अंशुमान गायकवाड़: क्रिकेट की पिच पर संघर्ष करने वाले वो खिलाड़ी, जिन्होंने कैंसर से भी लड़ी जंग

अंशुमन गायकवाड़ अपने पहले कप्तान नवाब पटौदी के अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे

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    • Author, प्रदीप कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अंशुमन गायकवाड़ बतौर क्रिकेटर जिस ख़ूबी के लिए जाने जाते रहे, उसकी मिसाल वे अपनी ज़िंदगी के आख़िरी लम्हों तक देते रहे.

गायकवाड़ को जिन लोगों ने क्रिकेट खेलते देखा है, उन्हें मालूम होगा कि पहली नज़र में वे कोई स्टाइलिश या कहें परफैक्ट बल्लेबाज़ नहीं थे.

लेकिन उनमें एक ख़ास तरह का जुनून था, जो दुनिया के ख़ौफ़नाक गेंदबाज़ों के सामने अड़ जाता था और अपना विकेट असानी से नहीं गंवाता था.

क्रिकेट करियर के बाद ज़िंदगी ने जब ब्लड कैंसर की चपेट में लिया, तो अंशुमन एक बार फिर अपनी पुरानी पहचान के साथ अड़े हुए थे.

एक महीने पहले तक लंदन के किंग्स अस्पताल में वे कैंसर की जंग लड़ते रहे, लेकिन आख़िरकार वे ये जंग हार गए.

लेकिन जाते जाते उन्होंने क्रिकेट प्रेमियों को अपने पुराने ग्रिट और ग्रेस की याद ज़रूर दिला दी.

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गायकवाड़ भी माने जाते थे भारतीय क्रिकेट टीम की दीवार

अंशुमन गायकवाड़ अपने इसी ग्रिट और ग्रेस की वजह से सुनील गावस्कर और गुंडप्पा विश्वनाथ के ज़माने में भी बतौर बल्लेबाज़ टीम इंडिया तक पहुंचे थे.

ना केवल पहुंचे थे बल्कि अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए थे.

अंशुमान गायकवाड़

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इमेज कैप्शन, कीर्ति आजाद के साथ गायकवाड़

आज की युवा पीढ़ी को भले इसका अंदाज़ा नहीं हो और लोग राहुल द्रविड़ को मिस्टर वॉल के तौर पर जानते हैं, लेकिन पुराने क्रिकेट प्रेमियों को याद होगा कि अंशुमन गायकवाड़ की पहचान भी ऐसी थी कि अपने दौर में वे भारतीय क्रिकेट टीम की दीवार माने जाते थे.

अंशुमन गायकवाड़ का इंटरनेशनल क्रिकेट करियर क़रीब एक दशक तक चला.

1974 में भारतीय क्रिकेट टीम में डेब्यू करने वाले अंशुमन गायकवाड़ दाएं हाथ के मिडिल ऑर्डर बल्लेबाज़ थे, लेकिन पाँचवाँ टेस्ट आते-आते सुनील गावस्कर के जोड़ीदार के तौर पर भारतीय क्रिकेट के ओपनिंग बल्लेबाज़ बन गए.

1984 तक चले क्रिकेटिंग करियर में अंशुमन गायकवाड़ ने 40 टेस्ट मैच खेले और इसमें 30 से ज़्यादा की औसत से 1985 रन बनाए.

वे धाकड़ बल्लेबाज़ तो नहीं थे, लेकिन ये आंकड़े उनके क्रिकेट की काबिलियत की पूरी कहानी नहीं बताते.

जब मरते-मरते बचे थे गायकवाड़

वे किस तबीयत के खिलाड़ी थे इसकी मिसाल उनकी दो पारियों से मिलती है.

इंटरनेशनल क्रिकेट के अपने छठे टेस्ट मैच में किंग्स्टन के मैदान पर वे सुनील गावस्कर के साथ भारतीय पारी की शुरुआत करने उतरे थे.

ये टेस्ट पोर्ट ऑफ़ स्पेन के उस ऐतिहासिक टेस्ट के बाद खेला जा रहा था जिसमें भारत ने चौथी पारी में 400 से ज़्यादा रन बनाकर जीत हासिल की थी.

ऐसे में क्लाइव लॉयड के तेज़ गेंदबाज़ों की फौज़ भारतीय बल्लेबाज़ों पर एक तरह से टूट पड़ी थी.

माइकल होल्डिंग, डेनियल, बर्नाड जूलियन और वेनबर्न होल्डर के सामने गावस्कर के साथ गायकवाड़ टिक गए. दोनों ने पहले विकेट के लिए 136 रन जोड़ दिए थे.

माइकल होल्डिंग का भारतीय बल्लेबाज़ों पर ग़ुस्सा बढ़ता जा रहा था और फिर वो हुआ जिसमें गायकवाड़ लगभग मरते-मरते बचे थे.

गायकवाड़ जब 81 रन पर खेल रहे थे तब माइकल होल्डिंग के एक बाउंसर को वे भांप नहीं पाए थे और वह गेंद सीधे उनके कान से जाकर टकराई.

तब होल्डिंग दुनिया के सबसे तेज़ गेंदबाज़ थे और औसतन 140 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से गेंदबाज़ी करते थे.

अंशुमान गायकवाड़

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गायकवाड़ का चश्मा आंखों से दूर जा गिरा और चेहरा ख़ून से लाल हो गया था. सामने मोहिंदर अमरनाथ भागकर गायकवाड़ की मदद के लिए पहुंचे लेकिन ये चोट काफ़ी गंभीर थी.

गायकवाड़ को तत्काल अस्पताल में दाखिल करना पड़ा. वे अगले दो दिनों तक आईसीयू में रहे.

इस दौरान डॉक्टरों ने उनकी कई सर्जरी की, लेकिन इसके बाद भी बाएं कान से सुनने की उनकी क्षमता बहुत कम हो गई थी.

इस हादसे के बारे में गायकवाड़ ने खुद टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, "सबीना पार्क में माइकल होल्डिंग जब गेंदबाज़ी कर रहे थे तब कई बार उनकी गेंद का अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता था. एक गेंद मेरे बीच की ऊंगली पर लग चुकी थी. मैंने नाराज़गी में उनको चिढ़ाने की कोशिश की. इसने उनके ग़ुस्से को और भी बढ़ा दिया. इसके बाद अगली गेंद थंडरबोल्ट की तरह आई और सीधी मेरी कान पर लगी थी."

कामयाब वापसी

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समाप्त

ऐसा लगा कि अंशुमन का क्रिकेट कहीं असमय समाप्त ना हो जाए, लेकिन सात महीने के अंदर वे टीम में वापसी करने में कामयाब रहे. ना केवल कामयाब रहे बल्कि वापसी के बाद पहले छह टेस्ट मैचों में वेस्टइंडीज़ के तेज़ गेंदबाज़ों का सामना किया.

जब 1978 में वेस्टइंडीज़ की टीम भारतीय दौरे पर आई, तो गायकवाड़ ने होल्डर और मार्शल के सामने बेंगलुरु टेस्ट की पहली पारी में 87 रन ठोके और कानपुर टेस्ट में 102 रनों की पारी खेली. भारत ये दोनों टेस्ट मैच ड्रॉ कराने में कामयाब रहा.

यहां ये ध्यान रखने की बात है कि गायकवाड़ उस दौर में भारतीय पारी की शुरुआत करते थे जब हेलमेट और दूसरे सुरक्षा गार्ड्स का चलन नहीं था. गायकवाड़ को लगी चोट ने भी बल्लेबाज़ों के लिए हेलमेट की ज़रूरत को बल दिया था.

लेकिन गायकवाड़ के नाम एक और कारनामा लिखा हुआ था. उन्होंने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ जालंधर में अपने टेस्ट करियर का इकलौता दोहरा शतक जमाया था.

201 रनों की पारी के लिए अंशुमन ने 436 गेंद खेलीं और 671 मिनट तक बल्लेबाज़ी की थी. यह उस दौर में टेस्ट इतिहास का सबसे धीमा दोहरा शतक था.

इस पारी की अहमियत इससे भी समझी जा सकती है कि भारत के 374 रनों में अकेले 201 रन अंशुमन गायकवाड़ के बल्ले से निकले थे.

लेकिन इसके बाद उनका करियर लंबा नहीं चला. और उन्होंने लगभग टीम से ड्रॉप होना पड़ा था. संयोग ये भी है कि जिस ईडन गार्डेंस में उन्होंने अपने टेस्ट करियर का डेब्यू किया था, वहीं उन्होंने आख़िरी टेस्ट भी खेला.

नेशनल सेलेक्टर और कोच रहे गायकवाड़

अंशुमान गायकवाड़

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इमेज कैप्शन, कपिल देव और शांता रंगास्वामी के साथ अंशुमान गायकवाड़

इसके बाद भी भारतीय क्रिकेट से उनका जुड़ाव बना रहा. वे पहले तो 1992 से 1996 तक भारतीय टीम के नेशनल सेलेक्टर रहे और इसके बाद दो बार भारतीय क्रिकेट टीम के कोच रहे.

वे जिस तरह के क्रिकेटर रहे, वैसे ही कोच के तौर पर रहे. उनकी कोचिंग के दौरान ही शारजाह में सचिन तेंदुलकर ने रेगिस्तानी तूफ़ान में शतक ठोका था. लगातार दो पारियों में शतक के साथ उन्होंने टीम को जीत दिलाई थी.

अंशुमन गायकवाड़ की कोचिंग के दौरान ही अनिल कुंबले ने एक पारी में दस विकेट झटके थे. 2018 में उन्हें बीसीसीआई ने सीके नायडू लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया था.

अंशुमन गायकवाड़ अपने स्वभाव के चलते टीम के साथियों में बेहद लोकप्रिय थे. जूनियरों के लिए वे प्रेरणा स्रोत थे तो सीनियरों के साथ भी उनके रिश्ते खासे मधुर थे.

इसका अंदाज़ा कपिल देव के उस वीडियो से भी होता है जो उन्होंने गायकवाड़ के निधन से कुछ दिन पहले ही पोस्ट किया था.

कपिल देव ने वीडियो में अंशुमन गायकवाड़ के साथ अपने रिश्तों को ही नहीं बताया था बल्कि कहा था कि उनके साथी क्रिकेटरों के लिए वे किसी गर्व से कम नहीं रहे.

कपिल देव की पीढ़ी अंशुमन गायकवाड़ के बाद क्रिकेट के मैदान में आई थी. लेकिन कपिल देव और मोहिंदर अमरनाथ को उनका सबसे क़रीबी दोस्त माना जाता रहा है.

वहीं अंशुमन अपने सीनियरों का कितना सम्मान करते थे, इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि ध्रूमपान करने के बावजूद भी वे कभी अपने कप्तान नवाब पटौदी के सामने सिगरेट नहीं पीते थे.

जब नवाब पटौदी का निधन हुआ तो उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने पहुंचे.

अंशुमन गायकवाड़ उस दौर के क्रिकेटरों में थे, जिनमें क्रिकेट विरासत में मिली थी. उनके पिता दत्ता गायकवाड़ भी भारत की ओर से क्रिकेट खेल चुके थे और उनके बेटे शत्रुंजय गायकवाड़ भी बड़ौदा की टीम में शामिल रहे, हालांकि वे इंटरनेशल क्रिकेट तक नहीं पहुंच पाए.

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