You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
क्या गर्भनिरोधक गोलियों से महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है?
- Author, सैंडी ओंग
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
गर्भनिरोधक गोलियां यानी ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव पिल लेने वाली कई महिलाओं को इस बात की आशंका रहती है कि कहीं इन गोलियां का उनकी मानसिक सेहत पर कोई बुरा असर न पड़े. लेकिन क्या इन आशंकाओं का कोई सबूत है?
कई युवतियों की तरह सारा ई हिल ने भी 18 साल से 30 साल की उम्र तक गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल किया. हिल अब टेक्सास क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी में विकासवादी मनोविज्ञान पढ़ाती हैं,. वह कहती हैं, "मैंने इसके बारे में दोबारा कभी नहीं सोचा." टेक्सास क्रिश्चियन यूनिवर्सिटी संयुक्त राज्य अमेरिका में क्रिश्चियन चर्च (डिसिपल्स ऑफ क्राइस्ट) से जुड़ी एक संस्था है.
गर्भनिरोधक गोलियां लेना शुरू करने के 12 साल बाद जब उन्होंने गर्भनिरोधक बदलना शुरू किया, तभी उन्हें इस बात का एहसास हुआ. गर्भनिरोधक गोलियां लेने के उनके अनुभवों ने उन्हें इससे जुड़े विज्ञान का अध्ययन करने और 2019 में एक किताब, 'हाउ द पिल चेंजेस एवरीथिंग' प्रकाशित करने के लिए प्रेरित किया.
कई महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियों के दुष्प्रभावों को लेकर चिंतित रहती हैं. खासकर इस बात को लेकर कि गर्भनिरोधक गोलियों का उनके उनके मूड और मानसिक स्वास्थ्य पर क्या असर होता है.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
घट रहा है गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल?
गर्भनिरोधक गोलियों पर नकारात्मक प्रतिक्रियाएं बढ़ रही हैं. ये चीज़ सोशल मीडिया पर सबसे अधिक स्पष्ट है, जिस पर 'क्विंटिंग बर्थ कंट्रोल' के हैशटैग ने लाखों व्यूज़ बटोरे हैं. ऐसा माना जाता है कि इससे कुछ हद तक ये पता चलता है कि गर्भनिरोधक गोलियां अब उतनी लोकप्रिय नहीं हैं.
कई विकसित देशों में डॉक्टरी पर्चे पर गर्भनिरोधक गोलियां लिखे जाने के आंकड़े गिर रहे हैं. इंग्लैंड की यौन और प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं के मुताबिक यहां ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव का इस्तेमाल 2020-2021 में 39% से घटकर 2021-2022 में 27% हो गया.
वहीं अमेरिका में गर्भनिरोधक गोलियां लेने वालों की संख्या 2002 में 31% से घटकर 2017 और 2019 के बीच 24% हो गई, जबकि कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने बताया कि गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल क्रमशः 2006-2016 और 2008-2016 से 23% से घटकर 11% हो गया.
वैध चिंताओं पर चर्चा करने के अलावा, सोशल मीडिया पर कुछ लोग गर्भनिरोधक गोलियों के मानसिक और शारीरिक दोनों तरह के दुष्प्रभावों के बारे में गलत जानकारी फैला रहे हैं.
यहां तक कि महिलाओं को गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल नहीं करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं, जबकि ऐसे लोगों का कोई मेडिकल बैकग्राउंड नहीं है. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन में गर्भपात में हाल ही में हुई वृद्धि के पीछे ये प्रवृत्ति एक वजह हो सकती है.
गर्भनिरोधक गोलियों को लेकर सवाल
क्या गर्भनिरोधक गोलियां वाकई किसी के व्यक्तित्व और जीवन के प्रति दृष्टिकोण को बदल सकती है? क्या इससे चिंता और अवसाद जैसी गंभीर मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों का जोखिम बढ़ सकता है? क्या चरम मामलों में ये आत्महत्या की वजह बन सकती है?
ऐसा लगता है कि इसका जवाब स्पष्ट नहीं है.
जब 1960 में अमेरिका में गर्भनिरोधक गोली आई, तो दो साल के अंदर ही इसका इस्तेमाल करने वालों की संख्या 12 लाख हो गई. पीले रंग की इन छोटी गोलियों को महिलाओं ने महिला सशक्तीकरण के प्रतीक के तौर पर सराहा. इससे महिलाओं को इस डर से मुक्ति मिली कि एक अनचाही गर्भावस्था उनके करियर या डिग्री को पटरी से उतार देगी.
आज, ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव दुनिया भर में लगभग 15 करोड़ महिलाओं का पसंदीदा विकल्प है. ये तादाद दुनिया भर में गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करने वाली आबादी का लगभग 16% है. ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव की विफलता दर केवल 1% है ( उन मामलों में 9% जब आप मानवीय भूल की वजह से कभी-कभार खुराक भूल जाएं).
गर्भनिरोधक गोली दो तरह की होती है और दोनों ही कृत्रिम सेक्स हार्मोन से बनती हैं. सबसे पहले, सबसे लोकप्रिय किस्म की संयुक्त गोली यानी कम्बाइन्ड पिल होती है, जिसमें एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के सिंथेटिक संस्करण होते हैं. दूसरी गोली प्रोजेस्टोजन-ओनली या 'मिनी-पिल' होती है.
दोनों ही गोलियां कई तरीकों से गर्भधारण को रोकने का काम करती हैं , जिसमें ओव्यूलेशन को दबाना और गर्भाशय ग्रीवा के म्यूकस को गाढ़ा करना शामिल है, जिससे शुक्राणु के लिए अंडे तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है.
हालांकि, ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव में मौजूद हार्मोन सिर्फ शरीर को ही प्रभावित नहीं करते, बल्कि इनका महिलाओं के मस्तिष्क पर भी असर पड़ सकता है.
गर्भनिरोधक गोलियों का मानसिक स्वास्थ्य पर असर
स्विट्जरलैंड के यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल बेसल में प्रसूति-स्त्री रोग विशेषज्ञ और मनोचिकित्सक जोहान्स बिट्जे कहते हैं, "मस्तिष्क पर हार्मोन का प्रभाव जटिल है. कुछ व्यक्तियों के लिए, गोली मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव डालती है. वहीं कुछ लोगों को इससे चिड़चिड़ाहट और यहां तक कि एंग्जाइटी (चिंता) की समस्या हो सकती है."
गर्भनिरोधक गोलियों के 65 साल के इतिहास में मेडिकल चेतावनियां बहुत कम रही हैं. यूके और यूएस में कुछ यौन स्वास्थ्य प्रदाता अपनी वेबसाइट पर गोली के मानसिक दुष्प्रभावों का कोई ज़िक्र नहीं करते हैं.
लगभग 40 वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रहे जोहान्स बिट्जे कहते हैं, "मुझे लगता है कि सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि प्रसूति-स्त्री रोग विशेषज्ञों की ट्रेनिंग में मानसिक स्वास्थ्य कोई विषय नहीं है. मानसिक स्वास्थ्य मनोचिकित्सकों के लिए है. चीजें धीरे-धीरे बदल रही हैं, लेकिन पहले, जब हम गोली पर चर्चा करते थे, तो हम थ्रोम्बोसिस, कैंसर, अनियमित रक्तस्राव, वजन बढ़ने के बारे में बात करते थे. इसमें मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा कमोबेश बाहर रखा गया."
इसके अलावा, शोधकर्ताओं की ओर से भी गर्भनिरोधक गोली के संभावित मानसिक दुष्प्रभावों पर बहुत अधिक जांच नहीं की गई. लेकिन बिट्जे कहते हैं कि 2016 में एक बदलाव शुरू हुआ, जब डेनमार्क के एक समूह ने इस विषय पर एक शोधपत्र प्रकाशित किया , जिसके बाद के वर्षों में और अधिक शोध हुए.
मूल डेनिश अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने 14 वर्षों की अवधि में 15 से 34 वर्ष की आयु की दस लाख से अधिक महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर नज़र रखने के लिए देश के राष्ट्रीय स्वास्थ्य डेटाबेस को खंगाला. उन्होंने पाया कि जिन महिलाओं ने एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन दोनों के कॉम्बिनेशन वाली गोली ली, छह महीने बाद उन्हें एंटीडिप्रेसेंट लिखे जाने की संभावना 70% अधिक थी, उन महिलाओं की तुलना में जिन्होंने कभी ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव नहीं लिया था. वहीं प्रोजेस्टोजन-ओनली या 'मिनी-पिल' लेने वाली महिलाओं के लिए ये जोखिम 80% था.
2023 में, शोधकर्ताओं के एक अलग समूह को भी ऐसे ही नतीजे मिले, जब उन्होंने यूके बायोबैंक में लगभग 2 लाख 50 हजार महिलाओं के स्वास्थ्य रिकॉर्ड का विश्लेषण किया. उन्होंने पाया कि गर्भनिरोधक शुरू करने के दो साल बाद, गोली का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं में अवसादग्रस्त होने की आशंका उन महिलाओं की तुलना में 71 फीसदी अधिक थी, जिन्होंने कभी गोली नहीं ली.
कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी में प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ और डेनिश अध्ययन का नेतृत्व करने वाले ओजविंड लिडेगार्ड कहते हैं, "इन उत्पादों का उपयोग शुरू करने और फिर अवसाद के लक्षण विकसित होने के बीच एक ठोस संबंध है."
हालांकि, ये दोनों अध्ययन 'कोहोर्ट अध्ययन' थे. इसका मतलब है कि इनमें महिलाओं के एक बड़े समूह के डेटा का विश्लेषण किया गया. ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव लेने वाली महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य परिणामों की तुलना उन महिलाओं से की गई, जो ऐसी गोलियां नहीं ले रही थीं. इसका मतलब है कि इन अध्ययनों में ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव लेने और मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध पाया गया, लेकिन ये पता नहीं लगा पाया जा सका कि ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव के कारण ही मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ा हो. उदाहरण के लिए, अलग-अलग महिलाओं में कुछ पहले से मौजूद अंतर हो सकते हैं, जिनसे अध्ययन का नतीजा प्रभावित हुआ हो.
कुछ अध्ययनों में विरोधाभासी नतीजे भी मिले
वहीं ऐसे भी अध्ययन हुए हैं, जिनमें कुछ मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों और ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव के इस्तेमाल के बीच संबंध का खंडन किया गया है. उदाहरण के लिए, जब ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पहले के 26 अध्ययनों की समीक्षा की, तो उन्हें गर्भनिरोधक के प्रोजेस्टोजन-ओनली तरीकों और अवसाद के बीच 'न्यूनतम' संबंध मिला.
अलग-अलग, दो क्लिनिकल ट्रायल्स में, जिनमें से हर परीक्षण में स्वीडन में 200 से 340 महिलाएं शामिल थीं, इनमें शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि कम्बाइन्ड गोली से अवसाद या मूड खराब नहीं होता है.
ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव से 'ब्रेक' लेना, जैसा कि कई तरह की संयुक्त गर्भनिरोधक गोलियों के साथ हर महीने सात दिनों के लिए आवश्यक है. दिलचस्प बात यह है कि कुछ निष्कर्षों के अनुसार ये 'ब्रेक' मूड खराब कर सकता है.
2023 में ऑस्ट्रिया में गोली लेने वाली 120 महिलाओं को शामिल करते हुए एक अध्ययन किया गया. इन 120 महिलाओं में कुछ महिलाएं लंबे समय से गर्भनिरोधक गोलियां ले रही थीं. अध्ययन के मुताबिक गोली से 'ब्रेक' के दौरान महिलाओं ने चिंता में 7% की वृद्धि महसूस की. इसके अलावा इस दौरान नकारात्मक भावनाओं में 13% और मानसिक स्वास्थ्य लक्षणों में 24% की वृद्धि दर्ज की गई.
साल्ज़बर्ग यूनिवर्सिटी में कॉग्निटिव न्यूरोसाइंटिस्ट बेलिंडा प्लेट्ज़र कहती हैं, "मानसिक स्वास्थ्य के नज़रिए से, गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करने वालों के लिए इसका लगातार इस्तेमाल अधिक लाभकारी हो सकता है."
बेलिंडा प्लेट्ज़र यूरोपीय संघ की ओर से फंड किए गए एक प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रही हैं, जिसमें महिला मस्तिष्क पर हार्मोनल गर्भनिरोधकों के प्रभाव का अध्ययन किया जा रहा है.
प्लेट्ज़र इस तथ्य को नकारती नहीं हैं कि कुछ महिलाओं को गोली लेने के बाद मनोवैज्ञानिक रूप से बहुत बुरा महसूस होता है और इन लक्षणों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए. वह कहती हैं, "लेकिन ऐसी महिलाएं बहुत कम संख्या में हैं."
विरोधाभासी नतीजे मिलने की वजह क्या है?
ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव के मानसिक दुष्प्रभावों पर अध्ययन के निष्कर्षों में भारी अंतर की वजह हेलेना कोप्प कैलनर समझाती हैं. हेलेना स्वीडन में स्टॉकहोम के पास डेंडरिड अस्पताल में प्रसूति एवं स्त्रीरोग विशेषज्ञ हैं. वो कहती हैं कि मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति को अक्सर व्यक्तिपरक ढंग से मापा जाता है और इसका अध्ययन करना बेहद मुश्किल होता है.
इसके अलावा, कई अलग-अलग तरह की गोलियां हैं (जैसे संयुक्त गोली के 30 से अधिक ब्रांड मौजूद हैं), जिनकी अक्सर तुलना नहीं की जा सकती है. वह आगे कहती हैं कि अलग-अलग अध्ययनों में अलग-अलग तरीके भी अपनाए जाते हैं.
बिटज़र कहते हैं कि शोधकर्ता अपने अध्ययन के अंत में जो देखते हैं, उसका भी उनके निष्कर्षों पर असर पड़ता है. उदाहरण के लिए, डेनिश अध्ययन में, "डॉक्टर की ओर से अवसाद की दवा लिखे जाने का संबंध ज़रूरी नहीं कि अवसाद के निदान से भी जुड़ी हो, ये डॉक्टर की प्रैक्टिस से भी जुड़ी है, जिससे नतीजे प्रभावित हो सकते हैं."
स्वीडन के गोथनबर्ग की फ़िज़िशियन सोफिया ज़ेटरमार्क कहती हैं कि इस तरह के अवलोकन वाले अध्ययनों से कारण-और-परिणाम संबंधों को साबित करना भी मुश्किल है, क्योंकि अन्य कारक भी हो सकते हैं, जैसे कि आनुवांशिकी और व्यक्ति का पर्यावरण, जो परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, जब उन्होंने राष्ट्रीय स्वीडिश रजिस्ट्री में लगभग दस लाख महिलाओं के स्वास्थ्य रिकॉर्ड का विश्लेषण किया, तो उन्होंने पाया कि कम आय और अप्रवासी पृष्ठभूमि की महिलाएं हार्मोनल गर्भनिरोधक पर मूड में बदलाव का अनुभव करने के प्रति अधिक संवेदनशील थीं.
ओजविंड लिडेगार्ड ने स्पष्ट किया कि उनके अध्ययन को व्यापक संदर्भ में समझा जाना चाहिए. लिडेगार्ड कहते हैं, "इसमें कोई संदेह नहीं है कि हार्मोनल गर्भनिरोधक का इस्तेमाल शुरू करने वाली कुछ महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य में गंभीर परिवर्तन होते हैं. हालांकि, यह समझना महत्वपूर्ण है कि केवल 7 से 8% ही ऐसी महिलाएं हैं, जो ऐसी मानसिक समस्याओं का सामना करती हैं कि उन्हें अपनी गोली बंद करनी पड़ती है... इन उत्पादों का इस्तेमला करने वाली ज़्यादातर महिलाओं को मानसिक रूप से कोई गंभीर परेशानी महसूस नहीं होती है."
साथ ही, कुछ महिलाओं के लिए गर्भनिरोधक गोलियों के फ़ायदे किसी भी दुष्प्रभाव से अधिक हो सकते हैं. अनचाहे गर्भ से मुक्ति देने के अलावा गर्भनिरोधक गोलियों (संयुक्त और मिनी-पिल) के दूसरे सकारात्मक शारीरिक प्रभाव भी हो सकते हैं.
हेलेना कोप्प कैलनर कहती हैं, "अगर आपको एंडोमेट्रियोसिस, बहुत ज़्यादा ब्लीडिंग, या पीएमडीडी (प्रीमेनस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर, पीएमएस का एक चरम रूप) है, तो गोली वास्तव में इसे सुधारने में मदद कर सकती है."
गर्भावस्था में भी स्वास्थ्य संबंधी कई जटिलताएं हो सकती हैं, खास तौर पर विकासशील देशों में. वहीं कई अध्ययनों में पाया गया है कि अनियोजित गर्भावस्था और अवसाद के उच्च जोखिम के बीच संबंध है.
दिमाग के रसायनों में बदलाव
लेकिन जिन मामलों में गर्भनिरोधक गोलियों से मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है, उनमें ये असल में कैसे होता है?
गर्भनिरोधक गोलियों के कारण महिलाओं का मूड कई तरह से प्रभावित हो सकता है.
गर्भनिरोधक गोली का एक दुष्प्रभाव यह है कि यह शरीर में प्राकृतिक एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के उत्पादन को प्रभावित करती है. ये हार्मोन मस्तिष्क में संज्ञान के साथ-साथ तंत्रिका को सुरक्षा देने, रक्त प्रवाह को नियंत्रित करने, सूजन और संकेतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.
गर्भनिरोधक गोलियों के साथ-साथ हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (एचआरटी) में इन हार्मोनों के सिंथेटिक संस्करण होते हैं, जो मासिक धर्म चक्र की प्राकृतिक प्रगति को बाधित करते हैं. इसमें प्रोजेस्टिन शामिल हैं, कृत्रिम प्रोजेस्टोजन हार्मोन का एक समूह जिसे कई तरीकों से बनाया जा सकता है, हालांकि इनमें से अधिकांश टेस्टोस्टेरोन से बने होते हैं. सिंथेटिक एस्ट्रोजन या प्रोजेस्टिन रासायनिक रूप से शरीर में बनने वाले हार्मोन से अलग हैं.
ऐसा माना जाता है कि इसके कई असर हो सकते हैं. एक असर यह हो सकता है कि, गर्भनिरोधक गोली लेने वाली महिलाओं में मस्तिष्क का प्राकृतिक 'मूड-बूस्टर' कहे जाने वाले सेरोटोनिन पर असर पड़े.
एक अध्ययन में, डेनिश शोधकर्ताओं ने सेरोटोनिन की गतिविधि का आकलन करने के लिए 53 स्वस्थ महिलाओं के मस्तिष्क स्कैन का विश्लेषण किया, जिनमें से 16 महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियां ले रही थीं. उन्होंने पाया कि गर्भनिरोधक गोलियां लेने वाली महिलाओं में एक निश्चित प्रकार के सेरोटोनिन सिग्नलिंग का स्तर उन महिलाओं की तुलना में 9-12% कम था, जो ये दवाएं नहीं ले रही थीं.
यह प्रभाव सेलेक्टिव सेरोटोनिन रीअपटेक इनहिबिटर (एसएसआरआई) अवसादरोधी दवाओं के इस विशेष प्रकार के संकेतन पर पड़ने वाले प्रभाव से दोगुना था. शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया कि यह गर्भनिरोधक गोलियों और अवसाद के बीच संबंध के लिए जिम्मेदार हो सकता है.
इस बात के भी कुछ प्रमाण हैं कि गर्भनिरोधक गोलियों में मौजूद कृत्रिम एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टिन एलोप्रेग्नानोलोन के उत्पादन में बाधा डाल सकते हैं. एलोप्रेग्नानोलोन मस्तिष्क में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला एक और हार्मोन है, विशेष रूप से मूड और शरीर की तनाव प्रतिक्रिया में. प्रसव के बाद होने वाले अवसाद के इलाज के लिए इस हार्मोन के एक फार्मास्युटिकल संस्करण को 2019 में अमेरिका में मंजूरी दी गई थी.
जो महिलाएं कृत्रिम सेक्स हार्मोन नहीं ले रही हैं, उनमें प्रोजेस्टेरोन एलोप्रेग्नानोलोन में बदल सकता है. लेकिन गर्भनिरोधक गोलियां लेने वाली महिलाओं में, यह प्रक्रिया बाधित मानी जाती है. इन महिलाओं में प्रोजेस्टिन एलोप्रेग्नानोलोन में नहीं टूटते हैं, जिसका अर्थ है कि वे इसके कुछ चिंता-रोधी और अवसाद-रोधी प्रभावों से वंचित रह सकती हैं.
चूहों पर किए गए एक अध्ययन में, ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव लेने वालों के मस्तिष्क में एलोप्रेग्नानोलोन की सांद्रता कम पाई गई. चूहों पर किए गए एक अन्य अध्ययन में , यह कमी सामाजिक व्यवहार और यौन प्रेरणा में कमी से जुड़ी पाई गई. अध्ययन के लेखकों का अनुमान है कि ये साइड इफेक्ट गर्भनिरोधक गोलियां लेने वाली महिलाओं के लिए प्रासंगिक हो सकते हैं. हालांकि, जानवरों पर किए गए अध्ययनों के परिणाम हमेशा इंसानों पर लागू नहीं होते हैं.
गर्भनिरोधक गोलियों से महिलाओं में तनाव के प्रति प्रतिक्रिया बिगड़ सकती है, जिससे चिंता और अवसाद हो सकता है. हिल बताते हैं, "शोधकर्ताओं ने पाया है कि गर्भनिरोधक गोलियों से तनाव के प्रति कोर्टिसोल प्रतिक्रिया में कमी आती है. कोर्टिसोल नहीं होने का मतलब है कोई तनाव नहीं, जो सतही तौर पर एक अच्छी बात लग सकती है. लेकिन यह इस तरह से काम नहीं करता है. कोर्टिसोल तनाव का कारण नहीं बनता है, यह वह है जिसकी मदद से हमारा शरीर तनाव से निपटता और उबरता है."
किशोरियों को ज़्यादा जोखिम
ओजविंड लिडेगार्ड किशोर लड़कियों को लेकर चिंता जताते हैं. उनके अध्ययन से पता चला है कि 15 से 19 साल की आयु की लड़कियों में कम्बाइन्ड पिल शुरू करने के बाद एंटीडिप्रेसेंट प्रिस्क्रिप्शन मिलने की संभावना लगभग दोगुनी (1.8 गुना) थी, उन लड़कियों की तुलना में जिन्होंने गोली नहीं ली.
मिनी-पिल लेने वाली लड़कियों के लिए, जोखिम दोगुने से भी ज़्यादा था (इस ग्रुप को एंटीडिप्रेसेंट प्रिस्क्रिप्शन मिलने की संभावना उन लोगों की तुलना में 2.2 गुना ज़्यादा थी, जिन्होंने गोली नहीं ली थी).
इसी तरह, ज़ेटरमार्क के अध्ययन में भी किशोर लड़कियों में हार्मोनल गर्भनिरोधक और अवसादरोधी या चिंता-रोधी दवाओं के इस्तेमाल के बीच मजबूत संबंध देखा गया. 12 से 14 साल की उम्र वाली लड़कियों में संयुक्त गोली और मिनी-पिल शुरू करने के एक साल के अंदर डिप्रेशन की दवाइयां दिए जाने की संभावना क्रमशः 240% और 190% अधिक थी. वहीं 15 से 17 साल की उम्र वाली लड़कियों में संयुक्त गोली और मिनी-पिल शुरू करने के बाद डिप्रेशन की दवा लिखे जाने की संभावना 52% और 83% अधिक थी.
यूके बायोबैंक से जुड़ी 2 लाख 64 हज़ार 557 महिलाओं से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर किए गए एक अन्य अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन महिलाओं ने अपने जीवन में कभी न कभी गर्भनिरोधक गोलियां लीं, उनमें जीवन भर अवसाद विकसित होने का जोखिम अधिक था , लेकिन यह जोखिम गोलियां इस्तेमाल करने के पहले दो वर्षों के दौरान सबसे अधिक था.
किशोरियों के अलावा, एक और समूह है, जिन्हें कई चिकित्सक गर्भनिरोधक गोलियां लिखने में सावधानी बरतते हैं. कोप्प कैलनर चेतावनी देती हैं, "जिन्हें पहले अवसाद रहा हो, या पहले कोई भी मानसिक समस्या रही है, तो ऐसे लोगों में गर्भनिरोधक गोली लेने पर अवसाद का जोखिम बढ़ जाता है."
कई विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे में खुद भी जागरूक रहना अहम है. जब आप पहली बार गर्भनिरोधक गोली लेना शुरू करती हैं, या एक ब्रांड से दूसरे ब्रांड पर स्विच करती हैं, तो खुद कुछ महीनों तक अपने मूड पर नज़र रखनी चाहिए. अगर आपको इस बात की चिंता है कि आपका गर्भनिरोधक आपके मूड को कैसे प्रभावित कर रहा है, तो अपने डॉक्टर से बात करें.
जोहान्स बिट्जे कहते हैं कि कई विकल्पों में से अपने लिए सही विकल्प खोजना चाहिए. वो कहते हैं, "यह बहुत ही व्यक्तिगत उपचार है."
हालांकि, गर्भनिरोध के कई ऐसे विकल्प भी हैं, जिनमें या तो हार्मोन नहीं होते हैं या गर्भनिरोधक गोलियों की तुलना में कम डोज़ होती है. इन विकल्पों में पुरुष और महिला कंडोम (जो यौन संचारित रोगों से बचाने में भी मदद कर सकते हैं), वजाइनल रिंग, आईयूएस (हार्मोनल कॉइल), आईयूडी (कॉपर कॉइल) और नसबंदी शामिल हैं.
सारा ई हिल के लिए, गर्भनिरोध के तरीके को बदलना उनके लिए जीवन बदलने जैसा था. वह सलाह देती हैं, "गर्भावस्था से सुरक्षा का ऐसा तरीका खोजने के लिए समय निकालें, जो आपको वह व्यक्ति महसूस कराए जो आप बनना चाहती हैं. समय और धैर्य के साथ, आप कुछ ऐसा पा सकेंगी जो आपके लिए कारगर हो."
(इस लेख में लिखी गई बातें सिर्फ सामान्य जानकारी के लिए हैं, और इसे डॉक्टर या मेडिकल सलाह का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए. इस साइट पर दी गई जानकारी के आधार पर किसी यूज़र द्वारा किए गए किसी भी निदान के लिए बीबीसी जिम्मेदार या उत्तरदायी नहीं है. बीबीसी यहां लिस्टेड किसी भी बाहरी इंटरनेट साइट की सामग्री के लिए उत्तरदायी नहीं है, न ही यह किसी भी साइट पर उल्लेखित या सलाह दी गई किसी भी व्यावसायिक उत्पाद या सेवा का समर्थन करता है. अगर आप किसी भी तरह से अपने स्वास्थ्य के बारे में चिंतित हैं, तो हमेशा अपने डॉक्टर से परामर्श करें.)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहाँ क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)