« पिछला|मुख्य पोस्ट|अगला »

सरकारी यानी घटिया!

विनोद वर्माविनोद वर्मा|सोमवार, 20 जून 2011, 11:14 IST


तमिलनाडु के एक पिछड़े ज़िले इरोड के ज़िलाधीश यानी कलेक्टर डॉ आर आनंदकुमार ने अपनी छह साल की बेटी को एक सरकारी स्कूल में भर्ती करवाया है.

जब वे इस स्कूल में अपनी बच्ची के दाखिले के लिए पहुँचे तो दूसरे माँ-बाप की तरह कतार में खड़े हुए.

दिल्ली के एक अख़बार में इस ख़बर का प्रकाशित होना ही साबित करता है कि यह कुछ असामान्य सी बात है.

यक़ीनन ज़िलाधीश को उनके साथी अधिकारियों ने समझाया भी होगा. लेकिन वे नहीं माने. उन्होंने अख़बार से भी बात करने से इनकार कर दिया कि ये उनका निजी फ़ैसला है.

किसी अफ़सर की बेटी सरकारी स्कूल में, आम लोगों के बच्चों के साथ कैसे पढ़ सकती है?

वहाँ किसानों और मज़दूरों के बच्चे पढ़ते हैं, उस सर्वहारा वर्ग के बच्चे जिनके लिए दो जून की रोटी के बाद इतना पैसा बचता ही नहीं कि वे सरकारी स्कूल के अलावा कहीं और अपने बच्चे को पढ़ा सकें.

अब सरकारी स्कूल में किसी अफ़सर, नेता, व्यापारी, उद्योगपति, डॉक्टर और ऐसे ही किसी ऐसे व्यक्ति के बच्चे नहीं पढ़ते जो उच्च या मध्यवर्ग में आते हैं. जो महंगे निजी स्कूल में नहीं जा सकते वो किसी सस्ते निजी स्कूल में जाते हैं, लेकिन सरकारी स्कूल में नहीं जाते.

ठीक वैसे ही जैसे इस वर्ग के लोग और उनके रिश्तेदार सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए नहीं जाते. एम्स और पीजीआई जैसे कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन वहाँ भी वो तब जाते हैं जब जेब जवाब दे जाती है या और कोई चारा नहीं होता.

वो सरकारी बसों में नहीं चढ़ते, सरकारी डाक व्यवस्था के इस्तेमाल को भरसक टालते हैं. वो सरकारी कंपनियों के उत्पाद नहीं ख़रीदते यहाँ तक कि टेलीफ़ोन जैसी सुविधा में भी निजी कंपनी को तरजीह देते हैं.

सरकारी के नाम पर वे रेल और सड़क जैसी गिनी चुनी चीज़ों का ही इस्तेमाल करते हैं. वो भी इसलिए कि उसका विकल्प नहीं है.

एक प्रोफ़ेसर का आकलन है कि संपन्न वर्ग को तो छोड़ दीजिए अब मध्यवर्ग के लोग भी हर उस सुविधा के इस्तेमाल को अपनी तौहीन समझते हैं जो सरकारी है.

हालात इतने ख़राब हैं कि यदि कोई व्यक्ति पैसा खर्च करने में ज़रा सा भी सक्षम है तो वह सरकारी कंडोम पर भी भरोसा नहीं करता.

वैसे तो ये सरकार के लिए चिंता की बात होनी चाहिए लेकिन सरकार को चलाने वाले राजनेता और अधिकारी दोनों को इसकी चिंता नहीं दिखती.

न्यायालयों को इस बात पर चिंता ज़ाहिर करते नहीं देखा कि सरकारी स्कूल इतने बदहाल क्यों है कि हर कोई अपने बच्चे को सरकारी स्कूल में भेजने से कतराता है. भेजता वही है जिसके पास विकल्प नहीं है या दोपहर को मिलने वाले उस भोजन की चिंता है जो न्यायालय के कहने पर सरकारी स्कूलों में बाँटा जा रहा है.

आज से दो दशक पहले स्थिति इतनी ख़राब नहीं थी. यक़ीन न हो तो उन राजनेताओं, अधिकारियों और न्यायाधीशों से बात करके देखिए जो आज से बीस साल पहले किसी छोटे शहर के प्रायमरी स्कूल में पढ़ते थे. उनमें से अधिकांश आपको किसी न किसी सरकारी स्कूल में पढ़े हुए मिल जाएँगे. उनका जन्म किसी न किसी सरकारी अस्पताल में हुआ होगा.

लेकिन आज क्या वे अपने बच्चों का जन्म किसी सरकारी अस्पताल में होने की कल्पना कर सकते हैं? क्या वे अपने बच्चे को किसी सरकारी स्कूल में पढ़ने भेजेंगे?

ये आज़ादी के बाद के पाँचवें और छठवें दशक में सरकारी व्यवस्था में हुए पतन का सबूत है. ये सरकारी प्रश्रय में निजी व्यवसाय के पनपने का सबूत भी है. ये नेहरू के समाजवादी भारत का मनमोहन सिंह के पूंजीवादी भारत में तब्दील हो जाने का सच है.

हमने अपनी आँखों से देखा है कि सरकारी अमला किस तरह से एक सरकारी व्यवस्था को धीरे-धीरे इसलिए ख़राब करता है ताकि उसके बरक्स निजी बेहतर दिखने लगे और आख़िर सरकारी व्यवस्था दम तोड़ दे या फिर उसका निजीकरण किया जा सके.

तमिलनाडु के ज़िलाधीश की बच्ची के सरकारी स्कूल में जाते ही सरकारी अमले ने उस स्कूल की सुध लेनी शुरु कर दी है. पक्का है कि अगर ज़िलाधीश की बच्ची वहाँ दो चार साल पढ़ पाई तो उसका नक्शा और स्तर सब बदल जाएगा.

लेकिन यह एक अपवाद भर है.

परिस्थितियाँ तो उस दिन बदलेंगीं जिस दिन हर राजनेता और अधिकारी अपने बच्चों को ऐसे ही सरकारी स्कूलों में भेजने का फ़ैसला कर ले.

यह समय है जब हम भ्रष्टाचार जैसी व्यापक समस्या के बारे में बात करते हुए ये भी सोचें कि जो कुछ भी सरकारी है वह धीरे-धीरे निकृष्ट क्यों होता जा रहा है और सिवाय सरकारी नौकरी के.

हम सब चुप क्यों हैं?

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 12:08 IST, 20 जून 2011 BHEEMAL Dildar Nagar:

    विनोद भाई, आपका ब्लॉग पढ़ कर लगा आपने मेरे दिल की किताब को पढ़ लिया हो. वाह-वाह, गंगा जल की तरह शुद्ध लेखना. आपका दृष्टिकोण इतना विस्तृत, वृहज जैसे अटलांटिक सागर. निराश न हों, मन को क्लांत न करें, बच्चों को क्या परिवेश मिलेगा यह विधाता निर्धारित करता है. सरकारी विद्यालय में पढ़ कर करमचंद मोहनदास गांधी, लालबहादुर शास्त्री और भी अनेक सूर्यतुल्य प्रतिभाएँ सामने आईं हैं. दूसरी तरफ़ कैम्ब्रिज और केंद्रीय स्कूलों के बच्चों को मैंने धूम्रपान और ड्रग्स लेते देखा है. बस विधाता, ख़ुदा और ख़ुदाई में विश्वास करें. यही सबसे अच्छा विकल्प है.

  • 2. 12:11 IST, 20 जून 2011 ईश्वर दोस्त :

    एक महत्त्वपूर्ण पहल को सामने लाने के लिए शुक्रिया. सरकारी स्कूलों के स्तर गिरने की एक वजह यह है कि मध्यवर्ग ने उससे मुंह मोड़ लिया है. मगर इसका एक छिपा हुआ पहलू भी है. आज सरकारी स्कूलों में ज़्यादातर आदिवासी, दलितों और अन्य पिछड़े व ग़रीब तबके के बच्चे दिखाई देते हैं. ये बच्चे तब कहां थे जब इन स्कूलों में आज़ादी के बाद उभरे पहले मध्यवर्ग के बच्चे पढ़ रहे थे? और अब जब उनके पढ़ने की बारी आई तो सरकारी स्कूलों का स्तर गिर गया या गिरा दिया गया!

  • 3. 12:18 IST, 20 जून 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    विनोद जी, बहुत शानदार बीबीसी पाठकों के लिए लिखा है आपने. लेकिन सरकारी स्कूलों की इस दुर्दशा के लिए हम भी आधे ज़िम्मेदार हैं क्योंकि कभी भी सरकारी स्कूलों की कोई ख़ैर-ख़बर नहीं लेते हैं जबकि प्राइवेट स्कूलों को अपना पूरा समय देते हैं. रहा सवाल भारत में बेईमानी का तो मेरे ख़्याल में महात्मा अगर बेईमान मज़हब बनाए तो उसके अनुयायी भी वही बन जाएँगे. क्योंकि शायद ईमानदार लाखों में एक भी नहीं मिलेगा. आपके दिमाग़ की दाद देता हूँ और क़ायल भी हूँ. क्योंकि आपने बीबीसी श्रोताओं के लिए शानदार और बिलकुल सच लिखते हैं.

  • 4. 12:29 IST, 20 जून 2011 rajkumar pandey:

    शानदार लेख विनोद जी, आनंद आ गया

  • 5. 13:05 IST, 20 जून 2011 Shankar, New Delhi:

    सरकारी मतलब घोटाला, ग़ैर ज़िम्मेदारी, कोई जवाबदेही नहीं. इसलिए लोग डरते हैं सरकारी सुविधाओं से. मगर सरकारी नौकरी मतलब यही फ़ायदे. इसलिए लोग सरकारी नौकरी चाहते हैं. स्वामी रामदेव और अन्ना जैसे लोग घोटाले रोकने और जवाबदेही के लिए क़ानून की बात करते हैं तो वह अलोकतांत्रिक है. वाह रे सरकारी सुविधाएँ और सरकारी लोकतंत्र.

  • 6. 15:29 IST, 20 जून 2011 HARISH:

    शानदार लेख विनोद जी.


  • 7. 16:21 IST, 20 जून 2011 Pradeep singh rawat:

    विनोद जी मैं डा आर आनंदकुमार को नमन करता हूँ.

  • 8. 16:26 IST, 20 जून 2011 Gurpreet:

    बहुत अच्छा ब्लॉग.

  • 9. 18:12 IST, 20 जून 2011 Prakash Choudhary, New Delhi:

    अगर बड़े पदों पर बैठे लोग सोच लें तो फिर सरकारी चीज़ें सुधर जाएँगीं. लेकिन ये सुधारेंगे कैसे, इन्हें दूसरों का ख़याल ही नहीं है. इनके पास तो इतनी पूंजी है कि अगर प्राइवेट स्कूल और अस्पताल से बेहतर भी कुछ होता तो ये उसका इस्तेमाल करते. अब तो विदेशों में बच्चों को पढ़ाने और विदेशों में ही इलाज करवाने का प्रचलन बढ़ रहा है. दूसरी ओर निम्न वर्ग के पास इतनी दिक़्कतें हैं कि वो अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भी नहीं पढ़ा पा रहा है क्योंकि उनके लिए ऊपर से भेजी गई कॉपी-किताबें भी तो उन तक नहीं पहुँच पा रही हैं.

  • 10. 19:06 IST, 20 जून 2011 Intezar Hussain:

    विनोद जी आपके लेख पढ़कर मुझे अपना गाँव और शहर की अपनी बीती हुई यादें ताज़ा हो गईं. हमारे ज़िले में आज से दशक दो दशक पहले सभी वर्ग के लोग सरकारी स्कूल में पढ़ते थे.और अब वही लोग सभी क़स्बों में बड़े-बड़े पदों पर तैनात हैं. डॉ राजेंद्र प्रसाद से लेकर मौलाना मज़हरुल हक़ तक सभी बड़े लोग सरकारी स्कूलों में ही पढ़कर निकले थे. आज अगर उन सरकारी स्कूलों में मध्य वर्ग के बच्चे नहीं जाते हैं तो इसके लिए गुरु वर्ग और अभिभावक वर्ग ज़िम्मेदार है. जब हम स्कूल नहीं जा पाते थे तो गुरुजी हमारा हाल पता करने के लिए के लिए बच्चों को हमारे पास भेजा करते थे. और गुरु एक पिता की तरह बच्चों का ख़याल रखा करते थे लेकिन आज तो गुरु पैसों को प्यार करते हैं जिसकी वजह से शिक्षा का स्तर गिर गया है. मैं डॉ आनंदकुमार को उनके प्रयासों के लिए धन्यवाद करता हूँ. अगर देश के बड़े अफ़सर, डॉक्टर, नेता अगर अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने लगें तो स्कूलों का कायाकल्प हो सकता है.

  • 11. 19:17 IST, 20 जून 2011 Jeetendra malakar:

    आपने एक नई दिशा दिखाई है. धन्यवाद.

  • 12. 00:13 IST, 21 जून 2011 Kann:

    जब ब्रिटेन की महारानी ने भारत की आज़ादी की घोषणा की उससे पहले ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल ने उनसे कहा था कि वे ऐसा न करें. उनका कहना था कि अगर भारत को आज़ाद किया जाएगा तो इसका मतलब है सत्ता चोर और लूटेरों के हाथों में सौंपना. आज लगता है कि चर्चिल की सलाह 101 प्रतिशत सही थी.

  • 13. 01:22 IST, 21 जून 2011 Surendra:

    समाजवाद कैपिटलिज़्म और कम्युनिज़्म का मिश्रण है. सरकार के लिए जितना संभव है निजी इकाइयों को काम देना चाहिए. समाजवाद का दूसरा नाम है - घोटालावाद.

  • 14. 02:46 IST, 21 जून 2011 Indresh:

    बहुत अच्छा है विनोद जी.

  • 15. 03:09 IST, 21 जून 2011 Arvind Yadav, Germany:

    बहुत अच्छा लिखा है आपने. लेकिन सरकारी सिस्टम से लोगों के मुंह मोड़ने को सरकारी निकम्मेपन से जोड़ना मुद्दे का आधा अधूरा रूप ही परिलक्षित करेगा. ये स्थिति सरकारी तंत्र की असफलता को दिखाती है साथ ही साथ ये भी दिखाती है कि हमारे समाज में 'महंगा है तो अच्छा है और बिकता है' की मानसिकता हावी है. पैसे वालों को पूजा जाता है चाहे वह पैसा किसी भी तरीक़े से कमाया गया हो. लोग अपने अपने स्तर पर इसी मानसिकता का पालन करते हैं. निम्न वर्ग के लोग सरकारी की बजाए कम महंगे निजी स्कूल, मध्य वर्ग के लोग उससे अधिक महंगे स्कूल में और उच्च वर्ग के लोग सबसे महंगे स्कूल में अपने बच्चों को भेजकर, बच्चों के अच्छे भविष्य की बजाय अपनी मानसिकता की आत्मसंतुष्टि करते हैं. कई माता पिता ऐसे हैं कि बच्चे को निजी स्कूल में भेज दिया और ट्यूशन लगा दिया अब चाहे बच्चा पढ़े या न पढ़े वो संतुष्ट हैं कि वो पड़ोसी से कम नहीं है. ये बात हर सेवा और सिस्टम पर लागू होती है.मध्य वर्ग इकॉनॉमी क्लास में यात्रा करता है तो उच्च वर्ग को लगता है कि इकॉनॉमी क्लास में सफर करना उसकी बेइज़्जती है. यही मानसिकता भ्रष्टाचार की जननी है.

  • 16. 10:33 IST, 21 जून 2011 Dhananjay Nath:

    सामयिक और सटीक लेख. निश्चिय ही बदलाव की बात हर कोई करता है लेकिन बदलाव कोई नहीं चाहता.

  • 17. 11:12 IST, 21 जून 2011 Amit Rai:

    नौकरियों में आरक्षण के मीठे फल सामने आ रहे हैं. खाइए. अब खट्टे क्यों लग रहे हैं.

  • 18. 11:32 IST, 21 जून 2011 Vinod Rathore:

    हाल ही में एक सरकारी परीक्षा में पहले सवाल में एक पैरा लिखा हुआ था कि किस तरह की सरकार आप चाहते हैं, इसमें सरकार को भ्रष्टाचार के मामले में ज़िम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया था. इसमें कहा गया था कि अगर सिस्टम बहुत ख़राब है तो क्यों न नया सिस्टम तैयार कर लिया जाए. निजीकरण हमेशा कोई विकल्प नहीं हो सकता. सरकार अपनी ज़िम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ सकती. यदि आप सिस्टम को नहीं सुधार सकते तो आपको सत्ता पर रहने का कोई हक़ नहीं है.

  • 19. 12:18 IST, 21 जून 2011 imadul haque:

    विनोद जी, काश आपकी ये सोच हमारे देशभक्त राजनेता भी सोच पाते.

  • 20. 12:26 IST, 21 जून 2011 prakash:

    बधाई, आपने मर्म पर निशाना साधा.

  • 21. 13:39 IST, 21 जून 2011 satnam singh:

    विनोद जी आपने बहुत अच्छा लिखा है.कभी सरकारी चीज़ देश की शान हुआ करती थी. पर अब वही सरकारी चीज़े कुछ भ्रष्ट लोगों की वजह से कंगाल हो चुकी है और उनका नाम सुनते ही लोग भागते हैं..इसकी वजह यह है कि जो लोग सरकार में हैं उन्होंने व्यापार शुरू कर दिया है. जो सरकारी डॉक्टर है उसने अपनी निजी क्लीनिक खोल लिया है.अगर कोई अस्पताल में उस डॉक्टर के पास जाता है तो डॉक्टर उसे अपना विज़िटिंग कार्ड थमा देता है कि घर पर आ जाना. मंत्रियों ने सड़कों के ठेके अपने रिश्तेदारों में बांट दिए हैं.सरकारी मोबाइल कंपनी वाले अच्छी सेवा नहीं देते इसलिए प्राईवेट कंपनी वालों की तरफ़ आम लोग भाग रहें हैं..मनमोहन सिंह ख़ुद निजीकरण को बढ़ावा दे रहें हैं.

  • 22. 14:05 IST, 21 जून 2011 kaushal kishore:

    विनोद जी, शानदार लेख, बहुत बधाई हो.

  • 23. 15:36 IST, 21 जून 2011 VIJAY RAJAK:


    विनोद जी कम से कम आप अपने बच्चों को अवश्य ही सरकारी स्कूल में दाख़िला कराएंगे. अच्छाई की शुरूआत ख़ुद करनी होती है.कहीं चिराग़ तले अंधेरा तो नहीं.

  • 24. 16:25 IST, 21 जून 2011 himmat singh bhati:

    विनोद जी लिखा तो आपने ज़ोरदार है. सरकारी है पर घटिया है. इसके भी एक नहीं कई कारण हैं. जैसे सरकारी स्कूल में शिक्षा दी जाए या नहीं लेकिन शिक्षकों को तनख़्वाह ज़रूर मिलती है. अब शिक्षकों को भी नरेगा से जोड़ दिया है अब वे भी कमाई से जुड़ गए हैं. सरकारी अनाज ग़रीबों के लिए होते हैं लेकिन उन्हें तो सड़ा हुआ अनाज ही नसीब होता है.अच्छा तो ख़ास लोग ही निकल जाते हैं और बाज़ार में बेचकर कमाई भी होती है.यही हाल पानी का है.सरकारी अस्पताल का भी यही हाल है, सिर्फ़ ख़ास लोगों को ख़ास सुविधा मिलती है.

  • 25. 17:19 IST, 21 जून 2011 brijmohun:

    एक बहुत ही सीधा साधा लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दे को आपने उठाया है.

  • 26. 20:03 IST, 21 जून 2011 Dr.Lal Ratnakar/Jaunpur/Ghaziabad:

    विनोद जी, आपका ब्लॉग तो वास्तव में वक़्त की नब्ज़ को करीने से छूता है. आपने जिस आईएएस अधिकारी की बात की है कहीं न कहीं उनके दिल में भारत है. एक आईएएस अधिकारी कों मैं जानता हूँ यद्यपि वह प्रमोटी हैं लेकिन पूरी जिंदगी वह डरपोक और घूसखोर अफ़सर की तरह पहचाने गए और उनका कभी भी जनता के मध्य तमिलनाडु वाले कलेक्टर डॉ आर आनंदकुमार जैसा आचरण नहीं दिखा, जबकि उनके पिता जी सामान्य किसान थे. उन्होंने मेहनत करके अंततः आईएएस अधिकारी तो बन गए पर आदमी नहीं बन पाए. यक़ीनन वे अकेले ऐसे अधिकारी नहीं हैं क्योंकि हमारा तंत्र इसी तरह के अफ़सरों से भरा पड़ा है. अफसरों को पता होना चाहिए कि बच्चे बच्चे होते हैं और उन्हें एक जैसी शिक्षा मिलनी चाहिए. 'समान शिक्षा' के हिमायती कलेक्टर डॉ आर आनंदकुमार को साधुवाद क्योंकि वो सरकारी व्यवस्था को ठीक करना चाह रहे हैं. सच तो ये है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले टीचर अपने बच्चों कों प्राइवेट स्कूलों में ही पढ़ाते हैं, सरकारी अस्पतालों के डाक्टर भी अपना इलाज प्राइवेट अस्पतालों में ही कराते हैं. भला हो इस सरकारी का. पता नहीं हमारे भीतर से सरकारी नौकरी की इच्छा कब ख़त्म होगी.

  • 27. 09:52 IST, 22 जून 2011 vibhas verma:

    आपने जिस नख़्ता-ए-नज़र से इस बात को देखा है उसकी कमी आजकल रिपोर्ट्स में बहुत खलती है. धन्यवाद.

  • 28. 12:50 IST, 22 जून 2011 kamlakant pandey:

    आप बिल्कुल सही कह रहे हैं. मैं एक और तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ. हाल ही में कई राजनीतिज्ञों की मौत हैलिकॉप्टर दुर्घटना में हुई है. इसकी एक वजह ये भी है कि अधिकारी और राजनीतिज्ञ सड़कों से यात्रा नहीं करना चाहते क्योंकि सड़कों की हालत इतनी ख़राब है. अगर हमारे गवर्नर और मंत्री सड़क के रास्ते से यात्रा करने लगें तो हमारी सड़कें दुनिया की सबसे बड़ी सड़कें हो जाएंगीं.

  • 29. 13:21 IST, 22 जून 2011 murari meena:

    शानदार जी शानदार.

  • 30. 17:19 IST, 22 जून 2011 Surendra Singh Kaintura:

    सरकारी विद्यालयों का स्टार काफ़ी हद तक हमारी मानसिकता पर निर्भर करता है. मेरा मानना है कि सरकारी स्कूल ही अपने वास्तविक और पारंपरिक लक्ष्य की ओर अग्रसर हैं. अन्य स्कूल शिक्षा का व्यवसायिकरण कर रहें हैं. इससे हमारी शिक्षा प्रणाली को गंभीर ख़तरा है.

  • 31. 19:57 IST, 22 जून 2011 himmat singh bhati:

    विनोद जी, यहाँ भारत में तो सरकारीपन की हद हो गई है. यहाँ ग़रीब लोग यूँ तो टैक्स के दायरे में नहीं आते हैं लेकिन उन्हें भी हर चीज़ ख़रीदने पर टैक्स पर टैक्स देना पड़ रहा है. विदेशी तर्ज़ पर वे सर्विस टैक्स भी देना पड़ रहा है. सरकारी लोग तो घोटाले पर घोटाले कर रहे हैं और पकड़े भी जा रहे हैं लेकिन उनको कोई शर्म नहीं है. ईमानदारी का जामा पहने सरकारी लोग भ्रष्टाचार रोकने या कम करने पर जिस तरह के अडंगे लगा रहे हैं उससे भी घटियापन ज़ाहिर हो रहा है. विकास के नाम पर लोगों की ज़मीनें ज़बरदस्ती ली जा रही हैं इससे और भी घटियापन सामने आ रहा है. बेईमानों के हौलसे लगातार बुलंद होते जा रहे हैं, लूटपाट और बलात्कार की घटनाएँ बढ़ रही हैं ये भी सरकारी निकम्मेपन की वजह से हो रहा है. वह देश का नायक कहाँ छिपा है जो कहता है कि मुझे हिंदुस्तानी कहलाने में शर्म महसूस हो रही है. इधर देश की जनता सरकारी घटियापन से शर्मसार हो रही है पर नेता को कहाँ शर्म आ रही है.

  • 32. 00:54 IST, 23 जून 2011 B. S. Saini:

    सरकारी सिस्टम को पटरी पर लाने की जो पहल डॉ आर आनंदकुमार ने की है उसने लिए उनको नमन.

  • 33. 11:36 IST, 23 जून 2011 balwant:

    बहुत बढ़िया आलेख. यदि मध्यम वर्ग भ्रष्ट लोगों के ख़िलाफ़ नहीं होगा तो उनकी स्थिति भी सरकारी चीज़ों की तरह हो जाएगी, जैसा कि आपने ज़िक्र किया है.

  • 34. 12:42 IST, 23 जून 2011 PRAVEEN SINGH:

    अधिक आशान्वित होने की आवश्यकता नहीं. ये न मान लें कि हमारे कर्णधार नेता कोई आदर्श स्थापित करेंगे. आप जाँच कर लें लालू, कपिल, चिदंबरम, सुषमा, मुलायम, आडवाणी, मोहन या फिर सोहन सबके बच्चे किसी हाई-फ़ाई स्कूल में ठाठ से पढ़ते हैं. मेरे मतानुसार जंक फ़ूड से सबसे अधिक हानि जंक फ़ूड कहने वालों को ही होती है. हमारे नेतागणों को कुमति ने लपेट लिया है. आपकी शुरुआत अच्छी है.

  • 35. 13:42 IST, 23 जून 2011 harish:

    ठीक कहा आपने. आज हम सभी सरकारी विभागों से डरते, भागते और निम्न दृष्टि से देखते हैं. लेकिन नौकरी करनी है तो सरकारी ही. हम भारतीय महान हैं.

  • 36. 09:55 IST, 24 जून 2011 deepak singh,122,himadri avennue,lane no 6 dehradun-248001:

    ब्लॉग में जो कुछ लिखा है वो बिलकुल सही है और ये सही बात है की अगर नेताओं और अधिकारियों के बच्चे और हमारे बच्चे भी अगर सरकारी विद्यालयों में पढ़ें तो काफी हद तक इस व्यवस्था को सुधारा जा सकता है लेकिन विडंबना ये है की आमजन तो पहल कर भी दे परन्तु उससे होने वाला कुछ नहीं क्यूंकि नेता और अधिकारी लोग ऐसा नहीं करेंगे,बिना इन लोगों के साथ आये ,व्यवस्था में कोई परिवर्तन होने वाला नहीं है | और ये लोग जनता के साथ तो न कभी थे न होंगे.....अगर हमें सही मायने में बदलाव लाना है तो पहले ऐसे लोगों को चुनकर लाना पडेगा जो जनता के कदम से कदम मिला कर चले और वाकई में बदलाव चाहते हों ,उसके बाद कुंठित और भ्रष्ट विचारों वाले अधिकारियों को सदा के लिए बाहर का रास्ता दिखाना होगा | तब जाकर हम उम्मीद कर सकते है एक नए परिवर्तन की.........एक नयी और खुशगवार सुबह की.......और ये असंभव भी नहीं है अगर हम खुद अपने अंतर्मन में ये सोचलें..........हम होंगे कामयाब एक दिन..............जय भारत जय उत्तराखंड....

  • 37. 00:09 IST, 25 जून 2011 prakash soy:

    शायद सरकार की आंख जल्दी ही खुले , नहीं तो हमारे देश में राजनेताओ पर से भरोसा उठ जायेगा.

  • 38. 07:55 IST, 26 जून 2011 h p das:

    सरकार मतलब घटिया. इसके परिणामस्वरुप अपने देश के सभी उद्योग धंधे अब निजी हाथों में जा रहे हैं और निजी उद्योगपतिओं द्वारा देश का इतना शोषण किया जा रहा है कि अब दुनिया के सबसे अधिक करोड़पति भारत में है और सबसे अधिक ग़रीब / भूखे भी भारत में हैं.

  • 39. 22:32 IST, 29 जून 2011 राजीव श्रीवास्तव:

    इस बारे में चालीस साल पहले चर्चा करनी चाहिए थी

  • 40. 16:48 IST, 30 जून 2011 Narender.Jaipur.Raj:

    विनोद जी आपका धन्यवाद कहना चाहूँगा कि आपने इस मुद्दे को उठाया.आज ज़रुरत है एक और आज़ादी की जिसमे किसी के साथ किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं हो और सबको सामान रूप से मूलभूत सुविधाओ का लाभ मिले. न कोई अमीर हो और न कोई ग़रीब हो. जब तक ये अमीरी ग़रीबी, जांति पांति, ऊंच नीच आदि भेदभाव रहेंगे तब तक देश का भला नहीं हो सकता. सिर्फ सरकारी नौकरो और नेताओ का ही हो सकता है.

  • 41. 21:27 IST, 30 जून 2011 Alok Kumar:

    सच है. ये कड़वा सच है. लोग इसी तरह से जीते चले आ रहे हैं. अगर आपके जैसे कुछ लोग सोचने लगें तो वो दिन दूर नहीं जब हम बेहतर तरीक़े से एक साथ रह पाएंगें.

  • 42. 17:58 IST, 01 जुलाई 2011 ashok singh raghuvanshi:

    विनोद जी, आपको लेख के लिए बधाई. समाज के समक्ष एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए आप के माध्यम से आर आनंद कुमार जी को साधुवाद. आपने अपने पूरे लेख में मुख्य रूप से मध्यम वर्ग को ही निशाना बनाया है. मेरा विचार है कि यदि मध्यम वर्ग परिश्रम करता है, अपने सपनों को परवान चढ़ाने के लिए जी तोड़ मेहनत करता है तो फिर क्या उसे ये हक नहीं कि वह अपने बच्चों को यथासंभव अच्छे स्कूलों में पढ़ाए, अपनी बीमारी का इलाज़ अच्छे डाक्टरों से करवाए? ऐसे में वह वहीं तो जायेगा जहाँ उसे अच्छे स्कूल मिलेंगे, जहाँ अच्छे डाक्टर मिलेंगे. इसकी खातिर वह अपनी औक़ात से कहीं अधिक कीमत अदा करता है. मध्यम वर्ग की मानसिकता को कोसने से अच्छा है कि सरकारी प्रतिष्ठानों के स्तर को ऊँचा उठाया जाए.

  • 43. 21:53 IST, 01 जुलाई 2011 C.P.SHYAM:

    ऐसे लेख को प्राथमिकता मिलनी चाहिए. हमारे देश में ऐसे बहुत से लोग सरकारी सेवा में हैं या सेवानिवृत हो चुके है जिन्होंने समाज के लिए बहुत असाधारण काम किए हैं. लेकिन ऐसे लोग कभी प्रचार नहीं चाहते. वर्मा जी को लीक से हटके लेख लिखने के लिए साधुवाद.

  • 44. 10:54 IST, 02 जुलाई 2011 punit pawan minz:

    विनोद जी, आपका ये कहना बिल्ल्कुल सही है. पर ऐसा क्या किया जाये के लोगों की सोच बदल जाये जो खुद तो सरकारी नौकरी का मज़ा लूट रहे है पर सरकारी संस्थानों को खोखला कर रहे है.
    बाकि़ को भी ऐसा कदम उठाना चाहिए कि वो भी इस परिवर्तन का हिस्सा बने. आपका ब्लॉग सराहनीय एवं उत्साहवर्धक है.

  • 45. 17:56 IST, 14 जुलाई 2011 sajid:

    इस अनोखी प्रस्तुति के लिए शुक्रिया.

  • 46. 09:09 IST, 19 जुलाई 2011 kamlesh sahu:

    बेहतरीन लेख लिखा आपने. ये सही है. धन्यवाद

इस ब्लॉग में और पढ़ें

विषय

इस ब्लॉग में शामिल कुछ प्रमुख विषय.

BBC © 2014बाहरी वेबसाइटों की विषय सामग्री के लिए बीबीसी ज़िम्मेदार नहीं है.

यदि आप अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करते हुए इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरूप कर लें तो आप इस पेज को ठीक तरह से देख सकेंगे. अपने मौजूदा ब्राउज़र की मदद से यदि आप इस पेज की सामग्री देख भी पा रहे हैं तो भी इस पेज को पूरा नहीं देख सकेंगे. कृपया अपने वेब ब्राउज़र को अपडेट करने या फिर संभव हो तो इसे स्टाइल शीट (सीएसएस) के अनुरुप बनाने पर विचार करें.