You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
भारत का वो द्वीप जहां किसी को जाने की इजाज़त नहीं, यहां रहने वालों का बाहरी दुनिया से कोई संपर्क नहीं
- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, दिल्ली
हिंद महासागर की भारतीय सीमा में मौजूद दुनिया से अलग-थलग बसे एक द्वीप का दौरा करने और वहां के जनजातीय लोगों से संपर्क करने के आरोप में पुलिस ने एक अमेरिकी पर्यटक को गिरफ़्तार कर लिया है.
24 साल के अमेरिकी पर्यटक मिख़ाइलो विक्ट्रोविच पोलियाकोफ़ पर आरोप है कि उन्होंने हिंद महासागर में मौजूद उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर रहने वाली जनजातीय आबादी से संपर्क करने की कोशिश की, फ़िल्म बनाई और इसके तट पर एक सोडा कैन छोड़ दिया है.
यह द्वीप हिंद महासागर में अंडमान निकोबार द्वीपसमूह का हिस्सा है और इससे पांच किलोमीटर की दूरी तक किसी को भी आने की अनुमति नहीं है.
इस द्वीप में सेंटिनलीज़ नाम के जनजातीय लोग रहते हैं जिनका दुनिया के बाक़ी हिस्सों से कोई मेलजोल नहीं है.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
सीटी बजाकर बुलाए जनजातीय लोग
अंडमान निकोबार द्वीपों के पुलिस प्रमुख एचजीएस धालीवाल ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया कि मिख़ाइलो पोलियाकोफ़ ने उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर उतरने से पहले जनजातीय लोगों को अपनी ओर बुलाने के लिए तट से कुछ दूर समंदर में अपनी नाव से लगभग एक घंटे तक सीटियां बजाई थीं.
"इसके बाद वह पांच मिनट के लिए किनारे पर उतरे और उन्होंने वहां मौजूद जनजातीय आबादी के लिए नारियल और केले रेत पर रखे और रेत का नमूना लेकर वापस आ गए. इसके साथ-साथ उन्होंने उस द्वीप पर अपने दौरे का वीडियो भी बनाया था."
दुनिया से कटी इस जनजाति की सुरक्षा के लिए काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन 'सर्वाइवल इंटरनेशनल' ने इस घटना को 'बेहद परेशान करने वाला' बताते हुए कहा कि इस तरह का काम उन जनजातीय आबादियों और पर्यटकों दोनों के जीवन को ख़तरे में डाल सकता है.
इस संगठन की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि यह अच्छी ख़बर है कि प्रतिबंधित क्षेत्र में जाने वाले व्यक्ति को गिरफ़्तार कर लिया गया है लेकिन यह ख़बर इस लिहाज से परेशान करने वाला है कि यह पर्यटक इस प्रतिबंधित द्वीप तक पहुंचने में कामयाब हो गया.
मिख़ाइलो पहले भी कर चुके थे कोशिश
अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि उन्हें इस घटना की जानकारी है और वह स्थिति पर नज़र रखे हुए है.
स्थानीय पुलिस के अनुसार मिख़ाइलो पोलियाकोफ़ पहले भी दो बार उस इलाक़े का दौरा करने की कोशिश कर चुके हैं. उन्होंने एक बार हवा वाली छोटी नाव में सवार होकर उधर जाने की कोशिश की थी और उन्हें पास के होटल के स्टाफ़ ने पकड़ लिया था.
दुनिया की जनजातीय आबादियों के संरक्षण के लिए काम करने वाले संगठन सर्वाइवल इंटरनेशनल ने इस बात पर ज़ोर दिया है कि इस तरह का संपर्क एक ऐसे समुदाय के लिए ख़तरा है जिसमें बाहर की दुनिया की बीमारियों जैसे ज़ुकाम और फ़्लू वग़ैरह से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता नहीं है.
'सर्वाइवल इंटरनेशनल' ने कहा है, "यह भारतीय प्रशासन की क़ानूनी ज़िम्मेदारी है कि वह सेंटिनलीज़ जनजातीय आबादी को धार्मिक प्रचारकों, सोशल मीडिया इनफ़्लुएंसर्स, ग़ैर क़ानूनी तौर पर वहां मछलियों का शिकार करने वालों और उनसे संपर्क करने की कोशिश करने वालों से बचाए."
सर्वाइवल इंटरनेशनल के प्रवक्ता जोनाथन माज़ोवर ने बीबीसी को बताया कि उन्हें डर है कि सोशल मीडिया के रुझान सार्वजनिक संपर्क से दूर रहने वाले जनजातीय समुदाय के लिए ख़तरे बढ़ा देंगे.
सेंटिनलीज़ ने कर दी थी अमेरिकी की हत्या
ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि सेंटिनल की जनजातीय आबादी से बाहर की दुनिया ने संपर्क बनाने की कोशिश की है.
अतीत में सेंटिनल की जनजातीय आबादी से संपर्क की कोशिशें कामयाब नहीं हुई हैं.
सेंटिनलीज़ जनजाति अतीत में कई बार साफ़ तौर पर इशारा कर चुकी है कि उसे बाहर की दुनिया से मेलजोल करने में कोई दिलचस्पी नहीं है.
बाहरी दुनिया की तरफ़ से उनसे मेलजोल की कोशिश पर उनका रवैया बेहद आक्रामक रहा है.
2018 में एक 27 वर्षीय अमेरिकी मिशनरी जालन एलन चाऊ ग़ैर क़ानूनी ढंग से उत्तरी सेंटिनल द्वीप पर उतरे थे.
भारत का क़ानून उस द्वीप के पास जाने की इजाज़त नहीं देता, इसलिए इस मामले की ना तो तफ़्तीश की जा सकी और न ही चाऊ की लाश वहां से लाई जा सकी थी.
इससे पहले वर्ष 2006 में भी दो मछुआरे उत्तरी सेंटिनल द्वीप के पास मछली का ग़ैर क़ानूनी शिकार करने के बाद द्वीप के किनारे से कुछ दूर समुद्र में अपनी नाव पर सो गए थे.
नाव का लंगर टूट गया और नाव बहकर द्वीप के किनारे पहुंच गई तो जनजातीय लोगों ने दोनों ही मछुआरों को मार डाला था.
इसी तरह करीब 20 साल पहले भारत के तटरक्षकों और सर्वाइवल इंटरनेशनल की ओर से जारी की जाने वाली एक तस्वीर में एक सेंटिनली जनजाति व्यक्ति को ऊपर से गुज़रने वाले एक हेलीकॉप्टर पर तीर ताने हुए दिखाया गया था.
उत्तरी सेंटिनल कहां है?
उत्तरी सेंटिनल अंडमान निकोबार के द्वीपसमूह में से एक है. यह हिंद महासागर की भारतीय समुद्री सीमा में स्थित है. अंडमान निकोबार उत्तर पूर्वी हिंद महासागर में 836 छोटे बड़े द्वीपों और चट्टानों का भारतीय क्षेत्र है.
उत्तरी सेंटिनल द्वीप आज भी दुनिया के लिए एक पहेली है और यहां आबाद लोगों को सेंटिनलीज़ कहा जाता है. यह द्वीप पूरी तरह से घने जंगलों से घिरा हुआ है. इसके चारों तरफ़ सफ़ेद रेत का समुद्री किनारा है.
यहां रहने वाले सेंटिनलीज़ जनजातीय लोग सबसे अलग थलग रहने वाले दुनिया से सबसे ज़्यादा कटे हुए हैं. इससे कुछ दूरी पर एक और द्वीप में शोम्पेन नाम की जनजातीय आबादी है जो उनकी तरह ही बाक़ी दुनिया से पूरी तरह कटी हुई है.
स्थानीय प्रशासन के अनुसार उनमें से 31 द्वीपों पर इंसान आबाद हैं. उत्तरी सेंटिनल द्वीप बाक़ी द्वीपों से अलग कुछ दूरी पर है जिसकी लंबाई लगभग दस किलोमीटर है.
सेंटिनलीज़ के रीति रिवाजों और उनकी भाषा के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है.
विशेषज्ञों का कहना है कि शायद यह अकेले ऐसे इंसान हैं जो हज़ारों साल पहले के पाषाण युग से निरंतरता के साथ जीवित हैं.
सर्वाइवल इंटरनेशनल के प्रवक्ता जोनाथन का कहना है कि सेंटिनलीज़ आबादी के बारे में कुछ बता पाना बहुत मुश्किल काम है. "उनकी आबादी के बारे में अंदाज़ा लगाया जाता है कि वह 50 से 200 लोगों के बीच हैं. वह तीन अलग समूहों में रहते हैं. यह लोग बिल्कुल स्वस्थ हैं. यह जनजाति जंगलों में जानवरों का और मछली का शिकार करके खाती है."
द्वीप के चारों तरफ़ समंदर में बहुत मछली पाई जाती है. सेंटिनलीज़ के बारे में बताया जाता है कि वह अपने द्वीप से बाहर नहीं निकलते और वह दूसरे द्वीपों के जनजातीय लोगों से भी पूरी तरह कटे हुए हैं.
भारत ने की थी सेंटिनलीज़ से संपर्क की कोशिश
भारत सरकार ने भी उत्तरी सेंटिनल द्वीप की आबादी सेंटिनलीज़ से संपर्क करने की कोशिश की थी लेकिन इसमें कामयाबी नहीं मिल सकी.
1991 में भारतीय अधिकारी नावों से समुद्र तट के पास पहुंचे थे. वह यहां की आबादी के लिए अपने साथ नारियल और केले ले गए थे.
पहली बार यहां के जनजातीय लोग अपने हथियारों के बिना उनके पास आए थे और उन्हें और तोहफ़े लाने का इशारा किया था. यह सिलसिला कुछ सालों तक चला.
द्वीप पर जाने वाले अधिकारियों का कहना था कि यह दोस्ताना कोशिशें भी ख़तरे से ख़ाली नहीं होती थीं क्योंकि जनजातीय लोग अक्सर अपनी कमान उनकी नावों पर ताने हुए होते थे. एक बार तो उन्होंने पत्थरों की कुल्हाड़ी से भारतीय अधिकारियों की नाव पर हमला भी कर दिया था.
कुछ अधिकारियों ने इन जनजातीय लोगों से संपर्क करने की कोशिश के बारे में सवाल उठाए तो 1996 में दूर से तोहफ़े गिराने का यह सिलसिला बंद कर दिया गया.
2004 में आई सुनामी के बाद भारतीय विशेषज्ञों ने सेंटिनलीज़ की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए द्वीप के पास दौरा किया था. उन्होंने समंदर में दूर से उनका जायज़ा लिया था. उनका मानना था कि सेंटेिनलीज़ स्वस्थ थे और उन्हें कोई परेशानी नहीं थी.
संपर्क से द्वीप की प्राचीन आबादी को ख़तरा
भारत सरकार ने हिंद महासागर में चीन की बढ़ती हुई गतिविधियों को देखते हुए ग्रेट निकोबार द्वीप के लिए मेगा डेवलपमेंट प्रोजेक्ट बनाया है.
इसके तहत एक बंदरगाह, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, बिजली घर और एक नौसैनिक अड्डा बनाने की योजना है. इसके साथ ही हज़ारों लोग भी यहां बसाए जाएंगे.
जोनाथन का कहना है कि अंडमान निकोबार के लिए जो विकास परियोजना बनाई गई है, ख़ास तौर से ग्रेट निकोबार में जो प्रोजेक्ट है, वह उन स्वतंत्र जनजातियों के अस्तित्व को ख़त्म कर देगा.
जोनाथन ने बीबीसी को बताया कि सेंटिनलीज़ से संपर्क स्थापित न करना उन्हें बचाने के लिए बेहद ज़रूरी है.
वह कहते हैं कि ब्रिटिश दौर में कम से कम ग्यारह ऐसे जनजातीय समूह थे जो बाहरी दुनिया से कटे हुए थे लेकिन बाहरी दुनिया से उनका संपर्क होने के बाद अब उनमें से केवल चार ही बचे हैं. इनमें से एक समूह सेंटिनलीज़ का है.
अगर उनसे बाहरी दुनिया का संपर्क स्थापित हुआ तो ख़तरा है कि यह प्राचीन मानव आबादी भी हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)