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अरविंद केजरीवाल: बदलाव के वादों से 'सॉफ़्ट हिंदुत्व' की राजनीति तक
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"बचपन से मैं हनुमान जी का भक्त हूं. बचपन में…पूरी पूरी रात बैठकर, कभी कभी 250-300 बार मैंने हनुमान जी की आरती की है. जीवन में कोई कठिनाई आए तो उनकी शरण में चले जाओ. सारे संकट दूर हो जाते हैं."
हाल ही में एक इंटरव्यू में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने खुद को हनुमान भक्त बताते हुए एक बार फिर ये बात दोहराई.
ये पहली बार नहीं है जब अरविंद केजरीवाल ने खुद को हनुमान भक्त बताया है.
दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 के लिए अपना नामांकन दाखिल करने से पहले भी वे कनॉट प्लेस के प्राचीन हनुमान मंदिर पहुंचे थे.
राजनीतिक मंचों से लेकर न्यूज टीवी के कैमरों तक पर वे अक्सर हनुमान चालीसा, रामायण की कहानी और उससे जुड़े किरदारों के सहारे विरोधियों पर निशाना साधते हुए दिखाई देते हैं.
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ये वो अरविंद केजरीवाल हैं, जो एक दशक पहले एक ऐसे भ्रष्टाचार विरोधी नेता के तौर पर सामने आए थे, जो अमीर और शक्तिशाली लोगों तक का नाम लेने से नहीं डरते थे.
उनके समर्थकों के लिए वे एक ऐसे नेता थे, जो धर्म, जाति से दूर सिर्फ़ ईमानदारी को तरजीह देते थे.
सवाल ये कि पिछले एक दशक में ऐसा क्या हुआ कि अरविंद केजरीवाल ने 'सॉफ्ट हिंदुत्व' की राह पकड़ ली?
अरविंद केजरीवाल का 'हिंदुत्व प्रेम'?
पिछले कुछ सालों से अरविंद केजरीवाल की राजनीति में अम्बेडकरवाद और लोकलुभावन योजनाओं के साथ-साथ हिंदू धर्म का सार्वजनिक प्रदर्शन जोर-शोर से दिखाई देता है.
वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष कहते हैं, "मैं 2018 तक अरविंद केजरीवाल के साथ रहा. इस दौरान मैंने धर्म के नाम पर उन्हें वोट बटोरने की कोशिश करते हुए नहीं देखा, लेकिन बाद में वे धर्म का प्रदर्शन करने लगे."
वे कहते हैं, "अरविंद कैमरों के साथ हनुमान मंदिर जाने लगे, हनुमान चालीसा का पाठ करने लगे. यह बताता है कि वे भी दूसरी पार्टियों की तरह धर्म की राजनीति कर रहे हैं."
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि साल 2017 में दिल्ली एमसीडी में आम आदमी पार्टी की बुरी हार ने अरविंद केजरीवाल को राजनीति का तरीक़ा बदलने पर मजबूर किया.
एमसीडी की कुल 270 सीटों में से 'आप' ने 48, कांग्रेस ने 30 और बीजेपी ने 181 सीटों पर जीत दर्ज की थी.
साल 2018 में दिल्ली की सत्तारूढ़ 'आप' सरकार ने 60 साल से ज़्यादा उम्र के बुज़ुर्ग लोगों के लिए तीर्थ यात्रा योजना की शुरुआत की.
दावा किया जा रहा है कि करीब 90 हज़ार लोग अब तक इस योजना का लाभ उठा चुके हैं.
योजना के तहत बुज़ुर्गों को अयोध्या, रामेश्वरम, वैष्णो देवी, द्वारकाधीश, अमृतसर और अजमेर जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों पर निःशुल्क ले जाया जाता है.
हालांकि आम आदमी पार्टी का कहना है कि ये तीर्थ यात्राएं सिर्फ हिंदू धर्म के लोगों को नहीं करवाई जाती और इस योजना का इस्तेमाल चुनावी राजनीति के लिए नहीं किया जा रहा है.
वहीं जब कोरोना आया तो 'आप' ने निज़ामुद्दीन मरकज़ के मामले को उठाया और उपराज्यपाल को चिट्ठी लिख एफ़आईआर दर्ज़ करने की मांग की.
2022 के गुजरात विधानसभा चुनावों से पहले अरविंद केजरीवाल ने कहा कि भारतीय करेंसी नोटों पर हिंदू-देवी देवताओं की तस्वीर होनी चाहिए.
जनवरी, 2024 को अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम हुआ. इस दिन आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में रामलीला का मंचन किया.
पार्टी के बड़े नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं ने भंडारे, प्रसाद वितरण और शोभायात्राओं में हिस्सा लिया.
कुछ ही दिन बाद अरविंद केजरीवाल अपने परिवार के साथ अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन करने भी गए, वहीं विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने इससे दूरी बनाकर रखी.
केजरीवाल का कहना है कि 'उनकी सरकार दिल्ली की सेवा करने के लिए रामराज्य से प्रेरित 10 सिद्धांतों का पालन करती है.'
दिल्ली में बांग्लादेशी और रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर भी आम आदमी पार्टी का रुख़ आक्रामक रहा है. दिल्ली सरकार ने एक आदेश पारित कर कहा है कि अवैध प्रवासियों के बच्चों को स्कूलों में दाख़िला न दिया जाए.
चुनाव से ठीक पहले पार्टी ने पुजारी-ग्रंथी योजना का एलान किया है. इस योजना के तहत मंदिर में काम करने वाले पुजारियों और गुरुद्वारे के ग्रंथियों को हर महीने 18 हज़ार रुपये देने का वादा किया गया है.
नई दिल्ली स्थित सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हिलाल अहमद कहते हैं कि साल 2014 के बाद से पूरा विमर्श बदल गया.
वो कहते हैं, "साल 2013-14 तक जिस राष्ट्रवाद को अन्ना आंदोलन ने स्थापित किया था, बीजेपी ने उसे अपने रंग में रंगना शुरू कर दिया. इससे हिंदुत्व निहित राष्ट्रवाद की अवधारणा सामने आई. ये वो समय था जब हर चुनाव लड़ने वाली पार्टी को लगा कि सिर्फ सेक्युलर होकर सत्ता हासिल नहीं की जा सकती."
सॉफ़्ट हिंदुत्व ज़रूरत या मजबूरी?
जनगणना 2011 के मुताबिक़, दिल्ली की आबादी 1.68 करोड़ है. इसमें 21.59 लाख यानी 12.86 प्रतिशत मुस्लिम और 81.68 प्रतिशत हिंदू हैं.
पिछले 41 वर्षों से पत्रकारिता कर रहे विनीत वाही का कहना है कि दिल्ली की कुल 70 विधानसभा सीटों में 7 सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में हैं.
इनमें सीलमपुर, ओखला, मुस्तफ़ाबाद, चांदनी चौक, बल्लीमारान, मटिया महल और बाबरपुर सीट शामिल है.
वो कहते हैं, "केजरीवाल ये समझ गए हैं कि सिर्फ़ मुसलमानों के सहारे सत्ता हासिल नहीं की जा सकती. मुस्लिम बहुल सीटों को भी जीतने के लिए उन्हें हिंदू वोटों की ज़रूरत होगी. अगर इन सीटों पर कांग्रेस थोड़ी मजबूत होती है तो उन्हें मुश्किल होगी."
वहीं वरिष्ठ पत्रकार शरद गुप्ता का मानना है, "दिल्ली के पिछले दो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली. कांग्रेस का वोट बैंक आम आदमी पार्टी की तरफ शिफ़्ट हो गया. मुसलमान बीजेपी की तरफ़ जाना नहीं चाहते और केजरीवाल को छोड़कर दूसरी जगह उनके पास है नहीं."
वे कहते हैं, "केजरीवाल को लगता है कि मुस्लिम वोट उनकी जेब में हैं. ऐसे में हनुमान चालीसा पढ़ो, खुद को हिंदू दिखाओ ताकि उस वोट बैंक को तोड़ा जा सके, जो पारंपरिक रूप से बीजेपी का माना जाता है."
ऐसी ही बात आशुतोष भी करते हैं. वे कहते हैं, "दिल्ली दंगे जब हुए आम आदमी पार्टी ने नागरिकों की मदद नहीं की. शाहीन बाग़ में महिलाएं धरने पर बैठीं, लेकिन अरविंद केजरीवाल एक बार भी नहीं गए. उन्हें डर था कि ऐसा करने पर बीजेपी उन्हें मुस्लिम परस्त नेता के तौर पर घोषित कर देगी."
आशुतोष कहते हैं, "मुख्यमंत्री होने के नाते अरविंद केजरीवाल को उनकी पीड़ा सुननी चाहिए थी, लेकिन उन्होंने नहीं सुनी. सिर्फ़ इसलिए ताकि हिंदू वोट उनसे छिटक ना जाए."
एक समय था जब अरविंद केजरीवाल गोल टोपी सिर पर लगाए इफ़्तार पार्टियों में शामिल होते थे, लेकिन समय के साथ उन्होंने इससे दूरी बनानी शुरू कर दी.
शरद गुप्ता कहते हैं, "2020 आते-आते अरविंद केजरीवाल ने गोल टोपी छोड़कर हनुमान मंदिर में माथा टेकना शुरू कर दिया. ये एक बड़ा बदलाव है, जो बहुत साफ़ दिखाई देता है."
'सॉफ्ट हिंदुत्व' के सवाल पर मीडिया से बात करते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा था, "आप मंदिर जाते हो? मैं भी जाता हूं. मंदिर जाने में तो कोई बुरी बात नहीं है. मंदिर जाने से शांति मिलती है. इसमें क्या गलत है? जो लोग आपत्ति कर रहे हैं, उन्हें क्या दिक्कत है."
उन्होंने कहा, "मैं मंदिर जाता हूं, मैं हिंदू हूं, मैं हनुमान जी, राम जी के मंदिर जाता हूं. मेरी पत्नी शिवजी की भक्त हैं. वे हर हफ्ते गौरीशंकर मंदिर जाती हैं. इसमें किसी को समस्या क्यों है. क्यों इसे मुद्दा बनाया जा रहा है."
धार्मिक प्रतीकों का सहारा
धर्म के संगठित और सुनियोजित इस्तेमाल की जो प्रक्रिया 90 के दशक से भारत में शुरू हुई, उसमें साल 2014 के बाद और तेज़ी आई.
वरिष्ठ पत्रकार विनीत वाही कहते हैं कि 'भगवान राम को भारतीय जनता पार्टी ने पहले ही अपने नाम कर रखा है, क्योंकि दशकों से भगवान राम उनकी राजनीति के केंद्र में हैं.
वे कहते हैं, "जब आम आदमी पार्टी हिंदुत्व की तरफ बढ़ी तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे धार्मिक प्रतीक को अपनाने की थी, जिसके सहारे वे हिंदू लोगों से जुड़ पाएं. इस कड़ी में उन्होंने हनुमान को चुना."
2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में इसकी गूंज सबसे ज़्यादा सुनाई दी. हनुमान चालीसा के पाठ और मंदिर दर्शन के अलावा वे प्रचार के दौरान गदा लेकर वोट मांगते हुए भी नज़र आए थे.
हिलाल अहमद का मानना है, "चुनावी राजनीति के हिसाब से प्रतीक चुने जाते हैं और हनुमान को चुनकर अरविंद केजरीवाल ने ऐसा ही किया."
वे कहते हैं, "लोग कहते हैं कि केजरीवाल ऐसा करके बीजेपी को जवाब दे रहे हैं, लेकिन ये जवाब देने की बात नहीं है, बल्कि सत्ता हासिल करने की राजनीति है. वे हिंदुत्व के विमर्श को खत्म नहीं कर रहे हैं. वे उसमें ऑपरेटर कर रहे हैं. उनका मक़सद इसका फ़ायदा उठाकर चुनाव जीतना है."
'आप' का 'हिंदुत्व' बीजेपी से कितना अलग?
दिल्ली विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने 6 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है, वहीं बीजेपी ने एक भी मुस्लिम को उम्मीदवार नहीं बनाया है.
शरद गुप्ता कहते हैं, "बीजेपी के हिंदुत्व में कोई घालमेल नहीं है. वहां मुसलमानों के लिए कुछ नहीं है. केजरीवाल मुसलमानों को भी साधना चाहते हैं."
वे कहते हैं, "बीजेपी का डीएनए शुरू से हार्ड कोर हिंदुत्व वाला रहा है. वे हिंदू राष्ट्र बनाने की बात करते हैं. मुसलमानों को टिकट नहीं देते. उनका टारगेट देश की क़रीब 80 प्रतिशत हिंदू जनता है, जिससे से वे 50 प्रतिशत वोट चाहते हैं, लेकिन केजरीवाल का हिंदुत्व कट्टर नहीं है."
गुप्ता का मानना है कि अरविंद केजरीवाल का टारगेट हिंदू वोट ही है, लेकिन वे मुसलमानों का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं.
ऐसी ही बात आशुतोष करते हैं. वे कहते हैं, "एक धर्म विशेष का वोट पाने के लिए अरविंद केजरीवाल दूसरे धर्म के ख़िलाफ़ कम से कम नफ़रत का व्यापार नहीं कर रहे हैं. वे एक तरह का संतुलन बिठाने की कोशिश कर रहे हैं."
वहीं संतुलन की बात पर हिलाल अहमद कहते हैं कि इसे अरविंद केजरीवाल बना नहीं रहे हैं, बल्कि ये खुद बन रहा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.