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ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का पहला साल भविष्य के बारे में क्या संकेत देता है?
- Author, लीस डूसेट
- पदनाम, चीफ़ इंटरनेशनल कॉरेस्पॉन्डेंट, बीबीसी
अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही दिन, उन्होंने दुनिया को साफ़-साफ़ संदेश दिया था. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ज़ोरदार तालियों के बीच घोषणा की, "हमारे रास्ते में कुछ भी रुकावट नहीं बनेगा."
यह एलान उन्होंने पिछले साल 20 जनवरी के दिन, वॉशिंगटन की कड़ाके की ठंड में, अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत पर दिए भाषण में किया था.
लेकिन सवाल यह है क्या दुनिया ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया था?
उस भाषण में एक ऐसी बात भी थी, जो ज़्यादा चर्चा में नहीं आई. ट्रंप ने 19वीं सदी के सिद्धांत 'मैनिफेस्ट डेस्टिनी' का ज़िक्र किया. इस विचार के मुताबिक अमेरिका को ईश्वरीय आदेश मिला है कि वह पूरे महाद्वीप में अपने क्षेत्र का विस्तार करे और अपने आदर्श फैलाए.
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उस वक्त उनकी नज़र पनामा नहर पर थी. ट्रंप ने ऐलान किया था, "हम इसे वापस ले रहे हैं."
अब वही घोषणा, वही दृढ़ संकल्प, ग्रीनलैंड के बारे में है - "हमें यह चाहिए ही."
यह नया मंत्र है. और ऐसे समय में एक झकझोर देने वाली चेतावनी है, जब हालात पहले ही बेहद ख़तरनाक दौर से गुज़र रहे हैं.
सबसे ज़्यादा बदलाव लाने वाले राष्ट्रपति
अमेरिकी इतिहास ऐसे मामलों से भरा पड़ा है, जब अमेरिका ने दूसरे देशों पर चढ़ाई की, कब्ज़ा किया या पर्दे के पीछे से सत्ता पलटने की कोशिशें कीं. लेकिन पिछली एक सदी में ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने किसी पुराने सहयोगी देश की ज़मीन हड़पने और वहां की जनता की इच्छा के ख़िलाफ़ शासन करने की खुली धमकी दी हो.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था जिन राजनीतिक मर्यादाओं और साझेदारियों पर टिकी रही, उन्हें इस कदर बेरहमी से तोड़ने की धमकी भी किसी अमेरिकी नेता ने नहीं दी.
इसमें कोई शक नहीं कि अब पुराने नियम खुलेआम तोड़े जा रहे हैं, और वह भी बिना किसी डर के. आज ट्रंप को अमेरिका के शायद सबसे ज़्यादा 'बदलाव लाने वाले' राष्ट्रपति के रूप में देखा जा रहा है.
देश और विदेश में उनके समर्थक तालियां बजा रहे हैं, दुनिया भर की राजधानियों में चिंता की लहर है, और मॉस्को व बीजिंग चुपचाप सब कुछ देख रहे हैं.
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने दावोस आर्थिक मंच पर, ट्रंप का नाम लिए बिना, बहुत सख़्त शब्दों में चेतावनी दी, "यह एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ना है जहां कोई नियम नहीं बचेगा, जहां अंतरराष्ट्रीय क़ानून को कुचला जाएगा, और जहां वही क़ानून चलेगा जो सबसे ताक़तवर होगा, एक बार फिर साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं के उभार के साथ."
अब एक संभावित, तकलीफ़देह व्यापार युद्ध को लेकर चिंता तेज़ी से बढ़ रही है. कुछ हलकों में तो यह डर भी है कि, स्थिति इतनी ख़राब हुई कि अमेरिका के सर्वोच्च कमांडर ने ग्रीनलैंड को बलपूर्वक लेने की कोशिश की, तो 76 साल पुराना नेटो सैन्य गठबंधन खतरे में पड़ सकता है.
वहीं ट्रंप के समर्थक, युद्ध के बाद बनी बहुपक्षीय वैश्विक व्यवस्था के ख़िलाफ़, उनके 'अमेरिका फर्स्ट' एजेंडे के समर्थन में और ज़्यादा मजबूती से खड़े हो रहे हैं.
बीबीसी न्यूज़आवर में जब यह सवाल पूछा गया कि क्या ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन होगा, तो रिपब्लिकन सांसद रैंडी फ़ाइन ने साफ़ कहा, "मुझे लगता है कि दुनिया में शांति बनाए रखने के एक मंच के रूप में संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह नाकाम रहा है. और सच कहें तो, वे चाहे जो भी सोचें, शायद उसका ठीक उलटा करना ही सही रास्ता है."
'पारंपरिक राजनेता नहीं'
पिछले हफ़्ते रैंडी फ़ाइन ने अमेरिकी कांग्रेस में 'ग्रीनलैंड ऐनेक्सेशन एंड स्टेटहुड एक्ट' नाम का एक विधेयक भी पेश किया. ऐसे में सवाल यह है, जब लगता है कि ट्रंप के रास्ते में कोई भी चीज़ रुकावट नहीं बनेगी, तो अमेरिका के बेचैन सहयोगी देशों की प्रतिक्रिया क्या हो?
पिछले साल भर में, अमेरिका के अनिश्चित और अप्रत्याशित राष्ट्रपति और कमांडर इन चीफ़ से निपटने के तरीकों पर कूटनीतिक हलकों में तरह-तरह के जुमले सुनाई दिए हैं.
ऐसे लोग जो इस बात पर ज़ोर देते हैं कि बातचीत के ज़रिये सब कुछ सुलझाया जा सकता है, कहते हैं, "हमें उन्हें गंभीरता से लेना चाहिए, लेकिन उनके हर शब्द को शब्दशः नहीं."
ट्रंप अक्सर हफ़्ते दर हफ़्ते अपना रुख़ बदलते दिखते हैं, कभी वह रूस के क़रीब खड़े होकर बातें करते हैं, फिर यूक्रेन के पक्ष में झुके दिखते हैं, और फिर अचानक वापस रूस की ओर लौट जाते हैं.
उनके समर्थक इसे उनके कारोबारी अंदाज़ से जोड़ते हैं.
ट्रंप के इस अतिवादी रुख़ को कुछ लोग न्यूयॉर्क में उनके प्रॉपर्टी डील्स के दिनों की मोलभाव वाली रणनीति का हिस्सा बताते हुए कहते हैं, "वह एक रियल एस्टेट टाइकून हैं."
इसकी गूंज ईरान के ख़िलाफ़ उनकी बार-बार दी गई सैन्य कार्रवाई की धमकियों में भी सुनाई देती है, हालांकि यह साफ़ है कि सैन्य विकल्प अब भी उनके पास मौजूद है.
उनके शीर्ष कूटनीतिज्ञ और अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से जब बार-बार ट्रंप की रणनीति को लेकर सवाल किए जाते हैं तो वह जवाब देते हैं, "वह पारंपरिक राजनेता की तरह बात नहीं करते. वह कहते हैं, और फिर करके दिखाते हैं."
पिछले राष्ट्रपतियों के रिकॉर्ड को वह बेहद निराशाजनक बताते हुए, वे अपने राष्ट्रपति के लिए इसे सबसे बड़ी तारीफ़ के तौर पर पेश करते हैं.
'हमला नहीं करना चाहते, ख़रीदना चाहते हैं'
ट्रंप की ग्रीनलैंड को लेकर दी गई धमकियों को नरम करने की कोशिश करने वालों में विदेश मंत्री मार्को रुबियो सबसे अहम आवाज़ों में रहे हैं. वह लगातार इस बात पर ज़ोर देते रहे हैं कि ट्रंप ग्रीनलैंड पर हमला नहीं, बल्कि उस विशाल और रणनीतिक बर्फ़ीले भू भाग को खरीदना चाहते हैं.
रुबियो यह भी याद दिलाते हैं कि ट्रंप अपने पहले कार्यकाल से ही दुनिया के सबसे बड़े द्वीप को खरीदने के विकल्प तलाशते रहे हैं, खासतौर पर चीन और रूस से संभावित ख़तरों को संतुलित करने के लिए.
लेकिन ट्रंप के धौंस जमाने वाले अंदाज़, सामूहिक फैसलों के प्रति उनकी उपेक्षा और इस सोच से इनकार नहीं किया जा सकता कि 'जिसके पास ताक़त है, वही सही है.'
इकोनॉमिस्ट पत्रिका की प्रधान संपादक जैनी मिंटन बेडोज़ कहती हैं, "वह सौदे और ताक़त में यक़ीन करने वाले इंसान हैं - माफ़िया जैसी ताक़त में. उन्हें गठबंधनों का फ़ायदा नहीं दिखता. उन्हें यह बात समझ ही नहीं आती कि 'अमेरिका एक विचार है, कुछ मूल्यों का प्रतिनिधि है', और सच कहें तो, उन्हें इसकी कोई परवाह भी नहीं है."
और वह इसे छुपाते भी नहीं हैं.
इस महीने की शुरुआत में न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक लंबे इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा, "नेटो से रूस या चीन को कतई भी डर नहीं लगता. बिल्कुल भी नहीं. लेकिन हमसे, अमेरिका से, बहुत डरते हैं."
अगर मामला सिर्फ़ सुरक्षा का होता, तो अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में अपने सैनिकों की मौजूदगी रखता है. साल 1951 के एक समझौते के तहत वह वहां और सैनिक भेज सकता है. इसी के तहत अमेरिका वहाँ और सैन्य ठिकाने भी बना सकता है.
लेकिन ट्रंप इसे कहीं ज़्यादा सीधे शब्दों में कहते हैं, "मुझे इसे अपना बनाना है."
और वह बार-बार साफ़ करते हैं, "मुझे जीतना पसंद है."
अब इस बात के सबूत बढ़ते जा रहे हैं कि मामला असल में यही है.
'सेन वॉशिंग'
पिछले एक साल में उनकी नीतियों ने जो पलटियां मारी हैं, वे कई लोगों के लिए भ्रमित करने वाली रही हैं.
हमने देखा था कि पिछले साल मई में, अपने दूसरे कार्यकाल की पहली विदेश यात्रा पर सऊदी अरब की राजधानी रियाद में दिए गए ट्रंप के मुख्य भाषण को कितनी ज़बरदस्त प्रतिक्रिया मिली थी.
इस भाषण में ट्रंप ने अमेरिका के तथाकथित 'हस्तक्षेपवादियों' को निशाने पर लिया था. उन्होंने उन पर आरोप लगाया था कि उन्होंने जितने देशों को बनाया, उससे कहीं ज़्यादा देशों को बर्बाद कर दिया, वह भी ऐसे जटिल समाजों में, जिन्हें वे खुद ठीक से समझते तक नहीं थे.
जून में, जब इसराइल ने ईरान पर हमला किया, तो ख़बरों के मुताबिक ट्रंप ने इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू को चेताया कि तेहरान के ख़िलाफ़ सैन्य धमकियां देकर वह उनकी कूटनीति को जोखिम में न डालें.
लेकिन उसी हफ़्ते के अंत तक, जब ट्रंप ने देखा कि इसराइल ने ईरान के शीर्ष परमाणु वैज्ञानिकों और सुरक्षा अधिकारियों को मारने में कामयाबी हासिल कर ली है, तो उनका रुख़ पलट गया.
उन्होंने कहा, "मुझे लगता है यह शानदार रहा."
कुछ महीने पहले फाइनेंशियल टाइम्स के लेखक एडवर्ड लूस ने एक शब्द गढ़ा था 'सेन वॉशिंग' (बेतुकी या अतार्किक बात को तर्कसंगत दिखाने की कोशिश).
लूस कहते हैं कि दुनिया के देश ट्रंप को अपने पाले में करने की कोशिश में उन्हें सभ्य और समझदार दिखा रहे हैं. और कई नेता चापलूसी भरे शब्दों का इस्तेमाल करने हुए ट्रंप के दरवाज़े तक पहुँच रहे हैं. इसी को लूस सेन वॉशिंग बता रहे हैं.
लूस ने अपने ताज़ा लेख में लिखा, "ट्रंप के समर्थक, जो सच्चे आस्तिकों से संख्या में कहीं ज़्यादा हैं, दिन रात इस काम में लगे रहते हैं कि उनकी नीतियों को किसी तरह तर्कसंगत और सुसंगत दिखाया जा सके."
'डोनरो डॉक्ट्रिन'
इसका खुला प्रदर्शन पिछले साल अक्तूबर में देखने को मिला, जब दुनिया भर के नेताओं को मिस्र के लाल सागर तट पर स्थित रिज़ॉर्ट शहर शर्म अल शेख़ बुलाया गया.
मौका था ट्रंप की ज़ोरदार घोषणा का जश्न मनाने का. उन्होंने घोषणा की थी कि "आख़िरकार, 3,000 साल में पहली बार, मध्य पूर्व में शांति आ गई है."
उनकी शांति योजना के पहले अहम चरण के तहत ग़ज़ा में बेहद ज़रूरी संघर्ष विराम हुआ और इसराइली बंधकों की तत्काल रिहाई संभव हो सकी.
यह ट्रंप की कठोर और दबाव वाली कूटनीति ही थी, जिसने नेतन्याहू और हमास को, इस पर सहमत होने के लिए मजबूर किया. यह एक बड़ी कूटनीतिक सफलता थी, जिसे केवल ट्रंप ही अंजाम दे सकते थे. लेकिन अफ़सोस, यह शांति की शुरूआत नहीं थी. किसी ने सच्चाई वहां बयान नहीं की.
पिछले साल ट्रंप के रवैये को 'मैनिफेस्ट डेस्टिनी' के फ्रेम में देखा गया.
इस साल बात 19वीं सदी की शुरुआत के 'मोनरो डॉक्ट्रिन' की है, जो वेनेज़ुएला पर हमले के बाद, अपडेट होकर 'डोनरो डॉक्ट्रिन' बन चुकी है. यह सोच अब ट्रंप की अपनी बन चुकी है.
ट्रंप मानते हैं कि अमेरिका अपने इलाके में, और ज़रूरत पड़े तो उससे बाहर भी, अपने हितों के लिए खुलकर कदम उठा सकता है. उनकी टीम के उत्साही समर्थक भी इसमें उनका पूरा साथ दे रहे हैं.
ट्रंप के लिए एक नारा हमेशा मौजूद रहता है, वही नारा जिसने उन्हें दोबारा सत्ता में पहुंचाया, "मेक अमेरिका ग्रेट अगेन."
नॉर्वे के प्रधानमंत्री योनास गार स्टोरे को लिखे उनके पत्र में साफ़ दिखा कि इस साल नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने की कसक उन्हें कितनी गहराई से चुभी है.
ट्रंप ने स्टोरे को लिखा, "अब मुझे सिर्फ़ शांति के बारे में सोचने की बाध्यता महसूस नहीं होती, हालांकि वह हमेशा एक अहम पहलू रहेगी, लेकिन अब मैं इस बारे में भी सोच सकता हूँ कि संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए क्या अच्छा और उचित है."
जब मैंने इस पूरे मामले पर नॉर्वे के विदेश मंत्री एस्पेन बार्थ आइडे से सवाल किया, तो उन्होंने बड़ी कूटनीतिक ठंडक के साथ कहा, "आज नॉर्डिक मिज़ाज रखने का अच्छा दिन है."
कोई लिहाज नहीं...
ग्रीनलैंड और डेनमार्क की संप्रभुता, और आर्कटिक में सामूहिक सुरक्षा के सवाल पर, बर्फ़ सी सख़्ती के साथ नॉर्वे बेहद शांत रहा है. यूरोप की प्रतिक्रियाएं अब भी इस फिसलन भरी राजनीतिक बर्फ़ पर फैली हुई हैं.
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने यूरोपीय संघ के 'ट्रेड बाज़ूका' को दागने की धमकी दी है, यानी जवाबी टैरिफ़ और ईयू के मुनाफ़े वाले बाज़ार तक पहुंच सीमित करना.
इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी,जो ट्रंप की यूरोप में सबसे क़रीबी सहयोगियों में से एक मानी जाती हैं, इस पूरे विवाद को बस "समझ की कमी और संवाद की गड़बड़ी" बताकर टालती नज़र आईं.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर कीएर स्टार्मर ने ग्रीनलैंड की क्षेत्रीय अखंडता का ज़ोरदार और सार्वजनिक रूप से बचाव तो किया, लेकिन साथ ही वह पिछले एक साल में ट्रंप के साथ बने अपने मज़बूत निजी रिश्ते को बचाए रखना चाहते हैं, इसलिए वह जवाबी टैरिफ़ जैसे क़दमों से फिलहाल दूरी बनाए हुए हैं.
ट्रंप अब कोई लिहाज़ नहीं बरत रहे हैं और वह अब उन निजी संदेशों को भी सार्वजनिक कर रहे हैं, जो पुराने कूटनीतिक तरीके इस्तेमाल करते हुए दुनिया के नेता उन्हें भेज रहे हैं, ताकि किसी तरह उन्हें अपने पाले में बनाए रख सकें.
फ्रांस के राष्ट्रपति ने प्रस्ताव रखा , "अमेरिका लौटने से पहले गुरुवार को पेरिस में साथ डिनर करते हैं."
इसी संदेश में, दूसरी विदेश नीति की उपलब्धियों की तारीफ़ करते हुए, उन्होंने यह भी जोड़ा, "मुझे समझ नहीं आ रहा कि ग्रीनलैंड को लेकर आप क्या कर रहे हैं."
नेटो के महासचिव मार्क रुटे ने लिखा, "आपसे मिलने का इंतज़ार है."
वही रुटे, जिन्होंने पिछले साल ईरान इसराइल के 12 दिन चले युद्ध के दौरान, आक्रामक अंदाज़ में हालात संभालने पर, ट्रंप को कभी 'डैडी' तक कह दिया था.
रुटे और कई दूसरे नेताओं का कहना है कि ट्रंप की सीधी धमकियों ने ही नेटो देशों को बीते कुछ सालों में अपने रक्षा खर्च को काफ़ी हद तक बढ़ाने पर मजबूर किया है.
ये चेतावनियां ट्रंप के पहले कार्यकाल से ही दी जा रही हैं, और उन्होंने उस रुझान को रफ़्तार दी, जिसकी मांग पहले के अमेरिकी राष्ट्रपति भी करते रहे हैं, और जिसे रूस से संभावित ख़तरे की छाया में नेटो के सदस्य देश खुद भी शुरू कर चुके थे.
दुनिया तेज़ी से बदल रही है
अटलांटिक के उस पार, वह देश जो लंबे समय से अमेरिका की छाया में जीता आया है, वह अपनी चुनौतियों के बावजूद अब आगे के लिए एक अलग राह तलाशने की कोशिश कर रहा है.
पिछले हफ़्ते चीन यात्रा पर गए कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने बड़ी सादगी से कहा था, "हमें दुनिया को वैसा ही स्वीकार करना होगा जैसी वह है, न कि वैसी जैसा हम उसे देखना चाहते हैं".
यह 2017 के बाद बीजिंग की किसी कनाडाई नेता की पहली यात्रा थी. कई सालों के गहरे तनाव के बाद यह दौरा इस बात का साफ़ संकेत था कि दुनिया तेज़ी से बदल रही है.
इसी बीच, ट्रंप ने एक बार फिर वो वह अचंभित करने वाली धमकी दोहराई कि अमेरिका कनाडा में अपने में मिला सकता है.
उन्होंने सोशल मीडिया पर एक तस्वीर साझा की, जिसमें कनाडा और ग्रीनलैंड समेत पूरा पश्चिमी गोलार्ध, अमेरिकी झंडे की धारियों और सितारों से ढका हुआ दिखाया गया था.
कनाडाई नागरिक अच्छी तरह जानते हैं कि यह ख़तरा अब भी बना हुआ है और अगली बारी उनकी भी हो सकती है.
पूर्व बैंकर मार्क कार्नी पिछले साल कनाडा के सर्वोच्च पद तक इस भरोसे के साथ पहुंचे थे कि ट्रंप से निपटने के लिए वही सबसे सही नेता हैं.
शुरुआत में उन्होंने 'डॉलर के बदले डॉलर' की नीति अपनाई और जवाबी टैरिफ़ लगाए, लेकिन जल्द ही यह कनाडा की अपेक्षाकृत छोटी अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महंगा साबित होने लगा, क्योंकि देश के 70 फ़ीसदी से ज़्यादा व्यापार का रुख़ उसकी दक्षिणी सीमा के पार, अमेरिका की ओर है.
मंगलवार को जब कार्नी दावोस के मंच पर पहुंचे तो उन्होंने भी इस असहज और निर्णायक दौर पर खुलकर बात की.
उन्होंने कहा, "ख़ास तौर पर सार्वजनिक वस्तुओं, खुले समुद्री रास्तों, स्थिर वित्तीय व्यवस्था, सामूहिक सुरक्षा और विवाद सुलझाने के ढांचों के ज़रिये अमेरिकी प्रभुत्व अब तक मददगार ही रहा है".
इसके बाद उन्होंने बिल्कुल दो टूक कहा, "हम किसी सामान्य बदलाव के दौर में नहीं हैं, बल्कि एक गहरी दरार के बीच खड़े हैं."
इसी महीने न्यूयॉर्क टाइम्स ने जब उनसे पूछा कि आख़िर उन्हें कौन रोक सकता है, तो ट्रंप का जवाब था, "मेरी अपनी नैतिकता और मेरी अपनी सोच ही अकेली चीज़ है जो मुझे रोक सकती है."
यही कारण है कि आज उनके सहयोगियों की एक पूरी फ़ौज उन्हें मनाने, ख़ुशामद करने और ज़रूरत पड़ने पर दबाव बनाने में जुटी हुई है, ताकि वह अपना मन बदल सकें.
लेकिन इस बार तय नहीं है कि इस कोशिश में कामयाबी मिलेगी या नहीं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.