'बदचलन' औरतों की परेड
'बदचलन औरत', ये एक ऐसा जुमला है जिसके चिपकते ही अदालतों के फ़ैसले बदल जाते हैं.
लंदन में शनिवार को लगभग पाँच हज़ार औरतें जान-बूझकर कम कपड़े पहनकर जुलूस की शक्ल में निकलीं, इसे 'स्ल्टवाक' कहा गया.
शब्दकोशों के मुताबिक स्ल्ट का अर्थ है--कुलटा, बदचलन, चरित्रहीन, पतिता आदि...पुरुषों के लिए ऐसे शब्दों का नितांत अभाव है.
रंगीन मिजाज़ और रसिक जैसे शब्दों को ठीक ऊपर वाले शब्दों के मुक़ाबले रखकर देखें तो बात अपने-आप समझ में आ जाएगी.
फिर महिलाओं ने ख़ुद के लिए ऐसा अपमानजनक शब्द क्यों चुना, इस मुहिम की आयोजकों का कहना है कि वे स्ल्ट शब्द का इस्तेमाल करके दोहरे मानदंड वाले पुरुषों को शर्मिंदा करना चाहती हैं जिन्होंने उन्हें यह नाम दिया है.
बहरहाल, 'स्ल्टवाक' एक विरोध प्रदर्शन है जिसकी शुरूआत कनाडा से हुई जहाँ एक पुलिस अधिकारी ने कहा कि यौन उत्पीड़न से बचने के लिए महिलाओं को स्ल्ट जैसे कपड़े नहीं पहनने चाहिए.
इसके बाद स्ल्टवाक के ज़रिए दुनिया के कई देशों में एक मुहिम चल पड़ी है, आयोजकों का कहना है कि पीड़ित को ही दोषी साबित करने की यह साज़िश बंद होनी चाहिए.
'हमें नहीं, बलात्कारी को सज़ा दो', 'हम चाहें जो पहनें, हमारी ना का मतलब ना है'...ऐसे नारों के बीच परेड की आयोजकों का कहना था कि आज भी यूरोप और अमरीका की अदालतों में बलात्कार के मामलों में पीड़ित महिला के कपड़ों और चाल-चलन पर बहस होती है जो शर्मनाक और अस्वीकार्य है.
इस तरह की परेड से आप सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन प्रतिरोध के तरीक़े को किनारे रखकर एक बार मुद्दे पर ग़ौर करिए.
यह विकसित देशों का कोई फैंसी मुद्दा नहीं है, भारत में भी यह समस्या विकराल है, महिलाओं के साथ यौन दुर्व्यवहार के बाद उन्हें ही दोषी ठहराने की प्रवृत्ति हमारे समाज में घर कर चुकी है.
स्ल्टवाक जैसे परेड का जो राजनीतिक संदर्भ है वह पश्चिमी देशों में अधिक समझ में आता है, भारत में नाम भले ही 'डीसेंट वाक' रख लें, पूरे कपड़े पहनकर विरोध करें लेकिन इस प्रवृत्ति का प्रतिकार तो होना ही चाहिए, तरीक़ा आप ख़ुद तय करें.

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राजेश जी आप भी कहां विदेशी लोगों की तुलना भारतीयों से कर बैठे. हम भारतीय विदेशियों की नक़ल ज़रूर करना जानते हैं लेकिन अक़्ल से काम करने की कोशिश नहीं करते. विदेशों के समाज में खुलापन हैं लेकिन यहां का समाज उससे कोसो दूर है.रही बात प्रतिकार करने की तो हम प्रतिकार करते रहें पर उसकी परवाह कौन करता है. यहां बलात्कार होता है तो उसे ही सिद्द करना पड़ता है कि उसके साथ इस तरह बलात्कार हुआ. यहां मतदाता सूची में से नाम हट जाता है तो उसे ही सिद्द करना पड़ता है कि वो अभी ज़िंदा है. यहां राम तेरी गंगा मैली की जा रही है लेकिन गंगा को ही साबित करना पड़ेगा कि वह मैली नहीं है.
बिल्कुल सही समय पर आपने एक सुंदर विषय और सकारात्मक सोच का ब्लॉग प्रस्तुत किया है. शिक्षित करने का सही तरीक़ा है.फिर भी जो बात पश्चिम का समाज समझ सकता है, भारत के परिपेक्ष्य में सटीक समझना आम लोगों के लिए संभव नहीं है.प्रयास सराहनीय है.
कपड़े से पता नहीं चलता है कि यह क्या है. कपड़े सुविधा और सरलता के हिसाब से पहने जाते हैं. मनुष्य के अंदर जो संस्कार होता है उसका व्यवहार भी वैसा ही होता है.
अगर कोई इन्सान अपने सामान की सही से हिफाज़त न करे तो उसे लापरवाह कहा जाएगा. इसी तरह से अगर महिलाएं अपनी इज्ज़त की परवाह ख़ुद न करके, दूसरे पुरुषों से यह उम्मीद करें की वह उनकी तरफ आकर्षित न हों, यह संभव ही नहीं है. पुरुष समाज बड़ा चालाक है वह जो चाहता है महिलाओं से करा लेता है. पुराने समय में ज़बरदस्ती और अब महिलाओं की आज़ादी और सौन्दर्य प्रतिस्पर्धाओं के नाम पर. हमेशा महिलाएं बेवक़ूफ़ बन कर पुरुषों के लिए तमाशा बनती हैं. महिलाओं के विरोध का यह तरीक़ा भी पुरुषों के लिए मुहं मांगी मुराद है.
राजेश जी आपका लेख तो बहुत अच्छा है लेकिन एक बात समझ में नहीं आती है कि बीबीसी या बीबीसी के पत्रकार हर मुद्दे को पश्चिम से क्यों तुलना करते हैं. एक ज़माना था भारत में बच्चे और बच्चियां साथ साथ कम कपड़ों में खेलते थे और साथ साथ रहते थे. लेकिन आज तो माहौल ही बदल गया है. 99 प्रतिशत बलात्कार के मामले आपस में मिलकर होते हैं.
ये जो हो रहा है उसे बहुत पहले होना चाहिए था. फिर भी ठीक है कि हो रहा है. मर्दों का समाज आज भी ख़ुद को ताक़तवर समझता है जो सोचता है कि वह ग़लत नही. मैं पूछता हूं किसी आदमख़ोर जानवर की नज़र में किसी का कम या ज़्यादा कपड़े पहनना क्या मायने रखता है, उसे तो शिकार ही चाहिए ना बस. अब बहुत हो गया इस मानसिकता का विरोध होना ही चाहिए, एक सभ्य समाज में इसकी कोई जगह नहीं हो सकती. सबको अपने हिसाब से रहने, आने जाने, खाने पीने की आज़ादी है.
किसी को भी ये अधिकार नहीं होना चाहिए कि वो सामने वाले के कपड़े तय करे चाहे वो फ़्रांस की सरकार क्यों ना हो. पीड़ित को दोषी साबित करना एक जघन्य अपराध है, इसके विरोध में आवाज़ उठाना आवश्यक है नाकि कम कपड़े पहनकर अपना मज़ाक़ उड़ाना.
राजेश जी आपने लंदन में आयोजित स्ल्टवॉक के संदर्भ में महत्वपूर्ण सवाल उठाया है.एक ऐसा सवाल जो महिला और पुरूष से उस तरह सीधे सम्बन्धित नहीं है, जैसा कि इसे पेश किया जाता रहा है.इसी कारण अब तक इसका कोई जबाब भी नहीं मिल पाया है केवल इतना भर होता है कि कुछ महिलावादी पुरूष विरोध से भर जाते हैं और प्रतिक्रिया में लगभग वैसा ही नज़रिया कुछ महिलाएं भी पुरूषों के प्रति भी फैलाने का काम करती हैं.मूल में यह समस्या का समाधान नहीं बल्कि नासमझी में उसका ही विस्तार करने जैसा होता है. वास्तव में ऐसा मानसिक असंतुलन के कारण होता है जबकि किसी महिला में हम केवल देह देखने लगते हैं तो यह नज़रिया पूरी तरह विकारग्रस्त होता है.तब ऐसे लोग तर्क देते हैं कि महिला अंग प्रदर्शन कर रही है, इसका मतलब है कि वह बदचलन है. और उसके बदचलन होने की गुंजाइस होते ही हमारा परम कर्तव्य बन जाता है कि हम पहले राक्षस बन जांए, उसके बाद ही कुछ विचार किया जा सकता है.ऐसे तर्क देने वाले यह नहीं देखते हैं कि जिस भावना में वशीभूत होकर हम राक्षस बन गए उससे उस महिला का कुछ भी लेना-देना नहीं था.उसे तो शायद पता भी न हो. हमारे अन्दर जो भावना है ही नहीं उसे कोई भड़काने का कोई उपाय किसी के पास नहीं है.कितनी ही मूल्यवान वस्तु पड़ी हो तो भी हमारे भीतर यदि चोर भावना नहीं होगी तो हम उसे चुराने की बात सोच ही नहीं सकते और यदि कहीं अवसर न भी मिले तो चोर व्यक्ति के चिंतन में चोरी चलती ही रहेगी इसमें उस वस्तु का कोई दोष नहीं होगा. कुछ लोग कामवासना को स्वाभाविक प्रवृत्ति बताकर इसे स्वाभाविक बताने की कोशिश भी करते हैं. यदि इस वासना को प्रवृत्ति मान भी लिया जाए तो फब्ती कसने, धक्कामुक्की करने का अधिकार तो मनुष्य की प्रकृति नहीं कही जा सकती है.यह तो खुलेआम हिंसा है.फिर इसे जायज़ कैसे ठहराया जा सकता है? हमारे समाज में भी इस तरह की चर्चा होती रहती है कि इतने वैश्यालय हैं लेकिन बिना बदचलन पुरूषों के ये एकदिन भी नहीं चल सकते हैं. इसलिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि एक भी व्यक्ति पतित है तो उसकी ज़िम्मेदारी पूरे समाज पर है.कोई इससे बच नहीं सकता है. न महिला ग़लत है और न ही पुरूष जो भी नीचता करे उसे मानसिक चिकित्सालय भेज दिया जाए और समाज के नीति निर्धारकों पर इसकी ज़िम्मेदारी हो.
भारत में जो चल रहा है क्या सही चल रहा है, यहाँ कौन सा चलन सही दिखाई देता है, आप बलात्कार की ही बात क्यों कर रहें हैं, यहाँ तो सभी काम बदचलनी के हो रहे हैं. विदेशियों का जो चलन है वह उनका है, हम उनकी तरह चल ही नहीं सकते. यहाँ परेड करने से भी बात नहीं बनेगी, वहाँ बन जाती है, यही तो समझ का फेर है.
आपने जो विषय चुना है वह बहुत ही अच्छा है. भारत ही नहीं पूरी दुनिया में औरतों को ही हर ग़लत काम का दोषी ठहराया जाता है, मैंने अख़बार में पढ़ा था कि दिल्ली में भी ये परेड होने वाली है, क्या ये सच है?
मैं इस पूरे 'स्लटवॉक' प्रकरण को तर्कसंगत नहीं ठहरा पा रहा. महिलाएं ये सवाल उठा रही हैं कि उन्हें मनमुताबिक कपड़े पहनने की आज़ादी होनी चाहिए. लेकिन क्या वो पुरुष का भी ऐसा ही आचरण स्वीकार करने को तैयार होंगी. अगर पुरुष भी उनके सामने कम कपड़ों में आएं तो क्या उन्हें स्वीकार होगा. क्या वे उन पुरुषों पर यौन अशुचिता का आरोप नहीं लगाएंगी?
आपका लेख अच्छा है लेकिन आप पूर्व पश्चिम के फेर में क्यों पड़ गए हैं. मैं इसे सिर्फ़ पुरुषों की सोच नहीं मानता. महिलाएं भी यही सोचती हैं. क्या कोई मां अपने बेटे की शादी बलात्कार पीड़ित लड़की से करना चाहेगी. अगर घर की सारी महिलाएं एक होकर ऐसे मामलों में फ़ैसले करें तो बेचारे पुरुष क्या कर लेंगे?
ये सच है कि एक बलात्कार से पीड़ित महिला की मनोदशा का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है. लेकिन बलात्कार का कारण छोटी स्कर्ट पहनना है ये कहना पूरी तरह न्यायोचित नहीं होगा. एक पुरुष एक महिला से ज़बर्दस्ती कर सकता है लेकिन बलात्कार करना बहुत मुश्किल होगा जब तक कि महिला की सहमति न हो. हां कुछ अपवाद ज़रूर हो सकते हैं जहां महिला मजबूर हो या अकेली महिला चार-पांच पुरुषों से भिड़ रही हो. इसलिए बलात्कार का सेहरा सिर्फ़ पुरुषों के सर पर ही क्यों पहनाया जाता है?
व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि भारत और पाकिस्तान में महिलाओं के प्रति लोग अच्छा नज़रिया नहीं रखते.
लंदन में महिलाओं द्वारा समाज की दोहरी मानसिकता पर लोगों का ध्यान आकृष्ट करने के उद्देश्य से प्रदर्शन किया गया है। यह विरोध जाहिर करता है कि इस मुद्दे पर सार्थक बहस की अब कोई गुंजाइश नहीं रह गई है. इसी कारण लोगों के बीच इस बात को लाने के लिए इस प्रकार का प्रदर्शन ही एकमात्र उपाय रह गया है। इसलिए इन महिलाओं के साहस और समझदारी कर सराहना की जानी चाहिए। जब परम्परागत तरीकों से बात न बने तो लीग से हटकर इस प्रकार के प्रयास न सिर्फ रचनात्मकता का सबूत हैं बल्कि इससे उस बैचैनी का भी पता चलता है जो समस्या का तुरन्त और प्रभावी समाधान चाहते हैं ।इस सवाल को कुछ लोग पुरूष मानसिकता से जोडने की कोशिश करते है। यह समस्या का बहुत ही सरलीकरण है।समाज में यदि कोई विकृति है तो यह समाजिक समस्या है न कि किसी जाति,धर्म,सम्प्रदाय या स्त्री पुरूष से सम्बन्धित है।समस्या को उसकी सम्पूर्णता में ही देखा जाना चाहिए न कि टुकडों में। इस प्रकार की बहस में अक्सर ऐसे योद्धा भी मैदान में तलवारें भांजने लगते हैं जिन्हें समस्या सेे बहुत कुछ लेना देना नहीं होता है वे सिर्फ रटे-रटाये जुमले इस्तेमाल करने लगते हैं । और बहस को किसी नतीजे तक पहुॅचने ही नहीं देते ।यदि कालातीत हो चुके इन जुमलों में जरा भी जान होती तो फिर समस्या कभी कि हल हो चुकी होती।
भारत में स्थिति बिलकुल अलग है .जैसा कि आपने लिखा कि ब्रिटेन , अमरीका में अदालत महिला के कपडे़ देखती है .पर यहाँ क्या होता है कि अगर कोई लड़की ऐसे कपडे़ पहनती है तो चाहे लोग उसे देखते ज़रुर है, पर कर कुछ नहीं सकते.आहें भर सकते है बस . पर इनकी वासना का शिकार वो लड़कियां होती है जो भोली- भाली होती है,जो खेत में घास खोदने जाती है या फिर मज़दूरी करने जाती है .
राजेश जी आपने बहुत ही गम्भीर मुद्दे पर ब्लॉग लिखा है इसके लिए आपकी दूरदर्शिता और साहस से मैं बहुत प्रभावित हुआ हूँ,लेकिन कुछ पंक्तियों से मैं सहमत नहीं हो पाया. हो सकता है कि मैं इसे ठीक से समझ नहीं पाया हूँ , इसलिए अपनी जिज्ञासा रख रहा हूँ. आपने लिखा है कि शब्दकोषों के मुताबि़क स्ल्ट का अर्थ है--कुलटा,बदचलन,चरित्रहीन,पतिता आदि....पुरूषों के लिए ऐसे शब्दों का नितांत आभाव है.मेरे लिए यह समझना कठिन है कि समाज, महिलाओं के लिए प्रयोग किये जाने वाले इन अपमानजनक शब्दों के लिए ही काफी पीड़ा से गुज़र रहा है ,फिर आपने पुरूषों के लिए इस प्रकार के शब्द न होने की बात आपने क्यों उठाई? वास्तव में अपमानजनक शब्दों को हम इस तरह नहीं देख सकते कि वे किसके लिए प्रयोग किये जा रहे हैं.ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किसी के लिए भी कितनी ही ख़राब परिस्थितियों में भी नहीं किया जाना चाहिए. “फिर पुरूषों के लिए ऐसे शब्द नहीं हैं” यह कहना उचित नहीं लगा यदि तुलनात्मक रूप से भी यह बात कही गयी है तो भी यह तुलना करने योग्य प्रसंग नहीं कहा जा सकता है.
आपने मुद्दा बहुत अच्छा उठाया है पर सवाल यह भी है कि पीड़ित कौन? पहले तो महिला ही कम कपड़े पहन कर पुरुषों को सताती हैं, ललचाती हैं और जब उनके साथ कोई पुरुष उलटा-सीधा कुछ करता है तो हल्ला भी करती हैं. मेरे हिसाब से सबको अपने-अपने दायरे में रहना चाहिए. सबको इस बात की आज़ादी होनी चाहिए कि वह अपने समाज और धर्म के हिसाब से कपड़े पहने और अगर इसके बाद भी कोई ग़लती करे तो उसे कठोर से कठोर सज़ा मिलनी ही चाहिए.
शब्दजाल या मकड़जाल में काहे को उलझते हैं. विषय साफ़ है कि औरत ही मानव को जन्म देती है फिर भी हम उन्हें सहानभुति या सदभावना की बजाए नफ़रत और वासना भरी दृष्टि से देखते हैं. देशवासियों से अपील है कि वो अपना दोष ढूंढ़े.
जब भी शिकवा शिकायत करना
सामने अपने बस एक आईना रखना.
लेकिन शरीर ढाक कर चलने में तकलीफ़ ही क्या है ? क्यों औरतें आधी नंगी घूमें और बदमाश युवाओं को उकसाऐं ?
राजेश जी जितना बलात्कारी है उतना ही दोष औरतों का भी है जो कम कपड़े पहनकर बलात्कारी को उकसाती हैं. आप अगर बलाकत्कार के केस देखें तो ज़्यादातर मामलों में तड़क भड़क कपड़े पहनने वाली औरतों का ही बलात्कार होता है.
जिन्हें बदचलन औरत कहा जाता है उनकी परेड से मुझे नहीं लगता है कि विचलित होने वाली कोई बड़ी घटना हो गई है. धर्म, नैतिकता, संस्कृति काग़ज़ के फूल नहीं हैं कि ज़रा सी बारिश में गल जाएंगे. यदि कहीं से भी विरोध हो रहा है तो प्रतिक्रिया में उस पर ही टूट पड़ना समझदारी का लक्षण नहीं है. जरूरत इस बात की है कि इस पर समुचित ध्यान दिया जाए. यदि पिता के सामने छोटा बच्चा सिगरेट सुलगाने लगा है तो मनोविज्ञान कहता है कि ये आपके प्रति उसका विद्रोह है. ख़ुद को और उसे समझे जाने की ज़रूरत है. आरोप और प्रत्यारोप की इसमें कोई जगह नहीं होनी चाहिए. झूठे अंहकार और नासमझी में लोग समस्या को नासूर बना देते हैं. इसमें ख़तरनाक बात ये है कि लोग इसे केवल महिलाओं का उत्पात मानने लगे हैं. ये उनका शौक़ नहीं है. ये प्रदर्शन समाज के ठेकेदारों को बेपर्दा करने की एक कोशिश है. ये तरीक़ा अनगढ़ और अपरिपक्व हो सकता है, लेकिन इस आवाज़ पर ध्यान दिया जाना चाहिए.
बहुत से लोग आरोप लगाते हैं कि महिलाएं कम कपड़े पहन कर पुरूषों को उत्तेजित करती हैं, इसलिए ही पुरूष बलात्कार करने को विवश होते हैं, लेकिन बीबीसी के पृष्ठ पर लगी हुई रिपोर्ट से ऐसा साबित नहीं होता है जिसमें कहा गया है कि वेटिकन में बच्चों के साथ यौन दुराचार रोकने के लिए सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है. जब सड़ांध बर्दाश्त से बाहर हो गई तब ही यह सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है. इससे पहले बेशर्मी की हद तक इस प्रवृत्ति को छुपाने की कोशिशें की गईं. और ऐसा भी नहीं है कि ये समस्या केवल चर्च के साथ ही है. लगभग हर उस जगह जहं लोग श्रद्धावश चुप रह जाते हैं या उनकी आवाज़ दबा दी जाती है, ऐसा ही होता है. यहां तो कोई महिला अंग प्रदर्शन नहीं करती है, फिर ये प्रवृत्ति क्यों है? ज़ाहिर है कि महिला के अंग प्रदर्शन से इस वहशियाना मनोवृत्ति का कुछ भी लेना-देना नहीं है. यदि ये मान भी लिया जाए कि कुछ लोग इसके लिए महिलाओं को ही ज़िम्मेदार मानते हैं फिर तो इस सवाल का भी जवाब देना पड़ेगा कि आपा खोने के लिए महिला के सामने ही हमारी हिम्मत क्यों पडती है? समाज में और भी जगहें हैं जहं हम दुम दबाकर भाग खड़े होते हैं. मर्दानगी दिखाने की वहां हम कोई मिसाल पेश नहीं करते.
नारी जाति की वर्तमान उपलब्धियाँ—शिक्षा, उन्नति, आज़ादी, प्रगति और आर्थिक व राजनीतिक सशक्तीकरण आदिदृयक़ीनन संतोषजनक, गर्वपूर्ण, प्रशंसनीय व सराहनीय हैं। लेकिन नारी-जाति के हक़ीक़ी ख़ैरख़ाहों, शुभचिंतकों व उद्धारकों पर लाज़िम है कि वे खुले मन-मस्तिष्क से विचार व आकलन करें कि इन उपलब्धियों की क्या, कैसी और कितनी क़ीमत उन्होंने नारी-जाति से वसूल की है तथा स्वयं नारी ने अपनी अस्मिता, मर्यादा, गौरव, गरिमा, सम्मान व नैतिकता के सुनहरे, मूल्यवान सिक्कों से कितनी बड़ी क़ीमत चुकाई है। जो कुछ, जितना कुछ उसने पाया उसके लिए क्या कुछ, कितना कुछ गँवा बैठी। नई तहज़ीब की जिस राह पर वह बड़े जोश व ख़रोश से चल पड़ीद—बल्कि दौड़ पड़ीद—है उस पर कितने काँटे, कितने विषैले व हिंसक जीव-जन्तु, कितने गड्ढे, कितने दलदल, कितने ख़तरे, कितने लुटेरे, कितने राहज़न, कितने धूर्त मौजूद हैं।