यौन शोषण पर ख़ामोश क्यों रहती हैं लड़कियां?

    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

''मैं हर साल उन्हें राखी बांधती थी, लेकिन वो मेरे बारे में जाने क्या सोचकर बैठे थे. उनका हंसी-मजाक कब छेड़छाड़ में बदल गया मुझे पता ही नहीं चला.''

''जब भी हम दोनों अकेले होते तो वो फ़ायदा उठाने का एक भी मौका नहीं छोड़ते थे. मैं सब समझती थी, लेकिन किसी से कह नहीं पाती थी.''

यूपी की रहने वाली कोमल (बदला हुआ नाम) के साथ 14 साल की उम्र में हुई इस घटना को वो कर्इ सालों बाद भी अपने घर में बता नहीं पाईं.

लेकिन, पीड़ित का शिकायत नहीं कर पाना ही कई बार सवालों के दायरे में आ जाता है.

जब भी महिलाएं एक लंबे समय बाद बचपन में हुए यौन शोषण की शिकायत करती हैं तो पहला सवाल उठता है कि उसी वक़्त या इतने सालों में क्यों नहीं कहा.

ऐसा ही सवाल अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने पूछा था जिसके बाद सोशल मीडिया पर इसके ख़िलाफ़ एक अभियान चला.

ट्रंप ने उनके द्वारा चुने गए सुप्रीम कोर्ट के जज ब्रेट कैवेनॉ पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों पर कहा था कि पीड़ित को उसी समय शिकायत करनी चाहिए थी.

इसका जवाब देने के लिए सोशल मीडिया पर #WhyIDidNotReport नाम से एक अभियान चला जिसमें लोगों ने अपने साथ हुई घटना का ज़िक्र करते हुए बताया कि उन्होंने उस वक्त क्यों नहीं बताया था.

कोमल के साथ भी ऐसी ही स्थितियांआईं जब बुआ के लड़के ने ही उनका यौन शोषण करना शुरू किया.

'जब मेरा भरोसा टूटा'

कोमल बताती हैं, ''मेरी बुआ का लड़का हमारे ही ऊपर वाले कमरे में रहता था. हम उनसे घुले-मिले थे और घरवालों को भी उन पर पूरा भरोसा था.''

"शुरुआत में तो सब ठीक था, लेकिन धीरे-धीरे वो मेरे साथ अकेले होने के मौके ढूंढने लगे.

सर्दियों में मेरी मम्मी और पड़ोस की आंटी खाना खाने के बाद छत पर धूप सेकने जाते थे. मुझे पढ़ना होता था इसलिए मैं कमरे में ही रहती थी.

दिन में हम टीवी देखते थे तो मम्मी के जाने के बाद वो मैच देखना शुरू कर देते थे. वो ज़बरदस्ती कमरे में रुकने की कोशिश करते और मुझे अपने पास खींचने लगते. किस करने की कोशिश करते.

मेरा कोई और भाई ऐसा नहीं करता था इसलिए मुझे अजीब लगता कि वो ऐसा क्यों करते हैं. मैं तो छोटी बच्ची भी नहीं हूं. फ़िल्मों में भी देखा था कि इस तरह की चीजें तो सिर्फ हीरो-हीरोइन के बीच ही होती हैं.

पर फिर भी मैं कुछ नहीं कह पाती. सिर्फ़ मना करती या बचने के लिए किसी काम में उलझी रहती. कभी-कभी तो सोचती कि काश घर में कोई और आ जाए. "

वो कहते रहते, ''मेरे पास बैठ, अरे थोड़ी देर तो बैठ.''

मुझे समझ नहीं आता था कि उन्हें क्या कहूं. मुझे वो सब बहुत बुरा लगता था, लेकिन उस बुरे को ज़ाहिर नहीं कर पा रही थी.

कैसे कहूं, किन शब्दों में बताऊं समझ ही नहीं आता था. एक डर ये था कि घरवाले क्या सोचेंगे. ये बात तो गांव भी पहुंच जाएगी फिर क्या होगा. बुआ-फूफा से तो झगड़ा ही हो जाएगा.

डर और उलझन

मनोवैज्ञानिक डॉक्टर प्रवीण त्रिपाठी भी बताते हैं, ''कम उम्र में यौन शोषण की सबसे बड़ी समस्या ही यही होती है कि बच्चों को कुछ ग़लत होने का पता ही नहीं चलता. अगर बच्चों को ये साफ़ हो जाए कि कुछ ग़लत हो रहा है तो वो ज़्यादा आसानी से अपनी बात कह पाएंगी. न ही हमारे समाज में सेक्स एजुकेशन जैसी कोई पढ़ाई होती है.''

''साथ ही पीड़ित को ये डर भी लगता है कि घरवाले क्या कहेंगे क्योंकि जो अपराधी होता है उस पर परिवार भरोसा करता है. पीड़ित को ये उलझन रहती है कि मुझ पर भरोसा करेंगे या नहीं. कई बार तो शिकायत करने पर मम्मी-पापा को जान से मारने की धमकियां भी दी जाती हैं.''

कोमल बताती हैं, ''ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहा. कभी किसी मेरे कमरे में तो कभी दूसरे किसी कमरे में, वो बस मौका ही ढूंढते. मैं पढ़ने बैठी होती तो हाथ खींचकर अपने पास बुला लेते. अब तो उनकी आहट से ही मुझे डर लगने लगा था.''

''कब मुझे कहां छू लेंगे ये सोचकर ख़ुद को बचाती रहती थी. आज भी उन दिनों को याद करती हूं तो एक घुटन-सी महसूस होती है. मेरा एक क़रीबी रिश्ते से भरोसा ही नहीं टूटा था बल्कि डर भी घर कर गया था.''

''ये सब क़रीब साल भर चलता रहा. एक बार बहुत चिड़ जाने पर मैं झटके से खुद को छुड़ाकर रोते हुए घर से बाहर आ गई. उस दिन तो जैसे वो डर ही गए थे. फटाफट घर से निकल गए और उसके बाद अपनी हरकतें कुछ कम कर दीं. कुछ समय बाद उनकी नौकरी बदल गई तो उन्हें कहीं और जाना पड़ा.''

सात साल में मिला दर्द

ऐसा ही एक मामला है बिहार की रहने वाली दीपिका (बदला हुआ नाम) का जिन्हें इस खौफ़नाक शोषण से तब गुज़रना पड़ा जब वो महज़ सात साल की थीं.

दीपिका बताती हैं, ''लोग अक्सर कहते हैं कि उन्हें अपने बचपन में लौटना है, लेकिन मुझे दुबारा अपना बचपन नहीं चाहिए. मुझे उससे डर लगता है. मुझे आज तक अफ़सोस है कि मैं कुछ नहीं कह पाई.''

''मैं सात साल की थी जब मेरे साथ वो सब शुरू हुआ. वो हमारे घर और दुकान पर कई सालों से काम करते थे. मेरे जन्म से भी पहले से. घरवालों को उन पर पूरा भरोसा था. दुकान में जब कोई नहीं होता तो वो मुझे अपनी गोद में बिठाते और सहलाने लगते. मुझे अच्छा तो नहीं लगता था, लेकिन समझ ही नहीं आता था कि वो क्या कर रहे हैं.''

''उन्हें लेकर मेरा डर और बढ़ता गया. मैं उनके पास नहीं आना चाहती थी. लेकिन, मम्मी कभी खाना देने तो कभी उन्हें बुलाने उनके कमरे में भेज देती.''

''मैं कहती थी कि अंकल के पास नहीं जाना, लेकिन घरवालों को कारण समझ नहीं आता था. उन्हें लगता कि बच्ची हूं तो ऐसे ही कुछ भी बोल देती हूं. लेकिन मैं लाख चाहकर भी ये पूरी बात नहीं बोल पाती थी. सही शब्द, सही तरीका मैं कभी ढूंढ नहीं पाती.''

सही शब्दों की कमी और शर्म

डॉक्टर प्रवीण त्रिपाठी भी बताते हैं कि बच्चों के मामले बड़ों से कहीं ज़्यादा मुश्किल होते हैं. उन्हें शारीरिक अंगों के नाम, सेक्शुअल एक्टिविटी से जुड़े शब्द नहीं पता होते. इसलिए बच्चे कहते हैं कि वो अंकल अच्छे नहीं हैं, उनके पास नहीं जाना, वो गंदे हैं. मां-बाप को ऐसे इशारों को समझना चाहिए.

वह बताते हैं कि बड़ी लड़कियों को इन मामलों में शर्म भी महसूस होती है. उन्हें लगता है कि उनके कैरेक्टर पर सवाल उठने लगेंगे.

क्या होता है असर

अगर बच्चों की बात न समझी जाए तो इसका असर पूरी ज़िंदगी पर पड़ सकता है.

डॉक्टर प्रवीण ने बताया, ''यौन उत्पीड़न के शिकार लोग डिप्रेशन में जा सकते हैं. कई बार वो ​ज़िंदगी भर उस वाकये को नहीं भूल पाते. उन्हें सेक्शुअल डिसऑर्डर हो सकता है. आत्मविश्वास ख़त्म हो जाता है.''

दीपिका ने भी धीरे-धीरे अपने रिश्तेदारों के पास जाना कम कर दिया था.

उन्होंने बताया, ''धीरे-धीरे मैं घर आने वाले मेहमानों से दूरी बनाने लगी. कोई अंकल या मामा-चाचा भी आते तो मैं उनसे दूर रहती. उनके छूने या गोद में लेने से ही मुझे वो अंकल याद आ जाते. हर छूना ग़लत लगने लगा था.''

''इसका नतीजा ये हुआ कि मम्मी-पापा मुझे डांटने लगे. मैं एक गंदी बच्ची बन गई जो बड़ों की इज्ज़त नहीं करती. उन्होंने जानने की कोशिश ही नहीं की कि मैं क्या सोचती हूं. मुझे लगता है कि बड़ों के दिमाग़ में दूर-दूर तक ये बात नहीं होती कि बच्चों के साथ भी ऐसा हो सकता है. वो हर व्यवहार को बचपना समझ लेते हैं. ''

मैं चुप रही और दो साल तक ये झेलती रही. फिर जब अंकल को अपने गांव लौटना पड़ा तो जैसे मुझे कैद से आज़ादी मिल गई. अब भी लगता है कि मम्मी-पापा को कुछ बताऊंगी तो उन्हें बुरा लगेगा और अब वो कुछ कर भी नहीं सकते.

क्या करें माता-पिता

डॉक्टर प्रवीण कहते हैं, ''हमारे समाज में समस्या ये है कि सेक्स जैसे मसलों पर बात नहीं होती. मां-बाप ख़ुद इन बातों को बहुत कम समझ पाते हैं. बच्चों को सबसे पहले ये भरोसा होना चाहिए कि उनका शिकायत करना सुरक्षित है. इसके बाद उन्हें डांट नहीं पड़ेगी. इसलिए हमेशा ऐसा माहौल बनाना चाहिए जिससे बच्चे अपनी परेशानी आसानी से ज़ाहिर कर सकें. ये बात हर उम्र के बच्चे के लिए लागू होती है. इन सब में सेक्स एजुकेशन सबसे ज़्यादा ज़रूरी है.

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