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वो लड़का जो बिना हाथों के करता है पेंटिंग
"मैं 14 साल का था और मुंबई का एक भी स्कूल मुझे दाखिला देने के लिए तैयार नहीं था. 'तुम्हारे हाथ ऐसे हैं, दूसरे बच्चे तुम्हें देखकर डर सकते हैं और पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाएंगे,' उन्होंने मुझसे ये बात कही. कई लोगों ने मुझे मंदिर या मस्जिद के बाहर बैठकर भीख मांगने की सलाह दी लेकिन मैं बेइज़्ज़ती भरी ज़िंदगी नहीं जीना चाहता था."
31 साल के बंदेनवाज़ नदाफ़, जो अविकिसित हाथों के साथ ही पैदा हुए थे, अपनी कहानी कुछ इस तरह याद करते हैं.
नदाफ़ अब एक चर्चित पेंटर हैं और अपनी कला की बदौलत वह हर महीने 25 से 30 हज़ार रुपये कमा रहे हैं. उनकी पेंटिंग को मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में भी जगह मिल चुकी है. अब वह इंडियन माउथ एंड फुट पेंटर एसोसिएशन से भी जुड़े हैं. लेकिन इस मुक़ाम तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं रहा.
जन्म ही बना तमाशा
बंदेनवाज़ नदाफ़ का जन्म महाराष्ट्र के शोलापुर ज़िले में हत्तूर गांव में साल 1987 के फ़रवरी महीने में हुआ था. वह जन्मजात विकलांग थे जो कि उनके परिवार में एक अजीब बात थी. इसलिए दूर-दूर से उनके रिश्तेदार इस 'अजीब बच्चे' को देखने के लिए आए.
नदाफ़ मजाक में कहते हैं, "मेरी दादी को ये सब ठीक नहीं लगा तो उन्होंने मुझे देखने के लिए 5 पैसे टिकट लगा दिया. आखिरकार लोगों ने इस 'अजीब बच्चे' को देखने के लिए आना बंद कर दिया."
मुंबई महानगर साबित हुआ बेहद क्रूर
लोग कहते हैं मुंबई सभी का ध्यान रखती है लेकिन नदाफ़ का अनुभव इससे हटकर रहा. जब वह सिर्फ तीन साल के थे तब उनके घरवाले उन्हें मुंबई लेकर आ गए. लेकिन इस शहर ने उनके साथ क्रूरता का व्यवहार किया.
वह बताते हैं, "जब मैं बड़ा हुआ तो घर वालों ने मेरे दाखिले के लिए कई स्कूलों के चक्कर लगाए लेकिन हर स्कूल ने मेरी विकलांगता की वजह से मुझे दाखिला देने से मना कर दिया. वे बिना हाथ वाले एक बच्चे का दूसरे बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंतित थे."
नदाफ़ बताते हैं, "14 साल तक मैं स्कूल नहीं जा सका. फिर किसी ने मुझे विकलांग बच्चों वाले स्कूल में जाने की सलाह दी. मैंने ऐसे ही एक स्कूल में दाखिला लिया और यहीं से मेरा सफर शुरू हुआ."
बंदेनवाज़ इस स्कूल में सातवीं कक्षा तक पढ़े. इसी स्कूल में उनकी स्विमिंग और ड्रॉइंग में दिलचस्पी पैदा हुई. यहां आर्ट टीचर विनीता जाधव ने उन्हें कला की शुरुआती शिक्षा दी.
और अपने पैरों पर खड़े हुए नदाफ़
इस स्कूल में बंदेनवाज़ ने अपने पैर से पेंटिंग शुरू की. एक बार स्कूल की न्यासी और दानकर्ता ज़रीन चौथिया ने उन्हें पैरों से पेंटिंग करते देखा. इस तरह उन्होंने बंदेनवाज़ की छुपी हुई प्रतिभा को पहचान लिया.
अपनी ज़िंदगी में ज़रीन चौथिया के योगदान को याद करके वह बताते हैं, "ज़रीन मैडम मुझे लेकर भालचंद्र धानू के पास लेकर गईं. उन्होंने मुझे पेंटिंग की बारीकियां सिखाईं. ज़रीन मैडम ने मेरा सारा खर्च वहन किया और उनके ही प्रयासों की वजह से मेरी पेंटिंग जहांगीर आर्ट गैलरी तक पहुंच सकी."
इस आर्ट गैलरी में उनकी तस्वीरें लगने से बंदेनवाज़ में काफी विश्वास पैदा हुआ. इसकी वजह से उनको ये विश्वास हुआ कि वह अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए अपने दम पर पैसे कमा सकते हैं.
वह कहते हैं, "उस दिन मुझे ये अहसास हुआ कि मेरे पैरों ने मुझे अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बनाया है."
नदाफ़ की एक नई शुरुआत
तीन साल पहले बंदेनवाज़ को इंडियन माउथ एंड फुट पेंटर्स एसोसिएशन के बारे में पता चला. उन्होंने इस संस्था का सदस्य बनने के लिए आवेदन किया. चयन प्रक्रिया के बाद उन्हें आईएमएफपीए में एक कलाकार के रूप में चुन लिया गया.
बंदेनवाज़ कहते हैं, "इससे पहले मुझे अपनी पेंटिंग्स किसी प्रदर्शनी में दिखानी पड़ती थीं. मुझे पूरे साल पेंटिंग करनी पड़ती थी. इसलिए मुझे अपनी एक मोबाइल रिपेयरिंग शॉप खोलनी पड़ी. लेकिन आईएमएफपीए में एक कलाकार के रूप में चुने जाने के बाद मेरे ज़िंदग़ी आसान हो गई."
आईएमएफपीए में कलाकार के रूप में चयनित होने के बाद उन्हें एक स्टाइपेंड मिलने लगा. इसके साथ ही उन्हें अपनी पेंटिंग्स के लिए भारत से बाहर ख़रीदार मिलने लगे. वह बताते हैं कि अब उन्हें एक साल में सिर्फ पांच पेंटिंग बनानी पड़ती हैं.
आईएमएफपीए आखिर क्या है?
आईएमएफपीए एक अंतरराष्ट्रीय संस्था माउथ एंड फुट पेंटर एसोसिएशन की शाखा है. इसकी स्थापना 1957 में स्विट्ज़रलैंड की गई थी.
आईएमएफपीए में मार्केटिंग और डेवलपमेंट शाखा के प्रमुख बॉबी थॉमस ने बीबीसी को बताया, "इसकी शुरुआत एक जर्मन नागरिक एरिक स्टेगमन ने की थी. वह पोलियो से पीड़ित थे और उनके दोनों हाथ निष्क्रिय थे. उन्होंने अपने मुंह और पैरों से पेंटिंग करना शुरू कर दिया. उनकी पेंटिग्स की काफी चर्चा भी थी. ऐसे में विकलांगता से पीड़ित दूसरे लोगों की मदद के लिए उन्होंने इस संगठन की शुरुआत की."
शुरुआत में इस संगठन से सिर्फ 18 कलाकार जुड़े थे लेकिन अब इस संस्था से 800 कलाकार जुड़े हुए हैं.
'कभी हार मत मानो'
बंदेनवाज़ अपनी मिसाल देते हुए कहते हैं कि लोगों ने मुझे हाथ न होने की वजह से भीख मांगने को कहा था लेकिन मैंने अपना रास्ता पेंटिंग में तलाश किया.
वह कहते हैं, "मैं अपने हाथों की मदद नहीं ले सकता लेकिन मैंने अपने पैरों से अपना भविष्य लिखा है. फिर वो लोग क्यों रोते हैं जिनके हाथ हैं. उन्हें परिस्थितियों का सामना करके आगे बढ़ना चाहिए."
(बीबीसी संवाददाता रोहन टिल्लू से बातचीत पर आधारित)
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