बांग्लादेश की राजनीति में परिवारवाद का बढ़ता दायरा

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- Author, रक़ीब हसनात
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला
बांग्लादेश की राजनीति में सक्रिय प्रमुख राजनीतिक दलों में वंशवाद एक पुरानी समस्या रही है.
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस संसदीय चुनाव में समस्या का दायरा बढ़ता दिख रहा है.
पिछले 15 सालों से बांग्लादेश की सत्ता पर काबिज़ अवामी लीग ने इस बार जिन उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, इनमें से कई लोग पार्टी के पुराने और वरिष्ठ नेताओं के बेटे-बेटियां हैं.
वहीं, कई लोग अपने पिता की मौत, सेहत ख़राब होने या उम्र ज़्यादा होने की वजह से मैदान में उतरे हैं.
इससे पहले साल 2018 में बीएनपी ने भी कई सीटों पर दिवंगत या बुज़ुर्ग नेताओं की संतानों को अपना उम्मीदवार बनाया था.
राजनीतिक विश्लेषक और ढाका विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर अबुल काशेम फज़लुल हक़ कहते हैं कि इन राजनीतिक दलों में लोकतंत्र नहीं होने के साथ ही देश में सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया नहीं होने की वजह से ऊपर से लेकर नीचे तक वंशवाद पनप रहा है.
राजनीति विज्ञान के शिक्षक और राजनीतिक विश्लेषक डा. मामून अल मुस्तफ़ा मानते हैं कि पार्टी के प्रति निष्ठा के सवाल पर बड़े राजनीतिक दल अपने पूर्व नेताओं की संतानों पर ज़्यादा भरोसा कर रहे हैं. इसी वजह से हर स्तर पर वंशवाद बढ़ रहा है.
लेकिन अवामी लीग और बीएनपी के नेताओं की दलील है कि नेताओं की संतान के तौर पर किसी को पद तो दिया जा सकता है, लेकिन नेता नहीं बनाया जा सकता. नेता बनने के लिए उनको अपनी राजनीतिक क्षमता साबित करनी पड़ती है.
अवामी लीग में परिवारवाद

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बांग्लादेश में सत्तारूढ़ अवामी लीग में फ़िलहाल पार्टी प्रमुख शेख़ हसीना ही सर्वेसर्वा हैं और उनके क़रीबी परिजनों में से कई लोग जनप्रतिनिधि के तौर पर पार्टी में विभिन्न पदों तक पहुँच गए हैं.
इस चुनाव में भी उनके कई परिजनों को उम्मीदवारी मिली है. इसके अलावा पार्टी के पूर्व महासचिव (अब दिवंगत) जिल्लुर रहमान और अब्दुल जलील, अब्दुर रज्जाक और मोहम्मद नसीम समेत कई नेताओं की संतानें पहले ही सांसद बन चुकी हैं.
इस बार जिन नए लोगों को टिकट मिले हैं, उनमें से कुछ लोगों के पिता साल 1970 और 1973 के चुनाव में अवामी लीग के टिकट पर चुनाव जीतने वालों में शामिल रहे हैं. वहीं, कुछ लोगों के पिता उम्र ज़्यादा होने की वजह से राजनीति में सक्रिय नहीं हैं.
प्रधानमंत्री के पूर्व सैन्य सचिव मेजर जनरल (रिटायर्ड) सलाउद्दीन मियाजी को झिनाईदह-3 सीट से पार्टी का टिकट मिला है.
उनके पिता वर्ष 1970 और 1973 में अवामी लीग के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं. इस बार इस सीट के निवर्तमान सांसद की जगह पार्टी ने मियाजी को अपना उम्मीदवार बनाया है.
इसी तरह प्रधानमंत्री दफ़्तर के पूर्व सचिव सज्जाद उल हसन को इस बार नेत्रोकोना की एक सीट से टिकट मिला है. उनके पिता मुक्ति युद्ध के दौरान गणपरिषद के सदस्य थे.
अवामी लीग ने चटगांव-1 सीट से पार्टी के अध्यक्ष मंडल के सदस्य इंजीनियर मोशर्रफ हुसैन के पुत्र महबूब रहमान रुहेल और चटगांव-2 सीट से पार्टी के पूर्व सांसद (अब दिवंगत) रफीकुल अनवर की पुत्री खदीजातुल अनवर को मैदान में उतारा है.

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इसी तरह पार्टी के कोषाध्यक्ष अशीकुर रहमान की सीट पर उनके पुत्र राशेक रहमान को टिकट मिला है. धार्मिक मामलों के पूर्व मंत्री मतीउर रहमान के पुत्र मोहम्मद मोहतिउर रहमान मैमनसिंग-4 सीट से मैदान में हैं. हाजी सलीम के पुत्र मोहम्मद सोलायमान सेलमी को ढाका-5 सीट से टिकट दिया गया है.
गाजीपुर-3 सीट से मैदान में उतरने वाली रूमाना अली पार्टी के दिवंगत नेता रहमत अली की पुत्री हैं.
दूसरी ओर, सुनामगंज-2 सीट से मैदान में उतरे चौधरी अब्दुल्ला अल महमूद पुलिस के मौजूदा आईजी चौधरी अब्दुल्ला अल-मामून के भाई हैं. उनके पिता सुनामगंज में अवामी लीग के संस्थापक महासचिव थे.
इसके अलावा भी कई ऐसे लोगों को भी टिकट मिले हैं जो पहले भी पार्टी के सांसद थे और हैं और जिनके पिता अवामी लीग के सांसद या बड़े नेता रह चुके हैं.
पार्टी के अध्यक्ष मंडल के पूर्व सदस्य नुह उल आलम लेनिन कहते हैं कि अवामी लीग करीब एक सदी पुरानी पार्टी है और ऐसे में यह तस्वीर स्वाभाविक है.
बीबीसी बांग्ला से उनका कहना था, "बांग्लादेश में अगर कोई व्यक्ति किसी पार्टी में शामिल होता है तो उसका पूरा परिवार उस पार्टी में शामिल हो जाता है. अवामी लीग के पुराने या पूर्व नेताओं का पार्टी में काफी योगदान है. इस वजह से आम लोगों में उनकी संतान के प्रति भी ऐसी धारणा बन गई है. ऐसे में यह कोई अस्वाभाविक मुद्दा नहीं है."
हालांकि, अबुल काशेम फजलुल हक का कहना है कि अगर सभी दलों की भागीदारी के साथ अच्छे माहौल में चुनाव होते तो अवामी लीग की ऐसी स्थिति नहीं होती.
वह कहते हैं, अब पार्टी के नेताओं को यह बात मालूम है कि जिनको टिकट मिलेगा वही सांसद बन जाएगा. इसलिए कोई अपना हिस्सा नहीं छोड़ना चाहता.
लेकिन पिता या परिवार के सहारे नामांकन पाने वाले इस मामले को इस तरह नहीं देखते.
मेजर जनरल (रिटायर्ड) सलाउद्दीन मियाजी का कहना था कि पिता की पहचान से उन्हें फायदा जरूर मिला. लेकिन नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद से उन्होंने इलाके में काम करके लोगों का विश्वास जीता है.
वह कहते हैं, "मेरे पिता एक मुक्ति योद्धा थे और वर्ष 1970 और 73 में सांसद रहे थे. मेरे पिता की पहचान और उनके जनसमर्थन ने मुझे पार्टी का समर्थन और प्रधानमंत्री का भरोसा हासिल करने में सहूलियत दी. लेकिन मुझे अपने करियर में ईमानदारी से काम करने के लिए सराहना भी मिली है. मैं सेवानिवृत्ति के बाद से क्षेत्र के लोगों के साथ हूं. मेरा जनसंपर्क पहले से ही था. शायद इन्हीं योग्यताओं के कारण प्रधानमंत्री ने मुझ पर भरोसा किया है.''
वंशवाद और बीएनपी

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बांग्लादेश के प्रमुख राजनीतिक दल बीएनपी के संस्थापक जिया उर रहमान के बाद उनकी पत्नी खालिदा जिया ने पार्टी की बागडोर संभाली थी. उसके बाद खालिदा के भाई-बहन समेत कई परिजन मंत्री और सांसद बने थे. फिलहाल पार्टी की कमान उनके पुत्र तारिक रहमान के हाथों में है.
इसके अलावा पार्टी की महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर समेत कई नेताओं के पिता शुरुआती दौर में पार्टी से जुड़ कर मंत्री और सांसद बने थे. लेकिन वंशवाद या नेताओं के उत्तराधिकारियों को पार्टी का नामांकन मिलने का मुद्दा वर्ष 2008 और 2018 के चुनावों के दौरान बड़े पैमाने पर उभर कर सामने आया.
खासकर, वर्ष 2008 के चुनाव से पहले सेना के समर्थन वाली कार्यवाहक सरकार के कार्यकाल के दौरान पार्टी के कई नेता विभिन्न मामलों में जेल में होने के कारण चुनाव के लिए अयोग्य हो गए थे.
पार्टी के कानून मामलों के सचिव कैसर कमाल बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "उस चुनाव में संबंधित सीटों पर जीत सुनिश्चित करने के लिए पार्टी के कई नेताओं के परिजनों को टिकट दिए गए थे. ऐसे नेता अपने-अपने इलाकों में काफी लोकप्रिय थे."
इसी तरह वर्ष 2018 के चुनाव में कुछ बुजुर्ग नेताओं के उम्र-जनित कारणों से निष्क्रिय होने या चुनाव लड़ने में सक्षम नहीं होने के कारण उनकी संतानों को उम्मीदवार बनाया गया था. लेकिन सभी मामलों में ऐसा नहीं हुआ.
कैसर कमाल कहते हैं, "मेरे इलाके में पार्टी के पूर्व सांसद की बजाय मुझे उम्मीदवार बनाया गया. था. इसी तरह पार्टी ने कई सीटों पर नए उम्मीदवार मैदान में उतारे थे."
दूसरी ओर, यह भी सच है कि पार्टी की उम्र बढ़ने के साथ ही पूर्व नेताओं के पुत्र-पुत्रियों का असर भी बढ़ रहा है. पार्टी के पदों या नामांकन के मामले में भी उनकी संख्या बढ़ रही है.
वर्ष 2018 के चुनाव में पंचगढ़ की एक सीट पर बीएनपी सरकार के कार्यकाल के दौरान संसद के स्पीकर और पार्टी के असरदार नेता जमीरुद्दीन सरकार के पुत्र नौशाद जमीन को नामांकन मिला था.
नौशाद जमीर का बीबीसी बांग्ला से कहना था कि पिता की पहचान के कारण कुछ सहूलियत मिलने के बावजूद उन्होंने तीन दशकों के दौरान अपने कामकाज से भी पार्टी में अपनी पहचान बनाई है.
वह कहते हैं, "हमारे जैसे राजनीतिक परिवारों के बेटे और बेटियां यूं ही राजनीति में शामिल हो जाते हैं और जनसंपर्क बन जाता है. लेकिन अगर कोई राजनीति में है ही नहीं और चुनाव आने पर अपने पिता के नाम पर पार्टी का उम्मीदवार बन जाए तो इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता."
क्यों फैल रहा है वंशवाद का जाल

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राजनेता चाहे जो कहें, हकीकत यह है कि पहले राष्ट्रीय स्तर पर वंशवाद के मामले में सिर्फ शेख हसीना और खालिदा जिया समेत कुछ गिने-चुने परिवारों की ही मिसाल दी जाती थी. लेकिन अब सांसद के अलावा उप-ज़िला के चेयरमैन या नगरपालिका के मेयर के तौर पर भी कई ऐसे लोग हैं जिनके पिता भी उसी पद पर थे.
अबुल काशेम फजलुल हक के मुताबिक, स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया नहीं होना ही इसकी सबसे बड़ी वजह है.
वे बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "लोकतांत्रिक प्रक्रिया होने की स्थिति में दूसरे लोगों को भी पार्टी में ऊपर आने का मौका मिलता. ऐसा नहीं होने के कारण ही परखे हुए कार्यकर्ताओं की जगह नेताओं के परिजनों को अहमियत मिल रही है. इसी वजह से हर स्तर पर वंशवाद देखने को मिल रहा है."
डॉ मामून अल मुस्तफा कहते हैं, "वंशवाद के विस्तार की एक और वजह यह है कि राजनीतिक परिवारों के सदस्यों को छोटी उम्र से ही एक तरह का राजनीतिक प्रशिक्षण मिल जाता है. इसकी वजह से वह लोग अपने इलाकों में राजनीति में पहले से ही आगे रहते हैं. इसके अलावा हाल के दिनों में दोनों प्रमुख दलों में योग्यता और आदर्शों के मुकाबले वफादारी के सवाल को ज्यादा अहमियत मिल रही है. पार्टी के प्रति वफादारी के पैमाने पर पुराने लोगों को ज्यादा अहमियत मिल रही है. पार्टी की सोच यह है कि उनके पूर्वज पार्टी के प्रति वफादार थे, इसलिए उनकी संतान भी वैसी ही रहेगी."
इन वजहों से ही सिर्फ सांसद या जनप्रतिनिधि के मामले में ही नहीं, बड़े दलों के सहयोगी संगठनों का नेतृत्व तय करने के मामले में वंशवाद को अहमियत मिलने लगी है.
अबुल काशेम फजलुल हक कहते हैं, "वंशवाद के प्रसार को रोकने के लिए एक व्यक्ति के दो बार से अधिक प्रधानमंत्री बनने की संभावना को ख़त्म करना होगा."
बीएनपी नेता नौशाद जमीर मानते हैं कि सिर्फ प्रधानमंत्री ही नहीं, सांसद के मामले में भी किसी को दो बार से ज्यादा मौका देना उचित नहीं है.
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