डिजिटल नोमेडः दुनिया घूमने के साथ करियर बनाते ये लोग कौन हैं?

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- Author, फ़ातिमा फ़रहीन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
बचपन में शायद हम सब का सपना होता है कि बड़े होकर पूरी दूनिया घूमना है. लेकिन फिर बड़े होते-होते पढ़ाई-लिखाई, नौकरी, घर बसाना, पैसा कमाना...इन सब चीज़ों में ज़िंदगी उलझ कर रह जाती है.
दुनिया घूमने और देखने का सपना, दिल में दबा-कुचला अरमान बन कर रह जाता है.
लेकिन क्या आपको पता है कि आप डिज़िटल नोमेड का हिस्सा बन कर दुनिया का हर कोना घूम भी सकते हैं और साथ ही नौकरी भी कर सकते हैं.
कौन होते हैं डिजिटल नोमेड?

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आपने हिंदी फ़िल्मों में बंजारों को ज़रूर देखा होगा. या फिर ख़ानाबदोश लफ़्ज़ ज़रूर सुना होगा.
डिजिटल नोमेड भी बंजारों या ख़ानाबदोश लोगों की तरह ज़िंदगी गुज़ारते हैं और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में घूमते रहते हैं. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि आधुनिक बंजारों के पास मोबाइल, लैपटॉप और उनमें हाईस्पीड इंटरनेट की सुविधा भी होती है जिसकी मदद से वो अपनी पसंदीदा नौकरी भी करते हैं.
डिजिटल नोमेड का सफ़र

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कहा जाता है कि स्टीवन के रॉबर्ट्स दुनिया के पहले डिजिटल नोमेड थे. उन्होंने 1983 से 1991 के बीच पूरे अमेरिका में साइकिल पर क़रीब दस हज़ार किलोमीटर का सफ़र किया. उनके पास रेडियो और दूसरे उपरकरण थे जिनके ज़रिए वो काम भी करते थे. 90 के दशक में डिजिटल नोमेड शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा. कंप्यूटर, इंटरनेट, लैपटॉप, टैबलेट्स के बढ़ते इस्तेमाल ने इसको और बढ़ावा दिया.
कार्ल मैलामड ने 1992 में लिखे अपने ट्रैवेलॉग 'एक्सप्लोरिंग द इंटरनेट' में पहली बार डिजिटल नोमेड शब्द का इस्तेमाल किया.
1997 में सुगियो माकिमोटो और डेविड मैनर्स ने डिजिटल नोमेड के नाम से एक किताब लिखी. उसके बाद से ना केवल इस शब्द का इस्तेमाल बढ़ता गया, बल्कि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती गई.
अमेरिकी कंपनी एमबीओ पार्टनर्स की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में फ़िलहाल एक करोड़ 73 लाख वर्कर्स डिजिटल नोमेड हैं और क़रीब दो करोड़ 40 लाख लोग अगले दो से तीन सालों में डिजिटल नोमेड बनने की ख़्वाहिश रखते हैं.
डिजिटल नोमेड का बढ़ता कारोबार

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2023 में किए गए एक सर्वे के अनुसार डिजिटल नोमेड वैश्विक अर्थव्यवस्था में क़रीब 787 अरब डॉलर का योगदान करते हैं.
जैसे-जैसे डिजिटल नोमेड का चलन बढ़ने लगा वैसे-वैसे इस जुड़े कारोबार भी बढ़ते गए.
सेफ़्टीविंग एक स्टार्टअप है जो दूर-दराज़ इलाक़ों से काम करने वाले प्रोफ़ेशनल्स के लिए ट्रैवल, स्वास्थ और मेडिकल इंश्योरेंस की सुविधा देती है.
उनका कहना है कि उन्होंने पिछले साल क़रीब ढाई करोड़ डॉलर का कारोबार किया. सेलिना डिजिटल नोमेड लोगों के लिए हॉस्टल और होटल की एक ग्लोबल चेन है.
उसने साल 2022 में 18 नई जगहों पर अपना काम शुरू किया. उसकी सालाना रिपोर्ट बताती है कि कंपनी के कारोबार में साल 2021 की तुलना में साल 2022 में क़रीब 98 फ़ीसद का इज़ाफ़ा हुआ.
जर्मनी के रहने वाले जोहानेस वोएल्कनर ने 2015 में नोमेड क्रूज़ शुरू की. यह डिजिटल नोमेड लोगों के लिए पहली मोबाइल कॉन्फ़्रेंस थी. यह लोग दुनिया भर में घूमते हैं और इस दौरान अपने स्कील को एक दूसरे से शेयर करते हैं, नेटवर्किंग करते हैं और सबसे बड़ी बात कि साथ मिलकर ज़िंदगी के मज़े लेते हैं.
भारत और डिजिटल नोमेड

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ज़ाहिर है जब पूरी दुनिया में यह सब हो रहा है तो भारत इससे अलग कैसे रह सकता था.
भारत में भी डिजिटल नोमेड का चलन बढ़ रहा है. ना सिर्फ़ ये कि कई भारतीय इस तरफ़ आकर्षित हो रहे हैं बल्कि भारत भी दुनिया भर के डिजिटल नोमेड्स की एक पसंदीदा लोकेशन बनता जा रहा है.
उदयपुर के रहने वाले मयंक पोखरना ख़ुद को एक डिजिटल नोमेड कहते हैं. उन्होंने 2015 में पढ़ाई ख़त्म करने के बाद बंगलुरु से अपने करियर की शुरुआत की. उन्हें वहां घर तलाशने में दिक़्क़त हुई तो उन्होंने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर को-लिविंग कंपनी बनाई. कुछ दिन नौकरी और कंपनी साथ-साथ चलती रही फिर 2017 में नौकरी छोड़ दी और कंपनी में फ़ुलटाइम लग गए.
लेकिन कोरोना के बाद कंपनी बंद कर दी और फ़्रीलांसिंग करने लगे. अब तक वो भारत के कई शहरों के अलावा दुनिया के दस से ज़्यादा देशों में रह कर काम कर चुके हैं. वो कहते हैं कि वो हर जगह अपनी पत्नी के साथ जाते हैं. वो भी काम करती हैं.
बीबीसी से उन्होंने कहा कि डिजिटल नोमेड किसी भी देश में नागरिकों और सैलानियों के बीच की एक कड़ी हैं. पर्यटक तो कुछ दिनों के लिए आते हैं लेकिन डिजिटल नोमेड ज़्यादा दिनों के लिए आते हैं. ये लोग कुछ महीनों से लेकर कई बार एक दो साल भी एक जगह रह जाते हैं.
सबसे ज़रूरी क्या है?

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उनके अनुसार भारत में वो तमाम ख़ूबियां हैं जो भारत को डिजिटल नोमेड्स के लिए एक अपकमिंग डेस्टिनेशन बनाता है.
उनके अनुसार हाईस्पीड इंटरनेट सबसे बुनियादी ज़रूरत है और भारत में पिछले कुछ सालों में इस क्षेत्र में काफ़ी तरक़्क़ी हुई है.
भारत सरकार पर्यटकों को लुभाने के लिए इतना सारा पैसे ख़र्च करती है. मयंक का कहना है कि डिजिटल नोमेड लोकल कल्चर और इकोनॉमी दोनों के साथ इंटीग्रेट करते हैं. इसलिए अगर सरकार इस ओर थोड़ा सा भी ध्यान देगी तो इसका ज़्यादा रिटर्न मिलेगा.
वो कहते हैं कि भारत इतना बड़ा देश है, यहां इतने तरह के मौसम हैं कि पूरी दुनिया से यहां आकर लोग साल भार मौसम के हिसाब से अलग-अलग हिस्सों में रह सकते हैं.
उनके अनुसार इसमें विदेशों से भारत आने वाले डिजिटल नोमेड्स का भी फ़ायदा है, क्योंकि यहां ख़र्च कम है.
अगर वो विदेशी कंपनियों के लिए काम करते हुए डॉलर या पाउंड में कमा रहें हैं तो भारत में रहना उनके लिए बहुत फ़ायदेमंद होगा.
मयंक का कहना है कि उन्हें लगता है कि इसका सबसे ज़्यादा फ़ायदा यह हो रहा है कि दुनिया में भारत के बारे में जो ग़लतफ़हमियां थीं, अब वो दूर हो रही हैं.
स्किल तो चाहिए ही. लेकिन सबसे ज़रूरी है अनुशासन. वो कहते हैं कि आपको हर महीने दो महीने पर जगह बदलना है. इसलिए आपको अपनी फ़िटनेस का सबसे ज़्यादा ध्यान रखना है. उनके अनुसार अपने जितना कम सामान लेकर चलें उतना ही आपको आराम होगा.
भारत का नोमेड गांव
मयंक पोखरना अगर भारत को डिजिटल नोमेड्स के लिए अपकमिंग डेस्टिनेशन कह रहे हैं तो शायद एक वजह है नोमेड गांव.
महाराष्ट्र के छोटे से शहर कोल्हापुर के रहने वाले मयूर सोनटाके ने नोमेड गांव की स्थापना की है.
2014 तक भारत में कॉर्पोरेट जॉब करने वाले मयूर ने एक अमेरिकी कंपनी के लिए रिमोट काम किया यानी वर्क फ़्रॉम होम.
उनका कहना है कि 2016 से उनके डिजिटल नोमेड बनने का सफ़र शुरू हुआ.
नेपाल से पहल करते हुए उन्होंने दक्षिण पूर्व एशियाई देशों का रुख़ किया. 2017 से उन्होंने विदेशी लोगों को भारत आने की दावत देना शुरू किया.
फिर उन्होंने गोवा सरकार के साथ मिलकर काम किया और साल 2019 में नोमेड गांव की स्थापनी की.
बीबीसी से उन्होंने कहा कि डिजिटल नोमेड लोगों की तीन सबसे अहम मांगें होतीं थीं. पहला हाईस्पीड इंटरनेट, दूसरा उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता होती थी और तीसरा घर से दूर रहकर अकेलेपन का एहसास.
मयूर ने उन्हें इन तीनों मामलों में आश्वस्त कराया. लेकिन कुछ ही महीनों बाद कोरोना महामारी आ गई. इस दौरान विदेशी तो नहीं आ सके लेकिन भारत के कई लोग उनके यहां पहुंचे. आज उनके यहां आधे भारतीय हैं तो आधे तीस से ज़्यादा देशों के विदेशी लोग हैं.
मयूर का मानना है कि भारत में डिजिटल नोमेड्स बढ़ रहे हैं जिनमें भारत के लोग भी शामिल हैं और एक बड़ी संख्या विदेशियों की भी है.
भारत में इसके बढ़ते चलन के लिए वो कई सकारात्मक वजहों को गिनाते हैं.
भारत में नौजवान लोगों की तादाद बहुत ज़्यादा है.
लोग देर से शादी कर रहे हैं और बच्चों को लेकर भी कोई बहुत ज़्यादा उत्साहित नहीं हैं. इसलिए कपल्स इस तरह के मौक़ों को हाथ से जाने नहीं देना चाहते हैं.
भारत में संभावनाएं

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भारत और दुनिया में तकनीकी डेवेलपमेंट हो रहा है. इंटरनेट की सुविधा दुनिया के कई दूसरे देशों के मुक़ाबले भारत में बेहतर हैं. उदाहरण के लिए ज़ूम या गूगल मीट और नए-नए टूल्स आ रहे हैं.
पिछले कुछ सालों में लोगों की आमदनी बढ़ी है. इससे युवाओं के पास डिसपोज़ेबल इनकम बढ़ी है.
युवाओं में रिस्क लेने की क्षमता बढ़ रही है. उनमें फ़्रीलांसर बनने या फिर स्टार्टअप खोलने की हिम्मत बढ़ रही है.
उनके अनुसार अगले पांच-दस सालों में भारत में डिजिटल नोमेड्स की संख्या में काफ़ी इज़ाफ़ा होगा.
उसकी एक ख़ास वजह बताते हुए वो कहते हैं कि फ़िलहाल जो युवा फ़्रीलांसर या रिमोट इलाक़े से काम कर रहे हैं या डिजिटल नोमेड हैं, वो अगले कुछ सालों में मैनेजर बनेंगे.
वो अभी के मैनेजर्स की तुलना में उन युवाओं पर ज़्यादा यक़ीन करेंगे जो रिमोट एरिया से काम करना चाहेंगे.
इसलिए अगली बार अगर आप बाली या गोवा के बीच पर किसी को प्रिंटेड शर्ट में नारियल पानी पीते हुए देखें तो उन्हें सिर्फ़ विदेशी पर्यटक नहीं समझें, हो सकता है कि वो एक डिजिटल नोमेड हों.
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