भेद का भाव
अमरीका में एक साल रहने के बाद मैं मुंबई वापस लौटने के लिए बेताब हो रहा था.
लेकिन पिछले अनुभव के कारण थोड़ा डर भी था कि घर मिलने में कठिनाई होगी. मुझे क्या पता था यह कठिनाई अपने समाज और देश से प्रेम की अग्नि परीक्षा बन जाएगी.
मकान ढूँढना शुरू किया. और मायूसी बढती गयी. घर तो कई पसंद आए, लेकिन यह देख और सुन कर मुझे बड़ा अफ़सोस हुआ कि मेरे धर्म के कारण मुझे कई लोगों ने घर देने से इनकार कर दिया.
वो भी उस इलाक़े में, जहाँ पढ़े-लिखे, दुनिया देखे लोग रहते हैं. मेरा 'सिंगल स्टेटस' भी एक बाधा साबित हुई.
इनकार करने वालों में हिंदू और ईसाई दोनों मज़हब के लोग थे. लेकिन आख़िरकार एक कैथोलिक जोड़ी ने मुझे अपना मकान किराए पर यह कह कर दिया कि वो बीबीसी के कारण हमें किराएदार बना रहे हैं.
इस भेदभाव का सामना करने के लिए मैं पहले से तैयार था, लेकिन भेदभाव इतना बढ़ जाएगा यह नहीं मालूम था.
मुंबई में हमारे कुछ साथियों ने मुझसे सहानुभूति जताई और कुछ ने कहा भेदभाव हर स्तर पर है. मुसलमान हिंदुओं को घर नहीं देते, हिंदू मुसलामानों को नहीं. शाकाहारी मांसाहारियों को घर किराए पर नहीं देते.
मेरे मुसलमान ब्रोकर ने कहा- सर अगर आप धारावी में किराए का घर लें, तो यह भेदभाव नहीं महसूस होगा. झोपड़ पट्टियों में हर धर्म के लोग एक साथ रहते हैं.
तो क्या पढ़ने-लिखने और प्रबुद्ध होने के बाद भेदभाव अधिक हो जाता है? क्या आपके पास इसका जवाब है?

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आपके साथ हुआ भेदभाव सही में शर्मनाक है, पर किसी न किसी तौर पर हम सब इस तरह के भेदभाद के शिकार हैं. मुंबई में उत्तर भारतीयों को भी मकान मिलने में मुश्किल होती है जैसा मैंने पाया था. विदेश में आपके रंग के आधार पर भेदभाव होता है. भेदभाव किसी भी तरह का हो, चाहे जुबां से जुड़ा हो, मज़हब से, राष्ट्रीयता से या जाति से, भेदभाव भेदभाव ही कहलाएगा. दुर्भाग्य से हम सब संकुचित दिमाग़ के हैं, और अक्सर किसी न किसी स्तर पर भेदभाव करते हैं.
जुबैर साहब यह कहना कठिन है कि आपको मकान मिलने में परेशानी का क्या कारण रहा. लेकिन आपने उसका जो निष्कर्ष निकाला उससे सहमत होना कठिन है .क्योंकि जिन लोगों ने आपको इस आधार पर मकान किराए में नहीं दिया क्योंकि आप उनके धर्म वाले नहीं हैं,यह सिर्फ़ उनका कहना था आपने इसे उसी तरह मान लिया यह आपकी असावधानी है.धर्म के बारे में उन्हें पता न हो तो यह चल सकता है लेकिन आपसे इसकी अपेक्षा नहीं की जाती है.दरअसल हम सबकी रूचि धार्मिक होने में नहीं बल्कि धार्मिक दिखने में होती है.जिस दिन हम धर्म को समझने लगेंगे हमें उन पर क्रोध नहीं ,दया आएगी. धर्म को लेकर हम इसलिए सजग होने लगते हैं क्योंकि धर्म के बारे में हमें भी बहुत पता नहीं होता है. खान-पान, रहन-सहन,रीति रिवाज को लेकर कुछ लोगों के आग्रह या दुराग्रह हो सकते हैं,या उनकी अज्ञानता हो सकती है. केवल इसी कारण हम उन पर कोई इल्ज़ाम नहीं लगा सकते है. आप शायद इस बात से सहमत होगें कि अधिकांश लोग ख़ास क़िस्म का चेहरा-मोहरा और विशेष पोशाक इसलिए अपनाते हैं क्योंकि इससे उनको धर्म से जुडे होने की पहचान मिल जाती है. यह सिर्फ रणनीति है और चालबाज़ी है. वास्तविक धर्म से इस बात का कुछ भी लेना-देना नहीं है. यदि इतने लोग वास्तविक धार्मिक होते तो अधर्म कब का ही मिट चुका होता. बहुत से लोग जाति,भाषा,प्रान्त या ऐसी ही दूसरी फिजूल बातों में भेद-भाव करते हैं. वे कोई ज्ञानी नहीं हैं कि हम उनकी बातों का बुरा मान जाएं वे अज्ञानी हैं. मूल बात यह है कि जो भी अपने दुराग्रहों के आधार पर भेद-भाव करेगा उसके निष्कर्ष गलत ही होगें और उन्हें दुख भुगतना ही पड़ेगा. हिन्दु, मुसलमान, ईसाई या सिख महान गुरूओं की परम्परायें हैं. जिस पर चलकर हम सभी इंसान बन पाते हैं. लेकिन हमने महान गुरूओं के नाम पर भी बॅटवारा करके फिर से भेद-भाव शुरू कर दिया है. क्योंकि भेदभाव हमारी निजी फितरत है,धर्म से इसका कुछ भी लेना-देना नहीं है. कोई पागलपन करे तो इसका ईलाज हो सकता है लेकिन हम उसकी यह व्याख्या करने लगें कि इसका कारण धर्म है तो इसका कोई ईलाज सम्भव नहीं है.
जुबैर भाई आपका ऐसा लेख पढ़कर बहुत दुःख हुआ. मै मुंबई में तो नहीं आप मेरे गांव में जायें और मेरे मकान में बिना किसी किराये के रहें. आप क्या अभी तक बिना शादी शुदा है ? रहा सवाल आप के दुख का तो ऐसी नफ़रत के लिए हिन्दू कम मुसलमान अधिक ज़िम्मेदार है . मैं बीबीसी पर पूरा विश्वास करता हूँ कि आप की घटना से यह एहसास हो गया है कि कितनी दूरियां भाई चारे में आ गयी है. ज़िम्मेदार कौन. हम सब . यही इंडिया की बदकिस्मती है कि अनपढ़ अगर ऐसा करें तो कोई दुःख नहीं पड़ता पर पढ़ा लिखा तबका ऐसा करता है तो बड़ा दुःख होता है.
अगर यह गुजरात में हुआ होता तो बीबीसी ने तुरंत बीजेपी और मोदी को दोष दिया होता, परन्तु चूंकि यह मुबंई मे हुआ है अतः महाराष्ट्र और केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध कोई टिप्पणी नहीं. उचित भी है, शायद, क्योंकि कांग्रेस के तो हज़ार ख़ून भी माफ़ है.
ज़ुबैर साहब, आप को घर मिलने में दो दिक्कतें हुई उसका एक ही कारण है कि आप सिंगल हैं और आपने परेशान हो कर इसको अपने धर्म से जोड़ दिया जो बिल्कुल ग़लत बात है. मेरे कई मित्र और रिश्तेदार हैं जो सालों से मुंबई में रह रहे हैं,लेकिन उनको कभी भी ऐसी दिक्कत नहीं हुई. वे बांद्रा जैसे महँगे इलाक़ों में रहते हैं और मुझे आपका ब्लॉग पढ़ कर समझ नहीं आता कि आप को ही क्यों दिक्कतें हुई. ज़ुबैर साहब, आप शादी करें या अगर शादीशुदा हैं तो अपने बच्चे लेकर मुंबई कहीं भी जाएँ, आपको घर मिलने में कोई दिक्कत नहीं होगी. यह मैं गारंटी देता हूँ आपको. बड़ी मेहरबानी अपने निजी कामों और दिक्कतों में धर्म को न घसीटें और बतौर बीबीसी के पत्रकार आपको ऐसा नहीं करना चाहिए. मुझे लगता है कि आप या तो दोबारा अमरीका जाना चाहते हैं इसलिए जाने के कोई कारण ढूँड रहे हैं या आप पत्रकारिता के बाद राजनीति में आना चाहते हैं.
आपके साथ कोई नई बात नहीं हुई है,आम आदमी तो रोज भेदभाव झेलता है. शायद पढ़ने लिखने और प्रबुद्ध होने के बाद भेदभाव अधिक हो जाता है क्योंकि आजकल पढ़े लिखे लोगों के पास ज्ञान नहीं बल्कि जानकारी होती है. जानकारी के सैलाब में ज्ञान तो बह चुका है. ये शहरी लोग जब अपने पड़ोसियों और रिश्तेदारों की मदद नहीं करते तो आपकी क्या करेंगे यहाँ तक कि माँ बाप भी बोझ लगते है. रही बात धार्मिक भेदभाव की, तो इसको बढ़ाने में खबरिया चैनल और नेताओं का विशेष योगदान हैं. खास तौर पर मुसलमानों की छवि ऐसी बना दी गयी है कि उनके साथ सबसे ज़्यादा भेदभाव होता है.
बुज़ुर्ग आज भी कहते पाए जाते है कि ज़्यादा पढ़ लिख कर अकल मारी गई है इसकी.
भाई मेरे जो भेदभाव मुसलमान करते हैं उसे क्यों नहीं दिखाते? सारे मुसलमान दूध के धुले और ग़ैर मुस्लिम ही भेदभाव वाले?
अफसोसजनक है...
जुबैर भाई आपके साथ जो हुआ उसके लिए एक इंडियन होने के नाते ख़ेद है, पर क्या करें सिस्टम ही कुछ ऐसा है. मैं खुशकिस्मत हूँ कि दुबई में रहता हूँ, एक ही फ्लैट में , हम 3 परिवार रहते हैं और वो भी अलग- अलग राज्य के पर कोई शिकायत नहीं है.
ज़ुबैर जी, मेरा धर्म हिंदू हूं, लेकिन मुझे जाति के आधार पर भेदभाव सहना पड़ता है. और ये भेदभाव तो कभी समाज से गई ही नहीं.
ये सिर्फ़ मुंबई की नहीं, पूणे में भी यही समस्या है. मैं भी मुस्लिम हूं और इन दोनों शहरों में मुझे मकान बहुत मुश्किल से मिले.
अगर वहां आके बम विस्फोट करेंगे तो यही हाल होगा. उन लोगों को हवाई अड्डे से ही वापस कर देना चाहिए.
मेरा मानना है कि मुंबई के लोग अच्छे हैं लेकिन किसी ने इस तरह का माहौल पैदा कर दिया है. मैं बिहार का रहने वाला हूं और दुबई में रहता हूं लेकिन मेरे बहुत से दोस्त मुंबई से हैं. वे सभी बहुत अच्छे हैं. मुंबई एक महानगर है वहां इस तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए.
एक फ़िल्म में कहते हुए दिखाया गया था कि हर मुस्लिम आतंकवादी नहीं होता लेकिन हर आतंकवादी मुस्लिम होता है. आपके साथ किया गया भेदभाव बिल्कुल ठीक नहीं है लेकिन सभी मुस्लिमों को अब आतंकवाद रोकने के लिए कुछ ना कुछ करना होगा और समाज को विश्वास दिलाना होगा कि आप उनके साथ नहीं हैं.
यही भेद भाव, जात-पात , धर्म-समाज के कारण ही हमारा भारत महान है ज़ुबैर साहब.
ये लेख पढ़ कर ऐसा नहीं लगा कि लिखने वाला कोई पढ़ा लिखा आदमी है .
हमारे देश का दुर्भाग्य है कि ये लोग यहाँ रह कर भी हमेशा देश की जड़ें काटने का
सामान ढूंढ़ते हैं . ये बेचारे इतने मासूम हैं और हमेशा हर जगह सताए जाते हैं .
मैंने कभी किसी हिन्दू को किसी मुस्लिम के घर किराए पर रहते नहीं देखा .
क्या कारण हो सकता है? शायद कहने कि ज़रुरत नहीं है.
इस घटना की जितनी भी भर्त्सना की जाए उतनी कम है. मुझे ये जानकर बेहद अफ़सोस हुआ.
ज़ुबैर साहब आपने अपना अनुभव लिखा तो है पर इसका विश्लेषण नहीं किया है. मुंबई हो या कहीं और भारत में मुस्लमानों के घर हिंदुओं और इसाइयों के साथ नहीं होते. वो हमेशा अपने समुह में रहते हैं. भारत में हर समाज अपनी पहचान बचाए रखने की कोशिश में लगा रहता है. मुझे लगता है कि मुस्लिम समाज के एक वर्ग ने अपने-आपको हमेशा पर-धर्मियों से अलग रखा है. इन हालात में अगर कोई मुस्लिम उसका हिस्सा बनना चाहता है तो शुरू में उसे परेशानी हो सकती है, बाद में नहीं.
ज़ुबैर साहब आपके साथ जो हुआ लो ग़लत हुआ. कुछ लोगों की सोच कभी नहीं बदलती. मैं यहाँ मेलबार्न में एक मुस्लिम परिवार में रहता हूँ और उन्हें 'सलाम वालेकुम' कहता हूँ और वो जवाब में 'राम राम' कहते हैं. क़ाश भारत में भी ऐसा ही हो पाता!
हर वक़्त किस उलझन में रहते हो
हमको ज़ालिम, हमारे प्यार को धोखा कहते हो.
जो सामने है उसे बुरा कहते हो
जिसे देखा नहीं उसे ख़ुदा कहते हो.
मुस्लिम होना शायद भारत में संदेहास्पद हो जाना है. इंसान हिंदू भी हैं और मुसलमान भी लेकिन सरकार ही हमें संतरे की फांक की तरह बांटने का प्रयास करती है.
ज़ुबैर साहब ये कौन सी बड़ी बात है जो आपने इसको इस तरह से लिया. आप किसी बड़े परिवार को देख लिजीए वहां घर में ही भेदभाव है. आप इससे ऊपर उठें.
जब यह केस आप जैसे नामचीन इंसान के साथ मुंबई जैसे महानगर में होता है तो बाक़ी इंडिया के बारे में अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है. मीडिया ने ख़ासतौर पर मुस्लिमों की छवि ही ऐसी बना दी है यह भेदभाव यहीं ख़त्म नहीं होता. मुस्लिम इलाक़ों में स्कूल कॉलेज नहीं खोले जाते बैंक मुस्लिमों का पैसा तो जमा कर लेते हैं लेकिन क़र्ज़ नहीं देते. कानपुर में एक भी एटीएम मुस्लिम इलाक़े में नहीं है.
इसमें क्या नया है? जब बीबीसी के एक रिपोर्टर को ऐसे भेदभाव का सामना करना पड़ता है तो एक आम आदमी की दुर्दशा की कल्पना आसानी से की जा सकती. लेकिन, मैं नहीं मानता कि इसे सुलझाया जा सकता है.
मुझे ख़ुशी है कि ज़ुबैर साहब को एक हिंदू मकान मालिक ने घर किराया पर देने से मना कर दिया. पाकिस्तान में हिंदू और सिखों के साथ किस तरह का व्यवहार हो रहा है? वहाँ हर माह औसतन पच्चीस हिंदू और सिख लड़कियों का अपहरण कर मुस्लिम बनने के लिए मजबूर किया जाता है.
ज़ुबैर साहब रहने के लिए घर मिलने पर बधाई. अब आपको एक दूसरी तरह के भेदभाव का शिकार होना पड़ेगा. आपको 'बाहरी' क़रार दिया जाएगा. मैं अमरीका में रहता हूँ, लेकिन यहाँ का शहरी नहीं. लेकिन मुझे यहाँ भेद-भाव का शिकार नहीं होना पड़ा है. हम भारतीयों में अपने भीतर ही इतने तरह के भेद-भाव हैं. इस तरह के हालात किसी और देश में नहीं पाए जाते हैं.
मेरा ख़्याल है इसमें धर्म का मुद्दा लाना ठीक नहीं है. मैं किसी हिंदू को नहीं जानता जिसे किसी मुस्लिम मकान मालिक ने अपना घर दिया हो. हमें उत्तर प्रदेश में अपना घर इसीलिए छोड़ना पड़ा क्योंकि हम एक मुस्लिम बाहुल्य इलाक़े में रहते थे.
आपके साथ जो हुआ वो ठीक नहीं हुआ. लेकिन आपको इतना विचलित नहीं होना चाहिए.
जब किसी को चुनने का अधिकार होता है तो वो सब कुछ देखता है, धर्म, जाति, भाषा, रंग, इलाक़ा, पैसा. इन सब बातों को धर्म से जोड़ना बेकार है.
बीबीसी क्यों इस तरह का ज़हर फ़ैला रहा है? क्या काम करने के लिए इस तरह की शर्त रखी गई है?
कहीं से भी किसी तरह के भेदभाव को उचित नहीं ठहराया जा सकता है. पर आपको इस भेदभाव का डर केवल इंडिया से था. भले ही 80 फ़ीसद मुसलान इसके लिए ज़िम्मेदार न हों लेकिन 20 फ़ीसद लोगों ने पूरी दुनियाँ में सारी क़ौम को शक के दायरे में ला दिया है.
मेरे ख़्याल से इस ब्लाग का कोई अर्थ नहीं है.
आपका दर्द सुनकर तकलीफ हुई. बात पढ़ने -लिखने की नहीं है. पढ़े -लिखे हों या कम पढ़े लिखे, या फिर निरक्षर, कुछ इस तरह की परम्परा बना दी गयी है कि अमुक सोसाइटी में फलां व्यक्ति को किराए पर नहीं रहने दिया जाएगा. यहाँ तक की पूरी कीमत चुकाने पर भी उसे घर नहीं बेचा जाएगा. यह नफरत है, डर है, क्या है, पता नहीं. मगर जो कुछ भी है गंभीर है. यहाँ बहुतों के साथ भेदभाव, पक्षपात हो रहा है. धर्म की बात छोडिये, जाति पूछकर घर किराए पर दिए या नहीं दिए जाते हैं. घर तो बड़ी चीज है, अगर किसी सरकारी नल से किसी कथित छोटी जाति के व्यक्ति ने पानी तक भी पी लिया तो उसकी जान पर बन आती है. हिन्दुस्तान का एक बहुत बड़ा तबका इस तरह की छुआछात से परेशान है ,
जुबैर साहब, आपको याद होगा कुछ साल पहले आपने अपने ऑफिस में मेरा इंटरव्यू लिया था, उस समय भी मैंने आपसे इस तरह के उपेक्षित लोगों का दर्द बयां किया था. चोट किसी को भी लगे दर्द तो होता ही है. काश... लोगों को सद्बुद्धि आये......काश.........फिर इस तरह की घटनाएं न घटें.
ज़ुबैर साहब आपको निजी रिहायश के लिए मकान किराए पर नहीं मिला इसका कारण आपके मुताबिक़ धर्म का भेदभाव है. धर्म के नाम पर आपको वाकई बहुत बड़ी कुर्बानी देनी पड़ी है. बेहतर होगा कि अब तक आपने इस तरह की जितनी भी कुर्बानियां दी हैं उन सब को सूचीबद्ध कर लिया जाए, ताकि धर्म के लिए त्याग करने वालों में आपका नाम छूट ना जाए. धर्म यदि जिन्दगी में न हो तो इस तरह की चर्चा करने से संतोष मिलता है चाहे वह काल्पनिक संतोष ही हो. आपने जिन लोगों के व्यवहार के बारे में शिकायत की है, वह तो केवल उनकी सोच है, व्यवहार है, धारणायें हैं, मान्यताएं है, राय हैं. ये सब बदलती रहती हैं इसमें बहुत अधिक चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है. इसमें धर्म कहॉ से आ गया? धर्म को कितने लोग समझते हैं या जीते हैं यह कहना कठिन है. वास्तव में तो धर्म व्यक्ति और सृष्टि दोनों का ही मूल है जो इसको समझने की राह में चल पडता है वही धार्मिक है. धर्म इस तरह प्रतिक्रिया नहीं करता कि उन्होने आपके बारे में कुछ राय बनाकर किराये में मकान नहीं दिया और बदला लेने के लिए आपने ब्लॉग लिख दिया. धार्मिक होने के लिए शायद यही घटना प्रस्थान बिंदू बन जाए. जिन्हें आप आजकल की शब्दावली में धर्म कह रहे हैं वह राजनीति है, व्यापार है और बाक़ि तो अधर्म ही चल रहा है.
दो चार लोगों की ग़लतियों के लिए पूरी क़ौम पर टिप्पणी उचित नहीं है.
ये बहुत ही शर्मनाक है लेकिन इसपर अचरज नहीं होना चाहिए.
मेरे ख़्याल है कि मकान मालिक को हक़ है कि वो ये फ़ैसला कर सके कि किसे घर देना है किसे नहीं. आप इसके लिए उनपर जाति, रंग, क्षेत्रीयता के आधार पर भेदभाव का आरोप नहीं लगा सकते हैं.
मुंबई में आम आदमी को भी घर मुश्किल से ही मिलता है किल्लत है सब जानते हैं
घर छोडिये होटलवाले भी आसानी से रहने की जगह नहीं देते. इसे मज़हब से जोड़ना अच्छी सोच नहीं दर्शाता , यह और भी दुखद है कि बीबीसी का संवाददाता मज़हब के चश्मे से देश समाज शहर को देखता है. बेचारे अनपढ़ आदमी से फिर क्या उम्मीद करें?
आम तौर पर बीबीसी के अन्य ब्लॉग्स पर बहुत परिपक्व टिप्पणियॉं आती है. लेकिन हैरत कि इस ब्लॉग की टिप्पणियॉं कुछ जुदा है.
साहब आप कि बात पर हँसी भी आती है और दुख भी होता है कि आप या तो इंडिया मै खाभी रहे नहीं या तो फिर आप अनारी हैं जिस देश में राम का नाम लेना , भारत माता कहना मुसलमान विरोधी हो जाना होता है उस देश में अगर कोई आप लोगो को घर में जगह न दे तो क्या करे .वैसे एक और भी डर है लोग ये भी सोचते हैं कि कहीं आप लोग फिर से पाकिस्तान ना माग ले यानि घर भी दो और फिर बटवारा भी करवा लो .
आपको घर ना मिलने के जो कारण मुझे समझ आते हैं वो इस प्रकार हैं. आप BBC में काम करते हैं - हिन्दुस्तान में लोग नेता, अभिनेता, वकील, पुलिस व पत्रकार को घर देना पसंद नही करते. कारण जानना चाहते है तो किसी भी नुक्कड़ पर पूछ लें. आपका 'सिंगल स्टेटस' - बैचलर को घर देना मतलब मुसीबत को घर बुलाना माना जाता है. ज़ुबैर भाई वैसे आप पहले से ही जानते थे की आपको घर मिलना आसान नहीं होगा तभी तो आप एक मुस्लिम ब्रोकर के पास गए. मैं नही समझता की आपको दुखी होने की ज़रूरत है, आपको घर तो कंपनी लीज़ पर भी मिल सकता था. जो की एक आसान तरीका था. हां, वो बात अलग है की फिर आप ये भेद का भाव नही लिख पाते.
कृप्या ये समझने की कोशिश करें कि हर मुसलमान आतंकवादी नहीं होता लेकिन आजकल हर आतंकवादी मुसलमान ज़रूर होता है.
बीबीसी और उसके संवाददाताओँ को सारी खामियाँ हिंदुओं और भारत में ही क्यों दिखाई देती है? योरप अमेरिका और ब्रिटेन में क्या मुसलमानों का स्वागत होता है? भारत जैसे आतंकवाद पीड़ित देश में तो फि़र भी ज्या़दा छूट है.
ये भारत देश है जहाँ की संस्कृति अथिति देवो भवः कहलाती थी. लेकिन अफ़सोस राजनीतिज्ञों ने मज़हब के उन्माद में अथिति को खलनायक बना डाला है. हिन्दू मुस्लिम के प्यार भरे रिश्ते को कमज़ोर किया है. पहली नज़र में ही हमें शक कि नज़रों से देखा जाता है. मुस्लिम है तो इसके ज़रूर ख़तरनाक इरादे होंगे. जिहाद के नाम पर कुछ घटनाओं ने मुस्लिमों को कहीं का नहीं छोड़ा है. वैसे ज़ुबैर भाई आपको परेशान होने कि ज़रुरत नहीं है. बीवी बच्चे तो हैं नहीं, इसलिए अकेले कहीं भी रह सकते हैं. पत्रकारिता का दूसरा नाम परेशानी ही तो है!
बहुत सही हुआ आपके साथ. आप मुसलमान लोग सारी दुनिया में आतंकवाद फैलाओ, खू़न की नदियाँ बहाओ, गै़र मुस्लिमों पर हमले करो, और साथ मे यह उम्मीद भी करो कि सब आपको सर आँखों पर बिठायें. बहुत खूब! क्या दोगली विचारधारा है!!!
आप मुंबई की बात कर रहे हैं. यहाँ कैलिफ़ोर्निया में ठीक उलटा हुआ. मैं शादीशुदा हूँ. अपने 13 साल के लड़के के साथ रहने के लिए मकान ढूँढने में पसीने निकल गए. यहाँ सिंगल हो. अमरीकी गोरी चमड़ी वाले हो, तभी मकान मिलेगा. मुझे लगा कि प्रोफ़ेसर हूँ लोग इतना सम्मान करेंगे. किंतु सारे क़यास ग़लत निकले. अमरीका कितना महान देश है यहाँ आ कर पता चला.
आप जो भी कह रहे है, वो आपने महसूस किया है. पर एक आम निवासी की नज़रो से देखिए वो आतंकवाद से जुड़ी किस तरह की परेशानियो का सामना कर रहा है. आज वो एक गैर शादीशुदा व्यक्ति को रहने के लिए मकान तो दे दे पर क्या गारंटी है की वो सीधा- साधा इंसान है. एक बात क्या किसी ने गौ़र की कि ये परेशानी उन्हे मुंबई मे ही हुई है जहाँ आतंकवादी मौत बनकर घूमते रहते है...वो किराए के मकान मे मकान मलिक को ग़लत जानकारी देकर किरायेदार बनकर हमलो को अंजाम देते है.
बेंगलोर, चेन्नई या कोलकाता में या दूसरे किसी शहर मे तो ऐसा नई होता, होता है भी तो ये बहुत शर्मनाक बात है.
पर मुंबई को बुरा बनाना छोड़ उनकी मजबूरी और परेशानी को समझना चाहिए...
आपको ये कहना चाहिए की मुंबाइवासी इतना डरे हुए हैं की अंजान अकेले इंसान को किरायेदार बनाने से परहेज करने लगे है...
क्या आप इस स्थिति मे होते तो यही नई करते ???
सीधा-साधा इंसान हमेशा ही मुसीबत में पड़ने से बचना चाहता है. और ये ग़लत नही है.