इस विषय के अंतर्गत रखें जून 2011

भेद का भाव

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|बुधवार, 29 जून 2011, 18:25

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अमरीका में एक साल रहने के बाद मैं मुंबई वापस लौटने के लिए बेताब हो रहा था.

लेकिन पिछले अनुभव के कारण थोड़ा डर भी था कि घर मिलने में कठिनाई होगी. मुझे क्या पता था यह कठिनाई अपने समाज और देश से प्रेम की अग्नि परीक्षा बन जाएगी.

मकान ढूँढना शुरू किया. और मायूसी बढती गयी. घर तो कई पसंद आए, लेकिन यह देख और सुन कर मुझे बड़ा अफ़सोस हुआ कि मेरे धर्म के कारण मुझे कई लोगों ने घर देने से इनकार कर दिया.

वो भी उस इलाक़े में, जहाँ पढ़े-लिखे, दुनिया देखे लोग रहते हैं. मेरा 'सिंगल स्टेटस' भी एक बाधा साबित हुई.

इनकार करने वालों में हिंदू और ईसाई दोनों मज़हब के लोग थे. लेकिन आख़िरकार एक कैथोलिक जोड़ी ने मुझे अपना मकान किराए पर यह कह कर दिया कि वो बीबीसी के कारण हमें किराएदार बना रहे हैं.

इस भेदभाव का सामना करने के लिए मैं पहले से तैयार था, लेकिन भेदभाव इतना बढ़ जाएगा यह नहीं मालूम था.

मुंबई में हमारे कुछ साथियों ने मुझसे सहानुभूति जताई और कुछ ने कहा भेदभाव हर स्तर पर है. मुसलमान हिंदुओं को घर नहीं देते, हिंदू मुसलामानों को नहीं. शाकाहारी मांसाहारियों को घर किराए पर नहीं देते.

मेरे मुसलमान ब्रोकर ने कहा- सर अगर आप धारावी में किराए का घर लें, तो यह भेदभाव नहीं महसूस होगा. झोपड़ पट्टियों में हर धर्म के लोग एक साथ रहते हैं.

तो क्या पढ़ने-लिखने और प्रबुद्ध होने के बाद भेदभाव अधिक हो जाता है? क्या आपके पास इसका जवाब है?

शतक एक समर्पित और जुझारू क्रिकेटर का

मुकेश शर्मामुकेश शर्मा|शुक्रवार, 24 जून 2011, 13:57

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पिछले साल के अंत और इस साल की शुरुआत में हुए दक्षिण अफ़्रीका के दौरे में राहुल द्रविड़ के बल्ले से रन नहीं बने और तभी ये चर्चा शुरू हो गई थी कि अब शायद द्रविड़ को सम्मानपूर्वक संन्यास ले लेना चाहिए.

छह महीने बाद द्रविड़ एक बार फिर क्रिकेट पिच पर उतरे और पहले ही टेस्ट में उन्होंने जुझारू शतक लगाया.

ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ इस शतक के बाद उनके संन्यास की माँग करने वाले चुप हो जाएँगे या इसी शतक से द्रविड़ की महानता साबित होगी.

द्रविड़ के इस शतक में उनके पूरे व्यक्तित्व की झलक मिलती है. एक गंभीर, जुझारू और क्रिकेट के प्रति समर्पित खिलाड़ी.

द्रविड़ 39 साल के होने को हैं, लंबे सफ़र के बाद सिर्फ़ तीन दिन पहले वेस्टइंडीज़ पहुँचकर इस उम्र में साढ़े छह घंटे की पारी खेलते हुए शतक जड़ना वास्तव में द्रविड़ या उनके जैसे अनुभवी क्रिकेटर के बल्ले से ही हो सकता था.

ऐसे समय में जबकि विराट कोहली, सुरेश रैना या अभिनव मुकुंद जैसे युवा क्रिकेटर उनके साथ टीम में हैं द्रविड़ की ये पारी उन लोगों के लिए एक केस स्टडी जैसी होगी.

किस तरह गेंद को पैड पर जाने से रोकते हुए, पुल शॉट से बचते हुए उन्होंने ये शतक जड़ा.

द्रविड़, तेंदुलकर या लक्ष्मण का इस उम्र में क्रिकेट में बेहतरीन प्रदर्शन खेल के प्रति उनका समर्पण दिखाता है और यही वजह है कि उम्र उनके असली खेल को बहुत बुरी तरह प्रभावित नहीं कर पाई है.

इन खिलाड़ियों ने खेल के मैदान से जो सीख दी है वो दरअसल ज़िंदग़ी के किसी भी क्षेत्र में लागू की जा सकती है. आपका समर्पण आपको अपने कार्यक्षेत्र में पारंगत करने की ओर आगे बढ़ाएगा ही.

'वॉल' यानी दीवार कहे जाने वाले द्रविड़ के पिछले प्रदर्शन के बाद जब दीवार में दरारों की बात की जा रही थी तो उससे विचलित हुए बिना द्रविड़ ने ध्यान क्रिकेट पर ही दिया.

उनसे कुछ साल पहले एक कार्यक्रम के दौरान बंगलौर में हुई मुलाक़ात में उनकी विनम्रता से आमना-सामना हुआ और उस विनम्र खिलाड़ी के इस शतक पर मुझे आश्चर्य नहीं बल्कि ख़ुशी है.

सुपरस्टार अजन्मा शिशु

सलमा ज़ैदीसलमा ज़ैदी|गुरुवार, 23 जून 2011, 14:04

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सुप्रसिद्ध कवि और देश के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के अभिन्न मित्र हरिवंश राय बच्चन के पुत्र होने के बावजूद अमिताभ बच्चन को सुपरस्टार की पदवी पाने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा.

अमिताभ के बेटे अभिषेक बच्चन इस सम्मान से अब भी कोसों दूर हैं.

बच्चन परिवार से बाहर देखें तो राजेश खन्ना, सलमान, शाहरुख़, आमिर वग़ैरह भी आयु के तीसरे दशक में यह स्वाद चख पाए.

लेकिन धन्य है ऐश्वर्या राय की कोख में पल रहा शिशु जो जन्म लेने से पहले ही सुर्ख़ियों में छा गया है.

बिग बी ने ट्विटर पर इत्तिला की और बधाई संदेशों का ढेर लग गया. एक घंटे में हज़ारों प्रशंसकों ने ट्वीट कर के अपनी ख़ुशी का इज़हार किया.

टीवी चैनेलों को मसाला मिल गया. किसी ने पंडिताचार्य को बुला कर बच्चे की जन्मकुंडली बनवानी शुरू कर दी तो किसी और ने न्यूमरोलॉजिस्ट की राय ली कि अंकों के हिसाब से बच्चे का भाग्य कैसा होगा.

किसी ने क़यास लगाने शुरू किए कि गर्भ में पल रहा शिशु लड़का है या लड़की तो किसी ने अनुमान लगाया कि जुड़वां बच्चे भी हो सकते हैं.

होने वाले दादा ख़ुश हैं, दादी ख़ुश हैं, माता-पिता फूले नहीं समा रहे. इन सब से बढ़ कर प्रशंसक गदगद हैं.

दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत महिला बच्चे को जन्म देने जा रही है. माँ की सुंदरता और पिता का क़द पाने वाला यह बच्चा यक़ीनन पैदायशी सुपर स्टार होगा.

आश्चर्य होता है कि एक स्वाभाविक, प्राकृतिक प्रक्रिया दुनिया का सबसे बड़ा अजूबा भी बन सकती है. क्या यह सिर्फ़ बाज़ार की माया है या हमारा दीवानापन भी?

आज दफ़्तर आते समय कार की खिड़की से एक झुग्गी के बाहर, मैले कुचैले कपड़े पहने एक मज़दूरनी को अपने बच्चे को दुलराते देखा.

उस बच्चे के जन्म पर शायद थोड़ा-बहुत जश्न हुआ हो, लेकिन हंगामा तो हरगिज़ ही नहीं हुआ होगा.

लेकिन यह बच्चा अपने माँ-बाप, दादा-दादी का सुपरस्टार तो है ही.

हमारा आपका बने ना बने.

सरकारी यानी घटिया!

विनोद वर्माविनोद वर्मा|सोमवार, 20 जून 2011, 11:14

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तमिलनाडु के एक पिछड़े ज़िले इरोड के ज़िलाधीश यानी कलेक्टर डॉ आर आनंदकुमार ने अपनी छह साल की बेटी को एक सरकारी स्कूल में भर्ती करवाया है.

जब वे इस स्कूल में अपनी बच्ची के दाखिले के लिए पहुँचे तो दूसरे माँ-बाप की तरह कतार में खड़े हुए.

दिल्ली के एक अख़बार में इस ख़बर का प्रकाशित होना ही साबित करता है कि यह कुछ असामान्य सी बात है.

यक़ीनन ज़िलाधीश को उनके साथी अधिकारियों ने समझाया भी होगा. लेकिन वे नहीं माने. उन्होंने अख़बार से भी बात करने से इनकार कर दिया कि ये उनका निजी फ़ैसला है.

किसी अफ़सर की बेटी सरकारी स्कूल में, आम लोगों के बच्चों के साथ कैसे पढ़ सकती है?

वहाँ किसानों और मज़दूरों के बच्चे पढ़ते हैं, उस सर्वहारा वर्ग के बच्चे जिनके लिए दो जून की रोटी के बाद इतना पैसा बचता ही नहीं कि वे सरकारी स्कूल के अलावा कहीं और अपने बच्चे को पढ़ा सकें.

अब सरकारी स्कूल में किसी अफ़सर, नेता, व्यापारी, उद्योगपति, डॉक्टर और ऐसे ही किसी ऐसे व्यक्ति के बच्चे नहीं पढ़ते जो उच्च या मध्यवर्ग में आते हैं. जो महंगे निजी स्कूल में नहीं जा सकते वो किसी सस्ते निजी स्कूल में जाते हैं, लेकिन सरकारी स्कूल में नहीं जाते.

ठीक वैसे ही जैसे इस वर्ग के लोग और उनके रिश्तेदार सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए नहीं जाते. एम्स और पीजीआई जैसे कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन वहाँ भी वो तब जाते हैं जब जेब जवाब दे जाती है या और कोई चारा नहीं होता.

वो सरकारी बसों में नहीं चढ़ते, सरकारी डाक व्यवस्था के इस्तेमाल को भरसक टालते हैं. वो सरकारी कंपनियों के उत्पाद नहीं ख़रीदते यहाँ तक कि टेलीफ़ोन जैसी सुविधा में भी निजी कंपनी को तरजीह देते हैं.

सरकारी के नाम पर वे रेल और सड़क जैसी गिनी चुनी चीज़ों का ही इस्तेमाल करते हैं. वो भी इसलिए कि उसका विकल्प नहीं है.

एक प्रोफ़ेसर का आकलन है कि संपन्न वर्ग को तो छोड़ दीजिए अब मध्यवर्ग के लोग भी हर उस सुविधा के इस्तेमाल को अपनी तौहीन समझते हैं जो सरकारी है.

हालात इतने ख़राब हैं कि यदि कोई व्यक्ति पैसा खर्च करने में ज़रा सा भी सक्षम है तो वह सरकारी कंडोम पर भी भरोसा नहीं करता.

वैसे तो ये सरकार के लिए चिंता की बात होनी चाहिए लेकिन सरकार को चलाने वाले राजनेता और अधिकारी दोनों को इसकी चिंता नहीं दिखती.

न्यायालयों को इस बात पर चिंता ज़ाहिर करते नहीं देखा कि सरकारी स्कूल इतने बदहाल क्यों है कि हर कोई अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में भेजने से कतराता है. भेजता वही है जिसके पास विकल्प नहीं है या दोपहर को मिलने वाले उस भोजन की चिंता है जो न्यायालय के कहने पर सरकारी स्कूलों में बाँटा जा रहा है.

आज से दो दशक पहले स्थिति इतनी ख़राब नहीं थी. यक़ीन न हो तो उन राजनेताओं, अधिकारियों और न्यायाधीशों से बात करके देखिए जो आज से बीस साल पहले किसी छोटे शहर के प्रायमरी स्कूल में पढ़ते थे. उनमें से अधिकांश आपको किसी न किसी सरकारी स्कूल में पढ़े हुए मिल जाएँगे. उनका जन्म किसी न किसी सरकारी अस्पताल में हुआ होगा.

लेकिन आज क्या वे अपने बच्चों का जन्म किसी सरकारी अस्पताल में होने की कल्पना कर सकते हैं? क्या वे अपने बच्चे को किसी सरकारी स्कूल में पढ़ने भेजेंगे?

ये आज़ादी के बाद के पाँचवें और छठवें दशक में सरकारी व्यवस्था में हुए पतन का सबूत है. ये सरकारी प्रश्रय में निजी व्यवसाय के पनपने का सबूत भी है. ये नेहरू के समाजवादी भारत का मनमोहन सिंह के पूंजीवादी भारत में तब्दील हो जाने का सच है.

हमने अपनी आँखों से देखा है कि सरकारी अमला किस तरह से एक सरकारी व्यवस्था को धीरे-धीरे इसलिए ख़राब करता है ताकि उसके बरक्स निजी बेहतर दिखने लगे और आख़िर सरकारी व्यवस्था दम तोड़ दे या फिर उसका निजीकरण किया जा सके.

तमिलनाडु के ज़िलाधीश की बच्ची के सरकारी स्कूल में जाते ही सरकारी अमले ने उस स्कूल की सुध लेनी शुरु कर दी है. पक्का है कि अगर ज़िलाधीश की बच्ची वहाँ दो चार साल पढ़ पाई तो उसका नक्शा और स्तर सब बदल जाएगा.

लेकिन यह एक अपवाद भर है.

परिस्थितियाँ तो उस दिन बदलेंगीं जिस दिन हर राजनेता और अधिकारी अपने बच्चों को ऐसे ही सरकारी स्कूलों में भेजने का फ़ैसला कर ले.

यह समय है जब हम भ्रष्टाचार जैसी व्यापक समस्या के बारे में बात करते हुए ये भी सोचें कि जो कुछ भी सरकारी है वह धीरे-धीरे निकृष्ट क्यों होता जा रहा है और सिवाय सरकारी नौकरी के.

हम सब चुप क्यों हैं?

'बदचलन' औरतों की परेड

'बदचलन औरत', ये एक ऐसा जुमला है जिसके चिपकते ही अदालतों के फ़ैसले बदल जाते हैं.

लंदन में शनिवार को लगभग पाँच हज़ार औरतें जान-बूझकर कम कपड़े पहनकर जुलूस की शक्ल में निकलीं, इसे 'स्ल्टवाक' कहा गया.

शब्दकोशों के मुताबिक स्ल्ट का अर्थ है--कुलटा, बदचलन, चरित्रहीन, पतिता आदि...पुरुषों के लिए ऐसे शब्दों का नितांत अभाव है.

रंगीन मिजाज़ और रसिक जैसे शब्दों को ठीक ऊपर वाले शब्दों के मुक़ाबले रखकर देखें तो बात अपने-आप समझ में आ जाएगी.

फिर महिलाओं ने ख़ुद के लिए ऐसा अपमानजनक शब्द क्यों चुना, इस मुहिम की आयोजकों का कहना है कि वे स्ल्ट शब्द का इस्तेमाल करके दोहरे मानदंड वाले पुरुषों को शर्मिंदा करना चाहती हैं जिन्होंने उन्हें यह नाम दिया है.

बहरहाल, 'स्ल्टवाक' एक विरोध प्रदर्शन है जिसकी शुरूआत कनाडा से हुई जहाँ एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि यौन उत्पीड़न से बचने के लिए महिलाओं को स्ल्ट जैसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए.

इसके बाद स्ल्टवाक के ज़रिए दुनिया के कई देशों में एक मुहिम चल पड़ी है, आयोजकों का कहना है कि पीड़ित को ही दोषी साबित करने की यह साज़िश बंद होनी चाहिए.


'हमें नहीं, बलात्कारी को सज़ा दो', 'हम चाहें जो पहनें, हमारी ना का मतलब ना है'...ऐसे नारों के बीच परेड की आयोजकों का कहना था कि आज भी यूरोप और अमरीका की अदालतों में बलात्कार के मामलों में पीड़ित महिला के कपड़ों और चाल-चलन पर बहस होती है जो शर्मनाक और अस्वीकार्य है.

इस तरह की परेड से आप सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन प्रतिरोध के तरीक़े को किनारे रखकर एक बार मुद्दे पर ग़ौर करिए.

यह विकसित देशों का कोई फैंसी मुद्दा नहीं है, भारत में भी यह समस्या विकराल है, महिलाओं के साथ यौन दुर्व्यवहार के बाद उन्हें ही दोषी ठहराने की प्रवृत्ति हमारे समाज में घर कर चुकी है.


स्ल्टवाक जैसे परेड का जो राजनीतिक संदर्भ है वह पश्चिमी देशों में अधिक समझ में आता है, भारत में नाम भले ही 'डीसेंट वाक' रख लें, पूरे कपड़े पहनकर विरोध करें लेकिन इस प्रवृत्ति का प्रतिकार तो होना ही चाहिए, तरीक़ा आप ख़ुद तय करें.

हंगामा है क्यों बरपा

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|रविवार, 12 जून 2011, 14:50

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सुषमा स्वराज की समझ में ही नहीं आ रहा कि उनके नाच पर इतना हंगामा क्यों मचा हुआ है.

राजघाट में प्रदर्शन के दौरान वह 'नया दौर' के गाने 'ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का' पर क्या नाचीं काँग्रेस ने उनकी पार्टी को 'नचनियों की पार्टी' घोषित कर दिया.

भारतीय राजनीति में नाचना गुनाह क्यों है?

अगर बराक ओबामा मुंबई के एक स्कूल में शरमाते हुए दो क़दम थिरक सकते हैं, हिलेरी क्लिंटन कीनिया में एक भोज के बाद नर्तकों की एक टोली के साथ नाच सकती हैं और मिशेल ओबामा बियोंका के गाने 'मूव यॉर बॉडी' पर एक पेशेवर नर्तकी की तरह कमर मटका सकती हैं तो सुषमा स्वराज क्यों नहीं?

भारत में भी इंदिरा गाँधी, शीला दीक्षित और सोनिया गाँधी को भी कई बार सार्वजनिक तौर पर नाचते हुए देखा गया है.

हाँ, वर्ष 1966 में ज़रूर जब इंदिरा गाँधी अमरीका की राजकीय यात्रा पर वॉशिंगटन गई थीं तो भारत के राजदूत बीके नेहरू के निवास स्थान पर भोज के बाद तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने इंदिरा के साथ नाचने की इच्छा प्रकट की थी. लेकिन उन्होंने मुस्कराते और थोड़ा लजाते हुए उनकी यह पेशकश ठुकरा दी थी कि भारत में लोग क्या कहेंगे.

वैसे भारत में नाचने वालों की कमी नहीं है.इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उमर अब्दुल्लाह ने सुषमा स्वराज को खुले आम चुनौती ही दे डाली कि उनके पिता फ़ारूख़ अब्दुल्लाह उनसे बेहतर नाचते हैं.

नाच गाने के अलावा फ़ारूख़ एक बार मोटर साइकिल की पिछली सीट पर शबाना आज़मी को डल झील की सैर कराने के लिए भी सुर्ख़ियों में आ चुके हैं.

सुषमा के नाच के अगले दिन भारतीय मीडिया में इस बात पर बहस शुरू हो गई कि क्या सुषमा का राजघाट पर नाचना उचित था?

आख़िर सुषमा किसके लिए नाच रहीं थी? जवाब कई हो सकते हैं.

भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए, बाबा रामदेव को रामलीला मैदान से हटाने के लिए जिस तरह सुबह तक का इंतज़ार नहीं किया गया उसके ख़िलाफ़ विरोध प्रकट करने के लिए या फिर बोर हो चुके कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए वगैरह वगैरह.

भारतीय संस्कृति में शिव के तांडव नृत्य की बड़ी अहमियत है.बाहर से यह नृत्य थोड़ा डरावना ज़रूर लगता है लेकिन वास्तव में यह सृजन और संरक्षण का प्रतीक है.

लेकिन कभी कभी यही तांडव विध्वंस की विभीषिका का चित्र भी प्रस्तुत करता हुआ पतन का जनक भी बन जाता है.

यह ख़तरा सुषमा स्वराज और विपक्ष के दूसरे राजनीतिक दलों के साथ हमेशा रहेगा जो अल्पकालीन राजनीतिक फ़ायदे के लिए बाबाओं की धुन पर नाचने के लिए मजबूर होते हैं.

चलेंगे हम भी कभी सर उठा के...

आख़िर मरना तो सभी को है लेकिन पाकिस्तानी पत्रकार सलीम शहज़ाद को जल्दबाज़ी में नहीं मारा गया...हत्यारे नें उन्हें सुधरने का अवसर दिया होगा. लेकिन सलीम शहज़ाद दिमाग़ से ज़्यादा दिल से काम लेते थे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर अमल करते थे.

पत्रकारिता की परिभाषा के तहत ही काम करते थे. सलीम शहज़ाद को शायद पता नहीं था कि पाकिस्तानी समाज में अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के मूल सिद्धांतों और शायद पत्रकारिता की परिभाषा के ज़्यादा मायने रह नहीं गए हैं.

पत्रकार का काम सच लिखना है लेकिन ऐसा कई लोगों को नागवार गुज़रता है. सलीम शहज़ाद को किसने मारा यह सब जानते हैं और ये भी कि इस तरह के कारनामों को पाकिस्तान में कौन अंजाम देता है.

शहज़ाद से नाराज़गी एक ख़बर के बारे में थी. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में अल क़ायदा और पाकिस्तानी नौसेना के कुछ अधिकारियों के बीच कथित संबंधों का उल्लेख किया था. उन्होंने घर के भेदी को जनता के सामने लाने की कोशिश की था. नतीजा ये कि इसके कुछ ही दिन बाद वे अचानक ग़ायब हो गए और फिर उनका शव मिला.

अनेक पर्यवेक्षक और जानकार मानते हैं कि निस्संदेह पाकिस्तानी सत्ता व्यवस्था और कुछ चरमपंथी तत्वों के बीच संबंध हैं. कराची में नौसेना के ठिकाने पर हमला हुआ तो नौसैनिक अड्डे के भीतर से ही चरमपंथियों को मदद भी मिली. उससे पहले 2009 में सेना के मुख्यालय पर हमला हुआ था तो उस समय भी कुछ सैन्य अधिकारियों ने हमलावरों को संवेदनशील जानकारी दी थी.

पत्रकारों ने जब भी इन मुद्दों पर या फिर सेना के ख़िलाफ़ लिखा है तो वह कम से कम कुछ दिनों के लिए आईएसआई के महमान ज़रूर बने हैं. हम भी दो बार वहाँ चाय पी चुके हैं. ख़ुशकिस्मती है कि आज भी आपके लिए हम आज भी आप के लिए लिख रहे हैं. बलूचिस्तान के तो मेरे कुछ ऐसे मित्र हैं जिनका अभी तक कोई पता ही नहीं चल सका है. आईएसआई के अधिकारी जब भी पत्रकारों से मिलते हैं तो उन्हें यह कहते हैं कि राष्ट्रीय हित में 'इस प्रकार की' ख़बरें नहीं लिखनी चाहिए.

ऐसा लगता है कि चरमपंथियों और सेना के संबंध भी राष्ट्रीय नीति का हिस्सा हैं.

बहरहाल पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसियाँ जिस तरह से पत्रकारों के साथ व्यवहार कर रही हैं उसे देखते हुए हम सलीम शहज़ाद से हबीबी जालिब की एक कविता ही सुना सकते हैं:

ज़माना एक सा जालिब सदा नहीं रहता
चलेंगे हम भी कभी सर उठा के रस्ते में....

पुरानी-देसी सभ्यता के डूबते हुए टापू

राजेश जोशीराजेश जोशी|सोमवार, 06 जून 2011, 13:00

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दिल्ली के कनॉट प्लेस में आप नई उम्र के बच्चों को अक्सर ये कहते हुए सुन सकते हैं कि अंकल डेढ़ कितना होता है, लेकिन जमना पार करके नोएडा होते हुए भट्टा-पारसौल और आगे निकलें तो पाएँगे कि देहातों की अपनी बोली-बानी अभी ज़िंदा हैं.

ग्रेटर नोएडा से आगरा के बीच 165 किलोमीटर लंबे यमुना एक्सप्रेस हाईवे के किनारे किनारे सफ़र करके अभी तीन-एक दिन पहले ही लौटा हूँ. वहाँ अब भी कोस-कोस पर पानी बदला हुआ होता है और चार कोस पर बानी भी बदल जाती है.

जून की तपती और सुनसान दुपहरी में घरबरा गाँव के नुक्कड़ पर बैठकर बाघ-बकरी खेलता हुआ बेरोज़गार नौजवान शिकायत करता है -- 'नौकरी तो है ना और जमीन ले ली जेपी ने... क्या करेंगे? सोलह गोटी खेलैंगे. और क्या करेंगे?'


farmers protest in western uttar pradesh

यमुना एक्सप्रेस हाईवे उसके गाँव के पास से गुज़रता है, जिसके दूसरी ओर जेपी एसोसिएट्स कंपनी रेस-ट्रैक बना रही है जहाँ फ़ॉर्मूला-वन की कारें दौड़ेंगी. गाँव के तमाम किसानों की ज़मीनें इस विकास को समर्पित हो गई हैं. विकराल राज्य मशीनरी से किसानों की टक्कर जारी है. पिछले साल टप्पल में गोली चली और इस साल सात मई को भट्टा-पारसौल में लोग मारे गए.

किसानों के दुख और ग़ुस्से का एक ही रंग है स्याह -- पर बोलियाँ अलग अलग.

आगे के गाँवों में रहने वाले किसानों की भी शिकायत वही है - धोखाधड़ी, ज़ोर-ज़बरदस्ती करके ज़मीन छीन ली सरकार ने. लेकिन बातचीत में मेरे-तेरे की जगह ब्रजभाषा की मीठी मोए-तोए घुल जाती है. 'मोए का पतो कि जमीन क्यों ले रइयै मायावती. हमतै तो कोई पूछतो भी नईं. जबरदस्ती धारा लगाय दई. हमें पतो भी नाय चलो. हमतै कौन पूछ रओ है.'

ये किसान समाज एक युगांतर पर खड़ा है. उसके एक ओर उसका गाँव है, गोशाला है, मंदिर है, सामाजिक संबंध हैं तो दूसरी ओर आलीशान हाई-वे है, ग्राँ-प्री कार रेस ट्रैक है, शॉपिंग मॉल्स, स्टेडियम, चमकदार आइ-टी हब्स, मल्टीप्लैक्सेज़, गॉल्फ़ कोर्स और लक्ज़री हाउसिंग है.

समुद्र में उठते ज्वार की तरह नए ज़माने की ये सुविधाएँ गाँवों को चारों ओर से घेरती जा रही है. गाँव अब पुरानी-देसी सभ्यता के टापू जैसे रह गए हैं. धीरे-धीरे डूबते हुए टापू.

एक तरह की कॉलोनियाँ बन रही हैं, उनमें एक लहजे में बोलने वाले आएँगे.. जो एक तरह का संगीत सुनेंगे और प्रेम संबंधों के बारे में एक तरह की राय रखेंगे.

ऐसे में देहाती संस्कृति का कोई एक आध टापू बचा भी रह सकता है. अगर बीस साल बाद वहाँ का बच्चा पूछे कि अंकल डेढ़ कितना होता है तो अचरज मत करना.

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