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मेनोपॉज़ के बारे में सात मिथक और उनका सच
हर साल 18 अक्टूबर को वर्ल्ड मेनोपॉज़ डे मनाया जाता है. इसका मकसद जागरूकता फैलाने के साथ ही इससे गुज़र रही लाखों-करोड़ों महिलाओं के आसपास मौजूद तमाम भ्रांतियों को तोड़ना भी है.
दुनियाभर में उन महिलाओं की आबादी बढ़ रही है जिन्हें माहवारी आना बंद हो चुका है. इसके पीछे वजह यह है कि महिलाओं की उम्र अब लंबी हो रही है.
साल 2021 में 50 साल या उससे अधिक आयु की महिलाओं की आबादी दुनियाभर में कुल महिलाओं और लड़कियों का 26 फ़ीसदी थी. संयुक्त राष्ट्र के डेटा के अनुसार 10 साल पहले ये आंकड़ा 22 फ़ीसदी था.
मेनोपॉज़ किसी भी महिला के जीवन का एक सामान्य चरण है, लेकिन अकसर इसके बारे में गलत जानकारियां प्रचलित होती हैं.
मेनोपॉज़ को लेकर मिथक पूरी दुनिया में मौजूद हैं. हम आपको ऐसे ही सात भ्रांतियों और उनका सच बता रहे हैं.
सभी महिलाओं का मेनोपॉज़ एक जैसा होता है
महिलाओं में हॉर्मोनल बदलाव उनके सामाजिक-सांस्कृतिक, बायोलॉजिकल और जीवनशैली जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है. ये बदलाव हर महिला में उनकी जीवनशैली के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं.
मेनोपॉज़ 50 साल या उसके बाद होता है
माहवारी बंद होने की औसत आयु 51 साल है, लेकिन ये 40 से 60 की उम्र के बीच कभी भी शुरू हो सकता है. ये अलग-अलग क्षेत्रों और नस्लीय समूहों पर निर्भर करता है.
वज़न बढ़ना है तय
मेनोपॉज़ के असर को छोड़ भी दें तो उम्र बढ़ने के साथ ही शरीर का मेटाबॉलिज़्म धीमा पड़ता जाता है. इसलिए डॉक्टर नियमित व्यायाम और संतुलित खाना खाने की सलाह देते हैं, ताकि आपका वज़न अनियंत्रित न हो.
हॉट फ़्लैशेज़ है आम
हॉट फ़्लैशेज़ (अचानक तेज़ गर्मी महसूस करना) आम बात है लेकिन ये हर महिला को प्रभावित नहीं करता है. ये मेनोपॉज़ के शुरुआती दो वर्षों में बेहद आम हैं और सात साल के बाद ये बंद हो जाता है.
बंद हो जाती है यौन संबंध की इच्छा
वेजाइनल ड्राइनेस, यौन इच्छा में कमी और तनाव आपके यौन संबंधों पर असर डाल सकते हैं. हालांकि, किसी अच्छे डॉक्टर और अपने पार्टनर के सहयोग से महिलाएं अपनी सेक्स लाइफ़ सामान्य तरह से जी सकती हैं.
डिप्रेशन, बेचैनी और मूड स्विंग्स
मेनोपॉज़ से तनाव (डिप्रेशन) नहीं होता है लेकिन मेनोपॉज़ की ओर बढ़ रहीं महिलाओं में नींद में कमी और हॉट फ़्लैशेज़ आम हैं, जिससे कई बार वो चिड़चिड़ापन महसूस कर सकती हैं.
हॉर्मोन थेरेपी से सेहत को है खतरा
हॉर्मोन का इस्तेमाल किसी महिला में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ाता है लेकिन ये हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम घटाता भी है. कई अध्ययनों में ये पता चलता है कि 60 साल से कम उम्र की महिलाओं, जिन्हें थोड़ी कम या बहुत अधिक हॉट फ़्लैश की समस्या है, को हॉर्मोन के इस्तेमाल का नुकसान से अधिक फ़ायदा है.
मेनोपॉज़ क्या है?
मेनोपॉज़ तब होता है जब माहवारी वाली महिलाओं की उम्र बढ़ने के साथ ही उनके सेक्स हॉर्मोन में बदलाव होता है. अंडाशय (ओवरीज़) हर महीने अंडे बनाना बंद कर देते हैं और एस्ट्रोजन का स्तर गिर जाता है. मेनोपॉज़ आमतौर पर 45 से 55 साल के बीच होता है, लेकिन कुछ महिलाओं में ये इससे जल्दी हो जाता है.
अगर किसी महिला को लगातार 12 महीने तक पीरियड्स नहीं आते तो उसे मेनोपॉज़ कहा जाता है. ये महिलाओं की प्रजनन क्षमता के अंत का संकेत है.
लेकिन मेनोपॉज़ रातोंरात नहीं होता. ये एक धीरे-धीरे चलने वाली प्रक्रिया है. एक महिला औसतन सात साल तक इस अवस्था से गुज़रती है लेकिन कुछ महिलाओं में ये 14 साल तक भी इस प्रक्रिया से गुज़रती हैं.
मेनोपॉज़ तीन चरणों में होता है.
पहला प्री-मेनोपॉज़, जो 30 से 40 साल की उम्र वाली महिलाएं प्रभावित होती हैं. इस दौरान महिलाओं को हर महीने पीरियड्स होते हैं, लेकिन एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन का स्तर कई बार बदलने लगता है.
दूसरा होता है पेरी-मेनोपॉज़, जो महिलाओं में प्रजनन क्षमता के अंत को दिखाता है. इस दौरान उनका एस्ट्रोजन स्तर तेज़ी से कम होता है. इस अवस्था में पीरियड्स अनियममित हो जाते हैं और कई बार महिलाओं को माहवारी नहीं भी होती, या कम समय के लिए होती है, या ये लंबे समय तक भी चलते हैं. महिलाओं में हॉल फ्लैशेज़, बेचैनी और नींद की कमी जैसी शिकायतें भी हो सकती हैं.
तीसरा और आख़िरी स्टेज पोस्ट मेनोपॉज़ होती है, जिसमें महिलाओं को लगातार 12 महीने तक माहवारी नहीं होती. इस दौरान पेरी मेनोपॉज़ के वक्त महसूस होने वाले लक्षण भी घटने लगते हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मेनोपॉज़ के 48 से अधिक अलग-अलग लक्षण हैं.
आम लक्षणों में ये शामिल हैं:
- हॉट फ़्लैशेज़ और नींद में भारी पसीना आना
- मेन्सट्रुअल साइकल में बदलाव और धीरे-धीरे पीरियड बंद होना
- योनी में सूखापन, सेक्शुअल इंटरकोर्स के समय दर्द
- सोने में दिक्कत या नींद की कमी
- मूड बदलना, तनाव और/या बेचैनी
- हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं, जो फ़्रैक्चर की आशंका बढ़ाती है
महिलाएं अकसर एकाग्रता में कमी और कमज़ोर याद्दाश्त की शिकायत करती हैं, जिसे आमतौर पर ब्रेन फ़ॉग कहा जाता है. इसके साथ ही जोड़ो में दर्द और शुष्क त्वचा भी एक लक्षण है.
यहां ये जानना ज़रूरी है कि हर महिला में ये लक्षण नहीं दिखते, लेकिन 75 फ़ीसदी महिलाएं इससे जूझती हैं.
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