You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कितना ख़तरनाक हो सकता है छोटे बच्चों के साथ प्रैंक करना
- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
पिछले दिनों आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में एक प्रैंक वीडियो बनाने का ट्रेंड चला था. लोग अपनी कार में अनजान बच्चों को लिफ्ट देकर कहते कि आपका अपहरण कर लिया गया है. बच्चे घबराकर चिल्लाने और रोने लग जाते.
ऐसे वीडियो बनाने वालों का कहना था कि वे बच्चों को जागरूक कर रहे हैं कि अनजान लोगों की गाड़ी में नहीं बैठना चाहिए. मगर उनकी इस बात के लिए आलोचना हुई कि वे लाइक और व्यूज़ के लिए बच्चों को परेशान कर रहे हैं.
अब सोशल मीडिया पर एक और प्रैंक वायरल है, जिसमें माता-पिता अपने छोटे बच्चों के सिर पर अंडे तोड़ रहे हैं.
दुनिया भर में टिक-टॉक और इंस्टाग्राम पर #eggcrackchallenge टैग के साथ हज़ारों वीडियो बनाए जा चुके हैं, जिन्हें करोड़ों लोग देख चुके हैं.
इन वीडियो में दिखने वाले ज़्यादातर बच्चे या तो शिशु हैं या फिर उनकी उम्र पांच-छह साल की थी.
इन वीडियो में देखा जा सकता है कि सिर पर अंडा तोड़े जाने पर कुछ बच्चे दंग रह जाते हैं. कुछ चोट लगने की बात करते हैं, कुछ रोने लगते हैं तो कुछ माता-पिता को धक्का देते हैं.
यह दिखाता है कि ज़्यादातर बच्चों को यह प्रैंक मज़ेदार नहीं लगा, भले ही वीडियो बना रहे उनके माता-पिता ठहाके लगा रहे होते हैं.
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा होना स्वाभाविक है क्योंकि बच्चे इस तरह के प्रैंक या मज़ाक को नहीं समझ पाते.
प्रैंक होता क्या है?
लखनऊ में मनोवैज्ञानिक राजेश पांडे बताते हैं कि प्रैंक ऐसा मज़ाक है, जिसमें किसी को विक्टिम यानी शिकार बनाया जाता है.
वह कहते हैं कि ऐसी क्रिया जो लोगों को ख़ुशी और आनंद दे, उसे फ़न या मौज-मस्ती कहा जाता है. जैसे कि चुटकुला. इसमें सुनाने वाले को भी मज़ा आता है और सुनने वाले को भी.
प्रैंक में भी मौज-मस्ती होती है लेकिन उसमें इंसान पर एक तरह से प्रयोग किया जा रहा होता है. दिक्क़त यह है कि उस प्रयोग में व्यक्ति को चोट लग सकती है, वह डर सकता है या उसे बुरा लग सकता है.
उदाहरण देते हुए राजेश पांडे कहते हैं, “क्लास में दाख़िल हो रहे बच्चे को कोई पांव अटकाकर गिरा दे तो सब लोग हंसेंगे. लेकिन गिरने वाले को चोट लग सकती है. यह भी एक प्रैंक है, मगर इसे मनोरंजन का सही तरीक़ा नहीं माना जा सकता.”
प्रैंक और बुली का महीन अंतर
बच्चों के साथ होने वाले प्रैंक को देखकर लोग असहज हो जाते हैं क्योंकि प्रैंक करने और किसी को बुली यानी परेशान करने में बहुत महीन अंतर है. प्रैंक करना उस समय परेशान करना बन जाता है जब विक्टिम कम ताक़तवर हो.
कॉमेडी का एक नियम माना जाता है- ‘पंच अप, नॉट किक डाउन. यानी व्यंग्य करने के लिए प्रभावशाली लोगों को निशाने पर लिया जाता है, कमज़ोर लोगों को नहीं. जबकि बच्चों के साथ होने वाले प्रैंक में हमेशा बच्चे निशाने पर होते हैं.
प्रैंक का शिकार बनना किशोरों और बड़ों के लिए भी हमेशा मनोरंजक हो, यह ज़रूरी नहीं है.
रेचल मेलविल-थॉमस ब्रिटेन में एसोसिएशन ऑफ़ चाइल्ड साइकोथेरेपिस्ट की प्रवक्ता हैं.
वह कहती हैं कि कोई प्रैंक तभी कामयाब माना जा सकता है जब कोई समझ जाए कि उसके साथ मज़ाक किया गया है, उसे कोई नुक़सान न पहुँचा हो और वह भी साथ में ठहाके लगाने लगे.
वह कहती हैं, “हम मिलकर हँसना चाहते हैं. ऐसा करने से सामाजिक समूहों में क़रीबी बढ़ती है. कोई प्रैंक तभी मज़ेदार होता है जब विक्टिम तुरंत हंसने वालों में शामिल होकर कहे कि वाह, क्या प्रैंक था. लेकिन ऐसा होना तब आसान नहीं है, जब आपने किसी के सिर पर कोई चीज़ फोड़ी हो.”
बच्चों के कोमल मन पर असर
प्रैंक में एक ऐसा विक्टिम होता है जिसे पता नहीं होता कि उसके साथ मज़ाक किया जा रहा है. उसे चौंकाने पर जो हंसी आती है, उस बात को समझना बच्चों के लिए आसान नहीं होता.
छोटे बच्चे विकास के शुरुआती दौर में होते हैं. उनके लिए किसी हास्य को तुरंत समझ पाना मुश्किल होता है. हालांकि, छोटी उम्र से ही बच्चे हंसाने वाली बातों के बारे में सीखना शुरू कर देते हैं.
कुछ शोधकर्ताओं ने पाया कि पांच से छह साल की उम्र में बच्चा व्यंग्य को समझने लग जाता है. कुछ बच्चे चार साल की उम्र में ही चुटकुलों को समझने लग जाते हैं. सीखने की यह प्रक्रिया किशोरावस्था तक जारी रहती है.
किसी बात या घटना को मज़ेदार मानने के लिए ‘बेमेलपन’ को सामान्य सिद्धांत माना जाता है. यानी उम्मीद से कुछ अलग होना. इसीलिए कुछ लोगों को असामान्य या बढ़ा-चढ़ाकर की गई हरकतें मज़ेदार लगती हैं, जैसे कि कार्टून.
क्या प्रैंक से बच्चों का भरोसा टूटता है
बच्चा भी सबसे पहले यही समझने लगता है कि कौन सी चीज़ें बेमेल या असामान्य हैं.
मेलविल थॉमस कहती हैं, “जैसे कि हाथी के सिर पर हैट देखना बच्चों को मज़ेदार लगता है. लेकिन अंडा तोड़ने जैसे प्रैंक के साथ समस्या यह है कि आप पहले तो बच्चों में उम्मीद जगाते हैं और फिर झटका देते हैं. जैसे कि आप कहते हैं चलो मम्मी के साथ खाना पकाते हैं. फिर अचानक सिर पर अंडा तोड़कर उसे चोट पहुंचा देते हो.”
इंग्लैंड की यॉर्क सैंट जॉन यूनिवर्सिटी में डेवेलपमेंटल साइकोलॉजिस्ट पेज डेविस ने बच्चों में ह्यूमर यानी हास्य के विकास की प्रक्रिया पर क़िताब लिखी है.
वह कहती हैं, “अंडा तोड़ने वाले प्रैंक में बड़ों को पता होता है कि वे क्या करने जा रहे हैं मगर बच्चे को पता नहीं होता. इसलिए वह समझ नहीं पाता कि कटोरी के बजाय उसके सिर पर क्यों अंडा तोड़ा गया. कई वीडियो में बच्चे नहीं समझ पा रहे हैं कि उनके साथ मज़ाक हो रहा है. इससे उनका भरोसा टूटता है.”
बाल मनोचिकित्सक रेचल मेलविल-थॉमस भी यही चिंता जताती हैं. वह कहती हैं, “पांच साल से कम उम्र के बच्चे के लिए आप ढाल की तरह होते हैं. उसे भरोसा है कि आप कभी उसे चोट नहीं पहुंचाएंगे. लेकिन आप उसके सिर पर अंडा फोड़ेंगे तो उस भरोसे को चोट पहुंचेगी.”
क्यों नहीं समझ पाते माता-पिता
इन प्रैंक के साथ एक समस्या यह भी है कि इन वीडियो को बच्चों की इजाज़त के बिना रिकॉर्ड करके ऑनलाइन पोस्ट किया जा रहा है.
सवाल यह भी उठता है कि बच्चों को शारीरिक नुक़सान पहुंचाने वाले प्रैंक को मनोरंजक कैसे माना जा सकता है? ख़ासकर तब, जब ऐसे वीडियो में कई सारे बच्चों के हावभाव दिखाते हैं कि उन्हें चोट लगी है.
बाल मनोचिकित्सक रेचल मेलविल-थॉमस इस बात पर भी हैरानी जताती हैं कि इस तरह के प्रैंक वीडियो में बच्चों की प्रतिक्रिया नकारात्मक है मगर माता-पिता और बड़े लोग हंस रहे हैं.
यह बात अट्यूनमेंट यानी समान भावना दिखाने के ख़िलाफ़ है जिसकी सलाह कई बाल मनोवैज्ञानिक देते हैं. जैसे कि बच्चे को चोट लगने पर मां का भी दर्द भरी प्रतिक्रिया देना. इससे बच्चों को यह सीखने में मदद मिलती है कि किस परिस्थिति में कैसी भावना दिखानी होती है. मगर प्रैंक में हो रहा व्यवहार ठीक उलट है.
शोधकर्ताओं का कहना है कि विक्टिम की भावनात्मक प्रतिक्रिया या उन्हें पीड़ा पहुंचाने पर आधारित प्रैंक वीडियो सोशल मीडिया का स्याह पहलू है.
मेलविल-थॉमस कहती हैं, “माता-पिता को तो ये सब करके व्यूज़, लाइक या अन्य तरह से कुछ न कुछ फ़ायदा मिल रहा होता है. ऐसे में वे इस बारे में नहीं सोच पाते कि उनके बच्चे को क्या महसूस हो रहा होगा. प्रैंक करते समय वे बच्चे की ज़रूरत के बजाय अपनी ज़रूरत पर ज़्यादा ध्यान दे रहे होते हैं.”
सावधानी हैं ज़रूरी
इस तरह के प्रैंक बच्चों पर बुरा असर डाल सकते हैं और माता-पिता से उनके संबंधों को भी प्रभावित कर सकते हैं.
चाइल्ड साइकोथेरेपिस्ट थॉमस मेलविल कहती हैं कि इस तरह के हालात में यह देखना महत्वपूर्ण है कि किसी प्रैंक का बच्चे पर क्या असर पड़ा है. आपका मक़सद क्या था, यह बात मायने नहीं रखती.
वह कहती हैं, “आप बच्चे से कह सकते हैं कि मैंने किसी और को देखकर सोचा कि मुझे भी ऐसा करना चाहिए. लेकिन अब मुझे अहसास हो गया है कि ऐसा नहीं करना चाहिए था, सॉरी.”
ऐसा करना ज़रूरी है क्योंकि माता-पिता अपने बच्चे के आदर्श होते हैं. सॉरी कहते समय आप बच्चे को सिखा रहे होते हैं कि जब आपको किसी बात का पछतावा हो तो क्या करना चाहिए.
मनोवैज्ञानिक राजेश पांडे कहते हैं कि ‘हंसने और मौज-मस्ती के और भी कई रचनात्मक तरीक़े हैं. जब आप प्रैंक करते हैं तो मज़े की उम्मीद कर रहे होते हैं. लेकिन आप यह नहीं माप सकते कि उस प्रैंक का सामने वाले पर क्या और कितना असर होगा.’
वह कहते हैं कि सिर्फ़ फ़न के लिए किसी को डराना, चौंकाना या परेशान करना ठीक नहीं है. ऐसा न छोटों के साथ करना चाहिए, न ही बड़ों के साथ.
इस कहानी का मूल लिंक यहां है , पढ़ने के लिए क्लिक करें.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)