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कोविड-19 के पाँच साल: तबाही मचाने वाली महामारी ने सिखाईं ये चार बातें
- Author, इसाबेल कारो
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
कोविड-19 के प्रकोप को गुज़रे पांच साल बीत गए हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 11 मार्च, 2020 को इसे महामारी घोषित किया था. इसके बाद सरकारों ने इस दौरान करीब 260 करोड़ लोगों को लॉकडाउन में रखा. उन्हें कई महीनों तक क्वारंटीन में रहना पड़ा.
संगठन की मानें तो इससे करीब 77 करोड़ 70 लाख से अधिक लोग संक्रमित हुए और 70 लाख लोगों की मौत हो गई. संयुक्त राष्ट्र एजेंसी की मानें तो मौतों की संख्या 1 करोड़ 50 लाख से अधिक हो गई हैं.
इस महामारी के विनाशकारी असर अभी भी दुनिया के सामने आ रहे हैं लेकिन कुछ विश्लेषक इस अंधकारमय दौर से उभरे कुछ सकारात्मक सीख की तरफ इशारा कर रहे हैं.
तनाव और ट्रॉमा विशेषज्ञ और बेल्जियम के व्रीजे विश्वविद्यालय में स्वास्थ्य मनोविज्ञान के प्रोफेसर रहे एल्के वैन हूफ ने लॉकडाउन को "इतिहास का सबसे बड़ा मनोवैज्ञानिक प्रयोग" कहा है.
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वैक्सीन तकनीक में विकास
इस दौरान वैज्ञानिकों ने दुनिया भर में टीकाकरण के क्षेत्र में क्रांति ला दी. सार्स-कोव-2 वायरस से निपटने के लिए सिर्फ़ नौ महीनों में वैक्सीन बना दी.
सिंथेटिक मैसेंजर आरएनए (एम आरएनए) को लेकर बड़े पैमाने पर वैक्सीन कार्यक्रम के विकास के लिए कई वर्षों से अध्ययन चल रहा था लेकिन कोविड-19 के दौरान इसका तेजी से विकास हुआ.
एम आरएनए तकनीक का इस्तेमाल करके फ़ाइज़र (यूएसए) ने बायोएनटेक (जर्मनी) और मॉडर्ना (यूएस) ने रिकॉर्ड समय में अपने टीके बनाए. इससे लाखों लोगों का समय से टीकाकरण हो सका.
यूके की 90 वर्षीय महिला मार्गरेट कीनन ने आठ दिसंबर, 2020 को पश्चिमी दुनिया में कोरोना का पहला टीका लगवाया. इसे बनाने वाले वैज्ञानिक कैटालिन कारिको और ड्रू वीसमैन को 2023 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला.
डब्ल्यूएचओ की सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. मार्गरेट हैरिस महामारी में वैक्सीन बनाने की दौड़ को सबसे बड़ा सकारात्मक विरासत बताती हैं.
बीबीसी से बात करते हुए डॉ. हैरिस ने कहा, "हमने अविश्वसनीय गति से तकनीकी प्रगति देखी है."
वो कहती हैं, "मैसेंजर आरएनए प्रौद्योगिकी पहले से ही पता थी लेकिन अब हम इसका उपयोग कैंसर सहित अन्य टीकों में देख रहे हैं.
प्रिवेंटेबल: हाउ ए पैनडेमिक चेंज्ड द वर्ल्ड एंड हाउ टू स्टॉप द नेक्स्ट वन पुस्तक की लेखिका और एडिनबरा विश्वविद्यालय की प्रोफेसर देवी श्रीधर कहती हैं कि महामारी से मिले सबक ने नए वायरस के प्रकोप का तेजी पता लगाने और पहचान करने में मदद की है.
वो कहती हैं, "हमारी वैज्ञानिक क्षमता में सुधार हुआ है, हमारे प्लेटफॉर्म लगातार उन्नत हो रहे हैं. महामारी की शुरुआत में हमारे सामने यह सवाल था कि क्या कोई वैक्सीन आएगी लेकिन अब यह है कि 'हम कितनी जल्दी वैक्सीन बना सकते हैं?"
वे कहती हैं कि इससे हमें अगली महामारी के लिए बेहतर तरीके से तैयार रहने का सबक भी मिला है. उदाहरण के लिए, जिन देशों ने "बेहतर प्रदर्शन किया है, वे वह देश हैं जिनकी आबादी महामारी से पहले स्वस्थ थी."
शिक्षा का एक नया युग
कोविड-19 के दौरान स्कूल बंद होने से दुनिया भर के बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ा है.
इंटर-अमेरिकन डेवलपमेंट बैंक (आईडीबी) के शिक्षा प्रभाग की प्रमुख मर्सिडीज़ माटेओ के अनुसार, प्राथमिक और माध्यमिक स्तरों पर स्कूल छोड़ने की दर में भारी वृद्धि हुई है और सीखने में देरी हो रही है. यह महामारी के सबसे गहरे घावों में से एक है.
इसके बावजूद माटेओ शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव देखती हैं. उन्होंने बीबीसी को बताया "21वीं सदी में शिक्षा पर बहस को आगे बढ़ाने और शिक्षा प्रणालियों पर पुनर्विचार करने से बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ा है."
माटेओ बताती हैं, "महामारी के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि शिक्षा क्षेत्र सबसे कम डिजिटल क्षेत्रों में से एक है, इसे बदलने के लिए बहुत सारी दिक्कतें थीं लेकिन कोविड-19 ने इसे लचीला और हाइब्रिड बनने के लिए मजबूर कर दिया.
मोटेओ कहती हैं कि इसका ही परिणाम है कि इससे केवल कक्षाओं के माध्यम से ही शिक्षा का विचार पीछे छूट गया है. इस दौरान स्कूलों के तेजी से बंद होने से कई देशों में शिक्षा राजनीतिक एजेंडे में ऊपर आ गई है. महामारी ने समाज में स्कूलों की भूमिका के बारे में अधिक जागरूकता भी पैदा की.
रोजगार पर पड़ी सर्वाधिक मार
कोविड-19 का सबसे गंभीर असर सीधे युवाओं और महिलाओं के रोजगार पर पड़ा. महामारी के कारण रोजगार के अवसर कम हो गए और गरीबी बढ़ गई. वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए अब यह सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है.
लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र के लिए अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के क्षेत्रीय कार्यालय में श्रम अर्थशास्त्र विशेषज्ञ गेर्सन मार्टिनेज कहते हैं कि महामारी के दौरान छुट्टियों ने देशों को मंदी से बचाने में प्रभावी रूप से मदद की. इसमें कोई संदेह नहीं है कि रणनीतियों ने आर्थिक सुधार को गति दी है.
हालांकि नौकरियों में तेजी से सुधार हुआ है लेकिन आईएलओ ने हालिया रिपोर्ट में चेतावनी भी दी है कि भू-राजनीतिक तनाव, जलवायु परिवर्तन और बढ़ते राष्ट्रीय ऋण जैसे आर्थिक दबावों के कारण यह सुधार धीमा पड़ रहा है.
कोविड-19 के दौरान रिमोट और हाइब्रिड कार्य की ओर हुआ बदलाव स्पष्ट है. कई वैश्विक फ़र्मों द्वारा कार्यालय आकर काम करने के लिए दबाव बनाए जाने के बावजूद हाइब्रिड कार्यस्थल का लाभ उठा रही हैं.
कई सरकारों ने कार्यालय के बाहर से काम करने के लिए कानून भी बनाए हैं. उदाहरण के लिए, आयरलैंड और फ्रांस जैसे देशों में अधिक लचीलेपन के साथ-साथ 'डिस्कनेक्ट करने का अधिकार' कानून भी शामिल है.
इसके अलावा मार्टिनेज के लिए शुरू की गई तकनीकी क्रांति उत्पादकता को तेजी से बढ़ाने के लिए एक "सुनहरा अवसर" भी लेकर आई है, उदाहरण के लिए, विभिन्न उद्योगों में एआई का प्रयोग करना.
मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता
इस महामारी ने अनिश्चितता, अकेलापन, भय और पीड़ा के बीच दुनिया भर को एक दर्दनाक कारावास बना दिया.
विश्व स्वास्थ्य संगठन और पैन अमेरिकन हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (पीएएचओ) जैसे संगठनों ने महामारी के बाद अवसाद, चिंता विकारों में वृद्धि, आत्मघाती व्यवहार और विचारों की व्यापकता पर गहन अध्ययन किया है.
चिंता, तनाव और अवसाद की विशेषज्ञ मनोवैज्ञानिक लॉरा रोजास-मार्कोस कहती हैं, "महामारी ने हमारी भावनात्मक स्मृति और हमारे संबंध बनाने के तरीके को प्रभावित किया है. हालांकि यह न केवल पीड़ा का नहीं बल्कि सीखने का भी एक महत्वपूर्ण मोड़ रहा है."
वह कहती हैं कि अब हम अपने मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल के महत्व के बारे में अधिक जागरुक हो गए हैं, "यह शरीर से अलग नहीं है, बल्कि पूरी तरह से जुड़ा हुआ है."
वह आगे कहती हैं, " लोगों को अपने जीवन को पीछे मुड़कर देखने का अवसर मिला. इस दौरान उन्होंने यह सीखा भी कि अपने या फिर पर्यावरण के अस्तित्व को हल्के में न लें."
बीबीसी की वर्ल्ड सर्विस द्वारा ग्लोबस्कैन के माध्यम से 30 देशों में कराए गए 2022 के एक सर्वेक्षण के अध्ययन में पाया गया कि एक तिहाई लोग महामारी से पहले की तुलना में अब बेहतर महसूस करते हैं.
इनमें से कई लोगों ने परिवार के साथ अधिक समय बिताने, समुदाय और प्रकृति से बेहतर जुड़ाव और अपनी समग्र प्राथमिकताओं के बारे में स्पष्ट रूप से महसूस करने की बात कही. इन बदलावों का व्यापक रूप से सकारात्मक प्रभाव पड़ा है.
इस संकट ने मनोवैज्ञानिकों द्वारा थेरेपी देने के तरीके में एक स्थायी और क्रांतिकारी बदलाव किया. इसमें वीडियो कॉलिंग को व्यापक रूप से अपनाया गया है.
इस लचीलेपन ने चिकित्सकों को उदाहरण के लिए, युद्ध के बीच में यूक्रेनी सैनिकों या दूरदराज क्षेत्रों में रहने वाले ग्राहकों तक पहुँचने की अनुमति दी है.
महामारी ने हमें लचीलेपन और मानवीय करुणा के बारे में सोचने पर मजबूर किया. रोजास-मार्को के अनुसार, यह हमारे स्वभाव के मूल में है. वो आगे कहती हैं कि त्रासदी के बीच एकजुटता के संकेत उज्ज्वल क्षण थे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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