राहुल द्रविड़ टीम में आ तो गए, पर पैदा होने वाली है ये जटिल स्थिति

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- Author, शारदा उगरा
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
कोई हैरानी कि बात नहीं है कि राहुल द्रविड़ अगले छह महीने यानी जून में वेस्टइंडीज़-अमेरिका में आयोजित हो रहे टी20 वर्ल्ड कप 2024 के ख़त्म होने तक भारतीय क्रिकेट टीम के कोच बने रहने के लिए तैयार हो गए हैं.
ऐसी रिपोर्ट्स भी हैं कि पूर्व तेज़ गेंदबाज़ आशीष नेहरा से भी भारतीय टीम का कोच बनने के लिए संपर्क किया गया था, पर उन्होंने मना कर दिया.
इसके बावजूद, द्रविड़ का कोच बने रहना ही टीम के लिए इस समय सबसे बेहतर और एकमात्र विकल्प है.
सोचिए अगर द्रविड़ कोच बने रहने के लिए तैयार नहीं होते तो क्या होता?
एक नए कोच को, चाहे वह कोई भी होते, वर्ल्ड कप के फ़ाइनल में मिली हार से निराश भारतीय टीम के साथ एक अहम दौरे से चंद रोज़ पहले ही जुड़ना होता.
दो टेस्ट और सफ़ेद गेंद के छह मैचों वाले दक्षिण अफ़्रीकी दौरे का पहला मैच 10 दिसंबर से ही शुरू होना है. दक्षिण अफ़्रीका वह अंतिम गढ़ है जिसकी सरज़मीं पर भारतीय टीम टेस्ट सिरीज़ जीतने से अब तक महरूम रही है.
अगर टीम को इस समय एक नया कोच मिला भी होता तो भी फैंस खिलाड़ियों से/टीम से दमदार प्रदर्शन की अपेक्षाएं करते क्योंकि आख़िरकार टीम में सब पेशेवर क्रिकेटर ही हैं.
लेकिन ड्रेसिंग रूम के माहौल जैसी एक चीज़ भी होती है जो कि नए कोच के (अपने सपोर्ट स्टाफ़ के साथ या उनके बग़ैर) आने से थोड़ी बाधित हो जाती है, फिर चाहे वो कितना भी सक्षम और योग्य ही क्यों न हो.
नए कोच के आने से शुरू शुरू में ड्रेसिंग रूम के हर किसी को थोड़ी बेचैनी महसूस होती. और यह दक्षिण अफ़्रीका से उसी की सरज़मीं पर मुक़ाबला करने का सबसे बढ़िया तरीक़ा नहीं होता.

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टीम कल्चर
बतौर कोच द्रविड़ के कार्यकाल और रोहित की कप्तानी के साथ उनकी साझेदारी के प्रभाव की जब भी चर्चा होती है, उसमें इसी ड्रेसिंग रूम का माहौल केंद्र में होता है जिसकी बदौलत उन्होंने इतना सब कुछ किया है.
राहुल द्रविड़ और रोहित शर्मा के बारे में सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला एक और अंग्रेज़ी शब्द 'टीम कल्चर' रहा है.
जिस कल्चर शब्द का इस्तेमाल किया गया है उसका यहां हिंदी में सबसे सटीक अर्थ संस्कृति नहीं बल्कि सुधार है.
यह काम करने के तौर तरीके और आदतों में सुधार के बारे में है. जो पहले की तुलना में पिछले दो वर्षों के दौरान भारतीय टीम में होने के सही मायने को दर्शाता है.
ऐसा नहीं है कि द्रविड़-रोहित की साझेदारी के आने से पहले ड्रेसिंग रूम के अंदर खलबली मची रहती थी.
इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि बीते दो दशकों के दौरान ड्रेसिंग रूम में क्या होता था, भारत ने कुछ बेहतरीन नतीजे दिए, टीम की ऊर्जा में काफी सुधार देखने को मिला है, और यह 1980 और 90 के दशक की डरावनी कहानियों से बहुत बहुत बेहतर है.
हालांकि आम लोगों की धारणा है कि द्रविड़-रोहित की जोड़ी क़ायदे, पेशेवराना अंदाज़ और परिपक्वता के मामले में टीम को एक क़दम आगे ले गई है.
वर्ल्ड कप के दौरान टीम का अनोखा प्रदर्शन इन्हीं सभी चीज़ों का संयुक्त परिणाम था.
टीम के सदस्य प्रत्येक खिलाड़ी अपने कप्तान के नेतृत्व में ख़ासकर बल्लेबाज़ों की भूमिका के बारे में स्पष्ट तौर पर बातें करते हैं.
इतना ही नहीं, प्लेइंग इलेवन के चयन को भी वैसे ही संभाला गया जैसा ये होना चाहिए.

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खिलाड़ियों से क्या कहा गया?
जिन खिलाड़ियों को शामिल नहीं किया गया उन्हें उसके कारणों के बारे में पहले ही बता दिया गया तो अंतिम ग्यारह में चुने गए खिलाड़ियों को तर्क देकर बताया गया कि वे क्यों चुने गए हैं और साथ ही ये भी कि उनसे क्या उम्मीदें हैं.
मैच का परिणाम चाहे जो भी आया हो प्रत्येक खिलाड़ी के प्रदर्शन की अलग से समीक्षा की गई.
कप्तान और कोच ने एक एक खिलाड़ी से बात की, रोहित ने वर्ल्ड कप से पहले कहा भी, "हमने चयन और प्लेइंग इलेवन की घोषणा के बाद सभी खिलाड़ियों से बात करने की कोशिश की है. हम उनसे आमने सामने बात करते हैं. एक-एक कर बताते हैं कि वे क्यों नहीं चुने गए... कप्तानी अपनी पसंद-नापसंद को लेकर नहीं की जाती. अगर कोई टीम में नहीं है तो उसके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य है."
बतौर कोच, द्रविड़ ने अपने कप्तान को 50 ओवर के मैच में ओपनर के तौर पर अचानक बल्ले का मुंह खोल कर तेज़ी से रन जुटाने के लिए मना लिया.
वर्ल्ड कप में, रोहित की आक्रामक ओपनिंग बल्लेबाज़ी ने भारत को पॉवरप्ले में वैसी शुरुआत दिलाई जिसकी दरकार थी.
रोहित का 125.94 का स्ट्राइक रेट शीर्ष छह भारतीय बल्लेबाज़ों में सबसे अव्वल रहा.
उन्होंने टूर्नामेंट में सबसे अधिक रन बनाने वाले विराट कोहली (68 चौके, 9 छक्के) की तुलना में चौके तो कम लगाए लेकिन 22 छक्के अधिक जमाए. रोहित ने कुल 66 चौके, 31 छक्के जड़े.
टीम में द्रविड़ की वापसी ज़िम्मेदारी के बोध के साथ ही उनकी लालसा को भी दर्शाता है.
अगले साल टी20 वर्ल्ड कप शुरू होने वाला है, ऐसे में भारत को दक्षिण अफ़्रीका में सिरीज़ जीतने के साथ ही एक दशक बाद कोई आईसीसी ट्रॉफ़ी हासिल करने में द्रविड़ ने छाप छोड़ने का ख़ुद को एक और मौक़ा दिया है.

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बदलाव का दौर
इन सब के बीच, यह बदलाव का एक बेहद नाज़ुक दौर है, ख़ासकर भारतीय टी20 क्रिकेट में.
50 ओवर के वर्ल्ड कप के ख़त्म होने के बाद से अगले साल जून में होने वाले टी20 वर्ल्ड कप तक भारत को केवल 11 टी20 मैच खेलने हैं.
इनमें से आठ अपने घरेलू मैदान पर ऑस्ट्रेलिया (पांच) और अफ़ग़ानिस्तान (तीन) के साथ जबकि तीन मैच उसे आगामी दौरे पर दक्षिण अफ़्रीकी टीम के साथ खेलने हैं.
रोहित शर्मा और विराट कोहली पहले ही दक्षिण अफ़्रीका में खेले जाने वाले सफ़ेद गेंद के सभी मुक़ाबलों से अपना नाम हटवा चुके हैं.
ऐसे में द्रविड़ को इस सवाल का जवाब भी देना होगा, शायद वे इसे चयनकर्ताओं के साथ बातचीत में भी उठाएं कि क्या उन्हें भारत की टी20 वर्ल्ड कप 2024 योजनाओं में होना चाहिए?
केवल टी20 के आंकड़ों की ही बात करें तो कोहली 180 के जादुई अंक को पार कर चुके हैं- बल्लेबाज़ी औसत 50 (52.74) और स्ट्राइक रेट 130 (137.97) से अधिक.
क्रिकेट के उस फ़ॉर्मेट में जो छक्का जमाने की पूर्वनिर्धारित योग्यता की ओर झुकता जा रहा है, रोहित के क्रिकेट वर्ल्ड कप 2023 में प्रदर्शन अपने में यह प्रमाण है कि उन्होंने एक नया गियर ढूंढ निकाला है जो टी20 की टीम में जगह तलाशते युवाओं को चुनौती दे सकता है.
निश्चित तौर पर यह चयनकर्ताओं- और द्रविड़- के सामने एक जटिल स्थिति पैदा करेगा. फिर भी, भारतीय क्रिकेट के इस उतार चढ़ाव वाले दौर को संभालने के लिए द्रविड़ से अधिक अनुभवी शख़्स कोई नहीं हो सकता है.
वे जानते हैं कि भारतीय क्रिकेट के बड़े सितारे के बारे में उनके रिटायरमेंट को छोड़कर बाकी हर तरह की बातचीत का स्वागत है.
पर साथ ही वे यह भी जानते हैं कि 11 अंतरराष्ट्रीय टी20 मैचों से इतर भी कुछ अन्य कारक भी हैं जो खेल के इस छोटे फ़ॉर्मेट में विराट और कुछ कम ही सही पर रोहित की भी किस्मत तय कर सकते हैं.
इसे आईपीएल कहा जाता है. इसका चयन बहुत ही कठोर हो सकता है, लेकिन यह इन सब के साथ ही द्रविड़ का काम भी बहुत आसान बना सकता है.
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