इंजीनियर रशीद: कौन हैं तिहाड़ में बंद कश्मीरी नेता जो बारामूला से जीत गए लोकसभा चुनाव?

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
जम्मू-कश्मीर की लोकसभा सीटों में से एक में जेल में क़ैद निर्दलीय उम्मीदवार अब्दुल रशीद शेख़ ने जीत हासिल की है. आम तौर पर लोग उन्हें इंजीनियर रशीद के नाम से जानते या बुलाते हैं.
लेकिन उनकी जीत और भी अहम इसलिए बन जाती है क्योंकि उन्होंने जेल में रहते हुए जम्मू कश्मीर नेशनल कॉन्फ़्रेंस उमर अब्दुल्ला को दो लाख से भी ज़्यादा वोटों से शिकस्त दी है.
बारामुला सीट पर रशीद को चार लाख 72 हज़ार वोट मिले जबकि उमर अब्दुल्ला को दो लाख 68 हज़ार वोट मिले. तीसरे स्थान पर रहे जम्मू-कश्मीर पीपल्स कॉन्फ़्रेंस के सज्जाद लोन.
उन्हें एक लाख 73 हज़ार वोट मिले.
जीत के बाद इंजीनियर रशीद के घर उनके समर्थक और आम लोग उनके परिजनों को मुबारक़बाद देने आ रहे हैं. कश्मीर में सोशल मीडिया पर भी इंजीनियर रशीद की जीत पर काफ़ी चर्चा हो रही है.
उनके एक स्थानीय समर्थक अब्दुल माजिद इस जीत पर कहते हैं कि साल 2019 के बाद जो कुछ भी कश्मीर में हुआ, इंजीनियर रशीद की जीत उसी बात का जवाब है.
उनका कहना था कि कश्मीर के युवाओं ने जिस तरह इंजीनियर रशीद का समर्थन किया है, वो इस बात को दर्शाता है कि नई पीड़ी नए चेहरों को ढूंढ रही है और पारंपरिक राजनीति से तंग आ चुकी हैं.
अब्दुल माजिद ने इंजीनियर रशीद की चुनावी मुहिम का साथ दिया था.

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दिल्ली की जेल में बंद है रशीद
इंजीनियर रशीद को 'आतंकवाद की फ़ंडिंग' के आरोप में यूएपीए के तहत साल 2019 में गिरफ़्तार किया गया था और इस समय वो दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद हैं.
यूएपीए क़ानून भारत में ग़ैरक़ानूनी गतिविधियों पर नकेल कसने के लिए 1967 में लाया गया था. इसका उद्देश्य भारत की अखंडता और संप्रभुता को चुनौती देने वाली गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए सरकार को ज़्यादा अधिकार देना था.
साल 2019 में केंद्र सरकार ने इस क़ानून में संशोधन कर सरकार को ये ताक़त दी कि किसी भी व्यक्ति पर अदालती कार्रवाई के बग़ैर उसे चरमपंथी या देशविरोधी घोषित कर सकती है.
गिरफ्तारी के बाद इंजीनियर रशीद को समर्थन दे रही अवामी इत्तेहाद पार्टी ने उनपर लगे आरोपों को ख़ारिज किया है.
पार्टी का कहना है कि रशीद पर लगे आरोप एक राजनीतिक साज़िश है.
रशीद अवामी इत्तेहाद पार्टी के संस्थापकों में से एक हैं. 2019 में भी उन्होंने बारामुला से पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था और तीसरे नंबर पर रहे थे.
इस बार उन्होंने बतौर स्वतंत्र उम्मीदवार चुनाव लड़ा था.
इंजीनियर रशीद और राजनीति

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अब्दुल रशीद शेख़ का जन्म हंदवाड़ा क़स्बा के लाछ, मावर में हुआ था.
श्रीनगर पॉलिटेक्निक से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले रशीद ने एक सरकारी विभाग में इंजीनियर के पद पर क़रीब 25 साल तक नौकरी की थी.
साल 2003 के आस-पास उन्होंने कश्मीर में उस समय के मशहूर उर्दू साप्ताहिक अख़बार 'चट्टान' में राजनीतिक मुद्दों पर लिखना शुरू किया. उनके लेखों से उन्हें काफ़ी शोहरत मिली.
इसी दौरान उन्होंने कश्मीर में भारतीय सेना के कथित मानवाधिकार उल्लंघन के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठानी शुरू की. वो धरनों और प्रदर्शनों के ज़रिए अपनी बात रखते थे.
इंजीनियर रशीद के परिवार में उनसे पहले कोई भी राजनीति में नहीं आया था. तीन बच्चों के पिता रशीद एक साधारण परिवार से आते हैं.
जेल जाने से पहले इंजीनियर रशीद शांतिपूर्ण तरीक़े से कश्मीर समस्या को हल करने की वकालत करते रहे हैं.
इंजीनियर रशीद जम्मू कश्मीर से संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाने के सख़्त ख़िलाफ़ थे और इस मुद्दे को लेकर वो सड़कों पर भी उतरे थे. उन्होंने इसे लेकर कई धरने भी दिए हैं.
साल 2008 में रशीद ने निर्दलीय उम्मीदवार की हैसियत से कुपवाड़ा के लंगेट विधानसभा सीट से अपना पहला चुनाव लड़ा और उसमें जीत हासिल की. उन्होंने 2013 में उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और उसका नाम रखा- अवामी इत्तेहाद पार्टी.
2014 के विधानसभा चुनाव में वो दोबारा विधायक बने. इस साल उन्होंने बारामुला से लोकसभा का चुनाव भी लड़ा लेकिन वो हार गए.
2015 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा के अंदर बीजेपी के कुछ विधायकों ने बीफ़ पार्टी बुलाने के आरोप में उनके साथ धक्का-मुक्की भी की थी. इसके बाद एक घटना में 2015 में दिल्ली के प्रेस क्लब में कुछ लोगों ने उनपर काली स्याही फेंकी थी.
अपने अनोखे अंदाज़ के लिए मशहूर इंजीनियर रशीद विधायक बनने के बाद भी बिना किसी सिक्योरिटी के अपनी छोटी-सी निजी कार में आना जाना किया करते थे.
जेल से कैसे लड़ा चुनाव

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इस चुनाव के दौरान वो तो जेल में थे, इसलिए उनके चुनाव प्रचार का ज़िम्मा संभाला था उनके बेटे अबरार रशीद ने.
अबरार के मुताबिक़ उनके पास चुनाव प्रचार के लिए पैसे नहीं थे. यहां तक कि प्रचार के लिए चुनावी पोस्टर्स भी कैसे बन जाते, कौन बना देता, उन्हें यह भी नहीं पता था..
इंजीनियर रशीद के समर्थकों ने इस चुनाव में ‘जेल का बदला वोट से’ का नारा दिया था.
नतीजे आने के बाद इंजीनियर रशीद के छोटे भाई ख़ुर्शीद अहमद ने बीबीसी से बात की.
उन्होंने कहा, "आख़िरकार जनता ने रशीद साहब को संसद भेजा. लेकिन तिहाड़ जेल के अधिकारियों ने जनवरी से अभी तक परिवारवालों को उनसे बात करने तक की इजाज़त नहीं दी है. वो अपने बुज़ुर्ग माता-पिता से भी बात नहीं कर पा रहे हैं."
"जिस देश का संविधान इतना आज़ाद है कि रशीद साहब को चुनाव लड़ने की इजाज़त दी, उसी देश के कुछ गिने-चुने व्यक्तियों ने उनके बुनियादी अधिकार उनसे छिन लिए हैं."
वो कहते हैं उन्हें उम्मीद थी कि जिस तरह से उन्होंने अपने इलाक़े में विकास का काम किया है और लोगों के अधिकार की बात करते आ रहे हैं, उसका फल उन्हें ज़रूर मिलेगा.
वो कहते हैं, "अब उन्होंने चुनाव जीत लिया है और हमें उनके बाहर आने का इंतज़ार है. परिवार से ज़्यादा अब जनता को उनका इंतज़ार है, जिन्होंने उनका चुना है."
महबूबा मुफ़्ती की हार

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कश्मीर की एक और पूर्व मुख्यमंत्री और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की प्रमुख महबूबा मुफ़्ती भी इस बार लोकसभा का चुनाव हार गईं हैं.
वो अनंतनाग-राजौरी सीट से उम्मीदवार थीं. नेशनल कॉन्फ़्रेंस के मियां अल्ताफ़ अहमद ने उन्हें दो लाख 80 हज़ार से भी अधिक वोटों के अंतर से मात दी.
अल्ताफ़ को पांच लाख 21 हज़ार वोट मिले जबकि महबूबा को दो लाख 40 हज़ार वोट मिले. जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी के ज़फ़र इक़बाल ख़ान भी मैदान में थे, उन्हें एक लाख 42 हज़ार वोट मिले.
श्रीनगर
नेशनल कॉन्फ़्रेंस ने श्रीनगर की सीट भी जीत ली है. पार्टी से उम्मीदवार आग़ा सैय्यद रोहुल्लाह मेंहदी ने पीडीपी के वहीदुर्रहमान पारा को क़रीब एक लाख 88 हज़ार वोटों से हराया.
आग़ा सैय्यद रोहुल्लाह मेंहदी को तीन लाख 56 हज़ार वोट मिले जबकि पारा को एक लाख 68 हज़ार वोट मिले.
चुनावी मुद्दे
इस बार घाटी में चुनावी मुद्दे क़रीब एक जैसे ही थे. घाटी की दोनों प्रमुख पार्टियों नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी ने 370 के ख़त्म किए जाने को अपना सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था.
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा हासिल था. केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने अगस्त 2019 में संविधान के इस अनुच्छेद को हटा दिया और जम्मू-कश्मीर से राज्य का दर्जा छीनते हुए उसे दो केंद्रशासित प्रदेशों में तब्दील कर दिया था.
जम्मू-कश्मीर में इस लिहाज़ से भी ये चुनाव काफ़ी अहम था क्योंकि 370 के हटाने के बाद वहां यह पहली की बड़ा चुनाव हो रहा था.
सीपीएम के नेता और पूर्व विधायक मोहम्मद यूसुफ़ तारिगामी ने चुनावी नतीजे आने के बाद बीबीसी से बात की और कहा, "कश्मीर की जनता के लिए ये एक बड़ी ख़बर है कि जो विश्वास ख़त्म हो गया था, वो फिर से वापस लौट रहा है. जम्मू-कश्मीर के लोग जिस मायूसी के दलदल में फंस गए थे, उस मायूसी से निकलने का आज उन्हें रास्ता नज़र आ रहा है."
"जो संविधान का भविष्य है, वो अब सुरक्षित रहेगा. संसद में विपक्ष की अब एक मज़बूत आवाज़ उभरेगी और मनमानी का दौर अब ख़त्म होगा. इसी मनमानी के कारण जम्मू-कश्मीर में एक लंबे समय से विधानसभा के चुनाव भी नहीं हो सके."
बीजेपी ने इस बार लोकसभा चुनाव के लिए कश्मीर घाटी में अपने उम्मीदवार मैदान में नहीं उतारे थे.
सरकार का दावा है कि 370 हटाने के बाद कश्मीर विकास कि राह पर आगे बढ़ रहा है और जम्मू -कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा भी बार -बार 'नए कश्मीर' की बात कर रहे हैं.
लेकिन कश्मीर में कुछ लोग इसे 'जबरन ख़ामोशी' भी कहते हैं. उनका आरोप है कि किसी को खुलकर बात करने नहीं दी जाती है.
जून 2018 में बीजेपी और पीडीपी की गठबंधन सरकार उस समय गिर गई थी, जब बीजेपी ने पीडीपी से अपना समर्थन वापस ले लिया था. तब से लेकर आज तक जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव नहीं कराए गए हैं.

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दक्षिण कश्मीर में सिविल सोसाइटी के एक वरिष्ठ सदस्य फ़रमान अली कहते हैं कि 370 हटने के बाद कश्मीर की राजनीति में एक नया रुझान देखने को मिला है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "आपने देखा कि दक्षिण और उत्तरी कश्मीर में दो पूर्व मुख्यमंत्री कैसे चुनाव हार गए. इसका मतलब है कि कश्मीर में युवा पीढ़ी के जो मुद्दें हैं, उनको एड्रेस करने की ज़रूरत है."
पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता रियाज़ ख़ावर 2024 चुनाव को कश्मीर में एक मज़बूत विपक्ष की तलाश से जोड़कर देखते हैं.
ख़ावर कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में 370 हटाने के बाद कई सारे क़ानून लाए गए हैं चुनाव के नतीजे आने के बाद उन्हें वापस करने की उम्मीद जगी है.
वो कहते हैं , "अब एक मज़बूत विपक्ष के ज़रिए इन्हें वापस किया जा सकता है. अब अगर बीजेपी कोई क़ानून बनाती भी है तो उस क़ानून को पास करने के लिए दो तिहाई बहुमत की ज़रूरत होगी."
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