डॉक्टर आंबेडकरः जिन्होंने जाति को महिलाओं के नज़रिए से देखा और समझा था

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- Author, अदिति नारायणी पासवान
- पदनाम, असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, दिल्ली यूनिवर्सिटी
- Author, निखिल अद्सुले
- पदनाम, पीएचडी छात्र आईआईटी दिल्ली
डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्हें आज भी पूरी तरह समझना बाकी है.
अगर भारत की अवधारणा और उसकी नींव के ढांचे को समझना है तो इसके लिए ज़रूरी है कि हम डॉक्टर आंबेडकर के कामों के बारे में जानें, बजाय इसके कि पहचान के आधार पर की जाने वाली नारेबाज़ी को देखें.
डॉक्टर आंबेडकर ने कभी भी औपनिवेशिक व्यवस्था को अपनी सोच, अकादमिक करियर या सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों का केंद्र नहीं माना. उन्होंने जाति व्यवस्था पर अपने विचार रखते हुए नस्ल और कुल से जुड़े सिद्धांतों को सख़्ती से ख़ारिज किया.
उनके समय में छात्रों के लिए अमेरिका को पढ़ाई के लिए चुनना असामान्य था.
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फिर भी डॉक्टर आंबेडकर ने अपने अकादमिक करियर की शुरुआत में ही अमेरिका को चुना ताकि ब्रिटिश औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली से अलग दृष्टिकोण विकसित कर सकें.
उन्हें लगता था कि ब्रिटिश शिक्षा व्यवस्था में धर्मशास्त्र और सौंदर्यशास्त्र का असर है और यह औपनिवेशिक तरीकों से ज्ञान फैलाती थी.
जाति नस्लीय है या लैंगिक?

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डॉक्टर आंबेडकर ने जाति व्यवस्था और उसके रोज़मर्रा के सामाजिक असर को अपनी पूरी ज़िंदगी महसूस किया था. 1913 से 1916 तक जब वे कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे, तब वहां जॉन ड्यूई, फ्रांज़ बोआस, जेम्स शॉटवेल और एडविन सेलिगमैन जैसे बड़े बुद्धिजीवी मौजूद थे.
इस माहौल में उन्होंने जाति व्यवस्था की सोच और प्रथाओं पर एक रचनात्मक और आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित किया. कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रवास के दौरान उन्हें वहां से करीब एक मील दूर हार्लेम को समझने का मौका मिला, जिसने नस्लीय मुद्दों की उनकी समझ विकसित की.
इसी वजह से डॉक्टर आंबेडकर ने जाति व्यवस्था को औपनिवेशिक और नस्लीय नज़रिए से देखने को ख़ारिज कर दिया. अपने पहले रिसर्च पेपर 'भारत में जातियां' में उन्होंने हर्बर्ट रिस्ले की औपनिवेशिक सोच को नकारा, जो जाति को विकासवाद और यूजेनिक्स से जोड़ती थी.
यही नहीं उन्होंने सेनार्ट, नेसफील्ड और भारतीय समाजशास्त्री एसवी केतकर के जाति संबंधी सिद्धांतों को भी ख़ारिज किया. इसके बजाय उन्होंने जाति व्यवस्था को लैंगिक और सांस्कृतिक-मानसिक दृष्टिकोण से समझाया.
समाजशास्त्री गेब्रियल टार्डे के 'अनुकरण के नियम' के आधार पर उन्होंने बताया कि जाति व्यवस्था की जड़ एंडोगैमी (सिर्फ़ अपनी जाति में शादी) है, जो महिलाओं के शरीर पर मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक नियंत्रण के ज़रिए काम करती है.
अपनी व्यवहारिक अर्थशास्त्र की समझ के चलते उन्होंने इसे समझाने के लिए आदमी और महिला के श्रम से उत्पन्न उत्पादों का सहारा लिया.
महिलाओं को केंद्र में रखकर जाति व्यवस्था को समझना उस समय एक क्रांतिकारी विचार था, जिसने जाति को नस्लीय आधार पर देखने की सोच को चुनौती दी.
इस तरह डॉक्टर आंबेडकर ने औपनिवेशिक, पुरुष-प्रधान और विक्टोरियन नैतिकता पर आधारित जाति व्यवस्था को चुनौती दी और 'निष्क्रिय महिला' की धारणा को तोड़ते हुए महिलाओं को अपनी आवाज़ उठाने का आधार दिया.
जाति को भारतीय दृष्टिकोण से समझना

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डॉक्टर आंबेडकर के लैंगिक विचारों को तब और गहराई से समझा जा सकता है जब हम उनके मनोवैज्ञानिक आयामों को देखते हैं.
ये विचार संक्षेप में लेकिन ज़्यादा स्पष्टता के साथ उनके अन्य लेखन में भी मिलते हैं, जैसे कि 'जाति का विनाश (Annihilation of - 1936), 'शूद्र कौन थे' (Who Were the Shudras?- 1946) और 'अछूत- कौन थे और वह अछूत क्यों बने' (The Untouchables - Who Were They and Why They Became Untouchables? 1948).
'जाति का विनाश' में उन्होंने साफ़ कहा कि जाति को नस्ल से जोड़ना 'तथ्यों का बड़ा विकृतिकरण' है और 'जाति व्यवस्था नस्लीय विभाजन नहीं करती.'
इस लेख में उनके शिक्षक जॉन ड्यूई के विचारों की झलक मिलती है. प्रोफेसर स्कॉट आर स्ट्राउड ने अपनी किताब में बताया है कि डॉक्टर आंबेडकर ने ड्यूई से बौद्धिक प्रेरणा ली.
व्यवहारवाद के प्रमुख विचारक डॉक्टर आंबेडकर व्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक अनुभव और शिक्षा से प्रेरित थे, जिन्हें वह मनोविज्ञान को समझने और सामाजिक बदलाव लाने की कुंजी मानते थे.
इसलिए डॉक्टर आंबेडकर ने मनोविज्ञान की भूमिका को महत्व दिया और उनका कहा प्रसिद्ध भी है कि 'जाति एक धारणा है; यह मन की अवस्था है.'
अपने एक गुरु, महात्मा जोतिबा फुले को समर्पित अपनी किताब 'शूद्र कौन थे?' में डॉक्टर आंबेडकर ने सांस्कृतिक संघर्ष को ऐतिहासिक दृष्टिकोण से समझाया.
उन्होंने कहा कि जाति की नस्लीय उत्पत्ति का दावा वैज्ञानिक खोजों और जांचों को ख़राब करना है. इसे नस्लीय आक्रमण की थ्योरी को सही ठहराने और औपनिवेशिक नस्लीय ढांचा बनाए रखने के लिए इस्तेमाल किया गया है.
महिलाओं को लेकर पुरानी धारणाओं को तोड़ा

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'अछूत- कौन थे और वह अछूत क्यों बने' में उन्होंने बताया कि जाति व्यवस्था का एक पहलू छुआछूत, मनोवैज्ञानिक और व्यवस्थागत गुलामी है. इसमें सचेत रूप से जाति की ताक़त का इस्तेमाल करके जातिगत गुलामी को अवचेतन रूप से कायम रखा गया.
ड्यूई के शिक्षा पर ज़ोर देने की समझ का इस्तेमाल करते हुए, आंबेडकर ने समझाया कि औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली ने जातिगत मान्यताओं को नए रूप और भाषा में मज़बूत किया है ताकि लोगों के मन गुलामी वाली सोच में बंधे रहें.
एक मुखर व्यवहारवादी डॉक्टर आंबेडकर इन अन्यायों का विरोध करने के लिए दृढ़ संकल्पित थे, चाहे वह लैंगिक स्तर पर हों, मनोवैज्ञानिक स्तर पर या सांस्कृतिक स्तर पर.
औपनिवेशिक शासन के दौर में ही उन्होंने अपने नए विचार विकसित किए. उन्होंने कभी-कभी औपनिवेशिक व्यवस्था के तरीकों और ज्ञान-प्रणाली का रणनीतिक उपयोग भी किया.
साथ ही अंग्रेज़ी भाषा की समझ को बेहद सूझ-बूझ से अपनाया ताकि लोगों को शिक्षित करें और औपनिवेशिक शासन के ख़िलाफ़ संगठित करें, आंदोलित करें.
उनके सामाजिक आंदोलन महिलाओं की पुरानी धारणाओं को तोड़ने और उन्हें फिर से गढ़ने पर केंद्रित थे.
यह उनके महिलाओं को दिए गए विशेष भाषणों में दिखता है, ख़ासकर मराठी में, ताकि उनके विचार सीधे महिलाओं तक पहुंच सकें.
उन्होंने शिक्षा पर ज़ोर दिया, क्योंकि शिक्षा ही वह शक्ति है जो दिमाग़ को आज़ाद कर सकती है और लोगों को यह समझने में मदद कर सकती है कि समाज में कौन-सी व्यवस्थाएं और विचारधाराएं काम कर रही हैं.
जीवन के अंत में, उन्होंने बौद्ध धर्म को अपनाया. उनके विचारों में हमेशा भाईचारे पर आधारित सोच और लोकतंत्र को जीने का तरीका शामिल था.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















