उतार-चढ़ाव भरे जलवायु सम्मेलन में हुआ समझौता जिसने बढ़ाई विकासशील देशों की चिंता

सीओपी28

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    • Author, एंजेला हेंशाल
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़, लंदन

दुनिया के लगभग 200 देश एक ऐसे ऐतिहासिक समझौते पर पहुंच गए हैं, जिसके तहत ईंधन के लिए कोयले, तेल और गैस के इस्तेमाल को धीरे-धीरे ख़त्म किया जाएगा.

लेकिन कुछ विकासशील देश इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इस समझौते की बारीक़ शर्तें कमज़ोर हैं और इस समझौते को लागू करने के लिए करना क्या है ये भी स्पष्ट नहीं है.

इस साल दुबई में जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखकर आयोजित हुए सीओपी28 का एक ही प्रमुख मक़सद था कि दुनिया को उसी रास्ते पर वापस लाया जाए जिससे ग्लोबल वॉर्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जा सके.

लेकिन, जब परिचर्चाएं ख़त्म हुईं और लोगों का ग़ुस्सा बढ़ने लगा, तो ऐसा लगा कि ये योजना खटाई में पड़ गई है.

आख़िरी मौक़े तक ये शिखर सम्मेलन बहुत हद तक इस सवाल तक सिमट कर रह गया था कि अंत में समझौता होगा या नहीं. सम्मेलन के दौरान कोई समझौता होने के लिए ये बेहद ज़रूरी था कि इसमें शामिल सभी 198 देश या तो किसी बयान पर सहमत हों या फिर ख़ाली हाथ लौट जाएं.

समझौते का जो शुरुआती प्रस्ताव तैयार हुआ उससे बहुत से देशों को सदमा लगा तो कई देशों का ग़ुस्सा भड़क उठा. क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि समझौते में जीवाश्म ईंधन जलाने को ‘धीरे धीरे ख़त्म किए जाने’ की बात शामिल की जाएगी.

इसके बजाय सम्मेलन के आख़िरी मौक़े तक जो बातचीत चलती रही, उसका नतीजा इस मुद्दे पर एक खोखले बयान के तौर पर सामने आया. इसमें कहा गया कि ‘जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल में बदलाव की दिशा में आगे बढ़ना’ है.

वीडियो कैप्शन, दुबई में हुए क्लाइमेट समिट में जीवाश्म ईंधन से दूर जाने पर बनी सहमति.

ख़बरों के मुताबिक़ तेल निर्यातक देशों के संगठन (OPEC) में शामिल सदस्य उन देशों की टोली में शामिल थे, जो जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल पूरी तरह ख़त्म करने को लेकर वैश्विक समझौते का सबसे ज़्यादा विरोध कर रही थी.

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इसके बजाय, संयुक्त अरब अमीरात जैसे तेल उत्पादक देश, इस सम्मेलन के दौरान कार्बन जमा करने की तकनीकों पर अधिक ज़ोर देने की वकालत कर रहे थे.

आख़िरी लम्हों में हुए समझौते के बावजूद, बोलीविया और समोआ जैसे देशों ने चिंता जताई है कि इस समझौते में विकसित देशों के ऊपर ये ज़िम्मेदारी नहीं डाली गई है कि वो जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल ख़त्म करने के मामले में दुनिया की अगुवाई करें.

इन विकासशील देशों का कहना है कि सारे देशों पर एक साथ ये क़दम उठाने का बोझ डालना नाइंसाफ़ी है. क्योंकि, विकसित देश तो पहले ही तेल, गैस और कोयले के इस्तेमाल से आर्थिक तौर पर बहुत फ़ायदा उठा चुके हैं.

और, सबसे अहम बात तो ये है कि ये बदलाव लाने के लिए जो रक़म दी जानी है, उसे भी बहुत घटा दिया गया है.

समझौते में बस यही उल्लेख किया गया है कि, जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल कम करने और जलवायु परिवर्तन से निपटने की तैयारी करने के लिए ग़रीब देशों को अधिक पूंजी की ‘ज़रूरत’ है.

ऑक्सफैम इंटरनेशनल के जलवायु परिवर्तन नीति की प्रमुख नफ्कोटे डाबी ने बिना लाग लपेट के कहा कि दुबई सम्मेलन का जो नतीजा निकला है, वो ‘बेहद नाकाफ़ी’ है.

नफ्कोटे डाबी ने कहा कि, ‘जिन ऐतिहासिक और महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को हासिल करने का वादा हमसे किया गया था, दुबई का जलवायु सम्मेलन उस मंज़िल तक पहुंचने से बहुत दूर रह गया.’

नफ्कोटे डाबी ने कहा कि ‘दुबई का जलवायु सम्मेलन दोहरी निराशा वाला रहा, क्योंकि, एक तो इसमें जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए नवीनीकरण योग्य ऊर्जा अपनाने के लिए विकासशील देशों को पैसे देने का कोई इंतज़ाम नही किया गया.’

‘दूसरे, जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को सबसे ज़्यादा झेल रहे लोगों, जैसे कि, उत्तरी पूर्वी अफ्रीका की मदद करने के वादे से अमीर देश एक बार फिर मुकर गए. जबकि हाल के दिनों में इस इलाक़े के लोगों ने भयंकर बाढ़ में अपना सब कुछ गंवा दिया था. उससे पहले वो लगातार पांच साल तक ऐतिहासिक सूखे और भुखमरी के शिकार रहे थे.’

चैथम हाउस में रिसर्च फेलो रूथ टाउनेंड ने कहा कि विकासशील देशों से कहा जा रहा है कि वो ‘विकास के लिए एकदम नए रास्ते पर चलें’, तो ज़ाहिर है कि विकासशील देश ये जानना चाहते थे कि इस नए रास्ते पर चलने के लिए उनके पास पैसे कहां से आएंगे.

लेकिन, इन तमाम आशंकाओं के बावजूद, दुबई का जलवायु सम्मेलन, दुनिया भर के क़रीब एक लाख प्रतिनिधियों, वार्ताकारों, लॉबी करने वालों, शाही परिवारों के सदस्यों और वकीलों को जलवायु के मसलों पर चर्चा करने के लिए एक मंच पर इकट्ठा कर पाने में सफल रहा, ताकि वो भविष्य की योजना तैयार कर सकें और जलवायु परिवर्तन से जुड़े आविष्कारों से मिले सबक़ को सबके सामने पेश कर सकें.

दुबई के जलवायु सम्मेलन (COP28) में हुए वाद-विवाद और परिचर्चाओं से ये पांच बड़े नतीजे निकले:

नवीनीकरण योग्य ऊर्जा

प्रदर्शनकारी

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मसौदे में जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल धीरे धीरे ख़त्म करने को लेकर क्या लिखा जाए, इसको लेकर सम्मेलन में तीखी तकरार हुई.

सौ से ज़्यादा देश 2030 तक दुनिया की नवीनीकरण योग्य ऊर्जा को बढ़ाकर तीन गुना करने पर सहमत हो गए.

प्रेरणा हासिल करने के लिए ये राष्ट्र, उरुग्वे जैसे देश से सीख सकते हैं, जो अपनी ज़रूरत की 98 फ़ीसद ऊर्जा रिन्यूएबल स्रोतों से बना रहा है.

जलवायु शिखर सम्मेलन से पहले अमेरिका और चीन ने नवीनीकरण योग्य ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने और कार्बन कैप्चर की परियोजनाओं में तेज़ी लाने पर मिलकर काम करने के लिए, आपस में एक समझौता किया.

दोनों देश, अपनी अगली राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं में सभी ग्रीनहाउस गैसों को शामिल करने जा रहे हैं. ये योजना 2025 में आने की संभावना है.

इस बीच, 50 तेल और गैस कंपनियां मीथेन का उत्सर्जन कम करने और तेल निकालने के दौरान गैस जलाने का काम बंद करने पर राज़ी हो गईं.

मीथेन, सबसे ख़तरनाक ग्रीनहाउस गैसों में से एक है और दुनिया में मानवीय गतिविधियों से धरती का तापमान बढ़ने में उसका एक तिहाई योगदान रहता है.

हालांकि, अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने इस सम्मेलन में निजी तौर पर शामिल नहीं होने का फ़ैसला किया. लेकिन उनके जलवायु प्रतिनिधि जॉन केरी ने मीथेन गैस का उत्सर्जन कम करने का वादा किया.

स्वास्थ्य

भारत की 12 साल की पर्यावरण कार्यकर्ता लिकप्रिया कंगुजम

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इमेज कैप्शन, भारत की 12 साल की पर्यावरण कार्यकर्ता लिकप्रिया कंगुजम

भारत की 12 साल की पर्यावरण कार्यकर्ता लिकप्रिया कंगुजम ने सोमवार को दुबई के जलवायु सम्मेलन के मंच पर तहलका मचा दिया.

इस साल जलवायु सम्मेलन में पहली बार स्वास्थ्य दिवस मनाया गया. दुनिया भर के दानदाताओं ने गर्म देशों में होने वाली उपेक्षित बीमारियों से मुक़ाबला करने के लिए 70 करोड़ डॉलर की मदद देने का वादा किया.

ये ऐसा प्रस्ताव है जिससे अफ़्रीका के तमाम देशों को फ़ायदा होगा. इस मदद का एक हिस्सा 2030 तक अफ़्रीका में होने वाली उन बीमारियों को जड़ से मिटाने में इस्तेमाल किया जाएगा, जिनकी अब तक अनदेखी होती रही है. जैसे कि लिम्फैटिक फिलारियासिस और ओंकोसरसियासिस, जिसे रिवर ब्लाइंडनेस के नाम से भी जाना जाता है.

रिवल ब्लाइंडनेस, आंखों और त्वचा में होने वाली ऐसी बीमारी है, जो परजीवी कीड़े से होती है, ये कीड़ा संक्रमित मक्खियों के बार-बार काटने से इंसानों तक पहुंच जाता है.

गेट्स फाउंडेशन के मुताबिक़ ये बीमारी, सहारा क्षेत्र के देशों में अंधेपन की बीमारी की सबसे बड़ी वजह है. इस बीमारी को आइवरमेक्टिन नाम की दवा से ठीक किया जा सकता है.

साल 2023 में नाइजर अफ्रीका का पहला देश बन गया था, जिसने अपने यहां रिवर ब्लाइंडनेस की बीमारी का पूरी तरह से ख़ात्मा कर डाला है.

सेनेगल ये उपलब्धि हासिल करने वाला दूसरा देश बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. उम्मीद की जा रही है कि जल्दी ही तंज़ानिया, इस बीमारी को जड़ से मिटा देने वाला तीसरा देश बन जाएगा.

नुक़सान और क्षतिपूर्ति का फंड

लॉस एंड डैमेज़

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लॉस एंड डैमेज फंड का मक़सद उन देशों को वित्तीय मदद देना है, जो जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभावों के सबसे ज़्यादा शिकार हो रहे हैं.

शर्म अल-शेख़ में हुए 27वें जलवायु सम्मेलन (COP27) में नेता आख़िरी मौक़े पर इस बात पर सहमत हुए थे कि ख़ास तौर से विकासशील देशों की मदद के लिए नुक़सान और भरपाई के ऐसे फंड का इंतज़ाम किया जाए, जिससे ये देश जलवायु परिवर्तन की वजह से बाढ़, जंगल की आग और सूखे जैसी भारी तबाही वाली घटनाओं से निपट सकें.

दुबई के जलवायु सम्मेलन के पहले ही दिन नुक़सान और क्षतिपूर्ति के फंड के लिए 70 करोड़ डॉलर का फंड बनाने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी गई.

मगर, इन वादों के बावजूद विश्लेषकों का कहना है कि विकासशील देशों को जितनी रक़म की ज़रूरत है, उसकी तुलना में ये फंड बेहद कम है.

इस समय पूर्वी अफ्रीका के ऐसे कई देश हैं, जिनको फ़ौरी तौर पर मदद की दरकार है. हाल ही में आई भयंकर और अभूतपूर्व बाढ़ की वजह से इन देशों के बड़े इलाक़े डूब गए थे. सोमालिया का कहना है कि अकेले उसको ही इस दशक में पांच अरब डॉलर की वित्तीय सहायता की ज़रूरत होगी.

प्रकृति

इस सम्मेलन में शामिल हुए लोग

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दुबई के सम्मेलन में पहुंचे प्रतिनिधियों ने इस बात से इनकार नहीं किया कि वो जलवायु सम्मेलन के मंच का इस्तेमाल कारोबारी बातचीत के लिए करते हैं.

एक बेहतर ख़बर के तौर पर दुबई के सम्मेलन में कॉन्गो बेसिन की गहराई से वैज्ञानिक पड़ताल की रिपोर्ट तैयार करने को मंज़ूरी दी गई. कॉन्गो बेसिन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा वर्षा वन कहा जाता है.

इस रिपोर्ट को शिखर सम्मेलन की वार्ताओं से अलग मंज़ूरी दी गई. ये रिपोर्ट उसी रास्ते को अख़्तियार करके तैयार की जाएगी, जैसा रास्ता 2021 में अमेज़न पर वैज्ञानिक पैनल ने अपनाया था. जिसके बाद, वर्षा वनों पर वैज्ञानिक आम सहमति जताने वाली 1300 पन्नों की रिपोर्ट तैयार की गई थी.

प्रकृति और कॉन्गो बेसिन की पारिस्थितिकी की गहराई से होने वाली इस पड़ताल में इस बात का भी पता लगाया जाएगा कि इलाक़े की जलवायु को वर्षा वन किस तरह से नियमित करते हैं और इंसानों ने इसके इकोसिस्टम पर किस तरह से असर डाला है.

विवाद

विरोध करने वाले लोग

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जलवायु सम्मेलन के मेज़बान के तौर पर संयुक्त अरब अमीरात का चुनाव एक विवादित मसला था.

शिखर सम्मेलन से पहले बीबीसी की एक पड़ताल में पता चला था कि मेज़बान संयुक्त अरब अमीरात ने इस सम्मेलन का इस्तेमाल तेल और गैस के सौदे करने की योजना बनाई थी

लीक हुए दस्तावेज़ों ने दिखाया कि संयुक्त अरब अमीरात ने 15 देशों के साथ जीवाश्म ईंधन के सौदे पर चर्चा की तैयारी कर रखी थी.

इसकी प्रतिक्रिया के तौर पर, सम्मेलन के लिए ज़िम्मेदार संयुक्त राष्ट्र की संस्था ने कहा कि वो ये अपेक्षा करते हैं कि सम्मेलन के मेज़बान बिना किसी पूर्वाग्रह या निजी हित को बढ़ावा दिए बग़ैर ये आयोजन करेंगे.

संयुक्त अरब अमीरात की टीम ने इस बात से इनकार नहीं किया कि वो इस सम्मेलन की बैठकों में कारोबार की बात करेंगे, और उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि ‘निजी बैठकें निजी ही होती हैं’.

इन बैठकों में किन मुद्दों पर चर्चा हुई, इसकी जानकारी देने से इनकार करते हुए, संयुक्त अरब अमीरात ने कहा कि उसका ज़ोर ‘जलवायु बचाने के लिए अर्थपूर्ण क़दम उठाने’ पर था.

इसी बीच दुबई जलवायु सम्मेलन के अध्यक्ष और संयुक्त अरब अमीरात की तेल कंपनी के अधिकारी सुल्तान अल-जबर, जलवायु कार्यकर्ताओं के लिए नफ़रत का बायस बन गए जब शिखर सम्मेलन के पहले एक कार्यक्रम में उनकी ज़ुबान से ये निकल गया कि उन्हें इस बात का भरोसा नहीं है कि नेट ज़ीरो का लक्ष्य हासिल करना मुमकिन है.

जो एक देश नुक़सान और क्षतिपूर्ति के फंड से सबसे ज़्यादा लाभ उठाने की उम्मीद लगाए हुए था वो नाइजीरिया था, जिसको इस सम्मेलन में शामिल होने के लिए 1411 प्रतिनिधियों के बैज दिए गए थे.

इतने ही लोग चीन से भी शामिल हुए. नाइजीरिया के विपक्षी दल ने दावा किया कि उनके देश के समूह में प्रतिनिधियों की ‘पत्नियां, गर्लफ्रेंड और उनके साथ रहने वाले लोग’ भी शामिल थे.

एक विशाल प्रतिनिधिमंडल भेजने के फ़ैसले की योजना को सोशल मीडिया पर ‘करदाताओं के पैसे की बर्बादी’ के तौर पर प्रचारित किया गया.

इस साल की बैठक में ब्राज़ील ने एक दोस्त बनाया, तो एक गंवाया भी. ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनाशियो लुला डा सिल्वा ने एक ज़बरदस्त जज़्बाती तक़रीर की और कहा कि असमानता से निपटने बग़ैर जलवायु के संकट से निपट पाना मुमकिन नहीं है.

हालांकि, इसके साथ ही साथ ब्राज़ील ने ये एलान भी किया कि वो दुनिया में तेल उत्पादक देशों के सबसे बड़े संगठन ओपेक में शामिल होगा.

इसकी तुलना में कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो की इस बात के लिए तारीफ़ की गई कि वो जीवाश्म ईंधन को ख़त्म करने का समझौता करने के लिए बने एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन में शामिल हो रहे हैं.

गुस्तावो पेट्रो ने जब ये कहा कि टिकाऊ विकास के लिए देशों को ऐसे रास्ते पर चलना होगा जिसमें कोयले और गैस पर निर्भरता न हो, तो इस बात के लिए भी उनकी सराहना की गई.

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