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'जीना यहां, मरना यहां', सालों से नावों में रह रहे हैं ये परिवार
- Author, लक्कोजू श्रीनिवास
- पदनाम, बीबीसी तेलुगु के लिए
इस नदी पर एक गांव बसा है. गांव में घर तैरते हुए दिखाई देते हैं, लेकिन उन घरों में न दीवारें हैं, न दरवाज़े. यहां कोई तय पता भी नहीं है, फिर भी यहां जीवन है.
दरअसल ये गांव आंध्र प्रदेश के पोलावरम ज़िले के चिंतूरू में सबरी नदी पर है. यहां कुछ परिवार नाव पर रह रहे हैं.
दशकों पहले कुछ लोगों ने चिंतूरू में सबरी नदी के तट तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी नाव से तय की थी.
ये कहानी है 11 मछुआरे परिवारों की, जो आंध्र प्रदेश के मारेडुमिल्ली वन क्षेत्र को पार करने के बाद, चिंतूरू में एक पुल के नीचे नावों पर अपना जीवनयापन करते हैं.
सबरी नदी पर बने पुल से कुछ नावें देखी जा सकती हैं. नावों के बीच से धुआं उठ रहा था. यहां काफी ठंड है. सुबह के पांच बजकर 45 मिनट हुए हैं. मुर्गे की आवाज़ नाव से आ रही है और लोग धीरे-धीरे जाग रहे हैं.
इन नावों पर रहने वाले लोग मछली पकड़ने का काम करते हैं. वो फिलहाल चाय पी रहे हैं और जब उन्होंने हमें इस ठंड में देखा तो हमें भी चाय ऑफ़र की.
हम यहां 'हरम्मातल्ली' नाम की नाव पर गए. इस पर सिम्हाद्री, वेंकटेश्वर राव और उनके दो बच्चे रहते हैं. आस-पास की दूसरी नावों में भी दूसरे परिवार धीरे-धीरे जग गए और रोजमर्रा का काम शुरू कर दिया.
इन नावों पर बसे लोगों का हाल जानने के लिए बीबीसी की टीम चिंतूरू पहुंची.
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नाव पर बसी दुनिया
नाव पर तुलसी का पौधा सूरज की रोशनी में चमक रहा है. वेंकटेश्वर राव ने अपनी पत्नी सिम्हाद्री को कंबल फोल्ड करने को कहा और चूल्हा जलाने के लिए लकड़ियां दीं. नाव के ऊपर तिरपाल लगा है.
उसके नीचे अलमारियां और चावल के बक्से हैं. तेल, सब्ज़ी और सभी घरेलू सामान व्यवस्थित रखे हुए हैं. नदी के किनारे बच्चे रेत पर खेल रहे हैं.
नावों पर किचन में पुरुष और महिलाएं एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं. कुछ नावें सामान लाने के लिए दूसरे किनारे पर जा रही हैं. वहीं, कुछ बच्चे तिरपाल के भीतर सो रहे हैं.
ये नावें यहां के कुछ परिवारों की पूरी दुनिया हैं.
सिम्हाद्री के माता-पिता का गृहनगर धवलेश्वरम है. ये गोदावरी नदी के तट पर स्थित है. वहां से उनके माता-पिता यहां आए.
सिम्हाद्री का जन्म यहीं चिंतूरू में हुआ था.
वो कहती हैं, "मां और पिताजी ने भी इस नाव में यात्रा की. यह नाव हमें मिली थी, तब ये यही हमारा जीवन है."
सिम्हाद्री कहती हैं, "मेरी मां को प्रसव के लिए इसी नाव से चिंतूरू के अस्पताल ले जाया गया. भले ही डिलीवरी अस्पताल में हुई लेकिन फिर मुझे इसी नाव पर वापस लाया गया. मैं यहीं बड़ी हुई हूं."
"मेरे बच्चे यहीं पैदा हुए और पले-बढ़े."
सिम्हाद्री के शब्दों में, "हमारे पास कोई विकल्प नहीं था, हमें जीविकोपार्जन के लिए यहां रहने के लिए मजबूर होना पड़ा."
शिक्षा के लिए नदी पार करना
मौजूदा समय में, इन नावों पर पैदा होने वाले नौ बच्चे यहां बड़े हो रहे हैं. वहीं दो बच्चे धवलेश्वरम में पढ़ रहे हैं. बच्चे नाव पर सवार होकर दूसरे किनारे जाते हैं. वे वहां सरकारी स्कूल में पढ़ाई करते हैं.
जैसे ही बच्चे स्कूल जाते हैं, उनके माता-पिता भी मछली पकड़ने निकल जाते हैं और जो मछली पकड़ते हैं, उनमें से कुछ खाने को रख बाकी को बेच देते हैं. उनके जीवन के हर पहलू का नाव एक अहम हिस्सा है.
सिम्हाद्री कहती हैं, "हमारे बच्चे हम जैसा नहीं बनना चाहते हैं. भले ही मैं अपनी जान गंवा दूं, मैं उनकी पढ़ाई नहीं रोकूंगी."
वहीं यहां रहने वाले महेश ने कहा, "हमारे बुजुर्गों ने हमें नाव दी. हम बच्चों को नदी पर जीवन नहीं बल्कि बेहतर ज़िंदगी देने की कोशिश कर रहे हैं."
फिलहाल इन 11 परिवारों की ज़िंदगी सबरी नदी पर ही निर्भर है. वे चाहते हैं कि बच्चों का भविष्य ऐसा न हो.
ये मछुआरे नावों को मंदिर मानते हैं.
महेश कहते हैं, "हम देवताओं के नाम पर नावों का नाम रखते हैं. नाव पर हम चप्पल पहनकर नहीं रहते हैं."
50 वर्षीय वेंकटेश्वर राव के पास तीन नावें हैं. वो बताते हैं, "एक नाव घर के लिए है, एक मछली पकड़ने के लिए है, और तीसरी नाव दरअसल उन दो नावों के क्षतिग्रस्त होने की स्थिति में इस्तेमाल के लिए है."
वह बताते हैं कि प्रत्येक नाव की कीमत एक लाख रुपये है.
वह कहते हैं, "यही हमारी संपत्ति है. यही हमारी विरासत भी है. मैं 40 साल से मछली पकड़ रहा हूं लेकिन कुछ भी नहीं कमाया है."
महेश बताते हैं, "हम दिन-रात मछली पकड़ने के आदी हैं, लेकिन हम डरते भी हैं. अगर रात में इलाज की ज़रूरत पड़े तो हम तुरंत नावों को बांध देते हैं और दूसरी तरफ डॉक्टरों के पास जाते हैं. और बाकी आपात स्थिति में हम भगवान भरोसे हैं."
महेश कहते हैं, "दिन में मछली पकड़ना अच्छा होता है, लेकिन जब अंधेरा हो जाता है तो नावों में बच्चे डर जाते हैं क्योंकि दूर से लोमड़ियों की आवाजें आती हैं. वे हमारे वापस आने तक डरते हुए इंतज़ार करते हैं. कभी-कभी, एक परिवार मछली पकड़ने के लिए हफ़्तों तक अलग-अलग जगहों पर रहता है."
अपने गृहनगर क्यों नहीं जाते?
अपने गृहनगर से 130 किलोमीटर दूर रहने वाले 11 परिवार एक महीने या दो महीने में एक बार धवलेश्वरम जाते हैं. नाव पर रहने वाले लोगों का कहना है कि चिंतूरू से धवलेश्वरम तक की यात्रा में एक हज़ार रुपये का खर्च आता है.
दुर्गाम्मा कहती हैं, "सिर्फ राशन लेने के लिए, हमें लगभग 1000 रुपये का भुगतान करना पड़ता है. 1000 खर्च कर हम धवलेश्वरम क्यों जाएंगे? जब राशन की तुलना में यात्रा खर्च अधिक है. लेकिन हमारे पास राशन कार्ड रहे इसलिए हम जाते हैं."
एक दूसरे मछुआरे, बुज्जी बाबू ने बताया, "दरअसल राशन कार्ड हमारी पहचान है. हम यह सुनिश्चित करने के लिए धवलेश्वरम जा रहे हैं कि इसे रद्द न किया जाए."
वहीं, दुर्गाम्मा कहती हैं, "लेकिन रिश्तेदार और दोस्त धवलेश्वरम से फंक्शन्स, जन्मदिन और शादियों के लिए आते हैं. सबरी नदी के रेत के टीलों पर सभी शुभ कार्य किए जाते हैं. हम स्थानीय लोगों को भी बुलाते हैं."
पानी में मछलियां कम हो गई हैं.
बुज्जी बाबू कहते हैं, "इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि हर बार जब आप मछली पकड़ने जाएंगे तो आपको मछलियां मिलेंगी ही. कभी-कभी तो जाल खाली का खाली ही आ जाता है. कभी-कभी आपको खाना बनाने के लिए भी पर्याप्त संख्या में मछली नहीं मिल पाती है. डीजल पर ही एक बार में 700-800 रुपये खर्च हो जाते हैं. "
वो कहते हैं, "कभी-कभी, जब हम मछली पकड़ते हैं, तो हम उनकी तस्वीरें लेते हैं और उन्हें व्हाट्सएप पर पोस्ट करते हैं. जब तक हम किनारे पर पहुंचेंगे, तब तक ग्राहक तैयार हो जाएंगे. हम ज्यादा मोलभाव नहीं करते. क्योंकि हमें उन लोगों से मदद मिलती है, इसलिए हमारी उनसे दोस्ती होती है. हम अपनी बैटरी लाइट और सेल फोन चार्ज करने के लिए उनके घर जाते हैं."
उन्होंने कहा. "जब हमें बहुत सारी मछलियां मिलती हैं, तो हम बाकी मछलियों को चिंतूरू बाज़ार में बेच देते हैं, जहां रोजाना बाज़ार लगता है."
क्या उम्मीदें पूरी होंगी?
समय के साथ नाव पर रहने वाले लोग पैडल बोट से इंजन बोट तक आए. यहां बिजली नहीं है लेकिन मोबाइल फ़ोन लोगों के पास हैं. नावों पर जीवन कठिन है, लेकिन वे अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य सुनिश्चित करने की कोशिश में हैं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.