You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
प्लास्टिक या पेपर से बने स्ट्रॉ का इस्तेमाल करते हैं तो ये ज़रूर पढ़ें
प्लास्टिक की चीज़ें इस्तेमाल नहीं करने को लेकर दुनियाभर में कई मुहिम छिड़ी हैं.
प्लास्टिक पर्यावरण के लिए एक अभिशाप की तरह है जो हमारे आस पास ही नहीं बल्कि दूर दराज़ के इलाक़े, पहाड़, नदियां, समंदर को भारी नुक़सान पहुंचा रहा है.
द साइंस जर्नल में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ 2040 तक पूरी दुनिया में क़रीब 1.3 अरब टन प्लास्टिक जमा हो जाएगा. अकेले भारत हर साल 33 लाख टन से अधिक प्लास्टिक पैदा करता है.
भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) और प्रैक्सिस ग्लोबल अलायंस के सहयोग से तैयार की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत हर साल क़रीब 3.4 मिलियन टन यानी 340 करोड़ किलो प्लास्टिक कचरा पैदा करता है और इसके केवल तीस प्रतिशत हिस्से को रिसाइकिल किया जाता है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक़ देश में प्लास्टिक की खपत बीते पांच वर्षों के दौरान तेज़ी से बढ़ा है.
इंसानों की प्लास्टिक पर निर्भरता इस कदर बढ़ गई है कि धरती पर इस 'सफ़ेद प्रदूषण' के ढेर लगते जा रहे हैं.
सिंगल यूज़ प्लास्टिक 300 साल तक पर्यावरण में रहते हैं
एक अनुमान के मुताबिक़ अमेरिका में हर दिन इस्तेमाल की जाने वाली ड्रिंकिंग स्ट्रॉ की संख्या 500 मिलियन है.
हालांकि इस आंकड़े की वैद्यता विवादों के घेरे में रही है और वास्तविक आंकड़ा उसके आधे के बराबर हो सकता है. लेकिन यह तो बिल्कुल सही है कि बीते दो दशकों से डिस्पोजेबल ड्रिंकिंग स्ट्रॉ यानी पीने के लिए एक बार इस्तेमाल किए जाने वाले स्ट्रॉ पर खर्च की जा रही राशि में हर साल इजाफ़ा हो रहा है.
इनमें से अधिकांश स्ट्रॉ इस्तेमाल के बाद कचरे में डाल दिए जाते हैं जो हमारे पर्यावरण को दूषित करने का काम करते हैं. सिंगल यूज़ प्लास्टिक को पर्यावरण में पूरी तरह घुलने में 300 साल तक लगते हैं.
स्ट्रॉ जैसे सिंगल यूज़ प्लास्टिक की संख्या इतनी बढ़ गई है कि लंबे समय से पूरी दुनिया में सिंगल यूज़ प्लास्टिक के ख़िलाफ़ बड़े स्तर पर मुहिम चलाई जा रही है.
भारत में जहां सिंगल यूज़ प्लास्टिक उत्पादों के विरोध में एक मुहिम छिड़ी है वहीं दुनिया भर में लाखों की संख्या में लोग ऐसी मुहिम से जुड़े हैं जो प्लास्टिक के इस्तेमाल का विरोध करता है और इनमें से एक है प्लास्टिक के स्ट्रॉ का विरोध.
प्लास्टिक के स्ट्रॉ के विरोध के लिए माइलो क्रेसो को भी कुछ श्रेय दिया जा सकता है. नौ साल की उम्र में उन्होंने 'बी स्ट्रॉ फ़्री' अभियान की शुरुआत की जिसकी वजह से स्टारबक्स और मैकडोनल्ड जैसी कंपनियों ने प्लास्टिक स्ट्रॉ का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया.
सिंगल यूज़ प्लास्टिक के विरोध की वजह से आज पेपर, मेटल, कांच और पौधे पर आधारित स्ट्रॉ बाज़ार में बड़ी मात्रा में देखे जा रहे हैं लेकिन क्या इनमें से किसी एक का चयन आसान है और क्या वाकई ये पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते?
शोध क्या कहता है?
हाल ही में हुए एक शोध में पेपर स्ट्रॉ से जुड़े एक अन्य पहलू पर ध्यान दिलाया है.
बेल्जियम के एंटवर्प यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पेपर से बने स्ट्रॉ पर यह शोध किया और पाया कि इसमें पलास्टिक की तुलना में कहीं अधिक पॉलीफ़्लोरो एल्किल पदार्थ यानी पीएफ़एएस पाया जाता है.
पीएफ़एएस या पॉलीफ़्लोरो एल्किल वो पदार्थ हैं जो जल्दी टूटते नहीं हैं और हमारे वातावरण, बारिश के पानी और मिट्टी में लंबे वक़्त तक रह सकते हैं. इसिलिए इन्हें फ़ॉरएवर केमिकल भी कहा जाता है.
पीएफ़एएस दशकों तक पर्यावरण में बने रह सकते हैं और ये पानी को दूषित करने के साथ साथ इंसानों से जुड़ी कई स्वास्थ्य समस्याओं के कारण हैं.
शोधकर्ताओं का कहना है कि पेपर और बांस के इस्तेमाल से बने स्ट्रॉ में भी पीएफ़एएस की अच्छी मात्रा पाई गई लिहाजा ये ज़रूरी नहीं है कि वो प्लास्टिक की तुलना में बेहतर विकल्प हों.
उनका कहना है कि इनमें मौजूद फ़ॉरएवर केमिकल की अधिक मात्रा इस बात पर यकीनन सवाल उठाते हैं कि ये कितने पर्यावरण के अनुकूल हैं.
तो फिर प्लास्टिक स्ट्रॉ का विरोध क्यों हो रहा है?
तो अगर प्लास्टिक स्ट्रॉ से पर्यावरण को कम ख़तरा है तो आखिर दुनियाभर में उसका विरोध क्यों हो रहा है?
वर्ल्ड वाइल्डलाइफ़ फ़ंड में प्लास्टिक वेस्ट और बिज़नेस के वाइस प्रेसिडेंट इरिन साइमन बीबीसी संवाददाता एली हिर्श्लाग से कहते हैं, "ये उतना भी सीधा मसला नहीं है क्योंकि यह केवल प्लास्टिक स्ट्रॉ की बात नहीं है. प्लास्टिक प्रदूषण एक बड़ा वैश्विक संकट है और इसका हल तभी किया जा सकता है जब हर कोई अपनी भूमिका अदा करेगा."
अक्षर फाउंडेशन की पर्यावरणविद परमिता सरमा संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सम्मेलन में 'प्लास्टिक कचरों को कैसे रिसाइकिल करों' विषय पर प्रेजेंटेशन दे चुकी हैं.
बीबीसी हिंदी की सहयोगी अंजलि दास से परमिता सरमा कहती हैं, "प्लास्टिक तो हर रूप में हमारे लिए हानिकारक है लेकिन इसके कुछ फ़ायदे भी हैं. हम दूरदराज के इलाके में इसके ज़रिए ही खाना ख़राब किए बग़ैर भेज पाते हैं. इसकी वजह से से खाना ख़राब हुए बग़ैर ग़रीबी में रह रहे लोगों को को मिल जाता है."
हालांकि परमिता सरमा साथ ही ये यह भी कहती हैं कि "हमें वैसे ही प्लास्टिक उत्पाद का इस्तेमाल करना चाहिए जो रिसाइकिल किए जा सकते हैं."
वे कहती हैं, "लोगों को प्लास्टिक की समस्या सुलझाने के लिए ज़िम्मेदारी भी लेनी होगी. इसके लिए वो सिर्फ़ और सिर्फ़ केवल रिसाइकिल की जाने वाली प्लास्टिक की वस्तुएं ही ख़रीदें. प्लास्टिक की समस्या से निपटने में उठाए गए सरकारी क़दम को समझे और लोगों को समझाएं और उसका पालन करें."
उनके अनुसार, "इसके लिए स्कूल-कॉलेजों में प्लास्टिक की समस्या पर बातें हो और छात्रों को इसे लेकर जागरूक किया जाए ताकि वो समाज के विभिन्न तबके में इसे लेकर आम जनों में समझ पैदा करने में सहयोग दें. अगर हम रिसाइकिल की ज़िम्मेदारी सुनिश्चित करते हैं तो प्लास्टिक की समस्या का प्रबंधन करने में सक्षम हो सकेंगे. विकसित देश अपने वहां प्लास्टिक को रिसाइकिल करते रहे हैं और आज वे उससे राजस्व भी कमा रहे हैं."
प्लास्टिक कचरे को कैसे कम किया जा सकता है?
ऑर्गेनाइजेशन फ़ॉर इकोनॉमिक कॉपरेशन एंड डेवलपमेंट ने अपनी ग्लोबल प्लास्टिक आउटलुक में अनुमान लगाया है कि पूरी दुनिया में क़रीब 380 मिलियन टन प्लास्टिक कचरा हर साल पैदा होता है.
प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना आसान तो नहीं है. लेकिन हम अगर इसे लेकर गंभीरता बरतें और कम से कम प्लास्टिक के इस्तेमाल पर ज़ोर दें तो अपने साथ ही दूसरों के जीवन में भी महत्वपूर्ण बदलाव ला सकते हैं.
इसके लिए सबसे ज़रूरी है कि एक बार इस्तेमाल (सिंगल यूज़) के लायक प्लास्टिक का उपयोग न करें.
भारत में प्लास्टिक का जो कचरा पैदा होता है उसमें सिंगल यूज़ प्लास्टिक के कचरे का हिस्सा 43% है. इसे देखते हुए भारत सरकार जुलाई 2022 से भारत में सिंगल यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिया है.
स्ट्रॉ के साथ ही गुटखे, शैंपू के पाउच, पन्नी, छोटी बोतलें, प्लास्टिक के ग्लास और कटलरी के कई छोटे सामान आदि वो प्लास्टिक उत्पाद हैं जिनका दोबारा इस्तेमाल नहीं होता और ये प्लास्टिक प्रदूषण के बड़े कारणों मे से हैं.
यदि ऐसी वस्तुओं को हम उपयोग में न लाएं और बाज़ार से इन्हें न ख़रीदें तो निश्चित तौर पर इसका फ़ायदा दिखेगा. लिहाजा हमें इसकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए.
भारत में हर साल बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरा पैदा होता है लेकिन यह दुनिया भर के उन देशों में आगे है जो रिसाइकिल किए गए प्लास्टिक कचरे का एक सार्थक इस्तेमाल भी कर रहा है.
इसकी शुरुआत साल 2000 में ही हो गई थी जब भारत में सड़क बनाने की तकनीक में प्लास्टिक-तार यानी प्लास्टिक और कोलतार का उपयोग किया जाना शुरू हुआ. दिल्ली से मेरठ तक के रास्ते में प्लास्टिक-तार का उपयोग किया गया है. ऐसे ही कई छोटे छोटे उपायों से प्लास्टिक कचरे का प्रबंधन करने की दिशा में सार्थक क़दम बढ़ाया जा सकता है.
(मूल कहानी के लिए यहां क्लिक करें.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)