें गोल पोस्ट से प्लास्टिक की रस्सियों से बांधा जाता है और उनके चेहरे को काले कपड़े से ढका जाता है, फिर सिर में गोली मार दी जाती है.

विशेष प्रशिक्षित फ़ायरिंग दस्ते के सदस्यों के चेहरे भी ढके होते हैं.

गोली लगने के बाद लोगों का सिर झुक जाता लेकिन शरीर खंभे से लटका ही रहता है.

इन में कुछ लोग इस्लामी ग्रुप अल-शबाब की सैन्य अदालत से सजा पाए हुए होते हैं. अल-शबाब का सोमालिया के एक बड़े हिस्से पर कब्ज़ा है और देश में क़रीब 20 सालों से उसका ख़ौफ़ है.

सज़ा पाए इनमें से कुछ सैनिक हैं जिन्हें नागरिकों या अपने साथियों की हत्या का दोषी पाया गया. कभी कभार अदालत कुछ गंभीर अपराधों के लिए आम अपराधियों को सज़ा देती है.

पिछले साल इसी तट पर 25 लोगों को मौत की सज़ा दी गई थी.

अभी हाल ही में छह मार्च को एक व्यक्ति सईद अली मोआलिम दाउद को मौत की सज़ा दी गई, जिन्हें उनकी पत्नी को कमरे में बंद कर आग लगा देने का दोषी पाया गया था.

दाउद ने कहा था कि तलाक़ मांगने पर उन्होंने अपनी पत्नी को ज़िंदा जला दिया था.

हमार जाजाब ज़िले में इस क़त्लगाह के ठीक पीछे एक छोटी सी बसाहट है, जहां क़रीब 50 परिवार रहते हैं. यहां कभी पुलिस एकेडमी हुआ करती थी.

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इमेज कैप्शन, मौत की सज़ा सुबह छह बजे से सात बजे के बीच दी जाती है.

मां-बाप को किस बात का है डर

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पुराने पुलिस सेंटर की जगह बसी बस्ती की निवासी फ़ार्तुन मोहम्मद इस्माइल कहती हैं, "मेरे पांच छोटे बेटे जैसे ही स्कूल से घर आते हैं वे बीच पर फ़ुटबॉल खेलने चले जाते हैं."

वो कहती हैं, "वे गोलपोस्ट को मौत की सज़ा देने के खंभे के तौर पर इस्तेमाल करते हैं."

"मैं अपने बच्चों की सेहत के लिए चिंतित रहती हूं क्योंकि वे वहीं खेलते हैं जहां लोगों को गोली मारी जाती है और खून फैला होता है. सज़ा देने के बाद उस जगह को साफ़ नहीं किया जाता."

जो लोग मारे जाते हैं उनको उसी तट पर दफ़ना दिया जाता है.

वो बोलीं, "मेरे बच्चे हिंसा और असुरक्षा में पले बढ़े क्योंकि वो मोगादिशू में पैदा हुआ थे. यह शहर 33 सालों से हिंसाग्रस्त रहा है."

फिर भी वो और अन्य मां बाप भी महसूस करते हैं कि सज़ायाफ़्ता अपराधियों के खून में खेलना, ये कुछ ज़्यादा ही है.

हालांकि बच्चों को बीच पर खेलने से रोकना मुश्किल काम है क्योंकि उनके मां बाप रोज़मर्रा के काम में जुटे होते हैं और बच्चों की देखभाल के लिए उनके पास समय नहीं होता.

ये मौत की सज़ाएं आम तौर पर सुबह छह से सात बजे के बीच दी जाती हैं.

इस दौरान सज़ा दिए जाने को देखने के लिए केवल पत्रकारों को बुलाया जाता है लेकिन बच्चों समेत स्थानीय लोगों को वहां इकट्ठा होकर देखने की रोक टोक नहीं है.

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बच्चे कहीं गोली का शिकार ना हो जाएं

असल में सियाद बार्रे जब राष्ट्रपति बने तो उन्होंने 1975 में इस जगह को मौत की सज़ा देने वाली जगह के तौर पर चुना ताकि आस पास के लोग इसे देख सकें.

उनकी सैन्य सरकार ने कुछ इस्लामिक मौलानाओं को गोली मारने के लिए इन खंभों को बनाया था जिन्होंने विरासत में लड़के और लड़कियों को बराबर का हक़ दिए जाने के एक नए पारिवारिक क़ानून का विरोध किया था.

आज केवल वे खंभे बचे हैं, हालांकि अब भीड़ को उस तरह से प्रोत्साहित नहीं किया जाता.

अभिभावकों को इस बात का डर है कि इस मैदान पर खेल रहे बच्चे भी गोली का शिकार ना हो जाएं.

वे कहते हैं कि उनके बच्चे पुलिस और सैनिकों से डरते हैं.

इस मैदान से कुछ ही मीटर की दूरी पर रहने वाली फ़ादुमा अब्दुल्लाही क़ासिम स्वीकार करती हैं, "मुझे रातों को नींद नहीं आती और बहुत बेचैनी महसूस होती है. कभी कभी मैं अल सुबह गोलियों की आवाज़ सुनती हूं और पता चलता है कि किसी को मौत की सज़ा दी गई है."

वो कहती हैं, "मैं अपने बच्चों को घर के अंदर ही रखती हूं. हम दुखी और बेबस हैं. मैं बाहर नहीं जाना चाहती और रेत में रिसते खून को नहीं देखना चाहती."

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छुट्टी वाले दिन जुटती है लोगों की भीड़

हालांकि यहां रहने वाले बहुत से लोग बहुत डरे हुए रहते हैं लेकिन अधिकांश सोमाली मौत की सज़ा का समर्थन करते हैं, ख़ासकर अल-शबाब के सदस्य.

क़ासिम इसका विरोध करती हैं क्योंकि अक्टूबर 2022 में मोगादिशू में हुए दोहरे कार बम विस्फ़ोट में उनका 17 साल का बेटा मारा गया था, जो एक स्नैक बार में सफ़ाई का काम करता था.

इस घटना में 120 लोग मारे गए थे और 300 लोग घायल हुए थे. इसके लिए अल-शबाब पर आरोप लगे.

वो कहती हैं, "जिन लोगों को मौत की सज़ा दी जाती है, उन्हें मैं निजी तौर पर नहीं जानती लेकिन मैं मानती हूं कि यह तरीक़ा बेहद अमानवीय है."

इस तट पर लगे खंभों के पास केवल आस पड़ोस के बच्चे ही नहीं खेलते, बल्कि सोमालिया में छुट्टी के दिन शुक्रवार को ख़ास तौर पर शहर के अन्य हिस्सों से लोग यहां आते हैं.

इन्हीं में से 16 साल के अब्दिरहमान आदम कहते हैं, " तैरने और फ़ुटबॉल खेलने के लिए मैं और मेरा भाई हर शुक्रवार को तट पर आते हैं. मेरी बहन भी आती है और बढ़िया कपड़े पहने होती है ताकि जब हम उसकी तस्वीर लें तो वो ख़ूबसूरत दिखे."

वो और उनके जैसे अन्य लोग जो यहां आते हैं, वे जानते हैं कि यहां मौत की सज़ा दी जाती है और उनकी कब्रें कहां है, लेकिन इसके बावजूद वो आते हैं.

उनके लिए जगह का ख़ूबसूरत होना अधिक अहम है.

आदम कहते हैं, "हमारे सहपाठी जब ये तस्वीरें देखते हैं तो उन्हें जलन होती है. वे नहीं जानते हैं कि हम मौत की सज़ा देने वाली जगह पर मस्ती कर रहे हैं."

(नईमा सईद सलाह सोमालिया के एकमात्र महिला मीडिया हाउस, बिलान मीडिया में पत्रकार हैं.)

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