सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस भारत से क्यों नहीं गए पाकिस्तान, क्या कह रहे हैं पाकिस्तानी

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सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान जब पिछले हफ़्ते जी-20 समिट में शामिल होने भारत आने वाले थे तो पाकिस्तान में अटकलों का बाज़ार गर्म था.
सोशल मीडिया पर वहाँ के पत्रकार और पूर्व डिप्लोमैट लिख रहे थे कि सऊदी क्राउन प्रिंस भारत जाने से पहले कुछ घंटों के लिए पाकिस्तान भी आएंगे और पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर से मुलाक़ात करेंगे.
भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने 30 अगस्त को ट्वीट कर कहा था, ''मुझे यह जानकर अच्छा लगा कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस जी-20 समिट में दिल्ली जाने से पहले इस्लामाबाद आएंगे और अहम बैठक करेंगे. यह बताता है कि दोनों देशों के बीच संबंध कितने गहरे हैं.''
पाकिस्तान के चर्चित पत्रकार कामरान ख़ान ने भी कुछ इसी तरह के ट्वीट कर बताया था कि क्राउन प्रिंस पाकिस्तान आएंगे और अहम निवेश की घोषणा करेंगे.
लेकिन सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस न तो नई दिल्ली आते वक़्त पाकिस्तान गए और न ही नई दिल्ली से जाते वक़्त पाकिस्तान गए.
11 सितंबर को मोहम्मद बिन सलमान नई दिल्ली से सीधे ओमान पहुँचे थे. जब क्राउन प्रिंस पाकिस्तान नहीं गए और भारत के साथ सऊदी अरब के कई अहम द्विपक्षीय समझौते हुए तो कामरान ख़ान ने ट्विटर पर एक भावुक पोस्ट लिखी.

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''भारत पाकिस्तान साथ काम क्यों नहीं करते''
कामरान ख़ान ने नई दिल्ली में पीएम मोदी और सऊदी क्राउन प्रिंस की मुलाक़ात का एक वीडियो क्लिप पोस्ट किया है.
कामरान ने लिखा, ''ये काम भारत और पाकिस्तान आपस में क्यों नहीं कर सकते हैं. दोनों मुल्कों को सब कुछ भुलाकर साथ आना चाहिए क्योंकि अंतरराष्ट्रीय संबंध में कोई स्थायी दुश्मन या दोस्त नहीं होता है.''
वो लिखते हैं, ''सऊदी अरब पाकिस्तान का बेहतरीन दोस्त है और मुश्किल घड़ी में हमेशा साथ रहा है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सऊदी अरब और इसराइल के बीच डील भी बहुत दूर नहीं है. भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सऊदी क्राउन प्रिंस ने नई दिल्ली में इंडिया-सऊदी अरबिया स्ट्रैटिजिक पार्टनर्शिप काउंसिल की बैठक की. दोनों देशों ने सऊदी अरब में 100 अरब डॉलर के निवेश को लेकर संयुक्त टास्क फ़ोर्स पर सहमति जताई है.''
कामरान ख़ान के इस ट्वीट के जवाब में अब्दुल बासित ने लिखा, ''भारत के साथ संबंधों में क्या अड़चन है, इसे हमलोग अच्छी तरह से जानते हैं. मुझे इस पर शक है कि दोनों देश कश्मीर विवाद को सुलझाए बिना आपसी भरोसा बहाल कर पाएंगे. बिना आपसी भरोसे के कोई भी संबंध टिकाऊ नहीं होता है.''
कामरान ख़ान के ट्वीट का जवाब भारत के अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू के पत्रकार कलोल भट्टाचार्जी ने भी दिया.
कलोल ने अपने जवाब में कहा, ''अंतरराष्ट्रीय संबंधों में तार्किक व्यवहार सबसे अहम है. सऊदी अरब दिखा रहा है कि वह एक विवेकशील और समझ वाला देश है. दूसरी तरफ़ पाकिस्तान ने अभी तक 26/11 के मुद्दों को नहीं सुलझाया है जो कि बहुत ही ख़तरनाक था. कोई भी देश पाकिस्तान के साथ सहज महसूस नहीं कर सकता है, जब तक 26/11 का समाधान न हो जाए.''
कलोल ने लिखा है, ''कई लोग मानते हैं कि पाकिस्तान अपनी सेना, मज़हब और अतिवाद से जुड़ी संरचनात्मक समस्याओं से निपटाने में सक्षम नहीं है. पाकिस्तान पहले अपनी आंतरिक समस्याओं को सुलझा ले तभी वह मुख्यधारा में आ सकता है.''

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जब पाकिस्तान ने बुश से की थी सिफ़ारिश
इस चर्चा के बीच पाकिस्तान के रज़ा हसन का एक ट्वीट शेयर हो रहा है.
रज़ा हसन इस ट्वीट में लिखते हैं, ''17 साल पहले तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश भारत के दौरे पर आए थे, जहाँ दोनों देशों के बीच परमाणु सहयोग पर समझौता हुआ था. तब पाकिस्तान ने बुश को मुल्क में बुलाने को लेकर सारा ज़ोर लगा दिया था. उस वक़्त काफ़ी हंगामा हुआ था कि अमेरिका ने परमाणु समझौता भारत के साथ कर लिया पर आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में जो उसका साथ दे रहा है, उसके संग बस क्रिकेट खेला.''
रज़ा लिखते हैं, ''17 साल बाद पाकिस्तान सऊदी क्राउन प्रिंस के मामले में फिर ऐसी कोशिश कर रहा है कि जी-20 से लौटते हुए वो इस्लामाबाद आएं और निवेश का एलान करें. पाकिस्तान सऊदी अरब से खनन, तेल, गैस, कृषि और पोर्ट से जुड़े 25 अरब डॉलर का निवेश करवाना चाहता है. छह महीने से इस बारे में प्रचार हो रहा है, वो भी प्रोजेक्ट को लेकर बिना किसी ठोस विचार विमर्श के.''

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भारत का ज़िक्र करते हुए रज़ा हसन ने लिखा- भारत ने बिना किसी एलान के अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई के साथ रेल और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर पर समझौता कर लिया ताकि चीन को चुनौती दी जा सके.
रज़ा लिखते हैं, ''सच तो ये है कि 17 साल पहले हक़ीक़त से हमारा सामना हुआ था और हमने कोई सुधार नहीं किया. दो दशक बाद हम आर्थिक चुनौतियों और असुरक्षा से जूझते हुए और अंधेरे में चले गए हैं. पर क्या ये पल पाकिस्तान की आंख खोलने का काम करेगा? वक़्त ही बताएगा.''
इस ट्वीट को शेयर करते हुए वॉल स्ट्रीट जर्नल के स्तंभकार सदानंद धुमे लिखते हैं, ''नई हक़ीक़त का सामना करते हुए क्या पाकिस्तान ख़ुद की डिप्लोमैसी और विदेश नीति को बेहतर करने का कोई रास्ता खोज सकता है? अगर पाकिस्तान की किस्मत अच्छी हुई तो उसके नेता इस वक़्त का इस्तेमाल आत्ममंथन के लिए करेंगे ताकि बदलाव लाया जा सके. यूएई, सऊदी अरब, बांग्लादेश से सबक लिए जा सकते हैं. ऐसा नहीं किया तो नीचे गिरना जारी रहेगा.''
पाकिस्तान की रक्षा विशेषज्ञ और सीनियर फेलो आएशा सिद्दीक़ा लिखती हैं, ''पाकिस्तान सिर्फ़ तब बदल सकता है, जब इसके सैन्य नेतृत्व को ये महसूस हो कि भारत के प्रति विचार खुले रखने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है. सऊदी ये समझा सकता है, पर अभी तक ऐसा नहीं हुआ है. देखते हैं ये बात कब तक चलती है.
आएशा को सदानंद धुमे जवाब देते हैं- क्या पाकिस्तानी जनरलों ने इस बात को माना कि पुराना भारत केंद्रित मॉडल फेल हो चुका है. या वो अब भी यही सोचते हैं कि बिना सोचे कुछ भी कर सकते हैं.

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पाकिस्तान के पूर्व राजदूत क्या बोले
अमेरिका और श्रीलंका में पाकिस्तान के राजदूत रह चुके हुसैन हक़्क़ानी ने द न्यूज़ में एक लेख लिखा है.
हुसैन हक़्क़ानी लिखते हैं, ''सोवियत संघ के विघटन के साथ ख़त्म हुए शीत युद्ध के बाद की दुनिया को समझने में पाकिस्तान पूरी तरह नाकाम रहा है. दुनिया के देश अब भी इस संघर्ष से जूझ रहे हैं लेकिन जो कभी एक-दूसरे को दुश्मन की नज़र से देखते थे, अब उनमें भी सहयोग भी पनप रहा है.''
हक़्क़ानी लिखते हैं, ''नई वैश्विक लहर में सवार होने का मौक़ा पाकिस्तान के नेताओं ने कई बार गँवाया है. 1950 से 1980 तक अमेरिका का सहयोगी होने के नाते पाकिस्तान को फ़ायदा पहुंचना चाहिए था. ख़ासकर तब जब दो विश्व युद्धों और शीत युद्ध ख़त्म होने के बाद के दौर में विश्व व्यवस्था में अमेरिका का दबदबा था. इससे ठीक उलट पाकिस्तान ने 1947 से अपने डीएनए में मौजूद भारत के लिए नकारात्मकता और एंटी अमेरिका सोच को बढ़ाने वाले ग़लत फ़ैसले किए.''
चीन का उदाहरण देते हुए हुसैन हक़्क़ानी लिखते हैं- पाकिस्तान जिस चीन को अपना दोस्त बताता है, उसने सारे पुराने संघर्षों को भुलाते हुए आर्थिक विस्तार की रणनीति अपनाई.
द न्यूज़ में लिखे लेख में हक़्क़ानी कहते हैं- ''चीन ने पश्चिमी देशों से निवेश हासिल किया और उनका बड़ा व्यापारिक साझेदार बना. हालांकि 1949 के बाद से चीन ने अमेरिका को वर्चस्ववादी और साम्राज्यवादी कहने में अपने चार दशक बिताए लेकिन 1990 के बाद से 2015 तक चीन चुप रहा. साल 2022 में दोनों देशों के बीच 690 अरब डॉलर का व्यापार हुआ.''
हुसैन हक़्क़ानी कहते हैं, ''चीन और भारत के बीच 1962 में जंग हुई थी. दोनों देशों ने कभी एक-दूसरे पर भरोसा नहीं किया. सरहद पर तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार कम नहीं हुआ है. बीते साल भारत और चीन के बीच 136 अरब डॉलर का व्यापार हुआ. भारत, अमेरिका या चीन, सबकी एक साझा नीति है कि आर्थिक उन्नति हासिल करते रहो. आर्थिक मुद्दों को राजनीतिक, सुरक्षा से जुड़े मुद्दों से अलग रखना चाहिए.''

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पीएम मोदी के नेतृत्व की तारीफ़
वॉशिंगटन में रहने वाले स्तंभकार एस कैसर शरीफ ने द न्यूज़ में इसी से संबंधित एक लेख लिखा है.
कैसर शरीफ ने लिखा, ''जी-20 के कार्यक्रम को इस तरह से डिज़ाइन किया गया कि चीन के वन बेल्ट वन रोड को भी चुनौती दी जा सके. खाड़ी देशों, सऊदी अरब, इसराइल के साथ भारत और यूरोप के बीच प्रस्तावित एनर्जी और ट्रांसपोर्ट लिंक पहली नज़र में चीन के बनाए प्रोजेक्टस को चुनौती देता हुआ प्रतीत होता है.''
शरीफ़ के मुताबिक़, चीन के बेल्ट एंड रोड कार्यक्रम को अब तक मिली जुली प्रतिक्रियाएं मिली हैं. ऐसे में हाल ही में जिस एनर्जी और ट्रांसपोर्ट लिंक का एलान हुआ है, वो कैसी हक़ीक़त का रूप लेगी ये समझने के लिए शायद कुछ साल इंतज़ार करना पड़े.
वो कहते हैं, ''निष्कर्ष में आप कह सकते हैं कि मोदी के नेतृत्व में वैश्विक रिश्तों में फेरबदल करने में भारत सफल रहा है. अलोकतांत्रिक गतिविधियों से जुड़ी आलोचनाओं को नज़रअंदाज़ करते हुए मोदी ने ख़ुद को और देश को विश्व पटल पर बेहतर स्थान पर पहुंचाया है.
पाकिस्तानी पत्रकार रऊफ़ कलासरा भी इस बात से चिंतित हैं कि सऊदी अरब और यूएई पाकिस्तान को बदले भारत को तवज्जो दे रहे हैं.
कलासरा ने एक वीडियो टिप्पणी में कहा, ''सऊदी अरब और यूएई अब इंडिया को ज़्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद समझते हैं. पाकिस्तानी इस बात से हैरान रहते हैं. सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस को पाकिस्तान आना था लेकिन नहीं आए. भारत दुनिया का सबसे बड़ा मार्केट है. इंडिया सऊदी अरब से कैश पर तेल लेता न कि हमारी तरह बार-बार उधार मांगने जाता है.''
कलासरा कहते हैं, ''भारत सऊदी अरब को अरबों डॉलर का करोबार दे रहा है. पाकिस्तान में जो भी नई सरकार आती है, सऊदी अरब पैसा मांगने जाती है. सऊदी अरब और यूएई इस बात को समझते हैं कि तेल एनर्जी के रूप में रिप्लेस हो रही है. सऊदी अरब को पता है कि तेल से बहुत दिनों तक उसकी अर्थव्यवस्था नहीं चलेगी. ऐसे में सऊदी अरब भविष्य के लिए काम कर रहा है और इसमें भारत मददगार साबित हो रहा है.''
कलासरा कहते हैं, ''यमन में सऊदी अरब के पक्ष में नवाज़ शरीफ़ ने अपने सैनिकों को भेजने से इनकार कर दिया था. दूसरी तरफ़ इमरान ख़ान ने इस्लामिक देशों के संगठन ओआईसी के समानांतर एक दूसरा संगठन खड़ा करने की कोशिश की. ऐसे में सऊदी अरब में पाकिस्तान छवि नकारात्मक हुई है. 2019 के बाद सऊदी क्राउन प्रिंस पाकिस्तान नहीं आए हैं. पाकिस्तान अब भी 70 और 80 के दशक में खड़ा है. लेकिन दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है.''

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सऊदी अरब और भारत : आंकड़े क्या कहते हैं?
सऊदी अरब की कुल आबादी में सात प्रतिशत भारतीय नागरिक हैं. भारत सरकार के मुताबिक़, सऊदी अरब में लगभग 26 लाख भारतीय रहते हैं.
भारत और सऊदी अरब के बीच कारोबार भी तेज़ी से बढ़ रहा है.
भारत का सऊदी अरब के लिए निर्यात साल 2018 में 5.6 अरब डॉलर से बढ़कर साल 2022 में 10.7 अरब डॉलर हो गया है.
डिप्टी मंत्री ने बतया कि सऊदी अरब के भारत के लिए निर्यात में भी बढ़ोत्तरी हुई है.
2018 में यह 26 अरब डॉलर था जो 2022 में बढ़कर 42 अरब डॉलर हो गया है.
हाल ही में सऊदी अरब के निवेश मंत्री ख़ालिद अल फलीह ने कहा था कि सऊदी अरब भारत के गुजरात प्रांत में सऊदी अरब के सॉवरेन वेल्थ फंड का दफ़्तर भी खोल सकता है.
सऊदी क्राउन प्रिंस ने साल 2019 में भारत में 100 अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा की थी.

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सऊदी अरब और पाकिस्तान : आंकड़े क्या कहते हैं?
गल्फ़ न्यूज़ के मुताबिक़, सऊदी अरब में काम करने वाले पाकिस्तानियों की संख्या क़रीब 26 लाख है. इसमें क़रीब 13 लाख पाकिस्तान सऊदी अरब में प्राइवेट सेक्टर में काम करते हैं.
समाचार एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक़, चार सितंबर को पाकिस्तान के अंतरिम प्रधानमंत्री अनवर उल-हक ने कहा था कि अगले पांच साल में सऊदी अरब पाकिस्तान में 25 बिलियन डॉलर का निवेश करेगा.
आर्थिक चुनौतियों और क़र्ज़ का सामना कर रहे पाकिस्तान की मदद के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने जुलाई महीने में तीन बिलियन डॉलर के लोन को मंज़ूरी दी थी.
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र में प्रोफ़ेसर संजय कुमार भारद्वाज ने जनवरी 2023 में बीबीसी से सऊदी-पाकिस्तान रिश्तों पर बात की थी.
प्रोफ़ेसर संजय भारद्वाज ने कहा था, ''पाकिस्तान सऊदी अरब के लिए बोझ भी है. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार मुश्किल से दो अरब डॉलर का है जबकि सऊदी भारत का चौथा सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है. अभी सऊदी और भारत का व्यापार 44 अरब डॉलर का है. भारत के लिए सऊदी अरब सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता देश है. सऊदी की अर्थव्यवस्था के लिहाज से भारत बहुत ही अहम देश है जबकि पाकिस्तान इस मामले में शून्य है. सऊदी अरब इसी वजह से अब कश्मीर को लेकर भारत के प्रति बहुत सॉफ़्ट रहता है. पाकिस्तान की उलझन इस मामले में साफ़ दिखती है.''
द ट्रिब्यून में लिखे लेख में पत्रकार अदीला नौरीन लिखती हैं, ''पाकिस्तान और सऊदी अरब के रिश्ते इस्लामिक मान्यताओं की बुनियाद पर हैं. दोनों देशों के बीच पहला समझौता 1951 में हुआ था. तब से दोनों देशों ने पीछे मुड़कर नहीं देखा है और इनको जोड़ने में मक्का और मदीना की भी अहम भूमिका है.''
वो लिखती हैं- दोनों देशों ने साथ में कई चुनौतियों को झेला है और भाइयों की तरह उसका मज़बूती के साथ सामना किया है.
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