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हंगामा है क्यों बरपा

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|रविवार, 12 जून 2011, 14:50 IST

सुषमा स्वराज की समझ में ही नहीं आ रहा कि उनके नाच पर इतना हंगामा क्यों मचा हुआ है.

राजघाट में प्रदर्शन के दौरान वह 'नया दौर' के गाने 'ये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का मस्तानों का' पर क्या नाचीं काँग्रेस ने उनकी पार्टी को 'नचनियों की पार्टी' घोषित कर दिया.

भारतीय राजनीति में नाचना गुनाह क्यों है?

अगर बराक ओबामा मुंबई के एक स्कूल में शरमाते हुए दो क़दम थिरक सकते हैं, हिलेरी क्लिंटन कीनिया में एक भोज के बाद नर्तकों की एक टोली के साथ नाच सकती हैं और मिशेल ओबामा बियोंका के गाने 'मूव यॉर बॉडी' पर एक पेशेवर नर्तकी की तरह कमर मटका सकती हैं तो सुषमा स्वराज क्यों नहीं?

भारत में भी इंदिरा गाँधी, शीला दीक्षित और सोनिया गाँधी को भी कई बार सार्वजनिक तौर पर नाचते हुए देखा गया है.

हाँ, वर्ष 1966 में ज़रूर जब इंदिरा गाँधी अमरीका की राजकीय यात्रा पर वॉशिंगटन गई थीं तो भारत के राजदूत बीके नेहरू के निवास स्थान पर भोज के बाद तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने इंदिरा के साथ नाचने की इच्छा प्रकट की थी. लेकिन उन्होंने मुस्कराते और थोड़ा लजाते हुए उनकी यह पेशकश ठुकरा दी थी कि भारत में लोग क्या कहेंगे.

वैसे भारत में नाचने वालों की कमी नहीं है.इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि उमर अब्दुल्लाह ने सुषमा स्वराज को खुले आम चुनौती ही दे डाली कि उनके पिता फ़ारूख़ अब्दुल्लाह उनसे बेहतर नाचते हैं.

नाच गाने के अलावा फ़ारूख़ एक बार मोटर साइकिल की पिछली सीट पर शबाना आज़मी को डल झील की सैर कराने के लिए भी सुर्ख़ियों में आ चुके हैं.

सुषमा के नाच के अगले दिन भारतीय मीडिया में इस बात पर बहस शुरू हो गई कि क्या सुषमा का राजघाट पर नाचना उचित था?

आख़िर सुषमा किसके लिए नाच रहीं थी? जवाब कई हो सकते हैं.

भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए, बाबा रामदेव को रामलीला मैदान से हटाने के लिए जिस तरह सुबह तक का इंतज़ार नहीं किया गया उसके ख़िलाफ़ विरोध प्रकट करने के लिए या फिर बोर हो चुके कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए वगैरह वगैरह.

भारतीय संस्कृति में शिव के तांडव नृत्य की बड़ी अहमियत है.बाहर से यह नृत्य थोड़ा डरावना ज़रूर लगता है लेकिन वास्तव में यह सृजन और संरक्षण का प्रतीक है.

लेकिन कभी कभी यही तांडव विध्वंस की विभीषिका का चित्र भी प्रस्तुत करता हुआ पतन का जनक भी बन जाता है.

यह ख़तरा सुषमा स्वराज और विपक्ष के दूसरे राजनीतिक दलों के साथ हमेशा रहेगा जो अल्पकालीन राजनीतिक फ़ायदे के लिए बाबाओं की धुन पर नाचने के लिए मजबूर होते हैं.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 15:30 IST, 12 जून 2011 vimal kishor singh:

    भारत एक लोकतांत्रिक देश है. मैं नहीं मानता कि किसी नेता या जनता का नाचना कहीं से ग़लत है. चाहे वो सुषमा हो या इंदिरा गांधी. लोकतंत्र में सभी को बोलने का हक है. वो किसी भी घटना पर कुछ भी बोल सकते हैं. जैसे सभी लोग नाच सकते हैं, वैसे ही बोल सकते हैं.

  • 2. 16:57 IST, 12 जून 2011 अनिल वर्मा:

    राजनीति में ये किस कदर अपशब्दों का इस्तेमाल कर सकते हैं, समझना मुश्किल है. चक्कर है मीडिया गाली गोली की तरह प्रचारित करती है

  • 3. 17:55 IST, 12 जून 2011 Amit Prabhakar:

    रेहान फ़ज़ल जी के पास आँकड़े तो ज़ोरदार हैं । पर किसी का विवाहेतर रिश्ता बनाना, पार्टियों में नाचना और शराब पीने जैसी व्यक्तिगत बातों से अब मीडिया ज्यादा रेटिंग नहीं कमा सकती । जनता को धीरे-धीरे समझ में आ चुका है कि ये सब व्यक्तिगत बाते हैं । और जहाँ तक रही राजघाट में नाचने की बात तो ये भी अपना तरीका है । हाँ, पार्टी में उनके गिर्द चलने वाले छोटी उम्र और राजनैतिक कद वाले नेताओं को शायद ये समझ में न आया हो कि सुषमा जी नाच क्यों रहीं हैं पर हमारे लिए तो कुछ भी फ़र्क नहीं पड़ता - बेंगलूर की हिन्दी में "'क्या' भी फ़र्क नहीं पड़ता" । नर्तन से ये बात याद आई - हमारे यहाँ नर्तक तो नहीं पर कवियों की बहुत कमी सी हो गई है । वो कुमार विश्वास के "कोई दीवाना कहता है" में वो बात नज़र नहीं आती । बेंगलूर की हिन्दी में ही - "एक और दिनकर या इक़बाल मंगता है" जो असर डाल सके ।

  • 4. 20:14 IST, 12 जून 2011 satnam singh:

    ये राजनीती है .किसी एक मुद्दे को नज़रअंदाज करने के लिए किसी दुसरे मुद्दे को उठा दो लोग पहले को भूल कर दुसरे पर ध्यान देना शुरू कर देंगे .ऐसा ही यहाँ करने कि कोशिश कि गई है कि अगर रामदेव जी के मुद्दे से लोगो का ध्यान हटाना है तो इस मुद्दे को ऊपर उठा दो . इसीलिए पॉलिटिक्स को समझने के लिए दिल और दिमाग से काम लेना पड़ता है . बिना सोचे समझे कुछ लिखने से नहीं

  • 5. 21:18 IST, 12 जून 2011 ashish yadav:

    सुषमा स्वराज का डांस करना वो भी एक देशभक्ति गीत पर कहीं से ग़लत नहीं है. हम हिंदुस्तानियों में देशभक्ति इतनी कूट-कूट कर भरी है कि देश प्रेम के जोशीले गाने सुनकर कदम अपने आप थिरकने लगते हैं और फिर सुषमा जी हमसे अलग तो नहीं हैं. जो लोग उनके नाच पर उंगलियां उठा रहे हैं क्या उन्होंने कभी किसी समारोह में डांस नहीं किया क्या. ये सब आम जनता का ध्यान भ्रष्टाचार के मुद्दे से भटकाने के लिए किया जा रहा है.

  • 6. 21:31 IST, 12 जून 2011 roni:

    कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना !!!!!!!!!!!

  • 7. 21:44 IST, 12 जून 2011 himmat singh bhati:

    भारत में तो बात का बतंगड़ बनाने कि परंपरा रही है ! इमानदारी और जबावदारी से कोई कम करना ही नहीं चाहता है देश भावना दूर तक नहीं दिखाई देती है ! सभी सत्ता सुख के भूखे है फ़जल साहब !
    श्रीमान और श्रीमती ओबामा बच्चो का साहस बढ़ाने के लिए उन के साथ नाचे ! और इसे गलत भी नहीं कहा जा सकता है ! सुषमा जी राज घाट पर क्यों नाचीं इस बात को ले कर हंगामा हो रहा है ! वह क्यों नाची यह तो वही बता सकती है पर महिलायें भावना में बहती जल्दी है इस लिए कोई ख़ुशी कि बात चल निकली होगी तो नाचने लगीं.
    प्राय सभी जातियों और धर्मो में ख़ुशी के पल होता रहा है और कोई यह कहता है कि यह नहीं होता तो सफ़ेद झूठ बोल रहा है ! पर सुषमा जी पहली बार नाची और मीडिया ने पहली बार उन्हें नाचते हुआ देखा तो बात दूर तक पहुची और कांग्रेस ने नचनिया वाली पार्टी कहा , पर देख जाय तो सभी पार्टियों में नाचने वाले लोग शामिल है और उन का पैसा भी इससे जुडा हुआ है !
    कांग्रेस की इंदिरा जी, शीला जी और सोनिया गांधी तक नाच चुकी है तो वह भी नचनिया वाली हुई न ! यह तो सोचने वाले कि समझ कि किसी के नाचने को ले कर उस का दृष्टीकोण क्या है और वह किस नजरिये से उसे नाचते हुआ देख रहा है !
    फ़जल साहब उस ज़माने में महफिले जमती थी ओर मुजरा भी होता था ! अब मुजरा देखने वाले और मुजरा करने वाले नहीं रहे तो मुजरा भी बंद हो गया है ! यहाँ आप मायावती जी को कैसे भूल गए उन के किसी भी समारोह में तो मर्द बने नेता और अधिकारी कई बार नाचते हुआ देखे गए है वहा मीडिया का ध्यान क्यों नहीं गया ! वहां उलटी गंगा कैसे बह रही है !
    ऊमर अब्दुल्ला भी अपने पिता को नचनिया बता रहे है और कह रहे हैं कि उन के पिता सुषमा जी से भी अच्छा नाच सकते हैं ! तो भाई जान कांग्रेस तो पहले से ही नचनिया पार्टी रही है !
    रही बात मिडिया कि तो वह खबरें बेच कर अपना कम चला रहे हैं जो जितना देता है उतनी ख़बर उस कि दे देते हैं ! अब कुछ समय बाद चुनाव जो होने जा रहे हैं तो मिडिया को भी पैसा चाहिए न !

  • 8. 00:07 IST, 13 जून 2011 Bansi Butta:

    ये आरोप नीचता की पराकाष्ठा है. आखिर लोग कब सुधरेंगे?

  • 9. 00:43 IST, 13 जून 2011 bkraushan:

    बिल्कुल ठीक कहा है विमल किशोर ने।

  • 10. 00:43 IST, 13 जून 2011 रवि शंकर तिवारी:

    भारत में राजनीति का गंदा दौरा चल रहा है.नेता गण एक दूसरे पर कीचड़ उछालने में कभी पीछे नही रहते. चाहे वो सत्ता पक्ष हो या विपक्ष.

  • 11. 12:00 IST, 13 जून 2011 ZIA JAFRI:

    रेहान साहब हंगामा इसलिए बरपा है की सुषमा स्वराज राजघाट पर नाचीं हैं .नाचना बुरी बात नहीं लकिन इसमें समय और स्थान का बड़ा महत्व होता है .जिसको सुषमा जी को समझना चाहिए .

  • 12. 14:03 IST, 13 जून 2011 BHEEMAL Dildar Nagar:

    मेरे समझ में थोड़ी थोड़ी कहानी आती है, कि कांग्रेस को मुबारकबाद हो , बड़ी सफलता पूर्वक , अन्ना , बाबा वगैरह से हल्ला गुल्ला करवा के , यह सिद्ध कर दिया है , कि हम सरकार तो चला ही रहे हैं , हल्ला गुल्ला भी करवा सकते हैं , वो भी भाजपा से बेहतर कर के दिखा दिया.

    भाजपा के लोफ भ्रमित हैं, सरकार और विपक्ष दोनों का कम हाथ से गया ,
    इब के करें भाया .. चलो कुछ ड्रामा हो जाये .

  • 13. 16:29 IST, 13 जून 2011 manish:

    ये बड़े शर्म कि बात है

  • 14. 17:54 IST, 13 जून 2011 Bikash Rao, Journalist, New Delhi :

    यह नाच नहीं शिव का तांडव है। हमेशा कुतर्क करने वाली कांग्रेस और उसकी सरकार अब सावधान हो जाएं।

  • 15. 19:58 IST, 13 जून 2011 pushpendra singh nain:

    रेहान साहब, आपकी बातों से मैं बिल्कुल सहमत हूँ. आख़िर क्या साबित करना चाहते हैं ये लोग जो ज़रा सी बात पर हल्ला मचा देते हैं. देश और देश प्रेम क्या मायने रखता है इनके लिए?

  • 16. 22:48 IST, 13 जून 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    रेहान साहब लगता है आप की और बीबीसी की तारीफ़ करो तो विचार छप जाएंगे, लेकिन सच्चाई ये है कि न तो बीबीसी और न आप अब किसी भी तारीफ़ के क़ाबिल रह गए हैं. मैं तो सच्चाई लिखता रहूंगा. आप और बीबीसी मेरे विचारों को भले ही रद्दी की टोकरी में डालते रहें.

  • 17. 00:03 IST, 14 जून 2011 Rajat Abhinav:

    रेहान फज़ल जी आपने राजनेताओं के नाचने के जितने भी उदाहरण दिए हैं उसमें से एक भी उदाहरण किसी व्यक्ति के समाधि स्थल पर नाचने के नहीं हैं. समाधि स्थल पर नाचना और अन्य स्थानों पर नाचने में ज़मीन-आसमान का अंतर है और इसी अंतर को विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज को समझना चाहिए था. भले ही वो देशभक्ति के गीत पर नाच रही थीं पर जगह ग़लत थी. क्या आपके पास ऐसा एक भी उदाहरण है जिसमें कोई सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति किसी के समाधि स्थल पर नाचा हो?

  • 18. 15:38 IST, 14 जून 2011 Anwar Ali:

    नाचना उतना बुरा नहीं जितना ये कि नाच कहां, कब और किस बात पर हुआ. कौन-सी खुशी का मौका था? क्या भ्रष्टाचार ख़त्म हो गया था या बाबा पर पुलिस की कार्रवाई सही थी? भौंडेपन के लिए राजघाट क़तई उचित जगह नहीं है. ये सब पार्टी के दफ़्तर में करना चाहिए था जहां अल्पसंख्यकों और वंचित समाज के ख़िलाफ साज़िशें की जाती हैं.

  • 19. 21:02 IST, 14 जून 2011 jitesh:

    भारतीय क़ानून या किसी किताब में कहीं नहीं लिखा है कि जो राजनीति करेगा वो सिर्फ़ राजनीति ही करेगा, नाचेगा नहीं.

  • 20. 11:40 IST, 17 जून 2011 ajeet:

    मान्यवर,
    शीला दीक्षित, इन्द्रा गाँधी जी, एवं सोनिया शायद दूसरे अंदाज में नाची होंगी. शायद नृत्य की वह विधा डांस कहलाती हो इसीलिए वो नचनियो की पार्टी नहीं है. सुषमा स्वराज जी को भी नृत्य की इस नयी विधा में पारंगत होने के पश्चात नृत्य करना चाहिए.........

  • 21. 18:43 IST, 26 जून 2011 raza husain:

    मेरा मानना है कि इसमें कोई ख़ास बात नहीं है. नेता लोग जब बॉलीवुड के अवॉर्ड समारोह में जाते हैं तो वहां भी वो ठुमके लगाते देखे जा सकते हैं. अगर कोई उम्मीदवार जीतता है तो भी नेता पार्टी दफ़्तर में मिलकर ठुमका लगाते हैं. लेकिन इस पर कभी ऐसा बवाल नहीं हुआ. असल में सुषमा स्वराज ने मीडिया के सामने डांस कर दिया इसीलिए उसपर इतना हंगामा मच गया.

  • 22. 11:03 IST, 04 जुलाई 2011 VIKAS KUMAR SHRAMA:

    मुझे नहीं लगता कि सुष्मा जी ने कुछ ग़लत किया है, गोली चलाना बुरी बात है मगर हमारे जवान भी तो देश के लिए ही गोली चलाते हैं.

  • 23. 18:53 IST, 11 जुलाई 2011 khushal singh:

    इतनी बहस भ्रष्टाचार पर कर लेते तो अच्छा होता. नाच को मुद्दा बनाने से मुख्य मुद्दे से ध्यान हट जाता है. ये हिंदुस्तान की कमज़ोरी है और इसका फ़ायदा नेता लोग उठाते हैं.

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