आंखों का पहला ट्रांसप्लांट, मलेरिया की नई वैक्सीन और..., साल 2023 में हेल्थ सेक्टर की बड़ी ख़बरें

सेहत के मामले में 2023 का साल कई उपलब्धियों वाला रहा है.

कई क्षेत्रों में उम्मीदों के नए दरवाज़े खोलने वाले रिसर्च हुए.

अब जबकि ये साल ख़त्म हो रहा है, तो हम कुछ बड़ी सफलताओं पर एक नज़र डाल रहे हैं.

मलेरिया की दूसरी वैक्सीन

एक सदी से भी ज़्यादा लंबी वैज्ञानिक कोशिशों के बाद, आख़िरकार दुनिया को मलेरिया से लड़ने की एक सस्ती वैक्सीन मिल ही गई.

मलेरिया का ये नया टीका ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने विकसित किया है, जो दुनिया का सिर्फ़ दूसरा मलेरिया का टीका है.

इससे दो साल पहले ही ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन (जीएसके) ने मलेरिया की एक वैक्सीन आरटीएस-एस विकसित की थी.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि मलेरिया से लड़ने में दोनों ही टीके 'बराबर के असरदार' हैं और इस बात का कोई सुबूत नहीं है कि कोई एक वैक्सीन, दूसरी वाली से बेहतर है.

हालांकि, दोनों टीकों के बीच जो बड़ा फ़र्क़ है, वो ये है ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के टीके, आर21 को बड़े पैमाने पर बनाया जा सकता है.

दुनिया में वैक्सीन की सबसे बड़ी निर्माता कंपनी, सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने भी मलेरिया के इस नए टीके की सालाना दस करोड़ ख़ुराक बनाने की तैयारी कर रखी है.

कंपनी की योजना है कि वो इसे बढ़ाकर साल में 20 करोड़ डोज़ तक ले जाएगी.

जबकि, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन की मलेरिया वैक्सीन आरटीएस,एस की अब तक केवल 1.8 करोड़ ख़ुराकें ही तैयार हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि मलेरिया का नया टीका आर21, इस बीमारी से लड़ने का एक 'अहम अतिरिक्त औज़ार' साबित होगा.

इस टीके की एक डोज़ दो से चार डॉलर में तैयार होगी और हर इंसान को इसकी चार ख़ुराक लेनी होंगी. आरटीएस, एस की तुलना में इस वैक्सीन की क़ीमत लगभग आधी है.

दोनों ही टीके तैयार करने में एक जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है. और, ये दोनों ही मलेरिया के परजीवी के जीवन चक्र के एक ही स्तर को टारगेट करते हैं.

हालांकि, नई वैक्सीन को बनाना आसान है क्योंकि इसके लिए छोटी ख़ुराक की ज़रूरत होती है और इसे बनाने में एक साधारण एडजुवैंट (टीके में मिलाया जाने वाला एक केमिकल जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता झटका देकर काम पर लगाता है) का इस्तेमाल किया जाता है.

मच्छरों से पैदा होने वाली बीमारियों में मलेरिया सबसे घातक है और इसके 95 प्रतिशत मामले अकेले अफ्रीका महाद्वीप में मिलते हैं.

साल 2021 में मलेरिया के 24.7 करोड़ मामले सामने आए थे, और इनमें से छह लाख 19 हज़ार लोगों की जान चली गई. मलेरिया से मरने वाले मरीज़ों में से ज़्यादातर पांच साल से कम उम्र के बच्चे थे.

दुनिया का पहला आंख का ट्रांसप्लांट

2021 में अमेरिका के रहने वाले आरोन जेम्स का चेहरा बिजली के ज़बरदस्त झटके की वजह से उस वक़्त लगभग पूरी तरह जल गया था, जब उन्होंने 7200 वोल्ट की बिजली की नंगी तार ग़लती से छू ली थी.

आरोन जेम्स एक बिजली कंपनी में लाइनमैन थे.

मई 2023 में आरोन जेम्स के चेहरे का आंशिक ट्रांसप्लांट किया गया.

इसके अलावा उनकी आंख का भी ट्रांसप्लांट किया गया. इस बेहद दुर्लभ ट्रांसप्लांट में 140 स्वास्थ्यकर्मी शामिल हुए थे.

आरोन जेम्स का ये बेहद जटिल ट्रांसप्लांट, न्यूयॉर्क की एनवाईयू लैंगोन हेल्थ के सर्जनों किया था. नवंबर महीने में उन्होंने इस सर्जरी का अपडेट दिया.

उन्होंने बताया कि इस दोहरे ट्रांसप्लांट के बाद 46 बरस के आरोन जेम्स की सेहत बेहतर है और वो अच्छे से रिकवरी कर रहे हैं. उनको दान में मिली आंख की सेहत भी बढ़िया है.

आरोन की दाहिनी आंख अब भी काम करती है.

डॉक्टरों का कहना है कि आरोन जेम्स की सर्जरी से वैज्ञानिकों को ये समझने का एक अभूतपूर्व मौक़ा मिला है कि इंसान की आंख का ज़ख़्म कैसे भरता है.

डॉक्टरों ने ये भी कहा कि रेटिना में रक्त का प्रवाह बिलकुल सीधा होता है. रेटिना हमारी आंख का वो हिस्सा होता है, जो किसी तस्वीर को हमारे ज़हन को भेजता है.

वैसे तो अभी ये तय नहीं है कि आरोन जेम्स की जो आंख ख़राब हो गई, उसकी रोशनी फिर से वापस आएगी. लेकिन, डॉक्टरों ने इसकी संभावना से इनकार भी नहीं किया है.

आरोन जेम्स को जिस एक शख़्स से चेहरा और आंख दान में मिले, वो उम्र के चौथे दशक में था.

सर्जरी के दौरान, डॉक्टरों ने दान देने वाले की बोन मैरो से वयस्क स्टेम सेल्स को, आरोन जेम्स की आंखों की नर्व (तंत्रिका) में डाला, ताकि उसे मरम्मत के लिए प्रोत्साहित किया जा सके.

हादसे के बाद आरोन जेम्स को दर्द की वजह से अपनी बायीं आंख निकलवानी पड़ी थी.

इसके बाद उनके कई ऑपरेशन किए गए. एक सर्जरी के बाद उनको बनावटी (प्रॉस्थेटिक) हाथ लगाया गया.

आरोन जेम्स अमरीका के केवल 19वें ऐसे इंसान हैं, जिनके चेहरे का ट्रांसप्लांट किया गया है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से दिल की सेहत की पड़ताल

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के एक नए टूल से पता चला है कि कितनी शराब पीने, धूम्रपान करने, ख़राब खान-पान और वर्ज़िश नहीं करने से किसी इंसान का दिल समय से कितना पहले बूढ़ा होने लगता है.

इस खोज का मक़सद दिल के बूढ़े होने की रफ़्तार को पलटना है, ताकि उम्र से जुड़ी कई बीमारियों जैसे कि दिल के दौरे या किसी अन्य रोग का ख़तरा कम किया जा सके.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का ये सिस्टम, मेडिकल रिसर्च काउंसिल (एमआरसी) के लंदन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (एलएमएस) के प्रोफ़ेसर डेक्लान ओ'रीगन की अगुवाई वाली टीम ने विकसित किया है.

टीम के मुखिया प्रोफ़ेसर डेक्लान ओ'रीगन कहते हैं, "जब हम किसी के चेहरे पर नज़र डालते हैं, तो हम ये हिसाब लगाने में उस्ताद हैं कि वो शख़्स अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा जवान दिखता है या बूढ़ा. हम सबके अंग एक जैसे ही हैं."

दिल की सेहत का आकलन करने के बहुत से तरीक़े हैं. इनमें स्कैन, इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ईसीजी) और ब्लड प्रेशर शामिल हैं.

लेकिन, इन सबसे सिर्फ़ यही पता चलता है कि अभी दिल की सेहत कैसी है और आगे चलकर हर दिन के हिसाब से या फिर आने वाले महीनों के दौरान वो कैसी रहने वाली है.

वहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विश्लेषण ये बताता है कि वक़्त के साथ साथ दिल के अंदर कितन कचरा जमा हो गया है.

प्रोफेसर ओ'रीगन कहते हैं कि एआई बताता है कि किसी इंसान की अब तक की उम्र के दौरान, उसके दिल को कितने झटके लग चुके हैं.

इस प्रक्रिया के दौरान, कसरत के बाद किसी इंसान के दिल की मैग्नेटिक रेज़ोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) की जाती है.

चूंकि दिल के बूढ़ा होने के सबसे शुरुआती संकेत बहुत हल्के और मामूली होते हैं. इसलिए, दिल के तजुर्बेकार डॉक्टर भी कई बार उन्हें पकड़ नहीं पाते हैं.

लेकिन, ये काम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाला औज़ार कर सकता है. क्योंकि, अलग अलग तरह की सेहत वाले क़रीब 40 हज़ार लोगों के दिलों की तस्वीरें और उनके नतीजों की जानकारी इस टूल में डाली जाती हैं.

फिर ये एआई सिस्टम, थ्रीडी मोशन में किए गए एमआरआई स्कैन की बारीक़ से बारीक़ बातों की पड़ताल करता है. और फिर उनकी तुलना, अच्छी सेहत भरे रहन-सहन वाले अलग अलग उम्र के पांच हज़ार लोगों के दिल की सेहत से करता है.

प्रोफेसर डेक्लान ओ'रीगन कहते हैं, "हमें ये नहीं पता कि दिल का वक़्त से पहले बूढ़ा होना हमारे जीन्स का नतीजा होता है और क्या हम दिल के जल्दी बूढ़ा होने की नियति लेकर पैदा होते हैं. या फिर, इसका ताल्लुक़ हमारे रहन-सहन से ज़्यादा होता है."

वो कहते हैं, "जेनेटिक्स से हम दिल के बूढ़ा होने की रफ़्तार को धीमा कर सकते हैं, या रोक सकते हैं. और, इन एमआरआई स्कैन के ज़रिए हम ये भी पता लगा सकते हैं कि किसी नए इलाज का दिल को हुए नुक़सान पर कैसा असर हो रहा है."

थ्रीडी प्रिंटिंग से बना आर्टिफिशियल घुटना

वैज्ञानिकों ने थ्रीडी प्रिंट तकनीक से ऐसा इम्प्लांट तैयार किया है, जो घुटनों के दर्द से परेशान मरीज़ों का मददगार बन सकता है.

ओस्टियोटोमी नाम की एक ख़ास सर्जरी के ज़रिए किसी इंसान के घुटनों की हड्डी को या तो काटा जाता है, या फिर इस तरह मोड़ा जाता है, जिससे उसका असली घुटना सुरक्षित रहे.

इस आर्टिफिशियल घुटने को यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है. इस तकनीक से घुटनों का ऑपरेशन जल्दी और सुरक्षित तरीक़े से किया जा सकेगा.

थ्रीडी हाई टिबियल ओस्टियोटोमी (एचटीओ) की प्लेटों का इस्तेमाल, मरीज़ के घुटने को दुरुस्त करने के लिए किया जाता है, जिससे वो ज़्यादा स्थिर, आरामदेह और पहले से उपलब्ध प्लेटों के मुक़ाबले ज़्यादा वज़न सह सकने लायक़ होती हैं.

किसी मरीज़ को किस तरह के ऑपरेशन की ज़रूरत होगी, इसका पता लगाने के लिए डॉक्टर मरीज़ के घुटने और उसकी पिंडली की हड्डी का एक्स-रे और सीटी स्कैन कराते हैं.

इसके बाद थ्रीडी प्रिंटर की मदद से घुटनों को स्थिर बनाने वाली सर्जिकल गाइड प्लेट तैयार की जाती है.

इसके बाद उसको मरीज़ की पिंडली में पिन की मदद से अस्थायी तौर पर लगाया जाता है.

इसके बाद, प्लेट लगाने में इस्तेमाल की गई पिनों को हटाकर दो स्क्र्यू लगा दिए जाते हैं, जिससे मरीज़ की हड्डी के बीच थोड़ी सी जगह बनाकर उसको सीधा किया जाता है.

इसके ऊपर, स्टैबिलाइज़िंग प्लेट लगाई जाती है, जिससे डिजिटल तरीक़े से बनी ये प्लेट वास्तविक रूप से मरीज़ के पैर में लग जाती है.

पांच मरीज़ों पर शुरुआती सेफ्टी ट्रायल के बाद, अब इंग्लैंड और वेल्श में 50 अन्य लोगों को, घुटनों की पारंपरिक सर्जरी की जगह इस नई तकनीक के परीक्षण में शामिल होने के लिए जोड़ा जा रहा है.

दिमाग़ में मिला ज़िंदा कीड़ा

दुनिया में पहली बार वैज्ञानिकों ने ऑस्ट्रेलिया की एक महिला के दिमाग़ से 8 सेंटीमीटर (3 इंच) लंबा एक ज़िंदा कीड़ा निकाला. 'लड़ी जैसा दिखने वाला ये कीड़ा', कैनबरा में पिछले साल सर्जरी के दौरान मरीज़ के ज़ख़्मी फ्रंटल लोब से निकाला गया था. लेकिन, इस सर्जरी की पूरी रिपोर्ट इस साल प्रकाशित की गई है.

महिला की सर्जरी करने वाली डॉक्टर हरी प्रिया बंडी ने कहा, "ये तो हमारे वहम-ओ-गुमान में भी नहीं था कि मस्तिष्क के भीतर हमें इतना बड़ा कीड़ा मिल जाएगा."

64 साल की ये महिला कई महीनों से पेट के दर्द, खांसी और रात में पसीना आने जैसी परेशानियों से जूझ रही थी. धीरे-धीरे वो डिप्रेशन और भूलने की बीमारी की शिकार हो गई.

साल 2021 में जनवरी महीने आख़िरी दिनों में उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया. स्कैन से उसके दिमाग़ के दाहिनी फ्रंटल लोब के भीतर अजीब तरह की चोट होने का पता चला.

मगर, मरीज़ के मस्तिष्क को ये चोट क्यों लगी, इसकी असल वजह जून 2022 में तब जाकर सामने आई, जब डॉक्टर बंडी ने उनकी बायोप्सी की.

डॉक्टरों ने बताया कि लाल रंग का ये परजीवी, शायद पिछले दो महीनों से उस महिला के दिमाग़ में पल रहा था.

इस मामले की जानकारी दुनिया को देने वाली इमर्जिंग इन्फेक्शस डिज़ीजेस पत्रिका के रिसर्चरों ने कहा कि इस महिला का ये मर्ज़ दुनिया का शायद ऐसा पहला मामला है, जब किसी इंसान के दिमाग़ के भीतर लार्वा की घुसपैठ का पता चला हो.

रिसर्चरों ने चेतावनी दी है कि ये मामला, जानवरों से इंसानों तक पहुंच रही बीमारियों और संक्रमणों के बढ़ते ख़तरे की तरफ़ इशारा करता है.

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