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चीनी गांव को अमरीका ने समझा मिसाइल गोदाम
ये दुनिया रंग-बिरंगी है. आप किसी भी देश में घूमने निकल जाएं, हमें हैरान करने वाले तमाम छोटे-बड़े अजूबे मिल जाते हैं. चीन को ही ले लीजिए. चीन के पूर्वी इलाक़े में स्थित फुजियान प्रांत में ऐसे ही अजूबे जंगलों और पहाड़ो के बीच छुपे हुए हैं.
ये अजूबे हैं मिट्टी के बने क़िले, जिन्हें स्थानीय भाषा में टुलो कहा जाता है. टुलो का मतलब होता है, मिट्टी की बनी इमारतें. ये कोई आम इमारतें नहीं हैं. असल में ये विशाल क़िले हैं, जिनके भीतर बस्तियां आबाद हैं. हर इमारत के अंदर कई-कई मुहल्ले बसे हुए हैं. बाहर से देखने पर कोई भी टुलो आपको आम मिट्टी की इमारत जैसा ही लगेगा.
शानदार इमारतों के भीतर...
मगर अंदर घुसने पर हमें पता चलता है कि ये तो क़िले जैसा है. अंदर मुहल्ले के मुहल्ले बसे हुए हैं. पूरी ज़िंदगी इन्हीं के भीतर गुज़रती है. आम तौर पर टुलो एक आंगन के इर्द-गिर्द बनाया जाता है.
इसके चारों तरफ़ घेरेबंदी जैसी करके तीन से चार मंज़िला इमारत खड़ी की जाती है. बाहर से ये बेहद मज़बूत होते हैं. किसी ख़तरे की सूरत में ये मज़बूत दीवारें, भीतर रहने वाले लोगों की सुरक्षा करती हैं. इन शानदार इमारतों के भीतर आबाद लोग, इन दीवारों के अंदर ख़ुद को और अपनी परंपरा को महफ़ूज़ रखते आए हैं.
सोलहवीं से बीसवीं सदी के बीच
बाहरी दुनिया के लोगों का इनके भीतर जाना मना था. टुलो के अंदर जाने पर आपको क़तार से बने लकड़ी के बने कमरे मिलेंगे. आम तौर पर ग्राउंड फ्लोर पर किचेन बने होते हैं. इनके ऊपर की मंज़िल पर अनाज रखने का इंतज़ाम होता है. इनके ऊपर की दो मंज़िलें बेडरूम के तौर पर इस्तेमाल होती हैं. सैकड़ों सालों से यहां लोग रह रहे हैं.
शीत युद्ध के दौरान इन क़िलों को अमरीका ने मिसाइल सिलो समझ लिया था, जहां मिसाइलें छुपाकर रखी गई थीं. बाद में जाकर इनकी सच्चाई दुनिया को पता चली. इन टुलो को सोलहवीं से बीसवीं सदी के बीच बनाया गया था. 2008 में यूनेस्को ने इन्हें विश्व धरोहर का दर्जा दिया था.
अंदर एक पूरी दुनिया
जब चीन में आर्थिक सुधार शुरू किए, तो इन टुलो में रहने वाले बहुत से लोग शहरों में जाकर बस गए. ये शानदार इमारतें वीरान होने लगी थीं. मगर जैसे-जैसे तरक़्क़ी हुई और इनकी शोहरत दूर-दराज़ तक फैली, यहां सैलानियों का आना शुरू हुआ.
2008 मे जब यूनेस्को ने फुजियान के ऐसे 46 टुलो को विश्व विरासत का दर्जा दिया तो यहां टूरिज़्म का विस्तार तेज़ी से हो गया. कभी ख़ुद को बाहरी लोगों की नज़रों से बचाने के लिए बनाए गए मिट्टी के इन क़िलों के दरवाज़े बाहरी लोगों के लिए खुल गए. अंदर एक पूरी दुनिया आबाद देखकर लोग हैरान रह जाते हैं.
टुलो की बढ़ती शोहरत
टूरिज़्म बढ़ा तो इन्हें छोड़कर बाहर बसने गए लोग भी वापस आने लगे. ऐसे ही एक शख़्स हैं, लिंग जोंग युआन. लिंग जोंग बीस बरस की उम्र में अपना कारोबार करने के लिए ग्वांगज़ो शहर में जाकर बस गए थे. मगर जब उन्हें टुलो की बढ़ती शोहरत का पता चला, तो वो वापस अपने टुलो चले आए.
वो यहां पर गॉरमेट टी यानी ख़ास तरह की चाय बेचने का कारोबार करते हैं. लिंग जोंग कहते हैं कि शहर में उनके कारोबार की पहुंच सीमित थी. जबकि टुलो को देखने के लिए लोग पूरी दुनिया से आते हैं. इसलिए उन्होंने यहां आकर अपना कारोबार शुरू कर दिया. आज इन टुलो को देखने के लिए बड़ी तादाद में लोग आते हैं.
किलाबंद बस्ती
इनके बीच लिंग जोंग का धंधा ख़ूब फल-फूल रहा है. लिंग जोंग, घर वापसी करने वाले यहां के अकेले बाशिंदे नहीं. वो तो कारोबार के लिए वापस आए हैं. मगर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो शहरों की ज़िंदगी से उकताकर इस क़िलाबंद बस्ती में रहने के लिए वापस आए हैं. 81 बरस के जियांग एन चिन ऐसे ही एक शख़्स हैं. जियांग यहीं पैदा हुए थे.
जवानी के दिनों में वो काम की तलाश में अपना टुलो छोड़कर चले गए थे. मगर, वो यहां रहने के लिए वापस आ गए हैं. जियांग कहने हैं कि शहरी ज़िंदगी में एकाकीपन बहुत था. यहां लोग एक-दूसरे से मिल-जुलकर रहते हैं. एक-दूसरे के साथ वक़्त बिताते हैं. बहुत मिलनसार होते हैं. इसीलिए वो अपने टुलो में रहने के लिए वापस आ गए.
शानदार इमारत
जियांग, इलाक़े के सबसे बड़े टुलो में रहते हैं. इसका नाम छंग छी लोग है, जिसे तमाम टुलो का राजा कहा जाता है. इसमें एक साथ कई गांव आबाद हैं. ये बेहद शानदार इमारत है. जियांग का परिवार कई पीढ़ियों से यहां रहता आया है. घर वापसी के बाद जियांग यहां हंसी-ख़ुशी से अपनी ज़िंदगी के आख़िरी वक़्त बिता रहे हैं.
वे यहां अपने परिवार की चार पीढ़ियों के साथ रहते हैं. चीन के लोग मेहमाननवाज़ी के लिए भी मशहूर हैं. यहां परंपरा के मुताबिक़ पूरा परिवार एक साथ खाना खाता है. जियांग शहर में शायद यही ज़िंदगी मिस कर रहे थे. टुलो में वापसी से उन्हें अपनी खोई हुई ज़िंदगी वापस मिल गई है. इन टुलो में सैलानियों का बहुत आना-जाना रहता है.
लेकिन यहां के बाशिंदे इससे परेशान नहीं होते. वो अपनी निजी ज़िंदगी में इस ताक-झांक को अच्छा मानते हैं. क्योंकि सैलानी आते हैं, तो उनका कारोबार बेहतर होता है. अगर सैलानियों का आना कम हो जाता है, तब यहां के लोगों को फ़िक्र हो जाती है. चीन के ये मिट्टी के क़िले, वाकई पूरब की सभ्यता के शानदार प्रतीक हैं.
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