पीएम मोदी के अमेरिका दौरे को लेकर पाकिस्तान में इतनी चर्चा क्यों

शुमाइला जाफ़री

बीबीसी न्यूज़, इस्लामाबाद

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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे और दौरे के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ उनके संयुक्त बयान को लेकर पाकिस्तान में चर्चा गर्म है.

इसकी सबसे बड़ी वजह तो यही है कि संयुक्त बयान में पाकिस्तान की भी चर्चा हुई और कहा गया कि पाकिस्तान सरकार को 'आतंकवाद' को ख़त्म करने के लिए काम करना होगा और यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पाकिस्तान की ज़मीन से कोई 'आतंकी हमला' नहीं हो.

इस बयान के चलते पाकिस्तान की सरकार में अमेरिका के साथ आपसी रिश्तों को लेकर मंथन का दौर देखने को मिल रहा है. भारत और अमेरिका के आपसी संबंधों को लेकर भी चर्चा हो रही है.

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ऐतिहासिक तौर पर पाकिस्तान को अमेरिका के सहयोगी देश के तौर पर देखा जाता रहा है. ख़ासकर 1980 से लेकर हाल के सालों तक. इस दौरान पाकिस्तान फ्रंटलाइन पर अमेरिका के साथ दो युद्धों में शामिल रहा है.

वहीं दूसरी ओर भारत इस दौरान विदेश नीति को लेकर गुटनिरपेक्ष नीति अपनाता रहा. इस दौरान भारत ने रूस के साथ अपने संबंधों को बनाए रखा. रूस की पहचान अमेरिका के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी की रही है.

वहीं दूसरी ओर भारत के लिए रूस सैन्य उपकरण और ऊर्जा का सबसे बड़ी आपूर्ति करने वाला देश रहा है.

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प्रेस कॉन्फ्रेंस पर पाकिस्तान ने क्या कहा

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पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने मोदी-बाइडन संयुक्त प्रेस बयान में पाकिस्तान के ज़िक्र को अवांछित, एकतरफ़ा और भ्रामक क़रार दिया है.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने आश्चर्य ज़ाहिर करते हुए ये भी कहा कि ये बयान, पाकिस्तान और अमेरिका के आतंकवाद विरोधी आपसी सहयोग और नीति के उलट है.

इसके कुछ दिन बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने अमेरिकी डिप्टी चीफ़ ऑफ़ मिशन को बुलाकर आपत्ति जताई.

इस आपत्ति में ये भी मांग की गई है कि अमेरिका कोई ऐसे वैसे बयान जारी नहीं करे, जिससे भारत के आधारहीन और राजनीति से प्रभावित आरोपों को बढ़ावा देते हैं.

पाकिस्तान ने अपनी आपत्ति में यह भी कहा है कि अमेरिका को दोनों देशों के बीच आपसी संबंध और आतंकवाद विरोधी सहयोग को बनाए रखने के लिए भरोसे और समझदारी से काम लेना चाहिए.

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ़ ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिकी दौरे और वॉशिंगटन में उनके रेड कार्पेट स्वागत और संयुक्त बयान में पाकिस्तान के ज़िक्र पर प्रतिक्रिया जताते हुए कहा है कि पाकिस्तान ख़ुद ही अमेरिका की वजह से आतंकी हमला झेलता आया है.

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने ये भी कहा कि अमेरिका की मदद के लिए पाकिस्तान ने काफ़ी ख़ून और पैसा बहाया है, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया जाता है.

उन्होंने ने यह भी कहा कि भारत के प्रधानमंत्री पर ईसाई, मुस्लिम और दूसरे अल्पसंख्यकों को निशाना बनाए जाने के लिए ज़िम्मेदार होने का आरोप है, लेकिन उनका अमेरिका में ज़ोर शोर से स्वागत किया जा रहा है.

पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ़ (बाएं) चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ

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इमेज कैप्शन, पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ़ (बाएं) चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ

'पिछली सैन्य सरकारों के लिए शर्मशार करना वाला बयान'

पाकिस्तान की संसद में ख्वाजा आसिफ़ ने कहा, “यह संयुक्त बयान एक तरह से परवेज़ मुशर्रफ़ समेत उन पाकिस्तानी सैन्य सरकारों के लिए शर्मसार करने वाला है जो अमेरिका की सहायता करते आए हैं. चुनाव के बाद जब एक स्थायी सरकार सत्ता में आई है तो उसने अमेरिका के साथ स्थायी रिश्ते रखे हैं. इस्लामाबाद को अपनी भोगौलिक स्थिति का लाभ मिलना चाहिए, दंड नहीं.”

वहीं पाकिस्तान में विपक्ष के नेता इमरान ख़ान ने पाकिस्तान की मौजूदा सरकार पर आरोप लगाया है कि चरमपंथ के ख़िलाफ़ पाकिस्तान की स्थिति और उसके उन्मूलन में योगदान को अमेरिका के सामने ठीक ढंग से नहीं रखा गया है. इमरान ख़ान ने कहा है कि इस बयान से यह संदेश जाता है कि पाकिस्तान सीमा पार आंतकवाद को बढ़ावा देता है.

इमरान ने यह भी कहा कि संयुक्त बयान में कश्मीर में मानवाधिकार के उल्लंघन के मामले का ज़िक्र क्यों नहीं हुआ. उन्होंने ये भी ट्वीट किया कि मौजूदा सरकार पाकिस्तान को अतंरराष्ट्रीय स्तर पर अप्रसांगिक बना चुकी है.

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क्या कह रहे हैं जानकार?

हालांकि पाकिस्तान के जाने माने विश्लेषक अयाज़ आमिर के मुताबिक नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा का पाकिस्तान पर गहरा असर देखा जा रहा है.

अयाज़ आमिर ने कहा, “नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी कांग्रेस में बेहतरीन भाषण दिया है. उनके भाषण को वहां ख़ूब सराहना मिली. यह केवल उनकी अपनी सराहना नहीं थी बल्कि एक मुल्क के तौर पर भारत की सराहना थी. भारतीय प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस, अमेरिका में रह रहे भारतीयों के योगदान और साझा मूल्यों की बात की. काश हमलोग भी इससे कुछ सीख पाते.”

अयाज़ ने दावा किया कि ये पहला मौक़ा है जब भारत-अमेरिका संयुक्त बयान में आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान का नाम आया है, हालांकि इससे पहले इस तरह के भाव ज़रूर रहे थे. उन्होंने ये भी कहा कि ये पाकिस्तान की सरकार ने ख़ुद ही किया है.

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साझा बयान में कैसे आया पाकिस्तान का नाम

वहीं राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर हसन अस्करी रिज़वी के मुताबिक़ भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिका यात्रा को राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में देखने के बदले अंतरराष्ट्रीय परिपेक्ष्य में देखा जाना चाहिए.

उन्होंने कहा कि संयुक्त बयान में पाकिस्तान का नाम अमेरिका की सहमति के बिना नहीं शामिल किया गया होगा, ऐसे में सवाल यह है कि अमेरिका इसके लिए तैयार कैसे हुआ?

डॉ. अस्करी के मुताबिक़ अतीत में पाकिस्तान जब अमेरिका के साथ फ्रंटलाइन सहयोगी के तौर पर चरमपंथ के ख़िलाफ़ युद्ध लड़ रहा था तब भी उस पर दोहरी नीति अपनाने का आरोप लगता रहा था.

यह भी आरोप लगता रहा है कि पाकिस्तान अल-क़ायदा पर कार्रवाई करने को तैयार है लेकिन अफ़गान तालिबान पर कार्रवाई करने को तैयार नहीं है. अस्करी के मुताबिक़ पाकिस्तान को अपनी ग़लती से सीख लेना चाहिए और आत्ममंथन करना चाहिए.

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उन्होंने कहा, “अगर पाकिस्तान, भारत की तरह सम्मान और प्रशंसा चाहता है तो उसे सबसे पहले आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर बनना होगा. हमारी समस्याएं आंतरिक हैं, बाहरी नहीं. अगर कोई देश राजनीतिक तौर पर अस्थिर होगा तो अंतराष्ट्रीय स्तर पर उसका सीमित प्रभाव ही होगा.”

संयुक्त बयान के अलावा पाकिस्तान, रक्षा क्षेत्र में भारत और अमेरिका के बढ़ते सहयोग को लेकर भी चिंतित है.

स्तंभकार कामरान युसूफ़ ने अपने विश्लेषण में लिखा है कि अमेरिका ने चीन को ध्यान में रखते हुए भारत को सैन्य उपकरण और तकनीक मुहैया कराने का फ़ैसला किया है लेकिन इससे दक्षिण एशिया का सैन्य संतुलन अस्थिर होगा और पाकिस्तान इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधे ख़तरे के तौर पर देख रहा है.

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शोधकर्ता नूरुलैन नसीम भी कामरान से सहमत दिखती हैं.

नूरुलैन के मुताबिक़, भारतीय प्रधानमंत्री के अमेरिका यात्रा से ज़ाहिर होता है कि भारत रणनीतिक तौर पर पश्चिमी देशों के क़रीब जा रहा है और इसका असर पाकिस्तान ही नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र में दिखेगा.

वो कहती हैं, “साफ़ है कि भारत अंतरराष्ट्रीय मामलों में एक ही वक़्त पर कई देशों के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ा रहा है. इसके अपने ख़तरे और फ़ायदे दोनों हैं. चीन अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को लेकर हिंद महासागर को देख रहा है. पाकिस्तान की सीमा भी हिंद महासागर से मिली हुई है. ऐसे में अमेरिका के साथ भारत के सैन्य समझौते से हिंद महासागर में स्थिति तनावपूर्ण हो सकती है.”

वहीं वरिष्ठ पत्रकार हुमा यूसुफ़ के मुताबिक़ पाकिस्तान को भारत और अमेरिका के सैन्य समझौते पर ध्यान देने के बदले, चीन और अमेरिका के साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने के बारे में सोचना चाहिए.

हुमा के मुताबिक़ पाकिस्तान की चुनौती यह है कि वे वॉशिंगटन और बीजिंग प्रसासन के साथ अपने रिश्तों को कैसे कायम रखता है, क्योंकि दो शक्तिशाली मगर आपसी प्रतिद्वंद्वी देशों से नज़दीकी संबंध रखना राजनयिक तौर पर उपयोगी होगा.

हुमा कहती हैं, “देखना होगा कि क्या पाकिस्तान इन दोनों देशों के बीच उपयोगी मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है? हालांकि मौजूदा राजनीतिक स्थिति में यह संभव नहीं दिखता है, लेकिन ये सवाल हमें ख़ुद से पूछना चाहिए.”

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