सुपरस्टार अजन्मा शिशु
सुप्रसिद्ध कवि और देश के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के अभिन्न मित्र हरिवंश राय बच्चन के पुत्र होने के बावजूद अमिताभ बच्चन को सुपरस्टार की पदवी पाने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाना पड़ा.
अमिताभ के बेटे अभिषेक बच्चन इस सम्मान से अब भी कोसों दूर हैं.
बच्चन परिवार से बाहर देखें तो राजेश खन्ना, सलमान, शाहरुख़, आमिर वग़ैरह भी आयु के तीसरे दशक में यह स्वाद चख पाए.
लेकिन धन्य है ऐश्वर्या राय की कोख में पल रहा शिशु जो जन्म लेने से पहले ही सुर्ख़ियों में छा गया है.
बिग बी ने ट्विटर पर इत्तिला की और बधाई संदेशों का ढेर लग गया. एक घंटे में हज़ारों प्रशंसकों ने ट्वीट कर के अपनी ख़ुशी का इज़हार किया.
टीवी चैनेलों को मसाला मिल गया. किसी ने पंडिताचार्य को बुला कर बच्चे की जन्मकुंडली बनवानी शुरू कर दी तो किसी और ने न्यूमरोलॉजिस्ट की राय ली कि अंकों के हिसाब से बच्चे का भाग्य कैसा होगा.
किसी ने क़यास लगाने शुरू किए कि गर्भ में पल रहा शिशु लड़का है या लड़की तो किसी ने अनुमान लगाया कि जुड़वां बच्चे भी हो सकते हैं.
होने वाले दादा ख़ुश हैं, दादी ख़ुश हैं, माता-पिता फूले नहीं समा रहे. इन सब से बढ़ कर प्रशंसक गदगद हैं.
दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत महिला बच्चे को जन्म देने जा रही है. माँ की सुंदरता और पिता का क़द पाने वाला यह बच्चा यक़ीनन पैदायशी सुपर स्टार होगा.
आश्चर्य होता है कि एक स्वाभाविक, प्राकृतिक प्रक्रिया दुनिया का सबसे बड़ा अजूबा भी बन सकती है. क्या यह सिर्फ़ बाज़ार की माया है या हमारा दीवानापन भी?
आज दफ़्तर आते समय कार की खिड़की से एक झुग्गी के बाहर, मैले कुचैले कपड़े पहने एक मज़दूरनी को अपने बच्चे को दुलराते देखा.
उस बच्चे के जन्म पर शायद थोड़ा-बहुत जश्न हुआ हो, लेकिन हंगामा तो हरगिज़ ही नहीं हुआ होगा.
लेकिन यह बच्चा अपने माँ-बाप, दादा-दादी का सुपरस्टार तो है ही.
हमारा आपका बने ना बने.

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सलमा जी, हद कर दी आपने. बीबीसी के मंच को इतना संकुचित करना कहाँ तक उचित है. बीबीसी की छवि जनकल्याण वाली है. मुझे आपसे अपेक्षा है कि बीबीसी की सार्वभौम, व्यापक छवि का ख़्याल रख कर ही लिखेंगी.
हिंदुस्तान में एक बीमारी है 'हिंदिस्तानी'. हम रात दस बजे भ्रष्टाचार पर इतनी गंभीर बात कर रहे थे कि अचानक सब कुछ समाप्त हो गया और जूनियर बच्चन सारे चैनेल पर छा गए. क्या कोई बता सकता है कि यह बच्चा क्या कृष्ण के रूप में जन्म ले रहा है जो देश की समस्याओं को पल भर में समाप्त कर देगा.
वाह सलमा जी बहुत सुंदर लिखा है आपने. थोडा़ सब्र करें. मालिक जानता है कि लड़का होगा या लड़की. इंतज़ार करें पैदा होने तक. रहा सवाल सुपरस्टार पैदा होने का, ये भी मालिक ही जानता है. ये सब मीडिया की मेहरबानी है. अब आप ख़ुद ही को देखिए, बीबीसी पर भी आपने भी लिख दिया है. आप ने कभी किसी ग़रीब के बच्चे के बारे में लिखने की कोशिश की?
लगता है या तो आप को जलन है या आप ख़ाली हैं और कोई काम नहीं है.
टीवी चैनल अपने टीआरपी बढ़ाने के लिए क्या-क्या परोस सकते हैं यह उसी का परिणाम है. जबकि देश में अन्य गंभीर मुद्दे भी हैं जनता के सामने परोसने के लिए. भगवान उनको सदबुद्धि दे.
आप सही कह रही हैं. इतना होहल्ला किस लिए हो रहा है. बच्चे तो रोज़ होते हैं. इतना हल्ला तो नहीं होता. ठीक है, ख़ुशी होती है, पर जनता है कि पागल हो रही है.
जो ख़बरों में आना चाहिए उसे कभी सुर्ख़ी नहीं मिली और जिसकी ज़रूरत नहीं उसे दिन रात प्रचारित-प्रसारित किया जाता है. शायद यह भारतीय मीडिया की नियति बन गई है. इस ख़बर का सुर्ख़ियों में आना यह सिद्ध ज़रूर करता है. सलमा जी, इतने बेबाक ब्लॉग के लिए धन्यवाद.
मुझे आपका ब्लॉग पढ़ कर संतोष हुआ, कम से कम लोगो का ध्यान उस तरफ मोड़ा जो लोग अक्सर नजरअंदाज़ कर देते हैं. शायद यही एक संवेदनशील लेखक और आम आदमी की सोच मे फ़र्क़ होता है.
बहुत सही और सच्ची बात कही है आपने. यह सब मीडिया का प्रचार है वरना आम आदमी को इस तरह की ख़बरों में दिलचस्पी नहीं है. सलमा जी, आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है.
मैं कल से ही सोच रहा हूँ कि अगर ऐश्वर्या गर्भवती हैं तो इसमें ख़बर क्या हुई.
बीबीसी को ऐसे बेवक़ूफ़ी भरे मीडिया चैनलों के लिए एक प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करना चाहिए.
आप बिलकुल सही लिख रही हैं, हम व्यक्ति पूजा करने वाले लोग हैं और यह सोच हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी. और कुछ यह भी है कि मीडिया अपना पेट पालने के लिए बातों का हौवा बना रही है. अब बच्चन परिवार भी उसी हौवे का लुत्फ़ उठा रहा है. मेरा भारत महान.
कुछ लोगों को सही बात कड़वी लगती है. आपके ब्लॉग पर आ रही प्रतिक्रियाएँ देख कर ऐसा ही लगता है.
सलमा जी, बचपन में मैंने एक लेख पढ़ा था पंडित जवाहर लाल नेहरू के बारे में कि कुछ लोग चांदी का चम्मच मुँह में लेकर पैदा होते हैं और पंडित जी भी उन्हीं में से एक थे. लेकिन उन्होंने अपने लिए लोहे की सलाख़ों को चुना. तो जन्म से कोई सुपरस्टार नहीं होता. यह ज़िंदगी अपने लिए ख़ुद बनानी पड़ती है. यह समाचार किसी सुपरस्टार का नहीं, देश की सबसे बड़ी फ़िल्मी हस्ती के दादा बनने का समाचार है. आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी.
सही लिखा आपने. एक चैनल पर एक रिपोर्टर इस की रिपोर्टिंग तरन्नुम के साथ कर रहे थे कि-ऐश्वर्या माँ बनेंगी, अभिषेक बाप बनेंगे, अमिताभ दादा बनेंगे, जया दादी बनेंगी.-अरे भाई, यह तो ज़ाहिर सी बात है. वाक़ई मीडिया कितना भी कहे कि हम जनकल्याण की बातें करते हैं, लेकिन ऐसा मीलों दूर नहीं है. अचानक से अन्ना हज़ारे के कार्यक्रम को हटा कर सब टीवी चैनलों पर यह न्यूज़ आ गई. अरे भाई ऐसा कौन सा अवतार पैदा होगा, वह भी आम बच्चों की तरह होगा. तारे ज़मीन पर फ़िल्म में सही संदेश है कि 'हर बच्चा स्पेशल होता है'. एक पाठक ने आपकी बात को कड़वा बताया है. सच हमेशा कड़वा होता है.
सलमा जी आप शायद पत्रकारिता का असली मकसद भूल चुकी है अथवा आपके पास व्यर्थ समय है . यदि आप इस प्रकार के ब्लॉग लिखती रही तो बीबीसी हिंदी अपनी विशिष्टता खो देगा. आप भी उन पत्रकारों कि जमात में शामिल लगती है जिनका मकसद है बस किसी बात को हवा देना.
यह लेख बेहतरीन है.
यह कैसी जलन है सलमाजी जो आपसे दबाये नहीं दब रही है । किसी के यहाँ खुशी आने वाली है जिससे आपको या किसी और को कोई नुकसान नहीं होने वाला . उसके स्टार बनने से आपको क्या तकलीफ है . आपने बीबीसी जैसे मंच पर भी उसे लिख कर खुद को स्टार बनाने की कोशिश तो नहीं की ना ? ...आप पत्रकार लोग ही अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए जनम कुंडली और न्यूमरोलॉजी बनवा रहे हैं.
जिस इमारत में मैं रहता हूँ उसके सामने झुग्गी-झोंपड़ियाँ हैं और रोज़ सुबह मैं वहां लोगों को पानी के लिए संघर्ष करते देखता हूँ. थोड़ी सी भी बारिश होती है तो उन्हें अपने छतों की मरम्मत के लिए मशक़्क़त करनी पड़ती है. उनके छोटे बच्चे ट्रैफ़िक की परवाह न करके सड़कों पर खेलते रहते हैं. यह सब मीडिया दुनिया को नहीं दिखाता. यह हमारा दुर्भाग्य है कि हमें ऐसी ख़बरें देखनी पड़ती हैं जिनका जनकल्याण से कोई लेनादेना नहीं.
सलमा जी, आपने सही लिखा है. मीडिया इस ख़बर को इतना महत्व क्यों दे रहा है जबकि अन्य अहम समाचार भी हैं. बहुत सी महिलाएँ गर्भवती होती हैं. ऐश्वर्या के गर्भवती होने में ऐसा क्या अनोखा है. सभी माता-पिता के लिए उनका बच्चा सुपरस्टार होता है. राज--यह जलन नहीं है. सलमा जी वही बता रही हैं जो भारत में सुपरस्टारों के बच्चों को लेकर सोच है. हरेक को अपना नज़रिया पेश करने का अधिकार है.
''आश्चर्य होता है कि एक स्वाभाविक, प्राकृतिक प्रक्रिया दुनिया का सबसे बड़ा अजूबा भी बन सकती है. क्या यह सिर्फ़ बाज़ार की माया है या हमारा दीवानापन भी?'' वाह सलमा जी बाज़ार की बात करती हैं और उसी बाज़ार में उतर आती हैं कोई नहीं आप इस मुल्क की कोई अलग पत्रकार तो नहीं हैं, वैसे बी बी सी के 'ब्लॉग' सीरियस होते हैं इसीलिए लोग पढ़ते भी हैं, बुरा मत मानियेगा आपका मनोरंजन वाला कॉलम ही ऐसी खबरों के लिए काफी नहीं है क्या, कला के पहलू में केवल और केवल अभिनय और वह भी 'गर्भस्थ' शिशु के लिए. एक बात मेरी समझ में नहीं आ रही कहीं यैसे ही मुहूर्त में किसी 'दरिद्र' के घर में या किसी 'नट' या 'बहचारिया' के घर में कोई 'लाल' गर्भस्थ हो गया हो, पर आपकी खोजी पत्रकारिता तथ्यों की परख कैसे करे, आदरणीया सलमा जी, बहुतों ने टिप्पणी की है बीबीसी के लिए ऐसे 'ब्लॉग' की जरूरत पर,
लोग वही देखते और सुनते हैं जो मीडिया उन्हें दिखाना या सुनाना चाहता है. और मीडिया वही परोसता है जो लोग चाहते हैं. लगता है आप भी उन्हीं में शामिल हैं वरना ऐसे विषय पर क्यों लिखतीं जिसका कोई तर्क ही नहीं है. प्रतिदिन हज़ारों बच्चे पैदा होते हैं. लोगों को यह बताने की क्या ज़रूरत है कि इस बच्चे पर कितना ध्यान दिया जा रहा है.
मीडिया ही ऐसे लोगों को सुपरस्टार बनाता है. आपके ब्लॉग में भी शब्दों और भावनाओं से खिलवाड़ है.
चर्चा में रहना कोई फ़िल्मी सितारों से सीखे. मीडिया की चाटुकारिता का प्रंचड सबूत है कि मीडिया के मायने ही बदल गए हैं.
मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया, और हमने उसे .... आपको धूल का फूल की ये पंक्ति तो सुनी होगी- सरासर ग़लत है, बल्कि कहिये कि कवि ने लोगों के दिल बहलाने और बाज़ारूपन करने की कोशिश की है । और आपको साहिर लुधियानवी की पंक्तियों को बाज़ारू समझने में ऐतराज़ हो तो थोड़ा विश्लेषण कर ही लें - भगवान ने हम सभी को अलग बनाया, काला गोरा, धनी-निर्धन, संपन्न-विपन्न (धनी-ग़रीब से थो़ड़ा अलग), प्रभावशाली और कमज़ोर, सबकुछ होकर भी बदबख़्त (बदकिस्मत), कुछ न होकर भी ख़ुशबख्त और सबल होकर भी कमबख़्त । ये सभी अंतर भगवान ने बनाकर भेजे हैं और हमने उसे पाटने की बहुत कोशिश की है । ये भी हमारे समाज की ही देन है कि हम अपने में से ही अच्छे बुरे का निर्णय बनी-बनाई प्रथा, चर्मवर्ण, धन और जाति के आधआर पर कर लेते हैं । किसी गोरे का बुरा करना उतना आज भी नहीं खलता जितना बदसूरत किसी और का । हमारे समाज ने ही लोगों को समझाया है कि अंतरतः सभी बराबर है - जात, धर्म, वर्ण और जन्मजात गुणों के आधार पर फ़र्क नहीं है - पर अभी वो दिन नहीं आया जब भारत (और दुनिया) इस बात को व्यवहारिकता तक ले पाए । इक़बाल के 'शिकवा' में भगवान को समर्पित वो पंक्ति याद आई -
बन्दा ओ साहिब ओ मोहताज़ ओ ग़नी (संपन्न) एक हुए ।
तेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुए ।
यूँ तो भगवान ने ही हमको इतना अलग बनाया पर ये हमारा कर्तव्य है कि हम सबों को एक माने । वक़्त और अर्पण तो लगता है इतना बड़ा बदलाव लाने में ।
देश में अन्य गंभीर मुद्दे भी हैं .................
यह तो कुछ भी नहीं. भारत में तो देश के लिए बिना कुछ किए लोग महान नेता की श्रेणी में आ जाते हैं और एक ख़ानदान विशेष का होने के कारण चमचे कहते हैं कि महान नेता अब प्रधानमंत्री बनने के लायक़ हो गए हैं. यह हम भारतवासियों की विडंबना नहीं तो क्या है.
अमिताभ ने तो सिर्फ़ अपनी भावना प्रकट की थी अपने ट्विट से. इसे ख़बर तो आप पत्रकारों ने बनाया.
मैं आपकी राय से काफी हद तक सहमत हूँ. पता नहीं इसे मैं अपने देश का सौभाग्य कहूँ या दुर्भाग्य?
मेरा मानना है कि ये बहुत ही घटिया लेख है.