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भारतीय क्रिकेट की दबंगई

पंकज प्रियदर्शीपंकज प्रियदर्शी|रविवार, 03 जुलाई 2011, 13:39 IST

कई बार दिमाग़ में ये बात आती है कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में भारतीय टीम और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के दंभ पर गर्व किया जाए या फिर शर्म. अपनी मनमर्ज़ी चलाने और अपनी नाक के लिए क्रिकेट की दुनिया को झुकाने के पीछे भारतीय क्रिकेट बोर्ड का मक़सद क्या है, समझ में नहीं आता.

समझ में आती है तो एक बात और वो ये है कि इसके क्रिकेट का नुक़सान हो रहा है और भारत की छवि ख़राब रहा. पिछले दिनों दो ऐसी घटनाएँ हुईं, जिसने भारतीय बोर्ड के दंभ और भारतीय क्रिकेटरों के बड़बोलेपन का उदाहरण पेश किया है. इसके चक्कर में तकनीक की भद्द पिटी और एक आहत अंपायर ने समय से पहले टेस्ट क्रिकेट को अलविदा कह दिया.

अंपायरों के फ़ैसले की समीक्षा यानी डीआरएस ने विश्व कप के दौरान ख़ूब चर्चा बटोरी. हालाँकि पहले से इसका इस्तेमाल हो रहा था, लेकिन विश्व कप के दौरान इसे ख़ूब सुर्ख़ियाँ मिली और भारत समेत कई देशों को इसका फ़ायदा भी मिला. जब दुनियाभर के क्रिकेट बोर्डों को इस पर आपत्ति नहीं, तो बीसीसीआई इसे अपनी नाक का सवाल क्यों बना रहा है. इसी हॉक आई या बॉल ट्रैकिंग सिस्टम के आधार पर सचिन तेंदुलकर पाकिस्तान के ख़िलाफ़ विश्व कप के सेमी फ़ाइनल मैच में नॉट आउट करार दिए गए. इसी हॉक आई के आधार पर कई देश मैच खेल रहे हैं.

लेकिन चूँकि बीसीसीआई ने इसके ख़िलाफ़ पहले ही मोर्चा खोल रखा था, तो वो अपनी बात से कैसे पीछे हट सकते थे. आज के ज़माने में तकनीक को ठेंगा दिखाकर अपनी बात मनवाना कहाँ की समझदारी है. लेकिन बीसीसीआई को समझदारी से क्या मतलब. एक समय ऐसा भी था कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड ट्वेन्टी-20 मैच के भी ख़िलाफ़ था, लेकिन भारत के ट्वेन्टी-20 विश्व कप जीतने के बाद बीसीसीआई की नींद टूटी.

उसकी नींद विज्ञापन से भारी-भरकम कमाई के कारण भी टूटी और ऐसी टूटी की इंडियन प्रीमियर लीग शुरू हो गया और फिर तमाशा क्रिकेट उन्हें ख़ूब भाने लगा. अगर डीआरएस में बॉल ट्रैकिंग सिस्टम ही नहीं होगा, तो डीआरएस का कोई मतलब नहीं है.

अब आइए भारतीय क्रिकेट बोर्ड के बाद भारतीय क्रिकेट टीम की दबंगई की चर्चा करें. कुछ वर्ष पहले भज्जी और साइमंड्स को लेकर जिस तरह भारतीय क्रिकेट बोर्ड ने अपना दम दिखाया और ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड को झुकने पर मजबूर किया, उससे ऐसा लगता है कि भारतीय खिलाड़ियों के भी पौ-बारह हो गए हैं.

अंपायर डेरेल हार्पर को लेकर भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का सार्वजनिक बयान निराशा पैदा करता है. ख़राब फ़ैसले आपको नाराज़ करते हैं, निराश करते हैं, लेकिन यही तो खेल भावना होती है कि आप अपनी भावनाओं पर काबू रखें. धोनी का सार्वजनिक बोलना और फिर बीसीसीआई का उस पर चुप्पी साध लेना हार्पर को आहत करने के लिए काफ़ी था.

भारत-वेस्टइंडीज़ के बीच आख़िरी टेस्ट हार्पर का आख़िरी टेस्ट होना था. लेकिन हार्पर ने पहले ही टेस्ट क्रिकेट छोड़ने की घोषणा कर दी. स्टीव बकनर के बाद एक और अंपायर भारतीय टीम की नाराज़गी की भेंट चढ़ गया. सवाल ये नहीं है कि अंपायर ग़लत थे या सही- सवाल ये है कि क्या किसी भी अंपायर की इस तरह की विदाई जायज़ है. आईसीसी का एक तबका भी इस बात से चिढ़ा है कि हार्पर को ऐसे जाना पड़ा.

अगर दबंग बीसीसीआई और भारतीय क्रिकेट सूरमाओं की यही हालत रही, तो फिर कदम दर कदम उनका समर्थन कम ही होगा और नाक की लड़ाई में क्रिकेट का कबाड़ा ही होगा.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 16:37 IST, 03 जुलाई 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    भारत की जनता ने क्रिकेटरों को सर पर चढ़ा रखा है. इन लोगों को विश्व कप जीतने का घमंड हो गया है. इससे दूसरे खेलों का भी नुक़सान हो रहा है. क्रिकेट की वजह से लोगों का समय भी बहुत बर्बाद हो रहा है. अब तो 12 महीने क्रिकेट ही चल रहा है.

  • 2. 17:51 IST, 03 जुलाई 2011 G M Khan:

    बहुत ही अच्छा ब्लॉग है और सही समय पर लिखा गया है. पंकज जी इसके लिए आपको बहुत बहुत साधुवाद. पर सवाल ये है कि सुनता कौन है? सबको एक नशे ने घेर रखा है. धन की शक्ति दिखाने की होड़ लगा रखी है बीसीसीआई और उसके समर्थकों ने. अब क्रिकेट सभ्य लोगों का खेल नहीं रह गया है. क्योंकि इसके अंदर सारी बुराई पैसे के कारण आ गई है. चाहे वो पैसा प्राप्ति के लिए हो या फिर पैसे के दम पर अपनी दीवानगी दिखाने के लिए हो. और दुर्भाग्य ये है कि इस पैसे के खेल में बीसीसीआई सबसे आगे है. आज की तारीख़ में आईसीसी एक कठपुतली बनकर रह गई है, जिसे बीसीसीआई जैसे चाहता है नचा रहा है. अब तो ईश्वर ही से आशा है कि इसका कोई हल निकले.

  • 3. 19:17 IST, 03 जुलाई 2011 himmat singh bhatai:

    पंकज जी पते की बात है. भारत सरकार बिना पूर्ण बहुमत के अपनी मन मर्ज़ी चला सकती है. तो बहुमत वाली सरकारें भी अपनी मनमर्ज़ी चलाती हैं. तो नई बात क्या है. यही हाल है क्रिकेट का. बीसीसीआई के पास जितना धन है, वो किसी और बोर्ड के पास नहीं. पंकज जी ये बात यूँ ही नहीं बोली जाती कि पैसा सिर चढ़ कर बोलता है. बीसीसीआई मालदार है और यहाँ के खिलाड़ी भी मालदार हैं. भारत के नुमाइंदे इस समय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में बॉस बने हुए हैं. रही बात क्रिकेट की, तो इसकी चिंता आज किसी को नहीं है. आज चिंता ये है कि कमाई आज हो रही है कल किसने देखा है.

  • 4. 21:15 IST, 03 जुलाई 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    पंकज जी ऐसा महसूस होता है कि बीबीसी ने आपको मंत्री बनाया हुआ है लेकिन आप सिर्फ़ क्रिकेट मंत्री का रोल अदा कर रहे हैं. क्या आपकी नज़रों में क्रिकेट के अलावा कुछ लिखने के लिए समय नहीं है. इस खेल ने देश का बंटाधार कर दिया है और साथ में आप जैसे रिपोर्टर जो रात-दिन क्रिकेट के बारे में बीबीसी पर लिखते रहते हैं.

  • 5. 23:05 IST, 03 जुलाई 2011 महेंद्र सिंह लालस:

    पंकज जी पहले लगा कि आपने किसी गोरे ख़ास तौर पर किसी ऑस्ट्रेलियन लेखक की टिपण्णी का तर्जुमा किया है.. ख़ैर, कुछ सीधी सादी बातें. जिस अंपायर की आप बात कर रहे हैं, उन्होंने सचिन के कंधे पर गेंद लगने पर उन्हें आउट करार दिया था. एक मैच में छह फ़ैसले एक टीम के ख़िलाफ़ जाएँ, तो उन्हें क्या दूसरे देश के खिलाड़ी माफ़ कर देंगे? रही साइमंड्स की बात, वे दारू पी कर अपने ही फ़ैंस को ठोक देते हैं, भज्जी की तो बिसात ही क्या? ध्यान रखिएगा रंगभेद दुनिया से गया नहीं है, आपकी टिपण्णी रंगभेद से भारत की जंग के ख़िलाफ़ और उसके पक्ष में है. इससे इतर कुछ भी नहीं.

  • 6. 01:18 IST, 04 जुलाई 2011 prem raj:

    हार्पर के साथ और क्रिकेट के साथ सचमुच बुरा हुआ. यहाँ हम सिर्फ़ एक टेस्ट नहीं खेल रहे थे, एक ग़लत फ़ैसले से नतीजा बदल सकता है. लेकिन जान-बूझ कर दिए गए बयान से क्रिकेट का भविष्य बदल सकता है. कई बार भारतीय या अन्य टीमों को ग़लत फ़ैसले का फ़ायदा हुआ और विपक्षी टीमों को भुगतना पड़ा है. ये खेल का हिस्सा है. आवश्यकता इस बात की है कि संयम बनाए रखा जाए. उम्मीद की जाए कि अगली बार क्रिकेट की जीत होगी. मैं हार्पर को मिस करूँगा.

  • 7. 14:04 IST, 04 जुलाई 2011 raushan singh:

    सर आज आपको काफी तकलीफ़ हो रही है और आप पहले कहाँ थे जब ऑस्ट्रेलिया इंग्लैंड जैसे देशों का वीटो चलता था, आपको तब तकलीफ़ नहीं होती थी . अब समय आ गया है इन्हे सबक सिखाने का.

  • 8. 15:13 IST, 04 जुलाई 2011 Arshad Quamar:

    पंकज जी जहाँ आज इंडियन क्रिकेट है वो आपकी ही देन है. मीडिया कभी भी किसी को ऊपर तो किसी को नीचे कर देती है और आज जो भी हमारी समझ में हो रहा है वो 80% मीडिया की ही देन है , आप ये क्यूँ भूल रहे है कि एक नहीं 6 ग़लत फैसले दिये और आपको वो भी याद होना चाहिए जब आपके महान अम्पायर ने सचिन को कंधे पर बॉल लगने से आउट दिया था. आप बीबीसी वाले प्लीज़ कुछ लिखने से पहले सोचा कीजिये. हमें मालूम है कि आप लोग बहुत महान हैं पर ताली एक हाथ से नहीं बजती.

  • 9. 15:53 IST, 04 जुलाई 2011 anand:

    पूरी तरह एक तरफा लेख है ये हार्पर एक बदनाम अम्पायर हैं, ख़ास तौर से चाहे वो मुरली को लेकर हो या सचिन को लेकर,उन पर नस्लभेदी होने का आरोप लगा है.धोनी ने बिलकुल सही किया,उन्होंने हार्पर के ग़लत फैसलों पर मैदान में सम्मान दिखाया लेकिन बाहर आकर उनका विरोध किया,यही तो सही तरीका है. उनका हक आवाज़ उठाने का है. आखि़र कैप्टेन नहीं बोलेगा तो कौन बोलेगा.

  • 10. 19:56 IST, 04 जुलाई 2011 ZIA JAFRI:

    पंकज साहब अभी ज़्यादा दिन नहीं हैं हैं जब भारतीय खिलाडी विदेशों मैं अपमान झेलते थे .आप भूल गए जब सुनील गावस्कर को लोर्ड्स के मैदान मैं जाने से रोक दिया था .अपने ये नहीं सोचा गावस्कर ने सर की उपाधि लेने से क्यों मना कर दिया ? रिकी पोटिंग जब टीवी तोड़ते हैं या झूठ बोलतें हैं तो दबंगई नहीं होती ? मेहन्द्र सिंह दोनी ने जो कहा वो क्या गलत था ?

    बीसीसीआई जो तर्क दे रहा है क्या वो गलत है ? बीसीसीआई में इतना दम है वो इन खर्चों को झेल सकता है लेकिन और बोर्डों में दम है की इस महंगी तकनीक पैर खर्च कर पायेंगे ?

  • 11. 21:20 IST, 04 जुलाई 2011 kush tripathi:

    पंकज जी शायद आपको पता होना चाहिए स्टीव बकनर ने अपने पूरे करियर में इंडिया और सचिन के खिलाफ हमेशा GALAT फैसले लिखे .हर खिलाडी को अपनी बात कहने का हक है . कम से कम हार्पर को कुछ तो शर्म आई . उसको दस साल पहले रिटायर हो जाना चाहिए था.

  • 12. 00:19 IST, 05 जुलाई 2011 विपिन कुमार दिवाकर:

    मेरा मानना है कि धोनी ने कोई गलत आचरण नहीँ किया है।

  • 13. 00:37 IST, 05 जुलाई 2011 योगेन्द्र सिंह शेखावत:

    एक समय जब भारतीय खिलाडी मुँह लटकाकर विदेशी खिलाडियों के सामने मुँह में दही जमकर सुस्त होकर आते थे तब यही भारत के लोंग आक्रोशित होते और कहते की हम कमजोर है क्या ? हम क्यूँ नहीं बोलते ? हम आक्रामक नहीं है फलाना-ढिकाना !!
    अब जब जोश और आक्रामकता दिखाई जा रही है तो बुद्धिजीवियों को साधुवाद का चोला याद आ रहा है | शराफत याद आ रही है |
    जब गोरे इतने सारे गलत निर्णय दे सकते हैं, डोमिनेट कर सकते हैं तो बराबर में शक्ति संतुलन करना कोई बुरी बात नहीं है | आपको स्टीव बकनर पर आज दया आ रही है पर ये वो ही बकनर हैं जो भारतीयों को मैच हराने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे.

  • 14. 12:20 IST, 05 जुलाई 2011 vipin gupta:

    इन गोरों ने हमारा बहुत शोषण किया है अब हमारी बारी है.

  • 15. 17:23 IST, 05 जुलाई 2011 raza husain:

    हम भारतीय अब रोने हो गई है . जब टीम हारती है तो मीडिया इन खिलाडियों को विलन बना देता है और जीतने पर हीरो ? जीत और हार खेल का हिस्सा हैं .
    याद करीए जब वेस्ट इंडीज़ दुनिया कि सबसे खतरनाक टीम थी उनके पास मार्शल , गार्नर , होल्डिंग जैसे गेंदबाज़ और ग्रीनेज , हेंसी , रिचर्ड , लोयड जैसे बल्लेबाज़ थे तब वोह टीम भी हारती थी पर रोटी नहीं थी . क्या इंडिया कि टीम वैसे टीम है ? है यह ज़रूर है कि इंडिया कि अब तक कि बेस्ट टीम है . तब टीम के हारने पर इतना बवाल क्यों होता है . पहले तकनीक नहीं थी . टीम के खिलाड़ी एम्पायर कि इज्ज़त करते थे पर एक गलत फैसले पर एम्पायर को सरेआम बेईज्ज़त करना कहाँ का इन्साफ है आखिर वो भी तो इंसान है क्या उनसे गलती नहीं हो सकती है .

    कई बार धोनी को साथी खिलाड़ी कि गलती से आउट होना पड़ा तब धोनी ने अपना आप नहीं खोया ? मेरा मानना है कि इंडिया के खिलाड़ी पैसे और निजी रिकॉर्ड के लिए खिलते है और ब्च्ची पैसा बटोरे रही है . आज बी सी सी आई के पास ताक़त है तो वो क्रिकेट को इकतरफा गेम क्यों बना रही है . क्रिकेट सिर्फ़ बल्लेबाजों का खेल होकर रह गया है.

    याद करीए किसी ज़माने मै मार्शल , होल्डिंग , गार्नर , वाल्श , लेली , थोम्सों , देल्ली , इमरान , वकार , रिचर्ड हेडली जैसे खोखर गंद्बाज़ होते थे . गेम बराबर का होता था , अगर गावस्कर मार्शल , होल्डिंग , लिल्ली , थोम्सों जैसे गेंदबाजों का सामना करके 100 बनाते थे तो कितना मुश्किल 100 होता था , आजकल तो हलवा गेंदबाज़ है . इन गेंदबाज़ों का सामना 8-9 नंबर का बल्लेबाज़ भी 40-50 रन आसानी से बना लेता है . आज सचिन 100 सेंचुरी बनाने के करीब है . ऐसे हलवा बोल्ल्वेर को खेलकर 100 बनाना आसन है . अगर मार्शल , होल्डिंग जैसे गेंदबाज़ होते तो क्या सचिन , पोंटिंग , द्रविड़ जैसे बल्लेबाज़ का ऐसा रिकार्ड होता ? क्रिकेट को अगर बचाना है तो गेम बराबर का बनाना होगा ? आई सी सी ने एक ओवर मै 2 बौंसरबाउंसर नियम लेन वाली है इससे गेंदबाजो को फ़ायदा होगा ? वैसे हमे वेस्ट इंडीज़ के बकनर समय से पहले जाने का दुख था अब हार्पर का भी कोई अच्छा नहीं है . इससे अम्पायरों पर दबाव बढ़ गया है .
    बी सी सी आई का रुख तानाशाह जैसे है . क्रिकेट बर्बाद हो रहा है . खेल भावना खतम हो रही है . क्रिकेट सिर्फ़ बल्लेबाज़ का खेल होकर रह गया है . अब क्रिकेट जगत को कभी मार्शल , गार्नर , इमरान , थोमसन जैसे गेंदबाज़ नहीं मिल पायेगें.

  • 16. 18:02 IST, 05 जुलाई 2011 uday :

    पंकज जी आप वही लिखेंगे जो भारत के ख़िलाफ और गोरों के हक़ में होगा. आखिर आप उनकी नौकरी जो करते हैं.

  • 17. 08:17 IST, 06 जुलाई 2011 Gurpreet:

    आपको शर्म क्यों आ रही है? आप दुखी क्यों हैं? कम से कम कहीं पर तो वो कुछ कहने की स्थिति में हैं?

  • 18. 09:18 IST, 06 जुलाई 2011 रणवीर कुमार:

    ये मज़ेदार है. वर्षों पहले से पश्चिमी देशों की टीम या उनके खिलाड़ी खुलेआम एशियाई या भारतीय क्रिकेटरों की बेइज्ज़ती करते आ रहे थे और तो और वे भारत में कदम रखना भी अपनी शान के ख़िलाफ मानते थे, तो भाई हर कुत्ते का दिन आता है. अभी भारत क्रिकेट में आर्थिक व खेल के दृष्टिकोण से सर्वश्रेष्ठ है तो हमें भी पूरा हक़ है कि हम भी अपना रूतबा दिखाएं. उन्होंने किया तो कुछ नहीं. हमने ऐसा क्या कर दिया कि हाय-तौबा मच गई. धोनी की सफल कप्तानी का एक पहलू उनकी बेबाक़ी भी है यह हमें याद रखना चाहिए.

  • 19. 10:45 IST, 06 जुलाई 2011 amit kumar gautam:

    मैं उन लोगों की बात से बिल्कुल भी सहमत नहीं हूं, जो ये कहते हैं कि इंडियन क्रिकेट बोर्ड दबंगई कर रहा है. न्यूटन के तीसरे सिद्धान्त को तो आप लोगों ने पढ़ा होगा - "क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया". आज वही हो रहा है, और कल भी वही होगा. ख़ैर रही बात इंडियन क्रिकेट बोर्ड की दबंगई की तो मैं आप लोगों को बता दूं, ऐसे बहुत सारे ग़लत फैसले दिए गए हैं जिन्हें देख कर खून खौल उठता है. चाहे वो गावस्कर का 'सर' की उपाधि वापस लौटा देना या गांगुली का क्रिकेट से सन्यास लेना. इसी बात की ओर इशारा करता है की दबंगई तो भारत शुरू से झेलता आ रहा है. लेकिन अब बारी भारत की. जागो इंडिया जागो.

  • 20. 13:43 IST, 06 जुलाई 2011 Kuldeep Srivastava:

    एक समय था जब इंग्लैंड और कंगारू भारतियों को बहुत हीन भावना से देखते थे और हमेशा मनमानी करते थे. पर आज हम हिन्दुतानियों की बारी आई तो वो चिल्लपों मचाने लगे? वो करें तो सही, हम करें तो दबंगई?

  • 21. 04:35 IST, 07 जुलाई 2011 ninad :

    क्या आपलो याद नहीं, बीस साल पहले जब हमारी अर्थव्यवस्था विकसित नहीं थी. और क्रिकेट के सारे आर्थिक समीकरण पश्चिमी लोग अपने पास रखते थे .और हमारे एशियाई खिलाड़ी हमेशा भेदभाव भरा सलूख़ पाते थे. गावस्कर और इमरान खा़न ने बराबर ये बात खुले तौर पे कही है.
    तो ''जिसकी लाठी उसकी भैंस".

  • 22. 18:18 IST, 07 जुलाई 2011 rashish:

    पंकज साहब आप को तो इंग्लैंड की नागरिकता मिलनी चाहिए. क्या ख़ूब इंडिया के ख़िलाफ़ लिखा है, आपको मेरी तरफ़ से धन्यवाद. बीबीसी वाले जलते हैं इंडिया की तरक़्क़ी से और क्यों ना जलें.हम पर शासन करने वाले आज हमारे पिछलग्गू जो हो गए हैं. धोनी ने सही कहा और बीसीसीआई ने ठीक किया.

  • 23. 17:35 IST, 08 जुलाई 2011 jane alam:

    पंकज जी सही समय पर सही विचार आपने व्यक्त किए हैं. आप जैसे सच्चे और ईमानदार पत्रकार का मैं बहुत सम्मान करता हूं.

  • 24. 23:12 IST, 08 जुलाई 2011 SUNIL KUMAR SINGH RENUKOOT SONEBHADRA UP:

    आपका लेख पक्षपात पूर्ण है, ऐसा लग रहा है की आप पत्रकार न होकर एक जज की भूमिका में आ गए है और भारतीय क्रिकेट खिलाडी और बीसीसीआई को दोषी करार दिया है . भारतीय क्रिकेट और भारतीयों पर जो वर्षो से भेदभाव होता आ रहा है उसका क्या , कभी बिगडै़ल ऑस्ट्रेलियाई खिलाडियों पर भी कुछ लिखिए तो समझ में आये. क्रिकेट एक व्यावसायिक खेल है . अगर एक ग़लती के लिए खिलाडियों पर दंड लगाया जाता है तो गलत फैसलों के बावजूद अम्पायरो को पूरा पैसा क्यों मिलता है, आज अन्तराष्ट्रीय पैनल में कोई भी भारतीय अम्पायर नहीं है.

  • 25. 02:53 IST, 10 जुलाई 2011 Satish Thawani:

    बीबीसी का कर्मचारी अपने आकाओं की बुराई कैसे कर सकता है.

  • 26. 07:10 IST, 11 जुलाई 2011 yogesh singh:

    भारत विरोधी बीबीसी, बिकी हुई बीबीसी

  • 27. 16:35 IST, 22 जुलाई 2011 srafaraz ahmad:

    पंकज जी , मुझे नही लगता कि कि धोनी ने कुछ भी ग़लत किया . जैसे को तैसे की ज़रूरत है.

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