यहां ईसाई धर्म गुरुओं को देश छोड़ने पर मजबूर क्यों कर रही है सरकार? - दुनिया जहान

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पिछले साल की शुरुआत में निकारागुआ की सरकार ने देश के कैथोलिक बिशप रोलांडो अल्वारेज़ सहित कई कैथोलिक धार्मिक नेताओं और धर्म गुरुओं को लातिन अमेरिका की सबसे बड़ी और बदनाम ‘लामोडेलो’ जेल में बंद कर दिया.
राष्ट्रपति डैनियल ओर्टेगा की सरकार की क्रूरता की आलोचना की वजह से बिशप अल्वारेज़ को 26 साल के कारावास की सज़ा सुनायी गई थी.
उन्हें उनके सहयोगियों के साथ निकारागुआ की राजधानी मानागुआ से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित लामोडेलो जेल में बंद कर दिया गया जहां स्थिति अत्यंत अमानवीय है.
वहां कीड़े-मकोड़ों की भरमार है और जेल की क्षमता से कहीं ज़्यादा क़ैदी बंद हैं जिनके साथ अमानवीय व्यवहार होता है. लगभग 500 दिनों तक रोम में वैटिकन सिटी के नेता और अमेरिका, बिशप अल्वारेज़ और उनके सहयोगियों की रिहाई के लिए दबाव डालते रहे.
इस दौरान जेल में बिशप अल्वारेज़ का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा था. फिर अचानक जनवरी में उन्हें और उनके सहयोगियों को रोम भेज दिया गया.
निकारागुआ की सरकार ने कहा कि पोप फ़्रांसिस और वैटिकन के नेताओं द्वारा संयम और शांति से साधा गया समन्वय प्रशंसनीय है.
इस सप्ताह हम दुनिया जहान में यही जानने की कोशिश करेंगे कि क्या वैटिकन निकारागुआ में ईसाई कैथोलिकों के दमन को रोक पाएगा?
सैंडनिस्टा पार्टी और डैनियल ओर्टेगा का उदय

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20वीं सदी में अधिकांश समय तक निकारागुआ पर एक ही परिवार का शासन रहा. 1936 से 40 सालों तक अनास्तासियो सोमोज़ा और उनके दो बेटों ने निकारागुआ को अपनी मज़बूत पकड़ में रखा था.
सोमोज़ा शासन की क्रूरता के बावजूद, कम्युनिस्ट क्यूबा के ख़तरे को कम करने की दृष्टि से निकारागुआ अमेरिका के लिए महत्वपूर्ण सहयोगी बन गया था और उसे अमेरिका से आर्थिक सहायता मिलने लगी थी.
मगर 1970 के दशक की शुरुआत के बाद से स्थिति बदलने लगी थी. इसकी वजह थी एक प्राकृतिक आपदा.
मानागुआ में आए एक भयंकर भूकंप की वजह से हज़ारों लोग मारे गए और उससे भी कहीं ज़्यादा लोग बेघर हो गए.
अमेरिका की एक्विनास इंस्टीट्यूट में प्रिंस्टन इनिशिएटिव इन कैथोलिक थॉट के सह निदेशक ब्रैंडन वैन डिक का कहना है कि भूकंप पीड़ितों की सहायता में सरकार की नाकामी से लोग नाराज़ थे क्योंकि इस त्रासदी से निपटने के लिए मिली अंतरराष्ट्रीय आर्थिक सहायता को अनास्तासियो जूनियर और उनके चेले हड़प गए थे.
इसके तुरंत बाद जनता में विद्रोह भड़क उठा और निकारागुआ में एक सत्ता संघर्ष शुरू हुआ. इस लड़ाई से सैंडनिस्टा यानि नेशनल लिबरेशन फ़्रंट के नेता डैनियल ओर्टेगा का राजनीति में उदय हुआ.
ब्रैंडन वैन डिक कहते हैं कि, “सैंडनिस्टा एक मार्क्सवादी पार्टी थी. शुरुआत में उन्होंने शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीके अपनाए लेकिन बाद में सामाजिक वर्गों में असमानता के ख़िलाफ़ अपने आंदोलन के चलते वो अतिवादी कदम उठाने लगे.”
इस क्रांतिकारी युद्ध के दौरान निकारागुआ के कैथोलिक चर्च के अनुयायियों ने डैनियल ओर्टेगा का साथ दिया. इस आंदोलन के समर्थकों का मानना था कि मार्क्सवादी सिद्धांत ईसाई विचारधारा से मेल खाते हैं.
कैथोलिकों ने कम्युनिस्टों का साथ दिया और...
ब्रैंडन वैन डिक के अनुसार, यूनिवर्सिटी के कैथोलिक छात्रों सहित कैथोलिक समुदाय के कई लोगों ने सैंडनिस्टा का समर्थन किया और उनके साथ सहयोग भी किया.
लेकिन कैथोलिक समुदाय के कई प्रमुख लोग सोमोज़ा का विरोध तो करते थे लेकिन सैंडनिस्टा का समर्थन नहीं करना चाहते थे.
यानि कि सैंडनिस्टा को समर्थन के मुद्दे पर कैथोलिक समुदाय में मतभेद थे. रोम के कैथोलिक नेता मानते थे कि कैथोलिक चर्च को सरकार से दूर रहना चाहिए.
लेकिन निकारागुआ के कई कैथोलिक नेता इससे सहमत नहीं थे और वह डैनियल ओर्टेगा की सरकार में शामिल हो गए.
इससे हुआ यह कि ओर्टेगा कुछ कैथोलिकों पर भरोसा कर सकते थे और कुछ पर नहीं. निकारागुआ के कैथोलिक चर्च ने दक्षिणपंथी गुट कोंट्रास की हिंसक कार्यवाहियों की भर्त्सना करने से इंकार कर दिया जिससे डैनियल ओर्टेगा नाराज़ हो गए.
1990 में ओर्टेगा सत्ता से बाहर हो गए और उस दशक में अधिकांश समय सत्ता से बाहर रहे. वो समझ गए कि कैथोलिक बहुल निकारागुआ में सत्ता में लौटने के लिए उन्हें ईसाई कैथोलिक चर्च के साथ संबंध सुधारने होंगे.
ब्रैंडन वैन डिक ने कहा कि, “वो 2001 में फिर चुनाव हार गए. लेकिन 2006 में चुनाव से पहले ओर्टेगा ने चर्च के साथ संबंध सुधारना शुरू कर दिया. उन्होंने अपने विगत काल के बयानों के लिए माफ़ी भी मांगी. साथ ही वादा किया कि अगर वो चुनाव जीत जाते हैं तो गर्भपात पर बिना शर्त प्रतिबंध लगा देंगे. वो अपनी साथी रोज़ारियो मोरिलो के साथ कैथोलीक रीति रिवाज़ से शादी करने को भी तैयार हो गए.”
2006 में डैनियल ओर्टेगा दोबारा निकारागुआ के राष्ट्रपति बने मगर उन्होंने अपने पुराने तौर तरीके जारी रखे.
ब्रैंडन वैन डिक का कहना है कि निकारागुआ में सरकारी भ्रष्टाचार तो हमेशा ही रहा है लेकिन ओर्टेगा के दोबारा सत्ता में आने के बाद भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और विरोधियों का दमन कहीं अधिक बढ़ गया.
विरोध और दमन

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2018 में ओर्टेगा सरकार के ख़िलाफ़ पूरे निकारागुआ में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए.
डैनियल ओर्टेगा ने विरोध प्रदर्शनों को हिंसक रूप से कुचलने की कार्यवाही शुरू कर दी. साल के अंत तक सरकारी सुरक्षाबलों ने सैकड़ों लोगों को गिरफ़्तार कर लिया या जान से मार दिया था.
एक मानवाधिकार संस्था बियांका जैगर ह्यूमन राइट्स फ़ाउंडेशन की अध्यक्ष बियांका जैगर एक सरकार विरोधी प्रदर्शन की चश्मदीद गवाह हैं.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि, “जब हम लोग मार्च कर रहे थे तो अचानक सुरक्षाबलों के निशानेबाज़ों ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियां बरसानी शुरू कर दीं. यह मैंने अपनी आंखों से देखा था. उस दिन निकारागुआ में 19 लोग मारे गए और 180 लोग घायल हो गए.”
बियांका जैगर कहती हैं कि राष्ट्रपति डैनियल ओर्टेगा, उनकी पत्नी और उपराष्ट्रपति रोज़ारियो मोरेलो ने ऐसे लोगों की सूची तैयार की जो 2018 के आंदोलन में सरकार के ख़िलाफ़ थे. इस सूची में कई धार्मिक प्रतिनिधियों के नाम थे.
बियांका जैगर का कहना है कि, “कैथोलिक चर्च के उन नेताओं के नाम इस सूची में थे जिन्होंने उन यूनिवर्सिटी छात्रों को बचाने की कोशिश की थी जिन्हें सुरक्षाबल जान से मार रहे थे. यह धार्मिक नेता सरकार के अत्याचारों की आलोचना कर रहे थे. ओर्टेगा ने उन्हें कभी माफ़ नहीं किया.”
अगले साल निकारागुआ में कई सरकार विरोधी नेताओं को या तो जेल में बंद कर दिया गया या उनकी हत्या कर दी गई. इसमें कई धर्मगुरू भी शामिल थे.
सहयोगी से कट्टर विरोधी
बियांका जैगर के अनुसार, कम से कम 200 धार्मिक नेताओं को या तो जेल में बंद कर दिया गया या देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया. इनमें से कई लोगों की नागरिकता रद्द कर दी गई.
बियांका जैगर ने कहा, “डैनियल ओर्टेगा और रोज़ारियो मोरेलो देश में कैथोलिक चर्च को ध्वस्त कर रहे हैं. वहां कोई धर्म गुरू या धार्मिक नेता नहीं बचेंगे.”
लेकिन एक धार्मिक नेता को ख़ासतौर पर निशाना बनाया गया. वो थे बिशप अल्वारेज़ जिन्हें विपक्ष और ओर्टेगा सरकार के बीच समझौता वार्ताओं में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था.
मगर वार्ता के दौरान उन्होंने ओर्टेगा का समर्थन नहीं किया.
बियांका जैगर ने आगे कहा, “ओर्टेगा सरकार, विपक्ष और छात्र नेताओं के बीच वार्ताओं में जब बिशप अल्वारेज़ शामिल हुए तो उन्होंने कहा कि देश को परिवर्तन की आवश्यकता है. यही बात निकारागुआ के कई लोग चाह रहे थे. वार्ताओं से डैनियल ओर्टेगा को वो हासिल नहीं हुआ जिसकी उन्हें उम्मीद थी. उन्होंने इसके लिए बिशप अल्वारेज़ो को ज़िम्मेदार ठहराया.”
आने वाले वर्षों में राजनीतिक माहौल बिगड़ता गया और फिर फ़रवरी 2023 में सरकार ने 200 से अधिक राजनीतिक बंदियों को निकारागुआ से निष्कासित करके अमेरिका भेज दिया.
इसमें कई पत्रकार, विपक्षी नेता और छात्र नेता शामिल थे. मगर सरकार ने बिशप अल्वारेज़ को देशद्रोह के आरोप में 26 साल कारावास की सज़ा सुना कर जेल में बंद कर दिया.
इसे सीधे तौर पर कैथोलिक चर्च की साख को चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है.
अब सवाल यह है कि ओर्टेगा सरकार के हाथों ईसाई कैथोलिकों के अत्याचार को रोकने के लिए चर्च के पास क्या विकल्प हैं?
वैटिकन क्यों है नरम?

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कुछ रिपोर्टों के अनुसार, पोप फ़्रांसिस ने 2023 में ओर्टेगा द्वारा कैथोलिक लोगों को बड़े पैमाने पर देश से निष्कासित करने के फ़ैसले की तुलना नाज़ी शासन से की थी जिससे ओर्टेगा बेहद नाराज़ हो गए.
वो पहले ही वैटिकन के राजदूत को रोम वापस भेज कर चर्च के साथ बातचीत के रास्ते बंद कर चुके थे लेकिन अब संबंध और भी बिगड़ गए.
बिशप अल्वारेज़ और दूसरे धार्मिक नेताओं के जेल में बंद होने के बाद सवाल था कि वैटिकन क्या कदम उठाएगा?
2024 में नए वर्ष की शुरुआत पर ईसाई धर्म के अनुयायियों को संबोधित करते समय पोप फ़्रांसिस ने कहा कि निकारागुआ में ईसाई धर्मगुरुओं की स्वतंत्रता छीनी जा रही है और वो वहां कि स्थिति से चिंतित हैं.
निकारागुआ में दमन के स्तर को देखते हुए उनका यह बयान बहुत ही नपा-तुला था. जबकि यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूसी युद्ध के बारे में वैटिकन का कहना था कि पोप फ़्रांसिस इस युद्ध को मुर्खतापूर्ण, घृणास्पद और नापाक मानते हैं.
हमने रोम में कैथोलिक समाचार एजेंसी ईडब्लूटीएन-एसीआई में वैटिकन मामलों के विश्लेषक आंद्रिया गागलियारडूची से बात की और पूछा कि निकारागुआ में दमन की कार्यवाहियों के ख़िलाफ़ वैटिकन की प्रतिक्रिया तीखी क्यों नहीं है जितनी रूस या अन्य देशों की कार्यवाही पर थी.
आंद्रिया गागलियारडूची ने कहा, “निकारागुआ में बिशप और दूसरे धर्मगुरुओं पर देशद्रोह के आरोप लगा कर उन्हें जेल में बंद कर दिया गया है. पैरा मिलिटरी गुट वहां धार्मिक नेताओं को निशाना बना रहे हैं. रूस में ऐसा नहीं हो रहा. रूस के वैटिकन के साथ संबंध अच्छे नहीं रहे हैं लेकिन निकारागुआ की स्थिति अलग है.”
आंद्रिया ने कहा कि निकारागुआ में प्रमुख कैथोलिक व्यक्तियों के जीवन को ख़तरे की वजह से पोप ने यह सावधानीपूर्ण रुख़ अपनाया है. लेकिन इसके कुछ और कारण भी हैं.
निकारागुआ जैसे कैथोलिक बहुल देश का वैटिकन के साथ संबंध स्थगित कर देना उसे चीन और उत्तर कोरिया जैसे गिने चुने देशों के साथ खड़ा कर देता है.
चीन और वैटिकन के बीच विवाद का मसला यह है कि वहां कैथोलिक नेता का चयन कौन करेगा. संभव है कि डैनियल ओर्टेगा ऐसा ही कुछ करने के बारे में सोच रहे हों.
अगर निकारागुआ मांग करे कि चर्च के प्रतिनिधि नियुक्त करने का अधिकार उसे होना चाहिए- तो ऐसे में वैटिकन के पास क्या विकल्प हैं?
आंद्रिया गागलियारडूची ने कहा, “वो ऐसा कभी नहीं करेंगे. बिशप की नियुक्ति पोप को ही करनी चाहिए. और यह पोप की सम्मति के बिना संभव ही नहीं है क्योंकि इससे चर्च की स्वतंत्रता प्रभावित होगी. तो इस प्रकार के समझौते की कोई संभावना नहीं है.”
लेकिन क्या चीन में ऐसा नहीं हो रहा?
आंद्रिया का कहना है, “चीन में यह फ़ैसला कैसे हो रहा है यह पता नहीं है क्योंकि उस संबंधी समझौते को गुप्त रखा गया है. जो हमें पता है वो ये कि वैटिकन कैथोलिक चर्च के पदों के लिए कुछ लोगों का नाम चीन सरकार को सुझाते हैं. उन नामों पर चर्चा होती है कि कौन लोग उन्हें स्वीकार्य हैं. लेकिन अंत में फ़ैसला पोप ही करते हैं.”
कई बार किसी देश के साथ कूटनीतिक संबंध टूट जाने के बाद चर्च ही संवाद का एक रास्ता बचता है.
आंद्रिया गागलियारडूची के मुताबिक़, प्राकृतिक आपदा या किसी त्रासदी के समय चर्च महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और वहां जाने से प्रभावित लोगों की आशा बंधती है. लेकिन क्या मध्य अमेरिका के सबसे बड़े देश में कैथोलिक चर्च इस समस्या से अकेले जूझ रहा है?
वैश्विक परिप्रेक्ष्य
वॉशिंगटन स्थित सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनैशनल स्टडीज़ में अमेरिका प्रोग्राम के निदेशक रायन बर्ग का कहना है कि निकारागुआ में जिस स्तर पर कैथोलिक और विपक्षी नेताओं का उत्पीड़न हो रहा है वैसा कहीं और नहीं देखा गया है.
निकारागुआ की स्थिति की कुछ हद तक अनदेखी होने की एक वजह यह है कि उसके पड़ोसी देशों में भी मानवाधिकार उल्लंघन आम बात है.
“यह क्षेत्र काफ़ी हद तक अपनी ही समस्याओं में उलझा हुआ है जिस कारण निकारागुआ में व्यापक दमन के बावजूद उसके ख़िलाफ़ कोई आवाज़ नहीं उठा रहा है. यह चिंताजनक है.”
लेकिन अमेरिका इस विषय में क्या कर रहा है. हमने देखा था कि 1980 के दशक में साम्यवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई के तहत ओर्टेगा सरकार के ख़िलाफ़ लड़ाई को अमेरिका ने आर्थिक सहायता दी थी.
अमेरिका का क्या रुख़ है?
रायन बर्ग कहते हैं कि शीतयुद्ध के बाद अमेरिका का ध्यान निकारागुआ से हट गया था और फ़िलहाल वो विश्व की दूसरी बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है.
रायन बर्ग कहते हैं, “अब हम निकारागुआ को लोकतंत्र और मानवाधिकार की समस्या के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखते बल्कि ड्रग्स और अवैध प्रवासन की समस्या के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं. निकारागुआ में तानाशाही है और यह भी अवैध प्रवासन की समस्या का एक कारण है. शीतयुद्ध के बाद से स्थिति अब काफ़ी बदल गई है. अब हम देख रहे हैं कि निकारागुआ, रूस, चीन और ईरान के साथ संबंध जोड़ रहा है. अमेरिका को इस बारे में रणनीति बनानी पड़ेगी.”
लेकिन वैटिकन चाहे तो एक काम ज़रूर कर सकता है जो दुनिया में बड़ी सुर्ख़ी बन सकता है और वह यह कि वैटिकिन डैनियल ओर्टेगा और उनकी पत्नी को धर्म से बहिष्कृत कर सकता है.
रायन बर्ग की राय है कि निश्चित ही वैटिकन के पास उन्हें धर्म से बहिष्कृत करने का विकल्प है मगर ऐसा नहीं लगता कि इसका उन दोनों पर या सरकार पर कोई ख़ास असर पड़ेगा.
अब लौटते हैं मूल प्रश्न पर कि क्या वैटिकन निकारागुआ में रोमन कैथोलिकों के दमन को रोक पाएगा?
निकारागुआ के वरिष्ठ धार्मिक नेताओं नें खुल कर निकारागुआ में राष्ट्रपति ओर्टेगा की सरकार द्वारा विपक्षी नेताओं और कैथोलिक ईसाई नेताओं के दमन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी है.
जवाब में राष्ट्रपति ओर्टेगा ने ईसाई धर्मगुरुओं को या तो जेल में बंद कर दिया है या देश से निकाल दिया है और वैटिकन के साथ संबंध तोड़ दिए.
पोप ने इस साल सार्वजनिक रूप से निकारागुआ में कैथोलिक नेताओं के दमन पर चिंता व्यक्त की है.
बिशप अल्वारेज़ निकारागुआ से रिहा होकर रोम लौट चुके हैं और हो सकता है जल्द हमें उनसे निकारागुआ की स्थिति के बारे सुनने को मिले.
सवाल यह है कि वैटिकन को और क्या करना चाहिए? वैटिकन के इतिहास को देखें तो हम पाएंगे कि मुश्किल स्थितियों में वह कूटनीति का सहारा लेता है. मगर इस समय ज़रूरत है कि शेष दुनिया भी इस समस्या का हल निकालने के लिए वैटिकन का साथ दे.
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