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दिल्ली में बीजेपी और आप वोटर लिस्ट पर भिड़े, क्या है विवाद की जड़
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी हिन्दी
दिल्ली में वोटर लिस्ट के नाम पर बीजेपी और आम आदमी पार्टी के नेता लगातार आपस में भिड़े हुए हैं.
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि नई दिल्ली विधानसभा सीट पर बड़ी संख्या में फर्जी वोटरों को जोड़ा जा रहा है.
केजरीवाल ने कहा है, "एक लाख की छोटी सी विधानसभा सीट है, उसमें पिछले 15 दिन में 13 हज़ार नए वोटर बनने की एप्लिकेशन कहां से आ गई? ज़ाहिर तौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार से ला लाकर, आस-पास के स्टेट से लाकर फर्जी वोट बनवा रहे हैं ये लोग.."
आम आदमी के इस आरोप को बीजेपी ने पूर्वांचली वोटरों से अपमान से जोड़ा है. इस बीच कांग्रेस ने भी 'नए वोटरों' के मुद्दे पर केजरीवाल पर हमला तेज़ कर दिया है.
अरविंद केजरीवाल के दिल्ली में यूपी-बिहार के वोटरों को लेकर दिए बयान पर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने केजरीवाल को 'फ़र्जी' और 'धोखेबाज' कहा है.
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बीजेपी बनाम आप
गिरिराज सिंह ने कहा, "केजरीवाल जी जो खुद फर्जी और धोखेबाज हैं, वो बिहार, यूपी और पूर्वांचल के लोगों को कहते हैं 500 रुपये का टिकट कटाकर आते हैं और पांच लाख का इलाज कराते हैं."
"ये (केजरीवाल) जिस थाली में खाते हैं, उसी में छेद करते हैं. इन्होंने अन्ना हजारे को धोखा दिया, दिल्ली को धोखा दिया. बिहार, यूपी और पूर्वांचल के लोगों को धोखा दिया, टोम्पो और थ्री व्हीलर वालों को धोखा दिया."
दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने कहा है, "पूर्वांचल समाज के भाई बहनों को फर्जी वोटर कहकर पूरे पूर्वांचल समाज का नाम ख़राब किया है और बेहद निंदनीय है. ये कोई पहली बार आपने नहीं किया है केजरीवाल जी. ये आपने मन का काला सच है जो बार बार आपकी ज़ुबान पर आता है."
इस मामले में मूल रूप से पूर्वांचल से संबंध रखने वाले बीजेपी सांसद और दिल्ली प्रदेश बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष मनोज तिवारी ने भी केजरीवाल पर निशाना साधा है.
मनोज तिवारी ने कहा, "आपने हिम्मत कैसी की पूर्वांचल के लोगों को यूपी-बिहार के लोगों को फर्जी कहने की. फर्जी आप हैं. फर्जी आपके वादे हैं अरविंद केजरीवाल.."
केजरीवाल के आरोप के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री और बीजेपी नेता सम्राट चौधरी ने भी उनपर निशाना साधा है.
सम्राट चौधरी ने कहा, " दिल्ली के चुनाव में पूर्वांचल के लोग, उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग, केजरीवाल को सत्ता से बाहर हटाएंगे."
वहीं आप सांसद संजय सिंह ने का आरोप है कि अगर यूपी और बिहार के कार्यकर्ताओं को लाकर फर्जी वोट बनवाए जाएंगे तो क्या उसके ख़िलाफ़ बोला नहीं जाएगा, उसे रोका नहीं जाएगा.
"इसमें पूर्वांचलियों का या यूपी-बिहार के लोगों के अपमान का सवाल कहा हैं? ये तो जो फर्जी वोट बनाने का अभियान बीजेपी चला रही है, उसको रोकने के लिए शिकायत करने हम चुनाव आयोग गए थे."
इससे पहले अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में पुराने वोटरों के नाम ज़बरन वोटर लिस्ट से हटाने के आरोप लगाए थे, इसमें ख़ासकर दिल्ली विधानसभा सीट का ज़िक्र किया गया है, जहां से अरविंद केजरीवाल चुनाव लड़ रहे हैं.
अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया है कि नई दिल्ली विधानसभा सीट पर कुल मिलाकर 18 हज़ार से ज़्यादा वोट ''इधर से उधर" किए जा रहे हैं.
केजरीवाल ने कहा है, "साढ़े अठारह प्रतिशत वोट अगर किसी विधानसभा की इधर से उधर कर तो फिर यह चुनाव थोड़े ही है, यह केवल तमाशा है, नाटक है."
हालांकि पुराने वोटरों के नाम सूची से हटाने के आरोप के जवाब में मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने दावा किया था कि वोटरों के नाम सूची से हटाने में पूरी प्रक्रिया का पालन किया जाता है.
क्या कहते हैं आंकड़े
अरविंद केजरीवाल ने वोटर लिस्ट में 18.5 फ़ीसदी बदलाव का आरोप लगाया है.
दिल्ली के पूर्व मुख्य निर्वाचन अधिकारी रहे राकेश मेहता ने बीबीसी से कहा , "दिल्ली एक शहरी क्षेत्र है और प्रवासी लोगों की वजह से यहां हर पांच साल में वोटरों की संख्या में काफ़ी बदलाव आ जाता है. दरअसल यह हर शहरी इलाक़े में होता है."
"नई दिल्ली सीट पर भी ट्रांसफ़र, पोस्टिंग और वोटिंग के योग्य हो गए नए वोटरों की वजह से बदलाव होना स्वाभाविक है."
हालाँकि हर पांच साल में किसी भी लोकसभा, विधानसभा या स्थानीय निकायों की सीट पर वोटरों की संख्या में बदलाव स्वाभाविक होता है.
इसके पीछे नए वोटरों का जुड़ना बड़ी वजह है. इनमें पहले से रह रहे कुछ लोगों की वोट देने की उम्र हो जाना, नए लोगों का इलाक़े में बसना शामिल है. इसके अलावा कुछ लोगों का इलाक़े से दूर चले जाना और कुछ वोटरों का निधन होने के कारण भी लिस्ट में बदलाव आता है.
नई दिल्ली विधानसभा सीट की बात करें तो चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक़ साल 2020 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में इस सीट पर कुल 1,46,122 वोटर थे. जबकि साल 2015 के चुनाव में इस सीट पर 1,37,924 वोटर थे.
इस तरह से पांच साल में कुल वोटरों की संख्या में 8198 वोटर बढ़ गए थे. यानी पांच चाल में क़रीब 6% वोटर बढ़े थे.
वोटरों की संख्या में बदलाव के ट्रेंड को देखने के लिए दिल्ली की दो अन्य सीटों का ज़िक्र करें तो बुराड़ी में साल 2015 के 2,88,420 के मुक़ाबले साल 2020 में 3,61,703 वोटर हो गए. इस सीट पर 73,283 नए वोटर जुड़े, यानी यहां 25 फ़ीसदी से ज़्यादा नए वोटर जुड़ गए.
वहीं पटपड़गंज सीट की बात करें तो इस सीट पर साल 2015 में 2,14,368 वोटर थे, जो साल 2020 में 2,31,461 हो गए. इस सीट पर पांच साल में 17093 नए वोटर जुड़े. यानी क़रीब 8 फ़ीसदी नए वोटर.
हालांकि इन तीनों इलाक़ों की बात करें तो यहां लोगों की बसावट में भी बड़ा अंतर नज़र आता है. जहां बुराड़ी में पूर्वांचल और बिहार के लोग बड़ी संख्या में बसते हैं और इस इलाक़े में नए बसावट लगातार जारी हैं, वहीं पटपड़गंज दिल्ली के प्रमुख रिहाइशी इलाक़े में आता है, जहां कई सारे अपार्टमेंट और सोसायटी हैं.
जबकि नई दिल्ली सीट आमतौर पूरी तरह से बसा हुआ इलाक़ा माना जाता है, इसमें बड़ी संख्या सरकारी नौकरी करने वाले लोगों की है.
क्यों अहम है दिल्ली का यह चुनाव
दिल्ली में महज़ 70 विधानसभा सीट हैं. लेकिन देश की राजनीति का केंद्र होने की वजह से दिल्ली की हर ख़बर सुर्खियों में होती है और दुनियाभर की नज़रें दिल्ली पर होती हैं.
बीजेपी के लिए यह चुनाव इसलिए काफ़ी अहम है कि क्योंकि वह दिल्ली में लगातार 6 विधानसभा चुनावों में हार चुकी है. नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भी साल 2015 और साल 2020 में राज्य विधानसभा चुनावों में बीजेपी बुरी तरह हारी है.
जबकि आम आदमी पार्टी की सियासत की नींव दिल्ली में ही है और उसके लिए दिल्ली राजनीतिक तौर पर काफ़ी अहम है.
केजरीवाल के आरोपों के बाद पूर्व सांसद और केजरीवाल के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ रहे कांग्रेस उम्मीदवार संदीप दीक्षित भी उनपर हमलावर हैं.
संदीप दीक्षित ने कहा है, "पूर्वांचली हो या दिल्ली का वोटर हो, कोई भी वोटर हो. सारे वोटर महत्वपूर्ण हैं, चाहे वो एक हो या ज़्यादा हों. चुनाव आयोग को निष्पक्ष होकर देखना चाहिए कि वोट बनने में या वोट कटने में, चाहे वो किसी भी समुदाय का हो, वह क़ानून सम्मत होना चाहिए."
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, "इन चुनावों के जो भी नतीजे होंगे उसका असर दूर तक जाएगा, बीजेपी चुनाव जीतकर यह दिखाना चाहती है कि कोई पार्टी उसके सामने नहीं टिक सकती, जबकि अगर आप दिल्ली में हार गई तो उनकी राजनीति ख़त्म हो जाएगी. इसलिए हर तबके को अपनी तरफ खींचने की कोशिश हो रही है. चाहे वो पूर्वांचली हो, उत्तराखंडी हो या पंजाबी और जाट हों."
रशीद किदवई कहते हैं, "इन चुनावों में मैंने दो अनोखी बात देखी है, जिसके बारे में मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. पहली बात यह कि बीजेपी ख़ुद चाह रही है कि कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर हो और दूसरी यह कि बीजेपी किसी पार्टी पर आरोप लगा रही है कि वह हिन्दुओं के तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है."
दरअसल माना जाता है कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में कांग्रेस के वोट बैंक पर कब्ज़ा कर लिया है, इसलिए अगर कांग्रेस अपने पुराने वोटों का कुछ हिस्सा वापस हासिल कर लेती है और वोटों का बंटावारा होता है तो इसका सीधा फ़ायदा बीजेपी को होगा.
रशीद किदवई कहते हैं कि दिल्ली में 'बंटेंगे तो कटेंगे' जैसे नारे नहीं चल सकते हैं, क्योंकि इससे मुस्लिमों का वोट आप की तरफ चला जाएगा, इसलिए यहां बाक़ी सभी छोटे-छोटे मुद्दों पर राजनीति हो रही है.
रोहिंग्या बनाम पूर्वांचली
दिल्ली के चुनावी माहौल में अरविंद केजरीवाल ने चुनाव जीतने पर पुजारियों और ग्रंथियों को सम्मान राशि
देने की घोषणा की है, जबकि उन्होंने जाटों के लिए आरक्षण की बात छेड़कर एक नई बहस को भी जन्म दिया है.
इससे पहले बीजेपी भी आम आदमी पार्टी पर यह आरोप लगा चुकी है वो दिल्ली में रोहिंग्या और बांग्लादेशियों की मदद कर उसे अपना वोट बैंक बना रही है.
वरिष्ठ पत्रकार विनीत वाही दिल्ली की सियासत को लंबे समय से देख रहे हैं.
उनका कहना है, "दिल्ली में 25-30 साल पहले पूर्वांचली बहुत बड़ा मुद्दा नहीं थे. लेकिन अब दिल्ली में उनकी संख्या क़रीब 30% होगी, जो ज़्यादातर पूर्वी और उत्तर पूर्वी दिल्ली में रहते हैं. बीजेपी ने रोहिंग्या की बात की तो केजरीवाल ने पूर्वांचलियों की बात कर दी."
उनका कहना है, "केजरीवाल को भी पता है कि यूपी-बिहार की बात छड़ने से उनपर असर होगा. उनको पता है कि पूर्वांचली वोटर उनके अपने वोटर हैं, फिर भी उन्होंने ऐसा किया है और पूरी तरह सोच समझकर किया है. उनके मन में ज़रूर कोई अन्य समीकरण है.
विनीत वाही मानते हैं कि 'शीश महल' हो या प्रधानमंत्री आवास, इनका ज़िक्र केवल ज़रूरी मुद्दों को भटकाने के लिए होता है, ये किसी की निजी संपत्ति नहीं है जो भी उन पदों पर आएगा, वही रहेगा.
उनका कहना है कि नई दिल्ली विधानसभा सीट पर ज़्यादातर सरकारी नौकरी करने वाले वोटर हैं इसलिए इस सीट पर वोटरों में बहुत बड़ा बदलाव संभव ही नहीं है.
दिल्ली में 5 फ़रवरी को विधानसभा चुनाव के लिए वोटिंग होनी है और यहां हर रोज़ नए राजनीतिक मुद्दे सामने आ रहे हैं. इस सियासी उठापटक का जनता पर कितना असर होगा, यह 8 फ़रवरी को नतीजों में देखने को मिलेगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित