दादा-दादी और नाना-नानी से दूर होकर क्या गंवा रहे हैं बच्चे?

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- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
10 सितंबर को भारत के कई स्कूलों समेत दुनिया के कई हिस्सों में ग्रैंडपेरेंट्स डे मनाया जा रहा है.
ग्रैंडपेरेंट्स में नाना-नानी या परदादा-परनानी वगैरह भी शामिल होते हैं मगर इसे हिंदी में बोलचाल में दादा-दादी दिवस कह दिया जाता है.
यह दिन समर्पित है उस पीढ़ी के लिए, जिसने अपना जीवन अपने परिवार के लिए समर्पित कर दिया. अपने बच्चों और उनके बच्चों की परवरिश की, उन्हें पढ़ाया-लिखाया और समय-समय पर मार्गदर्शन किया.
अलग-अलग देशों में ग्रैंडपेरेंट्स डे अलग दिन मनाया जाता है मगर अमेरिका की देखादेखी में अधिकतर देशों में यह सितंबर महीने में मनाया जाने लगा है.
दरअसल, अमेरिका में सितंबर के पहले सोमवार को लेबर डे मनाया जाता है. उसके बाद पड़ने वाले रविवार को ग्रैंडपेरेंट्स डे मनाने का रिवाज है. इसलिए हर साल इसकी तारीख़ अलग होती है.
दुनिया भर में ग्रैंडपेरेंट्स डे मनाने की तारीख़ भले ही अलग हो मगर मक़सद एक ही है- लोगों को उनके दादा-दादी या नाना-नानी के क़रीब लाना. बुज़ुर्गों को सम्मान और प्यार देना, साथ ही नई पीढ़ी को उनके महत्व के बारे में बताना.
इसी मक़सद से महाराष्ट्र सरकार ने इस साल फ़रवरी में स्कूलों को आदेश जारी किया था कि साल में एक दिन ग्रैंडपेरेंट्स डे ज़रूर मनाएं.

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महत्वपूर्ण सम्बंध
प्रणव घाबरू पेशे से अधिवक्ता हैं और दिल्ली हाई कोर्ट में वकालत करते हैं. वह बताते हैं कि उनके जीवन में उनकी दादी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
वह कहते हैं, “मैं बचपन से ही देखता था कि दादी दिन भर व्यस्त रहती थीं, फिर भी अख़बार और धार्मिक पुस्तकें पढ़ने के लिए समय निकाल लिया करती थीं. मैं उनके पास जाता तो धार्मिक पत्रिकाओं से प्रेरक कहानियां मुझे सुनातीं. इससे मुझे भी बचपन से ही पढ़ने लिखने का शौक़ पैदा हो गया. पढ़ने की यह आदत आज भी बनी हुई है और मेरे प्रोफ़ेशन में भी मदद कर रही है.”
प्रणव की तरह हममें से ज़्यादातर ने अपने दादा-दादी या नाना-नानी से कुछ न कुछ अच्छा सीखा होगा. हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला में समाजशास्त्र की सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. स्नेह बताती हैं कि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि छोटे बच्चों के लिए वे आदर्श होते हैं.
वह बताती हैं, “बच्चों को अपने दादा-दादी और नाना-नानी से बेपनाह प्यार, भावनात्मक समर्थन और सुरक्षा तो मिलती ही है, वे बच्चे के विकास की नींव रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं. वे बच्चों में अच्छी आदतें डालते हैं और अपनी संस्कृति से भी वाक़िफ़ करवाते हैं. आज बहुत से माता-पिता को कामकाजी होने के कारण यह भूमिका निभाने में दिक्कत हो रही है.”
डॉ. स्नेह दादा-दादी और नाना-नानी की एक और भूमिका पर रोशनी डालती हैं जो बच्चे के लिए बहुत अहमियत रखती है. वह है- पैरेंटिंग यानी बच्चों की देखभाल करना.
वह कहती हैं, “अगर आपके माता-पिता साथ नहीं होंगे तो आपको पहली बार अपने शिशु की देखभाल करने में दिक्कत हो सकती है. वे आपको सिखाते हैं कि कैसे क्या करना है.”
“इसी तरह अगर माता-पिता नौकरी-पेशे वाले हों तो उन्हें अपने बच्चे को क्रेश या किसी देखभाल करने वाले के पास छोड़ना पड़ेगा. कई बार वहां पर बच्चों को दादा-दादी जैसी देखभाल नहीं मिल पाती.”

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रिश्तों में ‘दूरी’
इन दिनों ग्रैंडपेरेंट्स डे मनाने की ज़रूरत पर इसलिए भी ज़ोर दिया जा रहा है क्योंकि अलग-अलग पीढ़ियों के आपसी रिश्तों को कई सामाजिक कारण प्रभावित कर रहे हैं.
आज एकल यानी ऐसे परिवार बढ़ रहे हैं, जहां बच्चे अपने माता-पिता के साथ रहते हैं लेकिन दादा-दादी उनके साथ नहीं रहते.
बेंगलुरु में रह रहीं अनीशा जमवाल (बदला हुआ नाम) अपने साथ बने दुविधा भरे हालात के बारे में बताती हैं.
वह कहती हैं, “हमारे बेटे को उसके दादा-दादी ने इतना लाड़-प्यार दिया कि उसका व्यवहार बहुत ख़राब हो गया. नुक़सान करने वाली शरारतें करता तो भी उसके दादा-दादी उसे टोकने नहीं देते. फिर जब पति की जॉब के कारण हम बेंगलुरु शिफ़्ट हुए, तब उसके व्यवहार में सुधार हुआ है.”
एकल परिवारों में कुछ फ़ायदे भी होते हैं लेकिन दादा-दादी और नाती-पोतों के नज़रिये से देखें तो ऐसे परिवारों में कई तरह की दिक्कतें भी आ रही हैं.
समाजशास्त्र की प्रोफ़ेसर डॉ. स्नेह कहती हैं कि भले ही हम अपने बुज़ुर्गों की भौतिक ज़रूरतें पूरी कर रहे हों मगर उनकी भावनात्मक ज़रूरतों को भी समझना चाहिए.
वह बताती हैं, “दादा-दादी अकेला महसूस कर सकते हैं. अपने पोते-पोतियों में उन्हें एक साथी मिलता है. लेकिन जब कोई बात करने को नहीं होगा तो सामाजिक अलगाव की भावना के कारण वे अवसाद में भी जा सकते हैं. बच्चे भी दादा-दादी से अलग होने पर उदास हो सकते हैं.”
ऐसा ही अनीशा के सास-ससुर के साथ भी हुआ था. वह बताती हैं कि जब वे बेंगलुरु आए तो बेटा कुछ दिन बहुत उदास रहा और सास-ससुर भी दुखी रहने लगे थे.
वह कहती हैं, “हमें भी बुरा लग रहा था. फिर हमने कोशिश की है कि छुट्टियों पर या तो मम्मी-पापा यहां आ जाते हैं, या फिर हम दिल्ली चले जाते हैं. साथ ही हर दूसरे-तीसरे दिन बेटे की बात वीडियो कॉल पर उसके दादा-दादी से करवा देते हैं.”

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क्या करना चाहिए?
समाजशास्त्रियों का कहना है कि बदले हुए सामाजिक-आर्थिक परिवेश का असर हम पर, हमारे माता-पिता और हमारे बच्चों, तीनों पीढ़ियों पर पड़ रहा है.
लोगों को अपने काम और सामाजिक दायित्वों के बीच संतुलन साधने में दिक्कत हो रही है. वे न तो अपने माता-पिता को समय दे पा रहे हैं और न ही बच्चों को.
ऐसी स्थिति में बुज़ुर्ग माता-पिता की सेहत पर भी असर पड़ रहा है और कई बार बच्चे बुरी आदतों के शिकार बन रहे हैं.
अक्सर ऐसा देखने को मिला है कि दादा-दादी या नाना-नानी अलग शहर में रहते हैं और उनके नाती-पोते अपने माता-पिता के साथ अलग शहर में. कई बार वे विदेशों में भी रहते हैं.
ऐसे में यह संभव नहीं हो पाता कि वे अक्सर छुट्टियों में एक-दूसरे के पास जाकर मिल सकें. ऐसी स्थिति में इंटरनेट और वीडियो कॉलिंग के माध्यम से संपर्क करना मददगार हो सकता है.
लेकिन हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र की सहायक प्रोफ़ेसर डॉ. स्नेह बताती हैं कि इस ख़ालीपन को भरने के लिए तकनीक पर बहुत ज़्यादा निर्भर होना ठीक नहीं है क्योंकि ‘मानवीय स्पर्श’ का अपना महत्व होता है जो आमने-सामने ही संभव हो सकता है.
वह कहती हैं, “आय के लिए घर से दूर रहना पड़ सकता है मगर संतुलन बनाने की कोशिश करनी चाहिए. अगर किसी कारण माता-पिता साथ न रह सकें तो उनके यहां अक्सर जाना चाहिए या उनको अपने पास बुलाते रहना चाहिए.”

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“साथ ही, जब बच्चे ख़ुद यात्रा करने लायक हो जाएं तो उन्हें ख़ुद से दादा-दादी या नाना-नानी के पास जाने दीजिए. इन सब बातों से आपके माता-पिता भी ख़ुश रहेंगे और आपके बच्चों को भी बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.”
इसी तरह स्कूलों में ग्रैंडपेरेंट्स डे मनाना अच्छी पहल तो है मगर साल में इस विषय को सिर्फ़ एक दिन देना काफ़ी नहीं है.
विशेषज्ञ कहते हैं कि बच्चों को इस रिश्ते का महत्व समझाने के लिए अध्यापकों को बीच-बीच में छोटे बच्चों से पूछते रहना चाहिए कि उनके दादा-दादी या नाना-नानी क्या करते हैं, उनसे बात कब हुई, उनसे क्या सीखा या उनसे सुनी कोई कहानी सुनाओ.
अधिवक्ता प्रणव घाबरू बताते हैं कि उनके माता-पिता, दोनों नौकरी करते थे. इस सिलसिले में उन्हें पास के एक क़स्बे में रहना पड़ रहा था जबकि दादी गांव में रहती थीं.
वह कहते हैं, “मैं भी मम्मी-पापा के साथ रहता था. वे जानते थे कि मुझे हर शनिवार का कितनी बेसब्री से इंतज़ार रहता था. जब हम शनिवार शाम को गांव पहुंचते तो दादी भी हमारा इंतज़ार कर रही होती थीं.”
“मेरा मानना है कि हर किसी को इसी तरह अपने बच्चों और माता-पिता, दोनों की भावनात्मक ज़रूरतों को समझना चाहिए और उनका पूरा ख़्याल रखना चाहिए.”
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