ग़ज़ा और यूक्रेन में जंग के बीच क्यों हो रही है संयुक्त राष्ट्र की आलोचना

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- Author, सेलिन गिरीट
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
ग़ज़ा संघर्ष की शुरुआत से ही संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुटेरेस मानवीय आधार पर संघर्ष विराम का लगातार आह्वान कर रहे हैं.
पिछले हफ़्ते उन्होंने फिर से अपील की और चेतावनी दी कि युद्ध में लगे सभी पक्ष अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन कर रहे हैं.
उन्होंने कहा कि वो “ऐसी प्रक्रिया देखना चाहते हैं कि द्वि-राष्ट्र समाधान के आधार पर इसराइलियों और फ़लस्तीनियों के बीच एक स्थाई शांति क़ायम हो.”
पिछले महीने उन्होंने पहली बार संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 99 का इस्तेमाल किया, जो संयुक्त राष्ट्र प्रमुख को अधिकार देता है कि वो ऐसे किसी मुद्दे को सुरक्षा परिषद के संज्ञान में लाएं जो उनकी नज़र में अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए ख़तरा हो.
अभी तक इसराइल ने संघर्ष विराम को ख़ारिज़ ही किया है. उसका कहना है कि हमास के ख़ात्मे तक वो अपना हमलावर रुख़ जारी रखेगा और पीएम बेन्यामिन नेतन्याहू ने फ़लस्तीनी राष्ट्र के गठन के विचार को नकार दिया है.
हमास प्रशासित स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, सात अक्टूबर के हमले के बाद हमास के सफ़ाए के लिए चलाए जा रहे इसराइली सैन्य अभियान में अबतक कम से कम 25,000 लोग मारे जा चुके हैं.
जबसे ग़ज़ा युद्ध शुरू हुआ है, संघर्ष विराम पर सुरक्षा परिषद सहमत नहीं हो सका है.
दिसम्बर में इसने ग़ज़ा पट्टी में और अधिक सहायता सामग्री पहुंचाने के प्रस्ताव को स्वीकार किया था, लेकिन संघर्ष विराम पर कोई सहमति नहीं बनी. पहले के दो प्रस्तावों को इसराइल के कट्टर समर्थक अमेरिका ने वीटो कर दिया था.
हालांकि संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने दो बार संघर्ष विराम के पक्ष में बहुमत के साथ वोट किया. पिछले प्रस्ताव का 193 में से 153 सदस्य देशों ने समर्थन किया था. बावजूद संघर्ष विराम को लेकर कोई बात नहीं बनी. आम सभा के फैसले बाध्य नहीं हैं.
‘संयुक्त राष्ट्र कोमा में है’

लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस में प्रोफ़सर फ़वाज़ गेर्ज़ेस का कहना है कि दो साल पहले रूस का यूक्रेन पर हमला और अभी ग़ज़ा युद्ध ने दिखाया है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ‘पंगु और निष्कृय’ है और संयुक्त राष्ट्र आम सभा ‘कार्यकारी एजेंसी की बजाय प्रतीकात्मक संस्था अधिक है.’
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गतिरोध को वो विश्व महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता का नतीजा मानते हैं जो चीन और रूस को अमेरिका और यूरोप के ख़िलाफ़ खड़ा करता है.
वो कहते हैं, “संयुक्त राष्ट्र और इसकी तमाम एजेंसियां कोमा में हैं. यह शीत युद्ध से भी बुरा समय है.”
सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य हैं, जिसमें पांच स्थाई सदस्य यानी पी5 हैं और 10 बारी बारी से सदस्य बनते हैं. ये पांच स्थाई सदस्य देश हैं अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, रूस और चीन. इनके पास वीटो पॉवर है और ये अन्य सदस्यों की सहमति के बावजूद किसी प्रस्ताव को रोक सकते हैं.
ग़ज़ा संघर्ष विराम के दो प्रस्तावों पर अमेरिका ने और यूक्रेन पर प्रस्ताव को रूस ने वीटो किया.
ह्यूमन राइट्स वॉच के लुईस शैरबोन्यू का कहना है, “संयुक्त राष्ट्र में दोहरे मापदंड सबसे बड़ी समस्या है.”
उनके मुताबिक़, “अंतरराष्ट्रीय क़ानून के प्रति प्रतिबद्ध होने का अमेरिका दावा आम तौर पर तब पूरी तरह खोखला होता है जब वो रूस के लिए लागू किए जाने की बात करते हैं लेकिन इसराइल पर इसे लागू नहीं करते.”
“यह सिर्फ अमेरिका के साथ नहीं है. रूस जब यूक्रेन में अत्याचार करता है और ग़ज़ा में नागरिकों को बचाने की बात करता है तो उसे सुनना मुश्किल हो जाता है.”
गुज़रे ज़माने की संस्था

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कार्नेगी यूरोप थिंक टैंक में सीनियर फ़ेलो सिनान उल्गेन का कहना है कि ऐसा लगता है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद गुज़रे ज़माने का ढांचा है.
वे कहते हैं, "80 साल पहले द्वितीय विश्व युद्ध के समय ये पांचों देश विजेता थे और उनके पास वीटो का अधिकार है, जबकि किसी अन्य देश के पास ये अधिकार नहीं है.”
“उदाहरण के लिए अफ़्रीका इन पी5 में नहीं है. दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश भारत नहीं है. लातिन अमेरिका का कोई प्रतिनिधित्व नही है. इसी तरह मुस्लिम आबादी वाला कोई देश पी5 में नहीं है.”
“यह मौजूदा वैश्विक व्यवस्था की ज़रूरत का जवाब नहीं देता है.”
इस संस्था को आधुनिक बनाने के लिए उल्गेन कुछ सुझाव देते हैः-
- यूरोपीय संघ को एक सीट दी जा सकती है.
- पी5 के वीटो अधिकार पर कुछ शर्तें रखी जा सकती हैं.
- आम सभा को सुपर मेजॉरिटी वोटिंग जैसे अधिकार दिए जा सकते हैं जिससे एक अकेले स्थाई सदस्य के वीटो पॉवर को काबू किया जा सके.
वो कहते हैं कि हालांकि सुरक्षा परिषद इससे अधिक समावेशी और ज़्यादा प्रतिनिधित्व वाला हो जाएगा लेकिन एक अकेले देश द्वारा सुरक्षा परिषद को ‘बंधक बनाए जाने’ की चुनौती फिर भी बनी रहेगी जैसा ग़ज़ा युद्ध के मामले में देखने को मिला.
सुरक्षा परिषद में सुधार के किसी प्रस्ताव पर दो तिहाई सदस्यों और सभी पी5 देशों की मंज़ूरी ज़रूरी होगी.
मानवीय सहायता पहुंचाने वाली एजेंसी

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इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के रिचर्ड गोवन का तर्क है कि ग़ज़ा युद्ध से पहले ही संयुक्त राष्ट्र चुनौतियों से जूझ रहा था.
वो कहते हैं कि पिछले साल ही सुरक्षा परिषद सूडना में युद्ध, नाइजर में तख़्तापलट और यूक्रेन पर रूस और पश्चिम में आरोपों प्रत्यारोपों पर स्टैंड लेने को लेकर जूझ रहा था.
इन कमियों के बावजूद वो मानते हैं कि सुरक्षा परिषद की उन जगहों पर बहुत अहमियत है जहां अमेरिका, चीन और रूस एक तरफ़ आ जाएं जैसे कि अफ़ग़ानिस्तान के मामले में.
वो कहते हैं, “जब अमेरिका ने काबुल छोड़ा और पश्चिम ताक़तें अफ़ग़ानिस्तान से बाहर गईं, संयुक्त राष्ट्र वहां बना रहा और संयुक्त राष्ट्र एजेंसियां स्कूल चलाती रहीं और लाखों लोगों को इमरजेंसी सहायता पहुंचाती रहीं.”
“अगर संयुक्त राष्ट्र नहीं होता और तालिबान से बातचीत नहीं होती तो पूरा देश भयंकर आकाल का शिकार हो जाता. इसी तरह ग़ज़ा में, सीरिया में और अन्य कई जगहों पर संयुक्त राष्ट्र की सहायता एजेंसिया लोगों तक खाना और दवाएं पहुंचा रही हैं.”
संयुक्त राष्ट्र के तंत्र में तमाम फ़ंड, कार्यक्रम और विशेष एजेंसियां हैं जिनमें हरेक का अलग क्षेत्र, प्रमुख और बजट है.
इसमें रेफ़्यूज़ी मामलों के संयुक्त राष्ट्र हाई कमिश्नर (यूएनएचसीआर), वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़), यूनाइटेड नेशंस डेवलपमेंट प्रोग्राम, विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और अन्य संस्थाएं शामिल हैं. ये सभी टिकाऊ विकास, आर्थिक विकास, व्यापार, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, शांति निर्माण, पुनर्गठन और मानवीय सहायता जैसे मामलों को देखती हैं.

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लुईस शैरबोन्यू के अनुसार, “अक्सर हमारा ध्यान सिर्फ सुरक्षा परिषद पर होता है लेकिन हम भूल जाते हैं कि संयुक्त राष्ट्र में कितने लोग काम करते हैं और अपनी ज़िंदगी को दांव पर लगाते हैं.”
ग़ज़ा युद्ध में ही मानवीय सहायता पहुंचाने वाले संयुक्त राष्ट्र के 100 कर्मचारियों की मौत हुई जोकि इस संस्था के 78 सालों के इतिहास में सर्वाधिक है.
संयुक्त राष्ट्र के सिस्टम में जांच कराए जाने की व्यवस्था है, गंभीर अपराधों की जवाबदेही तय करने के लिए अन्य राज्यों पर प्रतिबंध लगाने का तंत्र है, शांति अभियान भेजा जा सकता है और संघर्ष के बाद मानवाधिकार उल्लंघन की निगरानी की जा सकती है.
लेकिन वो कहते है, “संयुक्त राष्ट्र आखिरकार 193 देशों की सदस्यता वाला संगठन है. ये उतना ही अच्छा है जितना इसमें शामिल देश.”
“चाहे रूस सीरिया को या यूक्रेन में अपने अत्याचारों को ढंकता है या अमेरिका इसराइल को दबाव से बचाता हो या चीन उत्तर कोरिया को बचाता हो या उइगुरों के ख़िलाफ़ अपने दमन की आलोचना को दबाता हो.”
“आपके पास बिल्कुल दुरुस्थ संस्था और दुरुस्त चार्टर हो सकता है लेकिन क्या होगा अगर इसके सदस्य देश ही इसे न मानें.”
अभी लंबा संघर्ष बाकी है...

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सितम्बर में संयुक्त राष्ट्र समिट ऑफ़ द फ़्यूचर का आयोजन करेगा और उसे उम्मीद है कि वैश्विक शासन और भरोसे के पुनर्निर्माण पर विचार करने का यह एक मौका होगा.
रिचर्ड गोवन का सोचना है कि हालांकि संभावित सुधारों पर बात के लिए यह सबसे उत्तम प्लेटफ़ॉर्म हो सकता है लेकिन संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों को इस बात ज़रूर इल्म होगा कि यह सम्मेलन अमेरिकी चुनावों से दो महीने पहले हो रहा है.
वो कहते हैं, “संयुक्त राष्ट्र में सुधार पर वास्तव में कोई ठोस बातचीत के लिए राजनयिकों को राज़ी करना मुश्किल होगा, जब वे इस बात पर मनन कर रहे हों कि 2025 में हो सकता है कि ट्रम्प प्रशासन हो.”
प्रोफ़ेसर गेर्जेस का माना है कि संयुक्त राष्ट्र में ऐसे किसी भी ढांचागत सुधार को अमेरिका स्वीकार करेगा, जो सुरक्षा परिषद में उसकी स्थिति को कमज़ोर करे, इसकी उम्मीद करना अवास्तविक होगा.
ये मानते हुए कि दुनिया को संयुक्त राष्ट्र की अभी भी ज़रूरत है, वो कहते हैं, “यह एक लंबा संघर्ष है. हमारा आशय एक दशक नहीं बल्कि दशकों से है. अगर संयुक्त राष्ट्र का वजूद नहीं रहता है तो इसका नतीजा अराजकता होगी. तब वास्तव में जंगल का राज होगा.”
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