रूस का ये क़दम क्या दुनिया को एक नए संकट की ओर धकेल रहा है?

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- Author, बेरिल मुनोको
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद काला सागर से होने वाले अनाज निर्यात को लेकर आशंकाएँ जताई जा रही थी.
लेकिन रूस और यूक्रेन ने युद्ध के बावजूद काला सागर से अनाज के सुरक्षित निर्यात के लिए समझौता किया.
लेकिन अब स्थिति बदल गई है. पिछले दिनों रूस ने इस समझौते से अलग होने की घोषणा कर दी.
अब चिंता ये जताई जा रही है कि पहले से ही अकाल का सामना कर रहे कई अफ़्रीकी देशों के लिए गंभीर खाद्य संकट पैदा हो सकता है.
कई अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक इस बात से हैरान हैं कि रूस ने ये फ़ैसला 27 और 28 जुलाई को सेंट पीटर्सबर्ग में होने वाले रूस-अफ़्रीकी शिखर सम्मेलन से पहले किया है.
यह समझौता पिछले साल जुलाई में लागू होने के बाद से तीन बार रिन्यू किया जा चुका है.
इस समझौते के तहत यूक्रेन के ओदेसा,चोर्नामोस्क और यूज़नी/ पिवदनी बंदरगाहों से मालवाहक जहाज़ को काले सागर से गुज़रने की इजाज़त थी.
कीनिया सरकार ने रूस की इस कार्रवाई को पीठ में छुरा घोंपने जैसा बताया और कहा कि इस फ़ैसले से अफ़्रीकी देशों पर बड़ा असर पड़ेगा.
अनाज व्यापार में आई अड़चनों के कारण पहले से ही अफ़्रीकी देशों पर खाद्य सुरक्षा को लेकर दबाव है.
लाखों लोगों पर खाने की कमी और खाद्य पदार्थों की क़ीमतें बढ़ने का ख़तरा मँडरा रहा है.
इससे खाद्य सुरक्षा पर क्या पड़ेगा असर?

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सोमालिया, कीनिया, इथियोपिया और दक्षिण सूडान जैसे देशों में पाँच करोड़ से ज़्यादा लोगों को खाद्य सुरक्षा सहायता की ज़रूरत है, क्योंकि इन देशों में वर्षों से ठीक से बारिश नहीं हुई है.
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़ ये अनाज समझौता यूक्रेन को इन अफ़्रीक़ी देशों में मानवीय सहायता के तौर पर 6 लाख 25 हज़ार टन अनाज भेजने की अनुमति देता था.
विश्व व्यापार संगठन की महानिदेशक गोज़ी ओकोनज़ो इवेला कहती हैं, ''काला सागर के ज़रिए खाद्य पदार्थ, चारा और उर्वरक का व्यापार विश्व खाद्य क़ीमतों में स्थिरता के लिए ज़रूरी है. ये कहते हुए दुख हो रहा है कि इस फै़सले से सिर्फ़ ग़रीब लोग और ग़रीब देशों को नुक़सान उठाना पड़ रहा है.''
संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफ़एओ) के मुताबिक़ पिछले साल जुलाई से वैश्विक खाद्य क़ीमतों में 11.6 प्रतिशत की जो गिरावट देखी गई, उसमें इस समझौते का भी योगदान रहा है.
अदिस अबाबा विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र और पब्लिक पॉलिसी के प्रोफ़ेसर डॉक्टर कॉस्तोतीनोस कहते हैं, ''बाज़ार का ट्रेंड तुरंत बदल जाता है. जो नया है बाज़ार उसी के साथ जाता है. जैसे ही यह घोषणा हुई, अनाज व्यापारी अपनी क़ीमतें बढ़ा देंगे, देश निर्यात पर प्रतिबंध लगा देंगे और जमाखोरी बढ़ जाएगी.''
डॉक्टर कॉस्तोतीनोस आगे कहते हैं, ''कई देशों को रूस से गेहूँ, वेजिटेबल ऑयल (वनस्पति तेल), उर्वरक आयात करने में परेशानी होने वाली है. साथ ही शरणार्थियों को और अफ़्रीका में विस्थापित लोगों पर भी संकट आने की संभावना है.''
क्या रूस बदल सकता है अपना फ़ैसला?

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रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन स्पष्ट शब्दों में कह चुके हैं कि रूस तभी इस समझौते में शामिल होगा, जब पश्चिमी देश रूस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध हटा देंगे.
इस संकट को ख़त्म करने के लिए रूस पर पड़ रहे चौतरफ़ा वैश्विक दबाव और कूटनीतिक प्रयासों के बाद पुतिन ने ये बात कही है.
संयुक्त राष्ट्र, तुर्की, यूरोपीय संघ की अगुवाई में कई अफ़्रीकी देशों के साथ-साथ कई अन्य देशों ने रूसी अधिकारियों के साथ इस मुद्दे बातचीत की है, ताकि खाद्य सुरक्षा बनाए रखी जा सके.
पुतिन ने दिया अफ़्रीका को ये ऑफ़र
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि उनका देश यूक्रेन से अफ्रीका भेजे जाने वाले अनाज की भरपाई कर सकता है.
रूस ने बीते दिनों ब्लैक सी के जरिए अनाज भेजने के लिए सुरक्षित रास्ता देने के लिए यूक्रेन के साथ समझौते से बाहर निकलने का एलान किया था.
ये समझौता ख़त्म होने के बाद अफ्रीकन यूनियन ने एक बयान जारी कर निराशा जताई थी. रूस के इस फ़ैसले से अफ़्रीकन यूनियन के देशों पर सबसे ज़्यादा असर हुआ है. वहां अनाज के दाम बढ़ गए हैं.
राष्ट्रपति पुतिन ने कहा है कि रूस में इस साल रिकॉर्ड पैदावार होने की उम्मीद है.
क्रेमलिन ने एक बयान में कहा है कि रूस कमर्शियल और बिना चार्ज के आधार पर अनाज मुहैया करा सकता है.
रूस इस हफ़्ते रूस-अफ़्रीका समिट की मेजबानी करने वाला है. ये दूसरी शिखर वार्ता होगी.
रिपोर्टों के मुताबिक रूस का सुझाव है कि एक ऐसी योजना, जिसमें क़तर और तुर्की शामिल हैं, उसके जरिए वो अफ़्रीकी देशों में अनाज भेजने की कोशिश में है. हालांकि, अभी ये साफ नहीं है कि क्या अफ़्रीकी देश इस प्रस्ताव को मानेंगे या नहीं.
क्या अफ्रीकी देश रूस से खफ़ा हो जाएंगे?

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इस समझौते से अलग होने से रूस के अफ़्रीकी देशों के साथ संबंध ख़राब हो सकते हैं.
रूस- अफ़्रीक़ा शिखर सम्मेलन 27-28 जुलाई को सेंट पीटर्सबर्ग में होने वाला है.
14 अफ़्रीकी देश गेहूँ के आयात के लिए रूस और यूक्रेन पर निर्भर हैं.
लीबिया, माली, सूडान, मध्य अफ़्रीकी गणराज्य, मोज़ाम्बिक के साथ-साथ और भी अफ़्रीक़ी देशों में रूस आंतरिक मामलों में शामिल रहा है, जहाँ वो विद्रोहियों और जिहादी चरमपंथियों से लड़ने में इन देशों की मदद करता है
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