चीन और रूस की अदावत और 'जिगरी दोस्ती' की कहानी

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- Author, पाउला रोजास
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़
जब माओत्से तुंग पहली बार सोवियत संघ के दौरे पर गए, तब जोसेफ़ स्टालिन ने उनसे मिलने पर सहमत होने से पहले उन्हें कई हफ़्ते मॉस्को के बाहरी इलाके के एक गेस्ट हाउस में इंतज़ार कराया.
लेकिन शी जिनपिंग जब इस सप्ताह रूस के दौरे पर पहुंचे तो स्थितियां एकदम अलग थीं.
चीन और सोवियत संघ के बीच 1950 में मित्रता, गठबंधन और पारस्परिक सहयोग की जिस संधि पर माओ और स्टालिन ने हस्तक्षार किए थे, उसके 73 साल गुज़रने के बाद अब शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन ने दुनिया के सामने दोनों देशों की "बेपनाह दोस्ती" दिखाई.
लेकिन दोनों मुल्क तमाम वैचारिक मतभेद, मनमुटाव, सुलह और एक सशस्त्र टकराव का लंबा रास्ता तय करते हुए यहाँ तक पहुँचे हैं.
इन दोनों पड़ोसियों का इतिहास लंबा और कई घटनाओं से भरा रहा है. दशकों तक सोवियत संघ और चीन साम्यवाद के दो बड़े ध्रुव थे, जो सिद्धांतों की अपनी-अपनी व्याख्या और अपने वैश्विक प्रभाव को लेकर कई बार आमने-सामने आए.
लेकिन 1950 के दशक के शुरुआती सालों में दोनों देशों के रिश्ते बेहतर थे.
साल 1927 से 1936 तक चले और साल 1945 में दोबारा शुरू होकर 1949 तक जारी रहे चीनी गृहयुद्ध ने राष्ट्रवादियों और कम्युनिस्टों को दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देश पर नियंत्रण के लिए संघर्ष करते देखा.
शीतयुद्ध की पृष्ठभूमि के साथ, ये आश्चर्य की बात नहीं है कि अमेरिका और सोवियत संघ ने चीनी गृहयुद्ध में किस धड़े को चुना.
च्यांग काई शेक के राजनीतिक दल कुओमितांग को अमेरिका से वित्तीय मदद और हथियार मिले. अमेरिका ने कुछ रणनीतिक महत्व वाले स्थानों की सुरक्षा के लिए अपने 50 हज़ार सैनिक भी भेजे. वहीं, माओत्से तुंग की चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी को सोवियत रूस का साथ मिला.
कम्युनिस्ट पार्टी की सेनाएं बेहतर साबित हुईं और वो राष्ट्रवादियों को ताइवान द्वीप तक ले धकेलने में कामयाब रहीं. साल 1949 में माओ ने चीनी गणराज्य के जन्म की घोषणा की.

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स्टालिन के लिए, संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रभाव का मुक़ाबला करने और एशिया में समाजवादी गुट का विस्तार करने के लिए साम्यवादी चीन सही भागीदार था.
माओ, जिन्हें एक ऐसे देश के पुनर्निमाण की ज़रूरत थी, जिसने जापानियों (1937-1945) के ख़िलाफ़ लड़ाई में सालों बिताए थे और जो गृहयुद्ध के नरक में डूब गया था. उन्हें सोवियत की मदद की आवश्यकता थी.
दो बार रूस का दौरा
कभी चीन से बाहर न जाने वाले माओ ने पहली बार वित्तीय सहायता मांगने के लिए सोवियत संघ का दौरा किया था. अपने पूरे जीवन में उन्होंने सिर्फ़ दो बार विदेशी दौरा किया. दूसरी यात्रा भी मॉस्को की ही थी.
लेकिन स्टालिन ने उनके लिए ये आसान नहीं रहने दिया.
चाइनीज़ पॉलिटिक्स के प्रोफ़ेसर और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर जियोपॉलिटिक्स के डिप्टी डायरेक्टर विलियम हर्स्ट ने बीबीसी को बताया, "माओ अपने साथ स्टालिन के रवैये से नाख़ुश थे, जिन्होंने उनको लंबा इंतज़ार करवाया और चीन को वो नहीं दिया, जो उसे चाहिए था."
वास्तव में, नए बने पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चीन के नेता से मिलने में स्टालिन को कई हफ़्ते लग गए. उन्होंने माओ को मॉस्को के बाहरी इलाके में किसी गेस्ट हाउस में ठहराया. इस दौरान माओ की आवाजाही पर भी कुछ पाबंदियां थीं.
उस समय सोवियत संघ एक शक्ति था और उसने चीन को एक ऐसे 'गुलाम देश' के तौर पर देखा जो इस तरह के अपमानजनक व्यवहार को बर्दाश्त कर सकता था.
कुछ सप्ताह के बाद हालांकि दोनों नेताओं ने 'साइनो-सोवियत ट्रीटी ऑफ़ फ्रेंडशिप, अलायंस एंड म्यूचुअल असिस्टेंस' पर हस्ताक्षर किए, जिससे चीन को वो मदद मिली, जिसकी उसे सख़्त ज़रूरत थी. ये एक तरह का कम्युनिस्ट 'मार्शल प्लान' था जिसने चीन को पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों को नाकाम करने में मदद की.

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मॉस्को एक ऐसी महान शक्ति और मॉडल था, जिससे माओत्से तुंग सीखना चाहते थे. ये उस समय उनके प्रॉपेगेंडा में झलकता भी था. उन वर्षों में एक नारा बार-बार दोहराया जाता था, "आज का सोवियत संघ हमारे कल (भविष्य) के जैसा है."
उस समय मॉस्को ने चीन को सैन्य और वित्तीय सहायता दी. छात्रों को स्कॉलरशिप दीं और तकनीकी उपकरण भी मुहैया कराए. इसके अलावा उसने हज़ारों इंजीनियर चीन भेजे, जिन्होंने देश में इंडस्ट्रियल नेटवर्क बनाने में बड़ी मदद की.
हालांकि, दोनों देशों के संबंधों में 1958 के बाद खटास आने लगी.
और साम्यवाद बंट गया...
हर्स्ट बताते हैं, "इस समय तक चीन ने अपनी 'ग्रेट लीप फॉर्वर्ड रणनीति' के साथ अधिक कट्टरपंथी आर्थिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का फ़ैसला किया, जबकि सोवियत संघ के नेता ख्रुश्चेव अपनी ताकत को मज़बूत करने और कट्टर स्टालिन समर्थकों को किनारे करने में कामयाब रहे."
स्टालिन का 1953 में निधन हो गया. इसके बाद सत्ता निकिता ख्रुश्चेव के हाथों में आई, जिन्हें उदारवादी सुधारवादी नेता के तौर पर देखा गया. हर्स्ट कहते हैं, "वो (ख्रुश्चेव) स्टालिन के लाए आर्थिक बदलावों को पलटकर बाज़ार आधारित समाजवाद की ओर बढ़ना चाहते थे."
माओ इसके एकदम उलट थे.
ग्रेट लीप फॉर्वर्ड नीति को इतिहासकारों और खुद चाइनीज़ कम्युनिस्ट पार्टी ने बाद में भारी भूल बताया था. इस नीति के कारण लाखों लोगों की जान गई. ये नीति देश के तेज़ी से औद्योगीकरण की मांग करती थी और व्यावहारिक तौर पर सिर्फ़ एक उत्पाद- स्टील (इस्पात) के निर्माण पर ज़ोर देती थी.
कृषि उत्पादन को छोड़कर लाखों किसानों को ग्रेट लीप फॉर्वर्ड नीति के लिए लामबंद किया गया. इसकी वजह से देश में विनाशकारी अकाल पड़ गया.
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'चाइना पावर' पॉडकास्ट पर अमेरिकन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जोसेफ़ टोरिजियन कहते हैं, "माओ की आदत थी कि वो सामरिक और राजनीतिक मतभेद होने पर इसके गहरे कारणों को तलाशते थे और हमेशा उनमें वैचारिक मंशा देखते थे. इसलिए, जब उन्होंने ख्रुश्चेव का व्यवहार देखा तो उन्होंने सोचा कि सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ कुछ गलत है, जिसे उन्होंने संशोधनवाद कहा."
नए सोवियत नेता की पश्चिमी देशों के साथ "शांतिपूर्ण सह-अस्तिस्तव" की नीति की चाह को माओ ने "साम्राज्यवादी महत्वकांक्षाओं" की उपज माना.
एक दूसरे से नफ़रत करने वाले माओ और ख्रुश्चेव के बीच जो खाई बढ़नी शुरू हुई, वो अंत में चीन और सोवियत के रिश्तों में टूट के तौर पर जानी गई.
इसके परिणामस्वरूप ही दोनों ने राजनयिक संबंध तोड़े और दोनों देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन पर आधिपत्य के लिए प्रतिद्वंद्विता बढ़ गई.
विलियम हर्स्ट कहते हैं, "1960 के दशक के अंत में, चीन ने सोवियत संघ को कम से कम संयुक्त राज्य अमेरिका जितना बड़ा खतरा बताया."
उस समय मॉस्को भी चीन के लिए कुछ अलग राय नहीं रखता था.
साल 1966 में चीन ने सांस्कृतिक क्रांति शुरू की थी, जिसके कारण बड़े पैमाने पर शुद्धिकरण कराया गया. इसे ख्रुश्चेव के उत्तराधिकारी लियोनिद ब्रेझनेव ने "विशेष रूप से अस्थिर और ख़तरनाक" माना.
सशस्त्र संघर्ष
आपसी अविश्वास ने दोनों देशों के बीच सीमा पर कई झड़पों को जन्म दिया और साल 1969 में दोनों देशों के बीच सबसे बड़े सशस्त्र टकराव के साथ ही ये झड़पें ख़त्म हुईं. ये टकराव झेनबाओ टापू की एक छोटी सी नदी पर हुआ जो दोनों देशों की सीमा से लगती है.
उस साल मार्च महीने में चीनी सैनिकों ने सोवियत संघ पर क्यों हमला किया, इसकी कोई स्पष्ट वजह पता नहीं है. हालांकि, कुछ इतिहासकारों का माना है कि माओ इस टकराव से एक सामाजिक लामबंदी की इच्छा रखते थे, जो दशकों तक सांस्कृतिक क्रांति की वजह से फैली अराजकता के बीच एकता बहाल कर सकती थी.
इस संघर्ष में दोनों पक्षों ने अपने दर्जनों लोगों को गंवाया.

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सोवियत संघ ने इस हमले की उम्मीद नहीं की थी और न ही ये सोचा था कि उस साल के अगस्त महीने तक, देश के दूसरे कोने, यानी शिनजियांग के साथ सीमा पर नया संघर्ष पैदा हो जाएगा.
जोसेफ़ टोरेजियन कहते हैं, "यूएसएसआर ने तब ऐसे कई संकेत भेजने शुरू किए जिससे चीन को लगा कि परमाणु हमला हो सकता है और भले ही इसकी संभावना न हो, लेकिन कम से कम उन्हें इसके लिए तैयार तो रहना होगा."
इसके बाद चीन की मानसिकता में बदलाव आया.
कैंब्रिज के प्रोफ़ेसर टोरिजियन कहते हैं, "तब से, चीन ने 'तीसरे मोर्चे' की नीति शुरू की, जिसमें अमेरिका और साथ ही सोवियत संघ की ओर से परमाणु हमले से खुद को बचाना शामिल था. इसके अलावा अपनी औद्योगिक क्षमता को देश के दक्षिणपश्चिम हिस्से में स्थानांतरित करने के साथ बचाव के लिए हर तरह के सिस्टम बनाना भी इस नीति का हिस्सा था."
लेकिन ये रणनीति ज़्यादा समय तक नहीं टिकी. चीन को एहसास हुआ कि एक साथ दो-दो महाशक्तियों से निपटना असंभव है. जैसा कि विलियम हर्स्ट बताते हैं, "चीन को, सोवियत संघ के ख़िलाफ़ संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ गठबंधन करना सही लगने लगा, जिसने निश्चित तौर पर 1970 और 1980 के दशक में सोवियत संघ के साथ संबंधों को सुधारने में तो मदद नहीं ही की."
हर्स्ट कहते हैं, "अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने दूसरे अमेरिकी राजनेताओं से उलट इसे एक मौके के तौर पर देखा."
यूएसएसआर के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को रोकने के लिए, अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र में रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की सीट- जिसने ताइवान में कुओमितांग का गठन किया और जिसे कई देश चीन की सरकार मानते थे, को पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना को देने पर सहमति दे दी.
इसके एक साल बाद, 1972 में निक्सन की चीन की ऐतिहासिक यात्रा हुई और 1979 में दोनों देशों ने अपने राजनयिक संबंधों को फिर से स्थापित किया.
साल 1976 में माओ की मृत्यु ने भी देश के लिए एक नई दिशा की शुरुआत की. देंग शियाओपिंग के नेतृत्व में बाज़ार पहले से अधिक खुल गया. शियाओपिंग ने "चीन की खासियतों" के साथ समाजवाद के प्रचलित विचार को बढ़ावा दिया.
साम्यवाद पर आधिपत्य के लिए विवाद
चीन-सोवियत रिश्तों के विवाद का असर दुनियाभर की कम्युनिस्ट पार्टियों पर देखने को मिला.
हालांकि, साम्यवादी गुटों पर आधिपत्य के लिए सोवियत और चीन के बीच अधिकांश लड़ाई वैचारिक मोर्चे पर लड़ी गई थी, जिसमें दोनों शक्तियां कम्युनिस्ट पार्टियों और दुनिया के अलग हिस्सों में इन पार्टियों से उभरे उग्रवादी समूहों या गुरिल्लाओं पर अपना प्रभाव बनाने की कोशिश कर रही थीं.

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मेक्सिको की मिचुओकाना यूनिवर्सिटी के मिगेल एंजेल अपने एक आर्टिकल में लिखते हैं कि दोनों देशों की ये बढ़ती फूट कम्युनिस्ट पार्टियों के दिल में इस कदर उतर गई कि इससे जुड़े कई उग्रवादी गुटों ने अमेरिका के साथ "शांतिपूर्ण संबंधों" को खारिज कर दिया.
उदाहरण के लिए कोलंबिया में कम्युनिस्ट पार्टी संकट में पड़ गई और इससे अलग होकर वहां माओवाद के प्रभाव में मार्क्सवादी-लेनिनवादी कोलंबियाई कम्युनिस्ट पार्टी का उदय हुआ. इस समूह ने आगे चलकर एक गुरिल्ला गुट, नेशनल लिबरेशन आर्मी का निर्माण किया.
अर्जेंटीना, इक्वाडोर, चिली, ब्राज़ील, वेनेज़ुएला और मेक्सिको जैसे अन्य देशों में भी मार्क्सवादी-लेनिनवादी धड़े में ये विभाजन देखने को मिला. पेरू में माओवाद ने सेंदेरो लुमिनोसो जैसे गुटों को जन्म दिया.
चीन और सोवियत के बीच दक्षिणपूर्वी एशिया में भी वैचारिक टकराव देखने को मिले. प्रोफ़ेसर टोरिजियन कहते हैं, "चीन उस समय कंबोडिया के ऐसे समूह के समर्थन में उतरा जिसे सोवियत संघ ने अत्याधिक ख़तरनाक माना था."
सोवियत संघ का विघटन
हर्स्ट कहते हैं, "चीन के लिए 1980 के दशक में सोवियत संघ सबसे बड़ा ख़तरा था और इसने चीन को अमेरिका-जापान के साथ मिलकर सहयोग करने के लिए प्रेरित किया."
लेकिन 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो गया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिर से फेरबदल देखने को मिला.
चीन में रूस के नए राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन पर भरोसा नहीं किया गया, जिनके नेतृत्व में बड़े पैमाने पर निजीकरण हुआ और बड़े शक्तिशाली वर्ग के हाथों में और ताकत आई. रूस पूरी तरह से पूंजीवाद में प्रवेश कर गया.
लेकिन चीन और अमेरिका के बीच जो गठबंधन बनाया गया था, उसका अब कोई अर्थ नहीं रह गया था.

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साल 2001 में, रूस और चीन ने अच्छे पड़ोसी और मैत्रीपूर्ण सहयोग से जुड़ी संधि पर हस्ताक्षर किए.
विलियम हर्स्ट कहते हैं, "तबसे, चीन लगातार अलग-अलग शक्तियों के बीच संतुलन खोजने की कोशिश करता रहा है और उस जगह को अमेरिका, रूस और जापान ही नहीं बल्कि भारत या यूरोप के बीच भी नेविगेट करता है."
पिछले 30 सालों में चीन के अमेरिका और जापान के साथ संबंध कमज़ोर पड़ते रहे और बीते एक दशक में ये बिगड़ने वाली स्थिति में आ पहुंचे.
हर्स्ट ने कहा, "इससे रूस के साथ सकारात्मक संबंध बनाए रखना महत्वपूर्ण हो गया है, भले ही चीन रूस का सहयोगी नहीं है. चीन का दुनिया में केवल एक औपचारिक गठबंधन है और वह उत्तर कोरिया के साथ है."
हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि सहयोगी रहें या न रहें लेकिन "चीन के लिए रूस अत्यंत उपयोगी है."
रूस अब चीन का एक अहम सहयोगी बन गया है. वो बीते 20 सालों से चीन को विमानन उद्योग विकसित करने के लिए कई अहम तकनीक दे रहा है. उदाहरण के लिए रूस से मिल रही निर्बाध ऊर्जा ने चीन को मध्य पूर्व और अमेरिका से अपने आयात में विविधिता लाने और इसे संतुलित करने में मदद की है.
चीन और रूस एक बार फिर से करीबी बन गए हैं लेकिन अब रूस को चीन के समर्थन की ज़्यादा ज़रूरत है. चीन उपभोक्ता वस्तुओं का एक बड़ा आपूर्तिकर्ता है और फिलहाल रूस का व्यापारिक भागीदार है. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस पर लगे प्रतिबंधों को नाकाम बनाने के लिहाज़ से चीन अहम है.
माओ के ऐतिहासिक रूस दौरे के सात दशक बाद, दोनों देशों की भूमिकाएं उलट गई हैं.
शी जिनपिंग रूस गए, लेकिन अब यहां न तो कोई गेस्ट हाउस था और न ही लंबा इंतज़ार. वहां था तो सिर्फ़ स्वागत के लिए मुस्कान और एक रेड कार्पेट.
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