उत्तराखंड: हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में 'रैगिंग' पर छात्रों की चुप्पी से उठ रहे हैं सवाल

राजकीय मेडिकल कॉलेज, हल्द्वानी

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    • Author, वर्षा सिंह
    • पदनाम, देहरादून से, बीबीसी हिंदी के लिए

नैनीताल ज़िले के हल्द्वानी में राजकीय मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस प्रथम वर्ष के छात्रों का एक वीडियो 5 मार्च को सोशल मीडिया पर वायरल हुआ. इसमें एमबीबीएस के छात्र सिर मुंडाए हुए, हाथ पीछे की तरफ बांधकर और सिर झुकाए हुए एक कतार में चलते नज़र आते हैं.

6 मार्च को इस वीडियो का हवाला देते हुए एंटी रैगिंग हेल्पलाइन पर शिकायत भी दर्ज कराई. लेकिन 7 मार्च को एंटी रैगिंग कमेटी और मेडिकल कॉलेज की अनुशासन समिति की बैठक में छात्रों ने रैगिंग से इनकार कर दिया और सिर मुंडाने के लिए डैंड्रफ जैसी वजहें बताईं.

राजकीय मेडिकल कॉलेज, हल्द्वानी के प्राचार्य डॉक्टर अरुण जोशी कहते हैं, "सोमवार को एंटी रैगिंग कमेटी के सामने एमबीबीएस प्रथम वर्ष के सभी छात्र-छात्राओं को बुलाया गया. छात्र दबाव न महसूस करें, इसके लिए हमने सवालों की एक सूची तैयार की थी. जिसमें उनसे पूछा गया था कि आपसे ये किसने कराया है, क्या सीनियर छात्रों ने आपसे जबरन बाल कटवाए, उनके नाम क्या थे. लेकिन किसी भी छात्र ने कोई नाम नहीं लिया. सभी ने स्वेच्छा से बाल कटाने की बात कही."

छात्र-छात्राओं के कतारबद्ध होकर चलने पर कॉलेज प्रशासन ने कमेटी के सामने कहा कि नये एडमिशन होने के चलते छात्र-छात्रा परिसर में खो न जाएं, कुछ समय के लिए ये नियम बनाया गया था.

नैनीताल के ज़िलाधिकारी धीराज सिंह गर्ब्याल कहते हैं, "एंटी रैगिंग कमेटी के सामने किसी भी छात्र ने अपने साथ रैगिंग की बात स्वीकार नहीं की. छात्रों के साथ उनके अभिभावक भी मौजूद थे. बाल क्यों कटवाए, इस पर किसी छात्र ने डैंड्रफ की समस्या बताई तो किसी ने अनुशासन के लिए ऐसा करने को कहा. वीडियो के आधार पर हम इसे रैगिंग नहीं कह सकते जब तक कि कोई छात्र हमसे शिकायत नहीं करता. हॉस्टल के सीसीटीवी फुटेज की भी पड़ताल की गई. उसमें भी ऐसा कुछ नहीं दिखा. सीनियर छात्रों को चेतावनी दी गई है कि भविष्य में कुछ ऐसा हुआ और वे पकड़े गए तो कड़ी कार्रवाई होगी."

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हॉस्टल में निगरानी

हल्द्वानी राजकीय मेडिकल कॉलेज में पहले वर्ष में 93 छात्रों को एडमिशन मिला है. 15 फरवरी से सत्र शुरू हुआ है. प्राचार्य डॉक्टर जोशी ये मानते हैं कि वीडियो में कई छात्र एक साथ गंजे दिखाई दे रहे हैं, यानी किसी न किसी ने उनसे ऐसा करने को कहा है.

"हम ये सुनिश्चित करा रहे हैं कि कैंपस में ऐसी घटना दोबारा न हो. सभी छात्रों की काउंसिलिंग भी कराई जा रही है. उनसे कहा गया है कि अगर कोई सीनियर छात्र रैगिंग करता है या बाल काटने जैसे कोई काम करने को कहता है, तो वे ऐसा न करें."

वो बताते हैं कि यूजीसी ने भी इस मामले का स्वतः संज्ञान लिया और रिपोर्ट तलब की है. साथ ही एंटी रैगिंग कमेटी ने मेडिकल कॉलेज के सभी हॉस्टल की मॉनीटरिंग बढ़ाने और पुलिस प्रशासन को भी औचक निरीक्षण करने के निर्देश दिए हैं.

मेडिकल कॉलेज एंटी रैगिंग कमेटी के सदस्य और स्थानीय पत्रकार गणेश जोशी बताते हैं, "हल्द्वानी मेडिकल कॉलेज में इससे पहले भी छात्रों के बाल कटवाकर एक कतार में चलने की घटनाएं हो चुकी हैं. ये जाहिर सी बात है कि सीनियर छात्रों ने ही उनसे ऐसा करने को कहा होगा. एक साथ इतने बच्चे अपनेआप बाल नहीं कटवाएंगे. पिछले कई सालों से मेडिकल कॉलेज में ये चलन बन गया है. जब भी नया बैच आता है तो छात्र इसी तरह तकरीबन गंजा होकर एक कतार में जाते हैं. ऐसा शुरुआती 2-3 महीने तक होता है."

वो कहते हैं कि "नए एडमिशन के बाद नए-पुराने छात्र-छात्राओं की एक साथ काउंसिलिंग बहुत जरूरी है. अब तक वो काउंसिलिंग नहीं हुई थी लेकिन अब प्राचार्य छात्रों से संवाद कर रहे हैं और उनका हौंसला बढ़ा रहे हैं. हॉस्टल में निगरानी के लिए अलग-अलग टीम भी बनाई गई है."

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देहरादून में शिक्षाविद् डॉक्टर विद्या सिंह कहती हैं कि कॉलेजों में शालीनता में रहकर नए-पुराने छात्रों का परिचय हासिल करने तक तो ठीक है लेकिन बाल कटाकर सार्वजनिक तौर पर एक किस्म की परेड कराना ठीक नहीं है. क्योंकि इस तरह की रैगिंग की कोई सीमा नहीं रह जाती. इसीलिए रैगिंग पर प्रतिबंध लगाया गया है. परिवारवाले भी दबाव में रहते हैं क्योंकि रैगिंग के चलते आत्महत्या तक की घटनाएं हो चुकी हैं.

देहरादून के हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में मनोचिकित्सक डॉक्टर प्रियरंजन अविनाश कहते हैं, "मेडिकल कॉलेज में रैगिंग का कल्चर सा बना हुआ है. मेडिकल एजुकेशन में 5 साल से अधिक समय के लिए बच्चा पढ़ने आता है और हॉस्टल में रहता है. ये बच्चे अपने परिजनों और सपोर्ट नेटवर्क से दूर रहते हैं और उन्हें अपने सीनियर छात्रों के साथ ही रहना होता है. रैगिंग की शुरुआत एक दूसरे को जानने के लिहाज से हुई थी."

"लेकिन समय के साथ उसमें बहुत सी खराबियां आ गईं हैं. बच्चों के साथ शारीरिक-मानसिक शोषण होने लगा. सिर मुंडवाना और एक तरह की परेड कराना शर्मनाक है. आमतौर पर 10 में से 9 बच्चे अपने साथ हुई इस तरह की घटना झेल जाते हैं. लेकिन कोई छात्र बहुत संवेदनशील हुआ तो संभव है कि उसका आत्मविश्वास कमज़ोर पड़ जाए. बेहद कम मामलों में ऐसा भी संभव है कि वो आत्महत्या के बारे में सोचें."

डॉक्टर अविनाश कहते हैं कि मेडिकल की पढ़ाई बहुत तनाव वाली होती है. इस तनाव को उनके साथी और उनसे सीनियर स्टुडेंट ही समझ सकते हैं और एक दूसरे के साथ साझा कर सकते हैं. घरवाले भी इस तनाव को दूर करने में बच्चों की मदद नहीं कर सकते. इसलिए मेडिकल संस्थान में सीनियर-जूनियर छात्र-छात्राओं के बीच अच्छा रिश्ता बनना बेहद ज़रूरी है.

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