लॉरेंस बिश्नोई: जेल में बंद गैंगस्टर का हौव्वा कितना बड़ा है और उसकी वजह क्या है

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- Author, संजीव चौहान
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
मुंबई पुलिस ने बॉलीवुड अभिनेता सलमान ख़ान के घर के बाहर इसी साल अप्रैल में गोली चलाए जाने के मामले में 1735 पन्नों की चार्जशीट दाख़िल की है.
इस चार्जशीट में गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई का जिक्र कई जगहों पर है.
वैसे ये पहला मौका नहीं है जब सलमान ख़ान की वजह से बिश्नोई की चर्चा हो रही है. बिश्नोई का गैंग सलमान ख़ान को कई बार धमकी दे चुका है और कई बार हमले की योजना बना चुका है.
अपराध की दुनिया पर नज़र रखने वाले पत्रकार हों या फिर पुलिस के आला अधिकारी, वे मानते हैं कि अपना ख़ौफ़ बढ़ाने के लिए बिश्नोई सलमान ख़ान जैसे हाई प्रोफ़ाइल लोगों को धमकी देने की रणनीति अपनाता है.
बीते लंबे समय से गुजरात की जेल में बंद लॉरेंस बिश्नोई को लेकर कोई ख़बर जेल के बाहर नहीं आ रही थी, तभी अप्रैल में सलमान के घर के बाहर गोलियाँ चलीं.

'मुकदमेबाज़ी में फँसता जा रहा हूँ'

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कुछ साल पहले चंडीगढ़ ज़िला अदालत में पेशी के दौरान लॉरेंस बिश्नोई ने पुलिस सुरक्षा और तमाशबीनों की भीड़ के बीच मेरे एक सवाल के जवाब में कहा था, "मैं एक के बाद एक मुकदमेबाज़ी में फँसता जा रहा हूँ. बाक़ी इस लाइन में बदनामी के मामले में मेरा नाम ऊपर पहुंचाने में आप लोगों (मीडिया) का भी रोल है."
मीडिया की भूमिका पर दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के पूर्व डीसीपी एलएन राव कहते हैं, "लॉरेंस बिश्नोई हो या कोई और बड़ा अपराधी अगर मीडिया इनके बारे में छापना बंद कर दे तो पुलिस और जेल प्रशासन का आधे से ज़्यादा काम कम हो जाएगा."
लॉरेंस बिश्नोई के नाम का हौव्वा ज्यादा है या वाक़ई में वह बहुत ख़तरनाक है, ये पूछे जाने पर तिहाड़ जेल महानिदेशक पद से रिटायर हो चुके संजय बेनीवाल बताते हैं, "सिर्फ़ हौव्वा मान लेना सही नहीं है. उसका ख़ौफ़ ही है कि जो वो जेल की सलाखों में बंद रहने के बावजूद बाहर मौजूद अपने भरोसेमंद गुंडों और शूटर्स के ज़रिए जो अपराध चाहे, करवा डालता है. फिर चाहे पंजाब में पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला का क़त्ल हो या फिर कोई और वारदात."

तिहाड़ जेल के पूर्व महानिदेशक संजय बेनीवाल बताते हैं, "लॉरेंस बिश्नोई की नेटवर्किंग जेल से बाहर ज़बरदस्त है, उसे ख़त्म करना पुलिस और जाँच एजेंसियों के लिए बेहद ज़रूरी है. जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक लॉरेंस बिश्नोई जैसे अपराधियों पर कोई दबाव नहीं पड़ेगा.”
क्या देश की कोई ऐसी जेल नहीं है जिसका ख़ौफ़ लॉरेंस बिश्नोई को भी हो, इस सवाल के जवाब में तिहाड़ जेल के पूर्व महानिदेशक बोले, "जो शख्स ख़ुद को जेल में ही सुरक्षित समझता हो. जेल से बाहर जाना ही नहीं चाहता हो. उसे देश की किसी भी जेल में बंद रहने का ख़ौफ़ क्यों सताएगा? वो तो चाहता है कि उसे हमेशा हाई-सिक्योरिटी वाली जेल में ही रखा जाए ताकि जेल से बाहर मौजूद उसके दुश्मन उस तक न पहुँच सकें."
दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के पूर्व डीसीपी एलएन राव अब दिल्ली हाई कोर्ट में क्रिमिनल मामलों के वकील के रूप में प्रैक्टिस करते हैं.
वो कहते हैं, "चूंकि लॉरेंस बिश्नोई जैसे गुंडे जेल में ही खुद को सुरक्षित समझते हैं इसीलिए मैंने अक्सर देखा-सुना है कि अदालतों की सुनवाई के दौरान अधिकांश मामलों में उनके वकील अदालतों में पेश ही नहीं होते हैं. लॉरेंस जैसे लोग जेल से बाहर ज़मानत पर निकलना चाहते तब तो उनके वकील तारीख़ पर मुस्तैदी से हाज़िर होते. दिल्ली की ही कुछ अदालतों का रिकॉर्ड इस बात का गवाह है कि लॉरेंस बिश्नोई के वकील कोर्ट में नहीं पहुंचते और कोर्ट को मजबूरन अगली तारीख़ देनी पड़ती है."

वकील रखने में दिलचस्पी नहीं
वकीलों की नियमित ग़ैर-हाज़िरी के बारे में लॉरेंस बिश्नोई गैंग के शूटरों की पैरवी कर रहे सीनियर क्रिमिनल लॉयर अशोक बेनीवाल ने कहा, "लॉरेंस बिश्नोई को क्या पड़ी है कि वो हर उस मुक़दमे में अपनी पैरवी के लिए कोर्ट में वकील खड़ा करे, इनमें से कई मुकदमे ऐसे हैं जिनमें पुलिस ने अपनी वाहवाही के लिए लॉरेंस बिश्नोई का नाम जबरदस्ती एफ़आईआर में ठूंस दिया है."
एडवोकेट अशोक बेनीवाल कहते हैं, "लॉरेंस बिश्नोई का नाम ज़्यादातर मुक़दमों में जबरिया ही ठूंसकर पुलिस मीडिया में वाहवाही चाहती है. मुक़दमा जब कोर्ट में ट्रायल पर पहुंचता है तब पुलिस अधिकांश मुक़दमों में लॉरेंस बिश्नोई का लिंक आपराधिक घटना से जोड़ ही नहीं पाती है."

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एलएन राव बताते हैं, "लॉरेंस बिश्नोई जैसे युवा जब अपराध की दुनिया में उतरते हैं और वे जब पहली बार जेल में पहुंचते हैं तो अपराध की दुनिया का पहला सबक उन्हें जेल में पहले से बंद खूंखार अपराधी ही देते हैं. जेल से बाहर आने पर उन्हें पुलिस-स्थानीय प्रशासन के भ्रष्ट और लापरवाह तंत्र से भी फ़ायदा मिलता है.”
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह कहते हैं, "शुरुआती दौर में लॉरेंस बिश्नोई जैसे गुंडे अपने घर की देहरी तो खुद ही लांघते हैं लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू ये भी है कि लॉरेंस बिश्नोई जैसों को पाल-पोसकर उन्हें बड़ा करके अपने-अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने में जेल-पुलिस या कुछ मामलों में पॉलीटिशियन भी पीछे नहीं रहते हैं."
दिल्ली के पूर्व पुलिस कमिश्नर और उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स के प्रमुख रहे अजय राज शर्मा और यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह एक ही राय रखते हैं.
उनके मुताबिक़, "जिस दिन देश की पुलिस, पॉलिटिक्स, कानून बेख़ौफ़ होकर ईमानदारी से, लॉरेंस जैसे गुंडों को काबू करने की ठान लेंगे अपराध की दुनिया में लॉरेंस बिश्नोई जैसे लोग कभी 'बड़े' और 'ख़ौफ़नाक' बन ही नहीं पाएंगे."

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अजय राज शर्मा कहते हैं, "दरअसल, जब लॉरेंस बिश्नोई जैसे बिगड़ैल युवा जेल की चारदीवारी से बाहर निकलते हैं तो उन पर इलाके की पुलिस की पैनी नज़र रहना ज़रूरी है. यह देखने के लिए कि फलां शख़्स पहली या दूसरी बार जेल जाने के बाद आख़िर समाज के भीतर कहां उठ-बैठ रहा है? उसकी संदिग्ध गतिविधियां बढ़ तो नहीं रही हैं, जिनके चलते वो पहली या दूसरी बार जेल पहुंचा था. इसी का नतीजा सामने है कि थाना-पुलिस, क़ानून ऐसा नहीं कर पाती है. लिहाजा कल के छोटे-मोटे आपराधिक मानसिकता के युवा देखते-देखते कानून-पुलिस और समाज के लिए सिरदर्द बन जाते हैं."
जेल में रहने के बाद भी आपराधिक वारदातों को अंज़ाम देने के पहलू पर दिल्ली पुलिस के पूर्व कमिश्नर नीरज कुमार कहते हैं, "किसी भी अपराधी को जेल में रखने का मतलब यह है कि उसे, समाज से हटाकर क्राइम करने के बदले में, बंदिश में बंद कर दिया गया है. इसके बाद भी तमाम मामलों में यह भी देखने को मिला है कि, जेल सुप्रीटेंडेंट के टेलीफ़ोन से ही कुछ अपराधी तो जेल से बाहर कॉल करते रहते हैं."
"जब जेल सुप्रीटेंडेंट के दफ़्तर से ही अपराधी जेल से बाहर कॉल करना शुरु कर दें, तो फिर लॉरेंस बिश्नोई जैसों को काबू कौन करेगा? क्रिमिनल का जेल के बाहर नेक्सस उतना घातक नहीं है, जितना घातक उनकी जेल स्टाफ़ और अफ़सरों से दोस्ती है."

उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह बताते हैं, "जेल में बंद रहकर लॉरेंस बिश्नोई जैसे गुंडों को बाहरी दुनिया में अपना मजबूत नेटवर्क खड़ा करने, और फिर आपराधिक गतिविधियों को अंज़ाम देने में जितनी आसानी रहती है. उतना खुलकर वे जेल से बाहर की दुनिया में रहते हुए खुद को सुरक्षित नहीं मानते हैं."
वहीं दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस एस एन ढींगरा कहते हैं, "लॉरेंस बिश्नोई जैसे बदमाश-गैंगस्टर बाहर से ज़्यादा जेल में सुरक्षित हैं. वे जेल के अंदर रहकर कहीं ज़्यादा बेहतरी से अपने नेटवर्क का बाहरी दुनिया में सुरक्षित विस्तार करते हैं. क्योंकि जेल में उन्हें अपने पकड़े जाने या फिर पुलिस एनकाउंटर में मार डाले जाने की तो कोई चिंता या डर नहीं है."
बिश्नोई परिवार का लड़का और नाम लॉरेंस

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लॉरेंस बिश्नोई को लेकर मीडिया रिपोर्ट्स में जो जानकारी उपलब्ध है, उसके हिसाब से कुछ जगहों पर उसका जन्म दिन 22 फरवरी, 1992 है तो कुछ जगहों पर 12 फरवरी, 1993 है. यानी इस वक्त लॉरेंस की उम्र 31-32 साल है.
पंजाब के फजिल्लका के गांव धत्तरांवाली में जन्मे बिश्नोई परिवार के लड़के का लॉरेंस नाम भी दिलचस्पी का विषय है.
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक लॉरेंस बिश्नोई का असली नाम सतविंदर सिंह है.
हालांकि, कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि बचपन में एकदम गोरा चिट्टा होने के चलते परिवारवालों ने लाड़ में उन्हें लॉरेंस कहना शुरू किया था, जो बाद में उनके वास्तविक नाम से ज़्यादा मशहूर हो गया.
लॉरेंस बिश्नोई के पिता लाविंदर सिंह हरियाणा पुलिस में सिपाही थे. उन्होंने नौकरी 1992 में शुरू की थी लेकिन पांच साल के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृति लेकर खेती बारी करनी शुरू कर दी. लॉरेंस ने पंजाब के अबोहर से 12वीं की पढ़ाई की और आगे की पढ़ाई के लिए 2010 में चंडीगढ़ पहुंच गए.
लॉरेंस डीएवी कॉलेज में दाख़िला लिया. धीरे धीरे उसने छात्र राजनीति में दिलचस्पी लेनी शुरू की और यहीं उसकी दोस्ती गोल्डी बराड़ से हुई. ये वही गोल्डी बराड़ हैं, जो विदेश से बैठकर लॉरेंस बिश्नोई गैंग के लिए काम करते हैं और एक तरह से गैंग को संभाल रहे हैं. लॉरेंस साल 2011-2012 में पंजाब विश्वविद्यालय छात्र संगठन (एसओपीयू) बनाकर खुद ही उसके नेता बन बैठे.
अपराध की दुनिया में क़दम

लेकिन इस साल उन पर पहला मुक़दमा दर्ज़ हुआ. लॉरेंस बिश्नोई पर छात्र जीवन के अंतिम पड़ाव पर जो पहला मुकदमा दर्ज हुआ वो कत्ल की कोशिश में शामिल होने का था. यह बात साल 2011-2012 की है.
तब स्टूडेंट राजनीति में हार का मुंह देखने से बौखलाए लॉरेंस के साथी स्टूडेंट ने एक छात्र नेता पर गोलियां चला दीं. उस घटना के बाद दर्ज मुकदमे में पहली बार लॉरेंस का नाम पुलिस की एफ़आईआर में दर्ज हुआ था.
लॉरेंस बिश्नोई को साल 2014 में पहली बार राजस्थान में गिरफ्तार करके भरतपुर जेल भेजा गया था. जब उसे पेशी के लिए मोहाली (पंजाब) ले जाया जा रहा था तो वो वहां से पुलिस हिरासत से फरार हो गया.
साल 2016 में उसे दोबारा गिरफ्तार कर लिया गया. जबकि साल 2021 में उसे संगठित और अंडरवर्ल्ड अपराध की दुनिया से रोकने के लिए, मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट) के एक मामले में तिहाड़ जेल में सुरक्षा की नजर से लाकर बंद कर दिया गया था.
तिहाड़ लाए जाने से पहले वो पंजाब की बठिंडा जेल में बंद रहा था.
साल 2022 में उसे जेल से ही सिद्धू मूसेवाला मर्डर केस में पंजाब पुलिस द्वारा गिरफ्तार (जेल से ही) कर लिया गया.
साल 2022 में गुजरात एंटी टेररिस्ट स्क्वायड ने लॉरेंस बिश्नोई को ड्रग तस्करी के मुक़दमे में नामजद किया था. ये मामला कच्छ में एक पाकिस्तानी जहाज से ड्रग की बड़ी खेप की ज़ब्ती से जुड़ा था.
पुलिस को आशंका थी कि उस खेप को मंगवाने में लॉरेंस का हाथ था. उसी के बाद लॉरेंस को दिल्ली की जेल से निकाल कर गुजरात पुलिस 23 अगस्त 2023 में गुजरात के साबरमती जेल ले गई थी.

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तब से वो इसी साबरमती जेल में ही बंद है. यहां बताना जरूरी है कि 30 अगस्त 2023 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लॉरेंस बिश्नोई के ऊपर सीआरपीसी की धारा 268 (1) भी लगा दी थी, ताकि उसे किसी भी हाल में साबरमती जेल से एक साल तक बाहर लाया ही न जा सके.
यही वजह है कि अलग अलग अदालतों में लंबित मुक़दमों में उसकी अब पेशी भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हो रही है.
अमूमन अपराधी अपराध करने के बाद पुलिस और कानून से छिपता है. लॉरेंस बिश्नोई और उसका गैंग ऐसा है जो किसी भी बड़ी वारदात के बाद उसकी ज़िम्मेदारी खुद आगे बढ़कर लेता है.
देश के अलग अलग राज्यों में लॉरेंस के सनसनीखेज अपराधों की बात करें तो पंजाबी सिंगर सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड और फिर बीते साल जयपुर में करणी सेना के अध्यक्ष सुखदेव सिंह गोगामेड़ी का कत्ल सुर्ख़ियों में रहा है.
'लॉरेंस बिश्नोई अकेले नहीं बनते...'

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छात्र राजनीति से कभी हिंदुस्तानी राजनीति की मुख्य धारा में पांव जमाने की हसरत रखने वाला छात्र आज इंटरनेशनल डॉन लॉरेंस बिश्नोई कैसे बन गया?
बीबीसी के सवाल के जवाब में पूर्व आईएएस अधिकारी और पंजाब के रिटायर्ड प्रिंसिपल सेक्रेटरी शिक्षा राम लद्दर ने कहा, "जेल-पुलिस और कुछ नेताओं की मिलीभगत का नतीजा है लॉरेंस बिश्नोई."
तो क्या लॉरेंस को इतना बड़ा गैंगस्टर बनाने में पंजाब पुलिस का भी योगदान रहा है? इस सवाल के जवाब में 1991 बैच पंजाब कैडर के पूर्व आईएएस अब नेता बन चुके शिक्षा राम लद्दर बोले, "नहीं-नहीं मैं सभी जेल, पुलिस, नेताओं या ब्यूरोक्रेट के बारे में जिक्र नहीं कर रहा हूँ. मैं कहना चाहता हूँ कि कुछ लोगों की शह के बिना लॉरेंस बिश्नोई जैसे गुंडे अपराध की दुनिया का बड़ा नाम नहीं बन सकते हैं."
लॉरेंस बिश्नोई भले ही क़ानून और पुलिस की नजर में बदमाश-गैंगस्टर हैं लेकिन बिश्नोई समाज पर उनका प्रभाव है. इसकी पुष्टि राजस्थान के वरिष्ठ क्रिमिनल लॉयर अशोक बेनीवाल भी करते हैं.
उनके मुताबिक़, "बिश्नोई समाज में लॉरेंस बिश्नोई की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि, देश-दुनिया में रहने वाले बिश्नोई समाज के दो पक्षों में किसी भी विवाद का निपटारा, लॉरेंस की एक आवाज़ पर हो जाता है."
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