अमेरिकी सांसदों का हिमाचल में आकर तिब्बत पर बोलना क्या भारत के हित में है?

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अमेरिका के हाउस ऑफ़ रिप्रेजेन्टेटिव के एक प्रतिनिधिमंडल ने बुधवार को तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा से हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में मुलाक़ात की थी.
इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने तिब्बत की स्वायत्तता का मुद्दा उठाया और तिब्बतियों के प्रति अमेरिका के साथ को अटूट बताया.
भारत की ज़मीन से किसी विदेशी प्रतिनिधिमंडल की ओर से तिब्बत का मुद्दा उठाना एक अहम घटना के रूप में देखा जा रहा है.
भारत तिब्बत को चीन का हिस्सा मानता है और वह दलाई लामा और चीन के बीच चल रही तनातनी पर टिप्पणी करने से परहेज़ करता है.
ऐसे में सोशल मीडिया से लेकर विदेशी मामलों के एक्सपर्ट ये सवाल उठा रहे हैं कि भारत को इससे क्या हासिल होगा? क्या वजह है कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भारतीय ज़मीन से तिब्बत का मुद्दा उठा रहा है?
क्या भारत की इसमें मौन सहमति है? क्या तिब्बत के सहारे चीन पर दबाव बनाने की रणनीति तैयार की जा रही है.
भारत ने अनुमति क्यों दी?

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अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का यह दौरा आधिकारिक है या नहीं? इसे लेकर फ़िलहाल कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है.
द हिंदू अख़बार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल निजी दौरे पर भारत आया है.
बुधवार, 19 जून को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर विदेशी मामलों के जानकार गोकुल सहनी ने अमेरिका की भूमिका पर सवाल उठाए.
उन्होंने लिखा, "यह देखकर मैं हैरान हूं कि 2024 में अमेरिकी कांग्रेस तिब्बत के मामले में क्या हासिल करने की कोशिश कर रही है. अमेरिका ने दशकों तक इस मामले पर चुप्पी साधे रखी, बावजूद इसके कि जब इसे लेकर कुछ अंतरराष्ट्रीय हलचल थी. तिब्बत में लोकतंत्र लाने से अमेरिका अब क्या हासिल करना चाहता है?"
इस पोस्ट को रिपोस्ट करते हुए द हिंदू अखबार के डिप्लोमैटिक अफेयर्स की संपादक सुहासिनी हैदर ने लिखा, "अमेरिकी कांग्रेस के लोगों को भारतीयत धरती पर सार्वजनिक भाषणों में तिब्बत के बारे में राजनीतिक बयान देने की इजाजत देकर भारत क्या हासिल करना चाहता है? अगर यह भारत की नीति है, तो मंच पर कोई भारतीय अधिकारी या नेता क्यों नहीं हैं?"
इस पोस्ट पर बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने भी कमेंट किया. उन्होंने लिखा कि हमें चीन को यह बताना होगा कि उन्होंने लद्दाख में अप्रैल 2020 से हमारी जमीन पर कब्जा किया हुआ है. इसलिए हम तिब्बत और ताइवान को स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर सकते हैं. वे देश संयुक्त राष्ट्र महासभा की सदस्यता के हकदार हैं.
कुछ ही देर में सुहासिनी को जवाब देेने के लिए एक्स पर भारत के विदेश सचिव रहे कंवल सिब्बल सामने आ गए.
उन्होंने एक्स पर लिखा, “क्या यह कहा जा रहा है कि पेलोसी और कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल को वीज़ा देने से इनकार कर दिया जाना चाहिए था? या यह शर्त लगानी चाहिए थी कि कोई भी सार्वजनिक बयान नहीं देगा? क्या यह राजनीतिक रूप से संभव होता?”

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सिब्बल ने कहा, ''मोदी सरकार पर देश के अंदर और बाहर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के लिए पहले से ही हमला किया जा रहा है, ऐसे में इस फ़ैसले को चीन की मदद के तौर पर देखा जाता, जो तिब्बत पर अन्याय कर रहा है. इसका क्षेत्रीय स्तर पर हमारे लिए गंभीर परिणाम हैं.''
सिब्बल ने कहा, ''यूक्रेन युद्ध में पश्चिम के साथ न खड़ा होने पर वे देश भारत की ज़मीन पर भारत की आलोचना करते हैं. बावजूद इसके हमारा मीडिया भारत की स्थिति पर सवाल उठाने के लिए उन्हें न्योता देता है.''
सिब्बल ने पूछा कि इस मामले में भारत की चुप्पी को क्या सहमति के तौर पर देखा जाना चाहिए?

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इसका जवाब देते हुए फिर से सुहासिनी ने एक पोस्ट किया. उन्होंने लिखा, "यहां चीन या किसी अन्य की प्रतिक्रिया मुद्दा नहीं है. यह भारत की संप्रभुता और भारत की धरती से विदेश नीति के मुद्दे पर नियंत्रण का मामला है."
सुहासिनी के इस पोस्ट का जवाब देते हुए सिब्बल ने लिखा कि पश्चिम के देश भारत के रूस से संबंधों को अच्छे से जानते हैं, बावजूद इसके वे हमारी धरती से रूस पर हमला करते हैं. हमारा मीडिया ये जानते हुए भी उन्हें जगह देता है.
उन्होंने लिखा, "रायसीना डायलॉग में रूस पर हमला किया गया. क्या हम अपनी धरती पर विदेश नीति के मुद्दे पर उस नैरेटिव को नियंत्रित करने में सक्षम हैं?"
इसका जवाब देते हुए सुहासिनी ने लिखा कि वह तिब्बत मुद्दे की तुलना रूस-यूक्रेन संघर्ष और चीन की तुलना रूस ने नहीं करती हैं.
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने क्या कहा?

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सात लोगों के इस प्रतिनिधिमंडल में अमेरिकी कांग्रेस की पूर्व स्पीकर नैंसी पेलोसी भी शामिल हैं.
बुधवार को इस प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि अमेरिका, चीन को दलाई लामा के ‘उत्तराधिकार’ में हस्तक्षेप करने की इजाजत नहीं देगा.
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने दलाई लामा से मुलाक़ात ऐसे समय पर की है जब उनका जन्मदिन क़रीब है. छह जुलाई को वे अपना 89वां जन्मदिन मनाएंगे.
उनकी उम्र को देखते हुए दलाई लामा की संस्था और उनके उत्तराधिकार को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं.
अमेरिकी संसद की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष और रिपब्लिकन नेता माइकल मैककॉल के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि तिब्बत को अमेरिका का समर्थन अटूट है.
उन्होंने तिब्बत के साथ चीन के प्राचीन संबंधों के दावे को 'हास्यास्पद' बताया है.
द हिंदू के मुताबिक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल में शामिल ग्रेगरी मीक्स ने कहा, "तिब्बती लोगों के लिए हमारा समर्थन अटूट है. सुंदर दिनों को लेकर देखे गए सपने जिंदा रहेंगे. चीन विकास के नाम पर समुदायों को उनकी जगह से हटा रहा है."
उन्होंने कहा, "हम जानते हैं कि वे तिब्बती बौद्ध धर्म को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे हैं. यह चीन के लिए परम पूजनीय (दलाई लामा) के साथ बिना शर्त बातचीत में शामिल होने का समय है."
कार्यक्रम की शुरुआत में बोलते हुए मैककॉल ने दलाई लामा के निर्वासन के दिनों को याद किया.
उन्होंने कहा कि साल 1959 में दलाई लामा अपने 80 हजार अनुयायियों के साथ तिब्बत की संस्कृति और जीवन शैली को बचाने के लिए हिमालय को पार कर भारत आए थे.
मैककॉल ने कहा, "दशकों के बाद चीनी कन्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) तिब्बती लोगों की स्वतंत्रता को ख़तरे में डाल रही है. उन्होंने दलाई लामा के उत्तराधिकार के मामले में शामिल होने की कोशिशें भी की हैं. हम ऐसा नहीं होने देंगे."
उन्होंने दलाई लामा के साथ एक घंटे तक बातचीत की. मैककॉल ने तिब्बत के लोगों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए उनके अहिसंक तरीकों की सराहना भी की.
चीन ने क्या कहा?

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मुलाक़ात से पहले चीन ने नाराज़गी जताते हुए चेतावनी वाले अंदाज़ में कहा कि अगर अमेरिका तिब्बत को चीन का हिस्सा ना मानते हुए , अपनी प्रतिबद्धता का सम्मान नहीं करेगा तो चीन इस पर ‘कड़े क़दम उठाएगा.’
चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन चियान ने कहा, "ये सभी जानते हैं कि 14वें दलाई लामा कोई विशुद्ध धार्मिक व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि धर्म की आड़ में चीन विरोधी अलगाववादी गतिविधियों में लिप्त एक निर्वासित राजनीतिक व्यक्ति हैं.''
लिन ने ख़ास तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से कांग्रेस में पारित चीन-तिब्बत विवाद को सुलझाने की वकालत करने वाले एक्ट का समर्थन ना करने की अपील की है.
लिन ने कहा, "अमेरिका को इस एक्ट पर हस्ताक्षर करके इसे क़ानून नहीं बनाना चाहिए."
उन्होंने कहा, "चीन अपनी संप्रभुता, सुरक्षा और विकास के हितों की दृढ़ता से रक्षा करने के लिए कड़े क़दम उठाएगा"
भारत स्थित चीनी दूतावास ने भी इस पर लंबा बयान जारी करते हुए कहा, “हम अमेरिकी पक्ष से अपील करते हैं कि वह दलाई लामा समूह की चीन विरोधी अलगाववादी प्रकृति को पूरी तरह पहचाने, शिज़ांग (तिब्बत के लिए चीन की ओर से इस्तेमाल किया जाने वाला नाम) से जुड़े मुद्दों पर अमेरिका की चीन से की गई प्रतिबद्धताओं का सम्मान करे और दुनिया को ग़लत संकेत भेजना बंद करे.”
तिब्बत को लेकर अमेरिकी संसद में बिल

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हाउस ऑफ़ रिप्रेजेंटेटिव ने बीते दिनों ‘तिब्बत-चीन विवाद के समाधान को बढ़ावा देने वाले’ एक्ट को 391-26 से पारित किया था. इसे अमेरिकी सीनेट ने पहले ही पारित कर दिया था.
बिल के अनुसार अमेरिका तिब्बत के इतिहास, लोगों और संस्थाओं के बारे में चीन की ओर से फैलाई जा रही 'ग़लत सूचना' से निपटने के लिए फंड मुहैया कराएगा.
इस बिल में चीन के उस नैरेटिव को काउंटर किया जाएगा, जिसमें वो तिब्बत पर अपना दावा करता है.
बिल के ज़रिए कोशिश है कि चीन पर दबाव बनाया जाए कि वह तिब्बती नेताओं के साथ बात करे जो साल 2010 से रुकी हुई है, ताकि तिब्बत पर समझौता हो सके.
इसके साथ ही चीन तिब्बती लोगों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई पहचान की चिंताओं को संबोधित करे.
दलाई लामा पर भारत का रुख़

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साल 1959 में दलाई लामा को तिब्बत से भागकर भारत में शरण लेनी पड़ी थी. 31 मार्च 1959 को तिब्बत के इस धर्मगुरु ने भारत में क़दम रखा था.
17 मार्च को वो तिब्बत की राजधानी ल्हासा से पैदल ही निकले थे और हिमालय के पहाड़ों को पार करते हुए 15 दिनों बाद भारतीय सीमा में दाखिल हुए थे.
यात्रा के दौरान उनकी और उनके सहयोगियों की कोई ख़बर नहीं आने पर कई लोग ये आशंका जताने लगे थे कि उनकी मौत हो गई होगी.
भारत पहुँच कर उन्होंने एक निर्वासित सरकार का गठन किया.
भारत का रुख़ तिब्बत को लेकर बदलता रहा है. साल 2003 के जून महीने में भारत ने ये आधिकारिक रूप से मान लिया था कि तिब्बत चीन का हिस्सा है.
चीन के उस समय के राष्ट्रपति जियांग जेमिन के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की मुलाक़ात के बाद भारत ने पहली बार तिब्बत को चीन का अंग माना था. हालांकि तब ये कहा गया था कि ये मान्यता परोक्ष ही है.
भारतीय अधिकारियों ने उस वक्त ये कहा था कि भारत ने पूरे तिब्बत को मान्यता नहीं दी है जो कि चीन का एक बड़ा हिस्सा है. बल्कि भारत ने उस हिस्से को ही मान्यता दी है जिसे स्वायत्त तिब्बत क्षेत्र माना जाता है.
1989 में दलाई लामा को शांति का नोबेल सम्मान मिला. दलाई लामा का कहना है कि वह चीन से आज़ादी नहीं चाहते हैं, लेकिन स्वायतता चाहते हैं.
चीन तिब्बत को अपना भू-भाग मानता रहा है लेकिन तिब्बत ख़ुद को चीन के अधीन नहीं मानता और अपनी आज़ादी की बात करता रहा है.
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