केरल: रैगिंग का एक और मामला, पांच छात्र गिरफ़्तार

सैम्युल (उम्र-20 साल)

इमेज स्रोत, Imran Qureshi

इमेज कैप्शन, रैगिंग के मामले में ग़िरफ़्तार पांच छात्रों में से एक सैम्युल (उम्र-20 साल)
    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

केरल में जूनियर छात्रों की रैगिंग के आरोप में कोट्टायम के एक नर्सिंग कॉलेज के पांच छात्रों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया है.

(इस कहानी के कुछ अंश आपको विचलित कर सकते हैं)

उन पर आरोप है कि उन्होंने फ़र्स्ट ईयर के तीन छात्रों के साथ मार-पीट की, उनसे पैसों की उगाही की, इन पैसों से शराब ख़रीदकर लाने को कहा और उनके प्राइवेट पार्ट में डंब बेल तक लटकाया.

आरोप के मुताबिक़ सीनियर छात्र नवंबर 2024 से ही तीनों जूनियर छात्रों को प्रताड़ित कर रहे थे. सभी पीड़ित फ़र्स्ट ईयर के छात्र थे.

कोट्टायम के डिस्ट्रिक्ट पुलिस चीफ़ शाहुल हमीद के मुताबिक़, "सीनियर छात्रों ने तीनों जूनियर छात्रों को जबरन शराब पिलाई. और ऐसा करते हुए उन्होंने उनका वीडियो बनाया. इसी वीडियो के ज़रिए वो उन्हें लगातार ब्लैकमेल कर रहे थे."

लाल लाइन

बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

लाल लाइन

मामला कैसे आया सामने?

पांच ग़िरफ़्तार छात्रों में से एक जीवा, उम्र- 19 साल

इमेज स्रोत, Imran Qureshi

इमेज कैप्शन, पांच ग़िरफ़्तार छात्रों में से एक जीवा, उम्र- 19 साल

जिन छात्रों को ग़िरफ़्तार किया गया है उनके नाम हैं, सैम्युल (20 साल), जीवा (19 साल), रिजिल जिथ (20 साल), राहुल राज (22 साल) और विवेक (21 साल).

जब पीड़ित छात्रों में से एक के मां-बाप ने कहा कि उन्हें मामले की रिपोर्ट पुलिस में करानी चाहिए तब जाकर पीड़ित छात्रों की हिम्मत बढ़ी और उन्होंने पुलिस से संपर्क किया.

पुलिस के मुताबिक़ जैसे ही उनका फ़र्स्ट ईयर का बैच शुरू हुआ तब से ही उनकी रैगिंग शुरू हो गई.

स्थानीय गांधीनगर पुलिस स्टेशन के एसएचओ श्रीजित टी ने बीबीसी से कहा, "सीनियर छात्र जबरन उनसे पैसे उगाहते और उनसे शराब लाने को कहते."

पांच ग़िरफ़्तार छात्रों में से एक राहुल राज, उम्र- 22 साल

इमेज स्रोत, Imran Qureshi

इमेज कैप्शन, पांच ग़िरफ़्तार छात्रों में से एक राहुल राज, उम्र- 22 साल

इसके अलावा आरोप के मुताबिक़ पीड़ित छात्रों के शरीर पर कई जगह ज्यॉमेट्री बॉक्स कंपस (परकार) भी चुभोया गया.

पुलिस ने ये भी बताया सीनियर छात्रों ने उनके ज़ख्मों पर क्रीम भी लगाई. उनके चेहरे और मुंह पर भी जबरन वही क्रीम लगाई.

एक पुलिस अधिकारी के मुताबिक़ सीनियर छात्रों ने अपने बचाव में कहा कि वो 'मज़े लेने के लिए' रैगिंग ले रहे थे.

पुलिस अब जांच कर रही है कि कहीं इस केस में और सीनियर छात्र तो शामिल नहीं हैं.

किन धाराओं के तहत मामला दर्ज?

पांच ग़िरफ़्तार छात्रों में से एक रिजिल जिथ, उम्र- 20 साल

इमेज स्रोत, Imran Qureshi

इमेज कैप्शन, पांच ग़िरफ़्तार छात्रों में से एक रिजिल जिथ, उम्र- 20 साल

पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 118 के तहत मामला दर्ज किया है जिसमें ख़तरनाक हथियारों से गंभीर चोट पहुंचाना शामिल है. साथ ही अभियुक्तों पर धारा 308 भी लगाई गई है जिसके तहत डरा धमकाकर पैसे या क़ीमती चीज़ें हथियाने का मामला शामिल है.

इसके अलावा उन पर केरल रैगिंग एक्ट की धारा तीन और चार के तहत भी मामले दर्ज किए गए हैं. इनमें दोषी साबित होने पर 10 हज़ार रुपए तक का जुर्माना और दो साल की सज़ा का प्रावधान है.

हाल ही में एक और मामला आया था सामने

पिछले सप्ताह केरल में एक मशहूर स्कूल के 15 साल के छात्र की मौत ने पूरे राज्य को झकझोर कर रख दिया था.

परिवार ने आरोप लगाया था कि छात्र ने रैगिंग के बाद आत्महत्या की है.

घटना के बाद छात्र की मां ने सोशल मीडिया पर एक लंबा, भावनात्मक पोस्ट लिखा था. ये पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ था.

आत्महत्या एक गंभीर मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समस्या है. अगर आप भी तनाव से गुजर रहे हैं तो भारत सरकार की जीवनसाथी हेल्पलाइन 18002333330 से मदद ले सकते हैं. आपको अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से भी बात करनी चाहिए.

रैगिंग का छात्रों पर असर

कोट्टायम रैगिंग मामले में ग़िरफ़्तार छात्रों में से एक, विवेक, उम्र- 21 साल

इमेज स्रोत, Imran Qureshi

इमेज कैप्शन, कोट्टायम रैगिंग मामले में ग़िरफ़्तार छात्रों में से एक, विवेक, उम्र- 21 साल

साल 2009 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एक समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि रैगिंग का पीड़ित छात्रों पर विपरीत असर पड़ता है और उससे उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है. उनके फ़ोकस करने की क्षमता पर भी असर पड़ता है.

रैगिंग का शिकार हुए छात्रों में से 10 प्रतिशत से भी ज़्यादा के परीक्षा नतीजों पर इसका असर देखा गया.

समिति ने पाया कि रैगिंग की वजह से पीडि़त छात्रों में शर्म, अपमान और बेचारगी जैसी भावनाएं पनपती हैं जो उनकी मानसिक सेहत पर बुरा असर डालती हैं.

रिपोर्ट में साल 2006 के एक मामले का ज़िक्र करते हुए कहा गया कि एक 18 साल की इंजीनियरिंग छात्रा के साथ उसके सीनियर्स ने रैंगिग की और उसकी एक आपत्तिजनक सीडी भी बनाई.

उसका इलाज कर रहे डॉक्टरों ने बताया था कि पीड़ित छात्रा बोल भी नहीं पा रही थी और बार-बार बेहोश हो रही थी. तब उसे अस्पताल के मेंटल वार्ड में भर्ती कराना पड़ा था.

पीड़ित छात्रा 35 अन्य छात्राओं के साथ एक हॉस्टल में रह रही थी.

रैगिंग और हिंसा

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

दुनिया भर में हुए कई शोध के मुताबिक़ स्कूलों, कॉलेज और प्रोफ़ेशनल कॉलेज में ऐसी परंपराएं प्रचलित हैं जिनके ज़रिए सीनियर और जूनियर छात्रों के बीच सहज वातावरण बनाया जा सके.

अंग्रेज़ी में इसके लिए 'आइस ब्रेक' जैसे शब्द का इस्तेमाल होता है. लेकिन इनमें हिंसा का कहीं कोई ज़िक्र नहीं मिलता.

पिछले साल 18 फ़रवरी को केरल के वायनाड में विटनरी एंड एनिमल साइंसेस कॉलेज के सिद्दार्थन नाम के छात्र ने 'ख़ुदकुशी' कर ली थी.

मामले की सीबाई जांच में पाया गया कि बार बार साथी छात्रों द्वारा मारपीट, अपमान और शोषण के कारण सिद्धार्थन ने ये क़दम उठाया.

कोच्चि के प्रख्यात बाल मनोचिकित्सक डॉक्टर फ़िलिप जॉन इस तरह की घटनाओं के कारण के बारे में बात करते हुए बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "ख़तरनाक बात ये है कि रैगिंग अब ग्रुप्स में होने लगी है और इस दौरान हिंसा भी की जाने लगी है. भीड़ की सामूहिक मानसिकता ताक़त का एक भ्रमित एहसास देती है और हिंसा को सही ठहराती है. इससे लोगों को ताक़तवर होने और लीडर होने का एहसास होता है."

डॉक्टर जॉन ऐसे ही एक केस का ज़िक्र करते हैं जब 15 साल का एक बच्चा अपने दोस्तों को एक रेस्त्रां में खाना खिलाने ले गया और बिना भुगतान किए जाने लगा. जब दुकान के मालिक ने उससे पैसे मांगे तो उसके अहं को चोट पहुंची और उसने रेस्त्रां मालिक पर हमला कर दिया.

डॉक्टर जॉन कहते हैं, "बच्चों के मां-बाप की भूमिका बेहद अहम हो जाती है. उनमें ऐसे गुण विकसित करना बचपन से ज़रूरी है ताकि वो किसी ग़लत बात के प्रति विरोध दर्ज करा सकें. भले ही उसके दोस्त या ग्रुप उससे ऐसा करने के लिए कह रहे हों."

डॉक्टर जॉन के मुताबिक़, "बच्चों में इनर कंट्रोल होना बहुत ज़रूरी है. ताकि जब वो 18 या 19 साल के हों तो दूसरों को नुक़सान पहुंचाने के बारे में ना सोचें. ऐसा होने से हम वो समाज बना पाएंगे जिसमें निजी दंड देने का किसी को अधिकार ना हो. ये आपसी सामंजस्य को बढ़ाएगा."

वो आगे कहते हैं, "समाज हिंसा के प्रति असंदेवदनशील हो चला है. कोई भी हिंसा के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने को तैयार नहीं रहता."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)