रूस की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अध्यक्षता को लेकर क्या हैं चिंताएं?

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रूस और यूक्रेन के बीच एक साल से ज़्यादा वक़्त से चल रहा युद्ध अभी भी थमता नहीं दिख रहा है. ऐसे समय में रूस को फिर एक बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता मिली है.
इस पर सवाल तो उठ ही रहे हैं साथ ही ये आशंकाएं भी जताई जा रही हैं कि रूस इस मौक़े का इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में ज़मीनी स्तर पर फ़ायदा उठाने और अपने पक्ष को वैश्विक मंच पर और ज़्यादा मज़बूती से रखने के लिए कर सकता है.
पिछले शनिवार एक अप्रैल को रूस ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता संभाली. ये अध्यक्षता सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों को एक महीने के लिए बारी-बारी से मिलती है.
रूस को आख़िरी बार ये अध्यक्षता पिछले साल फ़रवरी के महीने में मिली थी और ये वही वक़्त था जब उसने यूक्रेन पर हमला कर दिया था.
सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष की भूमिका को ज़्यादातर प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है लेकिन संयुक्त राष्ट्र में रूस के राजदूत वैसिली नेबेन्ज़िया ने रूस की सरकारी न्यूज़ एजेंसी 'तास' को बताया कि उन्होंने कई मुद्दों पर बहस कराने की योजना बनाई है जिसमें हथियार नियंत्रण का मुद्दा भी शामिल है.
साथ ही उन्होंने कहा कि उनका देश एक ऐसी नई विश्व व्यवस्था पर चर्चा करवाएगा जो मौजूदा 'एकध्रुवीय' व्यवस्था को बदलने जा रही है.
यूक्रेन के विदेश मंत्री दमित्रो कुलेबा ने रूस की सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता को 'अप्रैल फ़ूल' दिवस पर अब तक का सबसे बुरा मज़ाक़ बताते हुए कहा कि रूस की अध्यक्षता ये याद दिलाती है कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा संरचना के काम करने के तरीक़े में कुछ ग़लत है.
साथ ही उन्होंने इस घटनाक्रम को 'अंतरराष्ट्रीय समुदाय के चेहरे पर एक तमाचा बताया.'
यूक्रेन ने की कड़ी आलोचना
यूक्रेन के राष्ट्रपति के सलाहकार मिख़ाइलो पोडोल्याक का कहना है कि यह क़दम "अंतरराष्ट्रीय क़ानून का एक और बलात्कार है".
रूस के सन्दर्भ में उन्होंने कहा है कि एक इकाई जो एक आक्रामक युद्ध छेड़ती है, मानवीय और आपराधिक क़ानून के मानदंडों का उल्लंघन करती है.
संयुक्त राष्ट्र चार्टर को नष्ट करती है और परमाणु सुरक्षा की उपेक्षा करती है वो विश्व की प्रमुख सुरक्षा संस्था का नेतृत्व नहीं कर सकती है.
रूस के सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता हासिल करने से एक ऐसी स्थिति पैदा हो गई है जिसमें सुरक्षा परिषद का नेतृत्व एक ऐसा देश कर रहा है जिसके राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ कथित युद्ध अपराधों के लिए अंतरराष्ट्रीय गिरफ़्तारी वारंट जारी किया जा चुका है.
पिछले महीने इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के ख़िलाफ़ वारंट जारी किया था. याद रहे कि इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट संयुक्त राष्ट्र की संस्था नहीं है.

रूस को कैसे मिल सकता है फ़ायदा?
रूस को सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता मिलने पर जो सबसे बड़ी चिंता जताई जा रही है वो ये है कि क्या रूस इसका इस्तेमाल यूक्रेन युद्ध में किसी क़िस्म का फ़ायदा हासिल करने के लिए कर सकता है.
पूर्व राजदूत अनिल त्रिगुणायत रूस में भारतीय मिशन के उप-प्रमुख के तौर पर काम कर चुके हैं. उनका मानना है कि सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता मिलने की वजह से रूस को यूक्रेन युद्ध में कोई अतिरिक्त फ़ायदा नहीं मिलेगा.
वे कहते हैं, "सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य किसी भी मसले को तब भी वीटो कर सकते हैं जब उनके पास अध्यक्षता न हो. तो अध्यक्षता मिलने से किसी सदस्य को कोई अतिरिक्त फ़ायदा नहीं है."
उनके मुताबिक़, सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष के तौर पर मिले एक महीने में "रूस अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाने की कोशिश करेगा".
वे कहते हैं, "सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता कर रहे देश को कई मुद्दों पर चर्चा करवाने का अवसर मिलता है. तो इसमें कोई शक नहीं कि रूस इस अध्यक्षता का इस्तेमाल अपने एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए करेगा. ''
''लेकिन यूक्रेन युद्ध के बारे में चल रहे द्वेष को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि रूस कुछ भी जल्दबाज़ी में प्रभावी ढंग से आगे बढ़ा पायेगा जब तक युद्धविराम नहीं होता."

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अनिल त्रिगुणायत कहते हैं कि रूस कुछ ख़ास मुद्दों पर चर्चा करवाने की कोशिश कर सकता है, लेकिन उसकी कोशिश होगी कि ऐसे मुद्दों को उठाया जाए जिन पर ज़्यादा सहमति बनने की उम्मीद हो.
वे कहते हैं, "अगर रूस कुछ भी विवादास्पद करने की कोशिश करता है तो अन्य स्थायी सदस्य देश उसे किसी भी वक़्त वीटो कर सकते हैं."
साथ ही उनका कहना है कि कोई भी देश अपनी अध्यक्षता के दौरान चर्चा के लिए बहुत सी चीज़ें ला सकता है. उनके अनुसार, "रूस ऐसे मुद्दे उठाने के बारे में सोचेगा जिनका दुनिया भर में एक व्यापक प्रभाव पड़ता है."
त्रिगुणायत कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की संरचना ही इस तरह से की गई है कि कोई भी देश अपना एजेंडा दूसरों पर नहीं थोप सकता.
वो कहते हैं, "अगर रूस यूक्रेन युद्ध में अपने हितों को आगे बढ़ाने के लिए कुछ करता हुआ दिखाई देता है, तो अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे अन्य स्थायी सदस्य इसे वीटो कर देंगे."

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'रूस को प्रचार करने का मौक़ा'
प्रोफ़ेसर हर्ष वी पंत नई दिल्ली स्थित ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के अध्ययन और विदेश नीति विभाग के उपाध्यक्ष हैं.
उनका कहना है कि सुरक्षा परिषद में तीन देश ऐसे हैं जो अपनी वीटो पॉवर का इस्तेमाल करके रूस को कोई ज़मीनी क़दम उठाने से रोक सकते हैं.
लेकिन इस बात के बावजूद रूस को मिली अध्यक्षता का महत्व कम नहीं होता.
पंत कहते हैं, "जब किसी देश के पास सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता होती है तो उसके पास मुद्दों पर चर्चा आयोजित करने की शक्तियां होती हैं और वो उस देश को अपनी प्राथमिकता के मुताबिक़ वैश्विक जनमत जुटाने में मदद करती हैं. मिसाल के तौर पर जब भारत के पास सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता थी तो एक ग़ैर-स्थायी सदस्य होते हुए भी समुद्री सुरक्षा और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर चर्चाओं का आयोजन किया गया था."
पंत कहते हैं कि रूस इस अध्यक्षता को किस तरह से इस्तेमाल करेगा ये तो समय ही बताएगा लेकिन ये ज़रूर है कि उसके पास एक मंच ज़रूर है जिस पर वो उन देशों को इकट्ठा कर सकता है जो यूक्रेन युद्ध को लेकर पश्चिमी देशों से सहमत नहीं हैं.
उनके मुताबिक़, संयुक्त राष्ट्र में यूक्रेन युद्ध को लेकर काफ़ी मतभेद हैं और बहुत से ऐसे देश हैं जो रूस का मौन समर्थन करते हैं.
वो कहते हैं, "रूस उनको अपना नैरेटिव बनाने के लिए एकजुट कर सकता है और इस बात को आगे बढ़ा सकता है कि यूक्रेन युद्ध पश्चिमी देशों या नेटो की ग़लती है. लेकिन ज़मीनी स्तर पर रूस कुछ कर पाए इसकी कोई सम्भावना नहीं है."

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रूस के आक्रामक तेवर
सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता मिलने से एक दिन पहले रूस ने कहा था कि वो इस भूमिका में अपने सभी अधिकारों को इस्तेमाल करने का इरादा रखता है.
वहीं अमेरिका ने रूस से आग्रह किया है कि वो इस भूमिका में ख़ुद को पेशेवर रूप से संचालित करे.
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की ने रूस के आक्रमण को रोकने के लिए पर्याप्त कार्रवाई करने में विफल रहने का आरोप लगाते हुए पिछले साल सुरक्षा परिषद में सुधार या "पूरी तरह से भंग" करने का आह्वान किया था. उन्होंने रूस की सदस्यता ख़त्म करने की मांग भी की है.
लेकिन अमेरिका का कहना है कि इस मामले में उसके हाथ बंधे हुए हैं क्यूंकि संयुक्त राष्ट्र का चार्टर किसी भी स्थायी सदस्य देश को हटाने की इजाज़त नहीं देता.
अमेरिका ने कहा है कि "दुर्भाग्य से रूस सुरक्षा परिषद का एक स्थायी सदस्य है और इस वास्तविकता को बदलने के लिए कोई व्यवहारिक अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी रास्ता मौजूद नहीं है."
साथ ही अमेरिका ने कहा है कि उसे आशंका है कि मॉस्को सुरक्षा परिषद में अपनी सीट का इस्तेमाल दुष्प्रचार करने के लिए जारी रखेगा और यूक्रेन में अपनी कार्रवाई को सही ठहराएगा.
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं जिनमें से पांच स्थायी और 10 ग़ैर-स्थायी सदस्य हैं.

सुरक्षा परिषद में किसी भी प्रस्ताव को पारित करने के लिए होने वाले मतदान में पक्ष में नौ वोट होने चाहिए और साथ ही ये भी सुनिश्चित होना चाहिए कि पांच स्थायी सदस्यों में से किसी ने भी प्रस्ताव के ख़िलाफ़ मतदान न किया हो.
पिछले साल फ़रवरी में रूस ने उस प्रस्ताव को वीटो कर दिया था जिसका मक़सद यूक्रेन पर रूसी आक्रमण को समाप्त करना था. इस प्रस्ताव पर मतदान के दौरान चीन, भारत और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश अनुपस्थित रहे थे.
इसके बाद रूस ने एक और प्रस्ताव को वीटो कर दिया था जिसमें यूक्रेन के चार क्षेत्रों को रूस के क़ब्ज़े से निकालकर वापस यूक्रेन को देने की बात कही गई थी. इस प्रस्ताव पर मतदान के दौरान ब्राज़ील, चीन, गैबॉन और भारत ने भाग नहीं लिया था.
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