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सऊदी अरब ने क्या भारत से पहले बाज़ी मार ली या इसके मायने कुछ और हैं?
सऊदी अरब ने यूक्रेन में जारी जंग को ख़त्म करने के लिए जिस पहल की शुरुआत की है, उसकी उम्मीद भारत से की जा रही थी.
कहा जा रहा था कि भारत का संबंध यूक्रेन और रूस दोनों से अच्छे हैं, इसलिए उसकी विश्वसनीयता इस मामले में ज़्यादा मज़बूत है.
भारत की छवि पश्चिम परस्त मुल्क के रूप में भी नहीं है, ऐसे में रूस भारत की ऐसी किसी भी पहल को ख़ारिज नहीं करेगा. लेकिन भारत अब तक ऐसा कोई क़दम नहीं उठा पाया है और सऊदी अरब ने इसकी शुरुआत कर दी है.
क्या सऊदी अरब इस मामले में बढ़त बनाता दिख रहा है? भारत ने सार्वजनिक रूप से ऐसी पहल अब तक क्यों नहीं की?
रविवार को यूक्रेन-रूस युद्ध को लेकर शांतिपूर्ण समाधान खोजने के लिए सऊदी अरब की मेज़बानी वाली वार्ता पूरी हो गई है.
इस बैठक में शामिल होने वाले देशों ने युद्ध का समाधान खोजने तक बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई है.
अमेरिका, चीन और भारत सहित 40 से अधिक देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार इस बैठक के लिए शनिवार को सऊदी अरब के जेद्दा में जुटे थे.
सऊदी प्रेस एजेंसी के मुताबिक़, “शामिल होने वाले देशों ने अंतरराष्ट्रीय परामर्श जारी रखने और विचारों को साझा करते रहने पर सहमति व्यक्त की है. प्रतिभागी देशों की राय है कि ये बातचीत ही इस युद्ध में शांति का मार्ग प्रशस्त करने में योगदान देगी.”
रूस ने इस बातचीत में हिस्सा तो नहीं लिया लेकिन क्रेमलिन ने ये ज़रूर कहा कि वह इस बातचीत पर क़रीब से नज़र बनाए हुए है.
जेद्दा की ये बैठक ऐसे समय में हुई है, जब यूक्रेन पश्चिम के समर्थन के अलावा ग्लोबल साउथ के देशों का समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा था. ये वो देश हैं जो यूक्रेन के समर्थन में खुल कर आने से झिझकते रहे हैं.
एक अमेरिकी अधिकारी ने रविवार को जेद्दा में हुई बातचीत को "अच्छा और रचनात्मक" बताया और चर्चा की मेज़बानी के लिए सऊदी अरब को धन्यवाद दिया.
अधिकारी ने कहा, “यह कई देशों के साथ बातचीत का एक अच्छा और रचनात्मक प्लेटफॉर्म था. ये देश विचारों को बाँटने और यूक्रेन में न्यायसंगत और स्थायी शांति के समर्थन के लिए एक साथ आए थे. यूक्रेन में युद्ध को कैसे ख़त्म किया जाए, इस पर चर्चा की और इसके दुनिया भर में व्यावहारिक परिणामों पर भी चर्चा की गई.”
युद्ध में कहाँ खड़े हैं यूक्रेन और रूस
यूक्रेनी, रूसी और अंतर्राष्ट्रीय अधिकारियों ने कहा है कि फ़िलहाल यूक्रेन और रूस के बीच सीधी शांति वार्ता की कोई संभावना नहीं है, क्योंकि युद्ध जारी है और यूक्रेन जवाबी कार्रवाई के ज़रिए अपने क्षेत्र वापस पाना चाहता है.
रूस और यूक्रेन में से कोई भी अभी सीज़फ़ायर के लिए तैयार नहीं है. उससे पहले युद्ध के मैदान पर स्थितियों को निर्णायक रूप से बदलने की कोशिश होगी.
रूस और यूक्रेन अभी तक उस पड़ाव पर नहीं पहुँचे हैं, जहाँ उन्हें एक मेज पर बैठने के लिए मजबूर होना पड़े और जब तब वह स्थिति नहीं आ जाती दोनों देश ऐसा नहीं करेंगे.
रूस एक लंबी अवधि के संघर्ष के लिए तैयार था और लंबे वक़्त तक ऐसा लगता भी रहा कि इस युद्ध में रूस का पलड़ा भारी है. अब ये संभव है कि रूस सीज़फ़ायर का विरोध ना करे लेकिन ये भी लगभग तय है कि जिन इलाक़ों पर रूस का कब्ज़ा है वो उसे वापस नहीं लौटाएगा.
वहीं यूक्रेन की सेना को इस समय पश्चिम का मज़बूत समर्थन मिल रहा है, यूक्रेन का मानना है कि माहौल उनके पक्ष में हैं और उन्हें युद्ध के मैदान में बड़े इलाकों को अपने पास लेना होगा.
भारत आख़िर क्यों वो नहीं कर पाया जो सऊदी ने कर दिया
ऐसे माहौल में जब कोई संभावित समाधान नहीं नज़र आ रहा तब कूटनीति युद्ध की तबाही और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव को सीमित करने या कम करने में मदद कर सकती है.
फॉरेन अफ़ेयर्स के एक विश्लेषण में कहा गया है कि भारत एक ऐसी महत्वपूर्ण शक्ति है, जिसके रूस और यूक्रेन दोनों के साथ बेहतर रिश्ते हैं.
रूस के भारत के साथ पुराने रिश्ते हैं और इसका ख्याल रखते हुए भारत रूस के हमले की खुलकर निंदा करने से परहेज करता रहा है. साथ ही यूक्रेन के लिए भारत ये कहता रहा है कि वह युद्ध का समर्थन नहीं करता.
इस साल मई में जापान में जी7 की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की से कहा था- “युद्ध को ख़त्म करने के लिए भारत जो कुछ भी कर सकता है, करेगा.”
अमेरिकी अख़बार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने बीते साल नवंबर में एक लेख में लिखा था जिसके मुताबिक़, बीते साल की शुरुआत में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शांति वार्ता की मेज़बानी करने की इच्छा ज़ाहिर की थी.
ये प्रयास कभी सफल नहीं हुआ लेकिन इससे ये साफ़ हो गया कि पश्चिमी देश भारत को दोनों देशों तक पहुंचने के लिए और रूस-यूक्रेन को एक मेज पर लाने वाले देश के रूप में देख रहे हैं.
भारत लंबे समय से रूस और पश्चिम के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने का प्रयास करता रहा है.
1950 और 60 के दशक के दौरान भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेता था. जैसे जैसे वक्त बदला भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्था में शामिल हो गया और इसने अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए लेकिन रूस हमेशा भारत का विश्वसनीय साझेदार रहा.
रूस भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति और हथियारों के लिए मुख्य साझेदार है. यूक्रेन युद्ध के दौरान पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखा.
बीते साल साल सितंबर में उज़्बेकिस्तान में एक क्षेत्रीय शिखर सम्मेलन में, मोदी ने पुतिन से कहा था- "आज का वक़्त युद्ध का वक़्त नहीं है."
न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने एक लेख में लिखा है कि दशकों में भारत के सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, देश की गुटनिरपेक्षता की परंपरा को अधिक प्रभावी रणनीति के साथ "सबको एक साथ लाने" की कोशिश कर रहे हैं.
अगर भारत शांति वार्ता में मुख्य भूमिका निभाता है तो ना ये कदम भारत के लिए ग्लोबल ऑर्डर को बदल देगा, बल्कि ये भी संभव है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा काउंसिल में स्थायी जगह मिल जाए.
लेकिन सवाल ये है कि जब भारत दोनों ही देशों के साथ इतने बेहतर संबंध रखता है और ऐसा करने से भारत की छवि वैश्विक शक्तियों के बीच और भी प्रभावी हो जाती, तो फिर भारत ने वो क्यों नहीं किया जो आज सऊदी अरब कर रहा है.
जेएनयू में मध्य एशिया और रूसी अध्ययन केंद्र में असोसिएट प्रोफ़ेसर राजन कुमार इस सवाल का जवाब देते हैं.
राजन कुमार कहते हैं, “भूराजनीति के लिहाज से ये वार्ता करने का सही समय नहीं है. पश्चिमी देश और यूक्रेन अपने जवाबी हमले को लेकर आशावान दिख रहे हैं. उन्हें लग रहा है कि इस हमले के दम पर वो रूस से उन क्षेत्रों को वापस ले सकते हैं, जिसे उसने युद्ध के दौरान अपने कब्ज़े में ले लिया है.”
“बातचीत उस स्थिति में होती है, जब कोई पक्ष समझौता करने को तैयार होता है. भारत को पता था कि जब शांति वार्ता होगी तो वो ना तो रूस को उन इलाक़ों से वापस हटने पर राज़ी कर पाएगा, जिन पर उसका कब्ज़ा है और ना ही यूक्रेन अभी की तथास्थिति को बनाए रखने के लिए तैयार होगा. ”
कुमार ये भी मानते हैं कि भारत के पास अपने मसले बहुत हैं, जिनसे वो पहले निपटना चाहता है.
वह कहते हैं, “भारत के पास बहुत कुछ है, जिस पर उसे काम करना है. भारत जी20 का आयोजन कर रहा है. चीन और पाकिस्तान के साथ तनाव को लेकर भी भारत के पास काम करने को बहुत कुछ है. ऐसे में शांति वार्ता की पहल करने के लिए भारत की स्थिति बहुत अनुकूल नहीं है.''
''एक अहम बात ये भी है कि भारत द्विपक्षीय वार्ता का समर्थक है और ना तो वो अपने मसले में किसी बाहरी तीसरे देश का दखल चाहता है और ना ही ऐसा करने का समर्थन करता है. ऐसे में उसके लिए ये दुविधा की स्थिति है कि क्या वो अपनी अंतरराष्ट्रीय नीति को बदलना चाहता है.”
आख़िर सऊदी ये शांति वार्ता क्यों कर रहा है?
जेद्दा की इस बैठक में ऐसा पहली बार हुआ कि चीन ऐसे किसी फोरम में शामिल हुआ जिसमें यूक्रेन-रूस युद्ध पर चर्चा हो रही हो.
चीन ने रूस की निंदा करने के अंतरराष्ट्रीय आह्वान को ख़ारिज करते हुए रूस के साथ घनिष्ठ आर्थिक और राजनयिक संबंध बनाए रखे हैं.
रूस बैठक में भले मौजूद नहीं है लेकिन बातचीत पर नज़र रख रहा है.
विश्लेषकों और पश्चिमी देशों के अधिकारियों का कहना है कि बातचीत में चीन की उपस्थिति सुनिश्चित करने में सऊदी कूटनीति महत्वपूर्ण रही है.
विश्लेषक दानिया कोलीलाट ख़तीब, बेरूत में सहयोग और शांति निर्माण अनुसंधान केंद्र के प्रमुख हैं. वॉयस ऑफ़ अमेरिका से बात करते हुए उन्होंने ये समझाया है कि आखिर सऊदी अरब ये वार्ता क्यों कर रहा है.
वह कहते हैं, “सऊदी अपने मित्र देशों में विविधता लाना चाहता है, और अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहता है. वह ऐसा करने में सफल रहा है और वह चीन, रूस के साथ अपने रिश्ते बेहतर कर सका है. ये सऊदी की इसी क्रम में नई कोशिश है”
राजन कुमार इस पर थोड़ी अलग राय रखते हैं,
वह कहते हैं, “ सऊदी के इस शंति वार्ता के कोई बहुत मायने नहीं थे. सऊदी ने ये बैठक अपनी विश्वसनीयता और साख को बढ़ाने के लिए किया. वो एक ऐसे देश में रूप में ख़ुद को दर्ज कराना चाहता है जो वैश्विक ऑर्डर में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. ये बैठक सऊदी ने अमेरिका और पश्चिमी देशों को खुश करने के लिए किया है क्योंकि बीते कई दिनों से सऊदी और अमेरिका के बीच रिश्तों में असहजता आई है. जो बाइडन की तमाम कोशिशों के बाद भी सऊदी अरब ने तेल के उत्पादन की सीमा घटाई ऐसे में उसने ये बैठक कर ग्लोबल साउथ को एक मंच लाने का काम किया, जो अब तक अमेरिका और पश्चिमी देश नहीं कर पाए थे.”
कुमार मानते हैं कि इस बैठक का सबसे बड़ा हासिल है चीन को ऐसे मंच पर ला पाना जहां यूक्रेन युद्ध की बात हुई.
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