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धर्म और आतंकवाद

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|शुक्रवार, 08 जुलाई 2011, 20:01 IST

पिछले हफ्ते मेरे ब्लॉग पर कई लोगों ने अपनी राय भेजी जिसके लिए मैं सब को धन्यवाद देता हूँ. आप में से कई लोगों ने लिखा कि मुझे घर न मिलने को मज़हब से नहीं जोड़ना चाहिए था.

मैं खुद ऐसा नहीं करना चाहता हूँ लेकिन अगर मकान मालिक आपका नाम सुन कर ब्रोकर से कहे मैं मुसलमान को किराए पर घर नहीं दूंगा तो आप किया सोचेंगे?

समस्या ये है की मैं अकेला नहीं हूँ. कई ऐसे लोग हैं जिन्हें इस तरह की दिक्क़तों का सामना करना पड़ रहा है.

ये भी सच है की सब मकान मालिक ऐसे नहीं हैं और ये भी सच है की भेदभाव क्षेत्रीय आधार पर भी है.
और सच ये भी है कि मुसलमान भी हिंदुओ के साथ भेदभाव करते हैं.


लेकिन समाज में भेदभाव है तो इसका खंडन करना ज़रूरी है.

दुख हुआ एक साहब की टिप्पणी से जिन्होंने केवल 'टेस्ट'के नाम से अपनी राय प्रकट की थी.

उनका कहना था,"अगर वहां (मुंबई) आके बम विस्फोट करेंगे तो यही हाल होगा."

एक दुसरे व्यक्ति ने अपना नाम नहीं लिखा लेकिन कुछ इस तरह से टिप्पणी की, " सभी मुस्लिमों को अब आतंकवाद रोकने के लिए कुछ ना कुछ करना होगा और समाज को विश्वास दिलाना होगा कि आप उनके साथ नहीं हैं."

यह मानसिकता ग़लत है और मेरा ब्लॉग इसी मानसिकता के विरोध में था.

क्या आतंकवाद को रोकने की ज़िम्मेदारी सिर्फ मुसलामानों पर है या फिर सभी भारतीय नागरिकों पर? और क्या मुसलामानों को समाज को सही मानों में विश्वास दिलाना होगा की वो आतंकवादियों के साथ नहीं हैं? क्या समाज को शक है की मुसलमान आतंकवादियों के हमदर्द हैं?

ये पढ़ कर मुझे अयोध्या में एक साहब की बात याद आ गई. उन्होंने मुझ से कहा, "ज़ुबैर जी मुसलमान देशद्रोही होते हैं."

मैंने कहा ये आपकी राय है लेकिन अगर आप गृह मंत्रालय से उन नामों की लिस्ट मंगाएं जिन्होंने 1947 से अब तक पैसे लेकर पाकिस्तान को सरकारी फाइलें बेचीं हैं तो आप अपना बयान वापस ले लेंगे, क्योंकि उनमें 95 प्रतिशत लोग मुसलमान नहीं हैं"

वो ख़ामोश हो गए. मैंने कहा कि हम उस लिस्ट को देख कर ये नहीं सोचेंगे की इसमें कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान. बल्कि हम सभी को देशद्रोही मानेगे.

आतंकवादी तो अकसर बाहर से आते हैं. लेकिन उन देशद्रोहियों का कोई खंडन क्यों नहीं करता जो रोज़ रिश्वत लेकर आपका काम करते हैं और देश को नीलाम करते हैं.

अभी पिछले दिनों एक विदेशी एफ़आरआरओ के दफ्तर गया, उसके कागज़ात अधूरे थे लेकिन रिश्वत देकर उसने अपना काम करवा लिया.

पासपोर्ट बनवाने जाएं तो बिना घूस के आपका काम नहीं होगा.

जबसे हेडली का मामला सामने आया है क़ानून सख्त हो गए हैं लेकिन इसके कारण रिश्वतखोरी भी अधिक बढ़ गई है.

अगर कोई पड़ोस का विदेशी आतंकवादी आए तो वो आराम से पुलिस और पासपोर्ट दफ़्तर को घूस दे कर एक भारतीय नागरिक बन सकता है.

देश को ऐसे ही लोग ख़तरे में डाल रहे हैं और सही मानो में ऐसे ही लोग देशद्रोही हैं.पर वो तो देशभक्तों में शामिल होते हैं क्योंकि वो सरकारी दफ़्तरों में मुलाजिम हैं.


टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 21:05 IST, 08 जुलाई 2011 Prashant kumar mitralok colony buxar bihar:

    जु़बैर साहब , अब बस कीजिये क्यों गड़े हुए मुर्दे को उखाड़ रहे हैं .

  • 2. 21:14 IST, 08 जुलाई 2011 अनिल वर्मा:

    जि़म्मेवार आप मीडिया के लोग भी कम नहीँ हैं जहाँ नित्यानंद गुमनाम मरते हैं और रामदेव

  • 3. 22:42 IST, 08 जुलाई 2011 indian:

    जु़बैर जी अपना देस चाहे जैसा भी हो अपना ही होता है , जहाँ तक भारत में आतंकवाद की बात है तो इसके लिए पाकिस्तान में पल रहे जेहादी मानसिकता के लोग ज़िम्मेदार है, जब तक पाकिस्तान पूरी दुनिया के सामने बेनकाब नही हुआ था, बहुत कम भारतीय मुसलमान थे जो पाकिस्तान की तारीफ़ नही करते थे. मुझे आज भी याद है आज से दस साल पहले मेरे कई मुसलमान दोस्त थे जो बताते थे कि जुम्मा के दिन मस्जिद में नमाज़ के दौरान किस तरह से भारत के बारे भड़काया जाता था और पाकिस्तान की तारीफ़ की जाती थी , कुछ ऐसे भी लोग थे जिन्हें पाकिस्तान के सारे क्रिकेट खिलाडि़यों के नाम याद थे और उनके पसंदीदा खिलाड़ी भी पाकिस्तानी ही थे और भारतीय खिलाडि़यों के खेल उन्हें बेकार नजर आता था. आज भी मुस्लिम बहुल इलाके में पाकिस्तान के मैच जितने पर पटाखे जलाये जाते है.
    जुबैर जी आपका लेख बदले के भावना से प्रेरित नजर अता है, क्योंकि अप उन गिने चुने लोगो में से नजर आते है जिनको देश सब कुछ देता है और भारतीय से प्यार मिलता है ;इसके बावजूद थोडा सा भी कोई परेशानी होता है तो उसे भेदभाव करार देते है . आपके सामने सिने अभिनेता हाश्मी का उदाहरण है , जिन्हें समूचे भारतीय समुदाय ने क्या कुछ नही दिया परन्तु किसी सोसाइटी में घर नही मिला तो उसने धार्मिक भेदभाव करार दिया . आज अगर वो किसी मुस्लिम देश में होते तो क्या उतनी आजा़दी मिल पाती जीतनी भारत में है. इसी एक प्रकार पूर्व क्रिकेट कप्तान पर जब मैच फिक्सिंग पर आरोप लगा तो उसने भी धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाया. आपका आरोप भी कुछ इसी तरह का है.

  • 4. 23:06 IST, 08 जुलाई 2011 naval joshi:

    मुझे अपना यह मत जाहिर करने में अब कोई संकोच नहीं है कि आप बेशक मुसलमान होने का भ्रम पाले हों लेकिन मुसलमान हो पाना अभी आपके लिए दूर की कौडी जैसा है.जो वास्तव में मुसलमान या हिन्दू हो गया तो उसे कोई भी मुसलमान या हिन्दू नजर आ ही नहीं सकता है. जो मोटी बुद्धि के लोग हैं वे ही हिन्दू या मुसलमान का रोना रोते है और अपनी पहचान लोगों पर थोपने की कोशिश करते है. यही विवाद का कारण भी हो जाता है. लोगों को इस बात से बहुत अन्तर नहीं पडता कि आपकी इबादत का तरीका क्या है. लेकिन जब हम अपनी पहचान दूसरों पर थोपने लगते हैं तो सामने वाला भी तीखी प्रतिक्रिया करता है .हम और आप जैसे लोग मुसलमान या हिन्दू होते नहीं हैं इसलिए दिखने की कोशिश करते हैं और यह आडम्बर हमें उन्हीं बहस के उसी कीचड़ में घसीट देता है जहॉ साम्प्रदायिक लोग अफवाह उत्तेजना को लेकर बात का बंतगड़ बना देते हैं।

  • 5. 00:37 IST, 09 जुलाई 2011 anand:

    सब लोग उतने समझदार नहीं होते लेकिन वो उतने बुरे भी नहीं होते ये बात सही है कि ज़िम्मेदारी सबकी है लेकिन स्वाभाविक तौर पर उनकी ज़्यादा है , जो आतंकवाद के शिकार भी है और उसके इल्ज़ाम से बदनाम भी. हाँ नफ़रत का कारोबार दोनों तरफ से है. जी हाँ दोनों तरफ से.अगर मैं आपको वो बाते बताऊं जो मुझे कुछ मुस्लिम दोस्तों ने कही हैं तो अआप हैरान रह जायेंगे, लेकिन मैं मनाता हूँ वे समझदार नहीं हैं,दिशाभ्रमित हैं.आप भी यही मानें. पूरे मुल्क या कौम के बारे में इतनी जल्दी राय कायम न करें.

  • 6. 00:48 IST, 09 जुलाई 2011 vivek kumar pandey:

    जुबैर जी देश को और दुनिया को सबसे बड़ा ख़तरा इस्लामिक चरमपंथ से है क्योंकि उनको व्यापक समर्थन और सहानुभूति मिलती है जबकि हिन्दू चरमपंथ फल-फूल नहीं सकता और वह बस कुछ लोगों तक ही सीमित है .इसका मुख्य कारण आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक सोच की कमी है .आज भी मुसलमानों को मदरसे की तर्ज़ पर सिर्फ़ धर्म की शिक्षा दी जाती है, जो उनमें धार्मिक उन्माद को बढ़ावा देती है और उनको आधुनिक सोच से दूर रखती है . मुझे पोलियो टीकाकरण अभियान में शामिल होने का मौका मिला और मैंने देखा की कुछ मुस्लिम लोग अपने बच्चों को पोलियो की ड्रॉप्स पिलाने से साफ़ मना कर देते है .पूछने पर बताते है कि ये सरकार की साजिश है हमारी आबादी को रोकने की .मैंने भी ठान लिया था कि मैं लोगो को समझाउगा और उनकी ग़लतफ़हमी दूर करूँगा, लेकिन मुझे कामयाबी नहीं मिली .मैंने पूछा कि आप टीवी./रेडियो पर शाहरुख खा़न और अमिताभ बच्चन को पोलियो ड्रॉप्स की अपील करते हुए देखते हैं ,जबाब मिला हाँ वो तो पैसे के लिए कुछ भी कर सकते है .आप इसको किस रूप में देखते है?

  • 7. 02:16 IST, 09 जुलाई 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    भेदभाव के बहुत से आधार हैं लेकिन सबसे ज़्यादा भेदभाव धर्मं के नाम पर मुसलमानों के साथ हो रहा है. क्या मुसलमान इस देश के किरायेदार हैं जो सबको विश्वास दिलाते फिरें कि हम आतंकवादी नहीं हैं. जिसको जो समझना है समझता रहे, लेकिन सलाह न दें कि मुसलमानों को क्या करना चाहिए. बम कोई और फोडे और नाम मुसलमानों का आता हैं. अब तो असली आतंकवादी बेनकाब हो चुके हैं. रिश्वत लेकर देश को बेचने वाले इस देश के असली गद्दार हैं और हमें फख्र है की देश में घोटाले करने वाले मुसलमान नहीं हैं.

  • 8. 09:19 IST, 09 जुलाई 2011 Amit Bhatt:

    आपको किराये में मिलने में परेशानी हुई इससे आप विचलित है,या वास्तव में हिन्दू ,मुसलमान का भेदभाव आपको परेशान कर रहा है. छोडिये जु़बैर सहाब इन बातों में कुछ नहीं रखा है ये तो केवल बातें हैं बातों का क्या? भेदभाव केवल हिन्दू- मुसलमान में ही नहीं होता है जिसके लिए आप फिक्रमंद दिखने की कोशिश कर रहे है. बात कुछ और ही है,जिसे आप छुपाना चाहते हैं. एक भाई अमीर हो जाता है तो अपने ग़रीब भाई के प्रति वह कैसा व्यवहार करता है,इसी मुम्बई में दूसरे राज्य के लोगों को किस तरह मारा गया क्या यह व्यवहार कम पीडा़दायी था. आपको कोई उदाहरण देना सूर्य को दिया दिखाने जैसा होगा आप सब जानते हैं लेकिन हम आपकी यह राजनीति नहीं समझ पा रहे हैं जो आप कर रहे हैं.

  • 9. 11:05 IST, 09 जुलाई 2011 anjani kumar:

    ज़ुबैर साहब ,आप की बात सही है लेकिन ये सभी समुदाय की ज़िम्मेदारी बनती है कि देश पहले हो धर्म बाद में. मै किसी समुदाय को दोष नहीं दे रहा हूँ, लेकिन जब धर्म हावी होने लगता है राष्ट्रीयता पर तो सवाल उठते है जो कि स्वाभाविक है .आज सभी भ्रष्टाचार पर बोल रहे हैं लेकिन क्या उन धार्मिक संगठनों की ज़िम्मेदारी नही बनती कि आवाज़ बुलंद करें. जब सारा देश एकजुट होने की कोशिश कर रहा हो तो यही दुःख देता है. जब अपने की बात आती है, फ़तवे जारी किये जाते है लेकिन देश के नाम पर नहीं.

  • 10. 11:36 IST, 09 जुलाई 2011 murari :

    ज़ुबैर अहमद जी, आपको बहुत बहुत धन्यवाद. जब मैं बच्चा था तब मुझे मुसलमानों से डर लगता था ,कारण यह था कि मुझे सिखाया गया था कि मुसलमानो में दया नाम की कोई चीज़ नही होती है,वे हिन्दुओं को पकड़ कर, काटकर भोग लगाते है.मेरे अऩ्दर एक डर बैठाया गया था जिससे आज भी पीछा नही छुड़ा पाया हूँ.

  • 11. 13:15 IST, 09 जुलाई 2011 BHEEMAL Dildar Nagar:

    जनाब जु़बैर भाई आपने उदहारण देकर अपने विष-वमन की प्रक्रिया चालू कर रखी है . इसे मैं आल्ला मियाँ की या राम जी की मर्ज़ी कहूं. फिलहाल मेरा शक एकदम विश्वास में बदल गया है कि बीबीसी स्टाफ को भारत मैं ज़हर फैलाने का ठेका मिल गया है, येनकेन प्रकारेंण विष-विष. यह अभी स्पष्ट होना चाहिए कि ये ठेका धृतराष्ट्र , गांधारी , शकुनि , दुर्योधन या दुशाशन किसने दिया है . मेरा शक पक्का हो गया कि ज़हर फैलाने का काम कितना आसान और लाभकारी काम है . अगर ये काम पाकिस्तान में करो तो... मैं आपका धन्यवाद करना नहीं चाहता .

  • 12. 13:17 IST, 09 जुलाई 2011 imadul haque:

    जु़बैर भाई आपका ये ब्लॉग बहुत अच्छा है. ये बात तो दिल को जाकर लगती है कि वो तो देशभक्तो में शामिल है क्योंकि वो सरकारी दफ्तरों में काम करते है .

  • 13. 13:19 IST, 09 जुलाई 2011 YM:

    ईमानदारी ईमान से है जहां ईमान ही नहीं वहाँ ईमानदारी की बातें करना फ़िज़ूल है.

  • 14. 13:59 IST, 09 जुलाई 2011 jane alam:

    ज़ुबैर साहब, आपके ब्लॉग को पढ़कर मुझे ऐसा लग रहा है कि हमारे देश में जबतक भ्रष्टाचार व्याप्त रहेगा तब तक आतंकवाद को शह मिलती रहेगी. आज ज़रूरत है हमें एक जुट होने की, हमारे दिलों में देश प्रेम की भावना जागृत करने की. जब तक भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ कोई सख्त़ का़नून नहीं बनेगा तब तक आतंकवाद फलता फूलता रहेगा .

  • 15. 14:25 IST, 09 जुलाई 2011 Patel Z .D:

    आपके स्तर के लोगों का यह हाल है तो आम मुसलमान का क्या हाल होगा.

  • 16. 15:44 IST, 09 जुलाई 2011 ashish yadav,hyderabad:

    जु़बैर जी, आतंक और आतंकवादियो का कोई मजहब या जाति नहीं होती .ये हम सब जानते हैं लेकिन किसी एक ही कौम के लोग आतंकी वारदात करते हैं ,जिससे उस विशेष कौम के लोगों के प्रति मन में ये डर बैठ गया है .जबकि हकीक़त में ऐसा है नहीं और बहुत कुछ हमारे देश के नेताओ ने भी हमें बाँटने का काम किया है.

  • 17. 15:59 IST, 09 जुलाई 2011 jagga singh:

    हिन्दू समाचारों में नफ़रत की भाषा बोलते हैं.

  • 18. 16:20 IST, 09 जुलाई 2011 jane alam :

    जब तक हमारे देश में भ्रष्टाचार रहेगा तब तक हमें आतंकवाद का दंश झेलना पड़ेगा.

  • 19. 16:28 IST, 09 जुलाई 2011 tahir ahmed:

    जो लोग अपने कर्त्तव्य का पालन ठीक ढंग से न करे वो सभी देशद्रोही हैं. देशवासियों को मौलिक अधिकारों का तो ज्ञान है लेकिन उनसे कोई 11 मूल कर्तव्यों के बारे में पूछे तो शायद 5 का भी जवाब नहीं दे पाएंगे और ऐसे कितने लोग है जो ये दावा कर सकते हों कि उन्होंने देश के लिए यह सही काम किया है . बोलने में तो सभी देशभक्त हैं लेकिन देश के लिए किया क्या ,उनका योगदान क्या रहा . ऐसे 90 फ़ीसदी लोग हैं जिन्होंनें रोटी खाई , अपने शौक पूरे किये और कुछ नहीं किया . इसलिए देशभक्ति का भ्रम दिमाग से निकाल देना चाहिए.

  • 20. 16:31 IST, 09 जुलाई 2011 SAMEER:

    ये हमारे देश का दुर्भाग्य है कि यहाँ देशभक्ति की परिभाषा हिंदू या मुसलमान होने से है . यदि आप हिन्दू हैं और कितने भी बड़े भ्रष्टाचारी हैं और देश को आर्थिक तौर पर खोखला कर रहे हैं, परन्तु आप देशभक्त होंगे . अगर आप मुसलमान हैं और कितने भी ईमानदार हैं परन्तु आप देशद्रोही होंगे . देशभक्ति को पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता है .

  • 21. 17:05 IST, 09 जुलाई 2011 dastgeer alam:

    ये शत प्रतिशत सच है.

  • 22. 17:27 IST, 09 जुलाई 2011 BINDESHWAR PANDEY[BHU]:

    माना कि सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं किन्तु आज ज़्यादातर आतंकवादी मुसलमान हैं इस बात से तो इंकार नहीं किया जा सकता? साहब गेंहूँ के साथ घुन को भी पिसना पड़ता है. लोगों को अफज़ल गुरु तथा जु़बैर अहमद में फ़र्क करने में वक्त तो लगेगा ही.

  • 23. 17:33 IST, 09 जुलाई 2011 raza husain:

    यह बात पूरी दुनिया जानती है कि मुसलमान का ईमान पैसा नहीं बल्कि देश के लिए क़ुर्बानी देना होता है.हिन्दू धर्म में पैसे की पूजा होती है . इतिहास गवाह है कि अंग्रेज़ों ने इंडिया में 200 साल राज किया. कौन से लोग अंग्रेज़ों को यहाँ लाए. सिर्फ पैसे के चक्कर में हिन्दू रजा अंग्रेज़ों को इंडिया मे लाए . मुसलमानों ने तो अपनी जान देकर अंग्रेज़ो को इंडिया से बाहार किया. आखिर क्यों इंडिया में मुसलमानों को आतंकी नज़र से देखा जाता है ? इंडिया में सरकारें हिन्दू होती है. नेपाल, बांग्लादेश , कश्मीर, चीन सीमा पर चंद पैसों की लालच में सेना के लोग उन लोगों को सीमा के अंदर घुसने देते हैं. यही नहीं इनके राशन कार्ड भी बन जाते है. इंडिया में 6-7 करोड़ विदेशी लोग आराम से रह रहे है .यह क्या आतंकवादी नहीं है ? इस देश में पासपोर्ट , राशन कार्ड , सरकारी लोन सब कुछ पैसा देकर हो जाता है. क्या यह देशद्रोही नहीं है ? बांग्लादेश सीमा रोज़ पार कराई जाती है , नेपाल सीमा से स्मग्लिंग पुलिस और सेना की मिलीभगत से होती है , कश्मीर सीमा से आतंकवादियों को पैसा और हथियार आता है यह सबको पता है ? यही हाल चीन का है बिना देश की सेना , पुलिस , डिपार्टमेंट के अफसरों के चीन की सेना इंडिया की सीमा के अंदर कब्ज़ा नहीं कर सकती? आज हिंदुस्तान भ्रष्टाचार , आबादी , कन्याभ्रूणहत्या जैसे कारनामों में दुनिया में नाम रोशन कर रहा है . क्या इन सबका दोषी मुसलमान है? 1974 में देश का बटवांरा हुआ, जितना दोष जिन्ना का था उससे ज़्यादा नेहरु , पटेल का था , कश्मीर समस्या के दोषी भी नेहरु हैं.हर बात पर मुसलमानों को दोषी ठहराना बंद होना चाहिये . अब तो हिन्दू आंतकवादी भी दुनिया के सामने आ गये हैं ? मेरे कहने का मतलब यह है कि बुरे लोग हर मज़हब में होते है इसका यह मतलब नहीं को वो मज़हब ख़राब है? हमे मिल-जुलकर देश में आतंकवाद , भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं को दूर करना होगा तभी देश तरक्की करेगा.

  • 24. 17:41 IST, 09 जुलाई 2011 PRAVEEN SINGH:

    क्या बीबीसी और पत्रकार टीम भारत राष्ट्र की शत्रु हैं , इतनी बात अमरीका में करो तो सीआईए तुमको सी -ऑफ कर देगा .

  • 25. 17:51 IST, 09 जुलाई 2011 jubairamir:

    आप ये कह सकते हैं कि अफ़ज़ल गुरु नकली नाम है वो एक पंडित है .आप ये भी कह सकते हैं कि कसाब नाम का कभी पैदा ही नहीं हुआ , सब सरकारी गद्दारों की धोखाधड़ी है . साथ में इतने दर्द जो मानवजाति के लिए है आपके , कह सकते हो कि पंडितों और सिख लोगों की कश्मीर मैं पूजा होती है , 2 लाख पंडितों को स्वर्गवासी बना दिया , ये परम देश भक्त लोगो ने किया. अगले ब्लॉग में ज़रूर लिखो कि यासीन मालिक , गिलानी , अफ़ज़ल गुरु को शांति के लिए भारत रत्न भी देना चाहिए .

  • 26. 18:13 IST, 09 जुलाई 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    जनाब बिंदेश्वर पाण्डेय जी, आपका ये सोचना बिलकुल गलत है कि ज़्यादातर आतंकवादी मुसलमान हैं, आप बताइए क्या लिट्टे, माओवादी, उल्फा, संघ ये सब इस्लामिक संगठन हैं और दुनिया में न जाने कितने ऐसे संगठन होंगे. ज़रूरी बात ये है कि मुसलमानों के नाम का शोर ज्यादा मचाया जाता है. अगर मुसलमान अपने हक़ के लिए या इंसाफ़ कायम करने के लिए लड़तें हैं तब भी उन्हें आतंकवादी कहा जाता है लेकिन अमरीका बेवजह ईराक पर हमला करता है फिर भी उसे आतंकवादी नहीं कहा जाता. आखि़र क्यों ?
    मुसलमानों के पकडे जाते ही ख़बरिया चैनल उसे आतंकवादी घोषित कर देते हैं लेकिन प्रज्ञा सिंह, पुरोहित, कुलकर्णी और असीमानंद को आतंकवादी नहीं कहते. आखिर क्यों? (जबकि असीमानंद जुर्म क़ुबूल कर चुके हैं)

  • 27. 18:54 IST, 09 जुलाई 2011 vikas kushwaha kanpur:

    पाकिस्तानी आतंकवादियो को भारत में रहने और खाने का इंतज़ाम कौन करता है ये आप भी जानते है जु़बैर साहब .

  • 28. 19:46 IST, 09 जुलाई 2011 rao guamn singh:

    मेरा किरायेदार तो मुसलमान है. मैंने ऐसा नही सोचा था. आपका ख्या़ल पढकर अब सोचना पडा है. फिजूल की बात है, तवज्जो नही देनी चाहिए.

  • 29. 20:07 IST, 09 जुलाई 2011 MD. KHURSHID ALAM:

    प्रिय ज़ुबैर, इस तरह की परिस्थितियों से चिंतित होने की ज़रूरत नही है. पूरी दुनिया में ऐसा होता है.मृत्यु के बाद जीवन के बारे में सोचें. अपने काम में सच्चे इस्लाम धर्म का पालन करें.

  • 30. 21:23 IST, 09 जुलाई 2011 khalid:

    मुझे लगता है कि समाज में फैली इन परिस्थितियों से निपटने के लिए सब से पहले हमें खु़द को बदलना होगा जब तक हम अपने आप को एक मुसलमान के तौर पर पेश नहीं करेंगे तब तक इस तरह की परिशानियों का सामना करना ही पड़ेगा. हमें खु़द को पेश करने में कहीं न कहीं कुछ चूक हो रही है और यूँ भी इल्ज़ाम उस वक़्त तक नहीं लगाया जाता जबतक कोई व्यक्ति उस तरह का कोई कदम न उठाये.

  • 31. 21:58 IST, 09 जुलाई 2011 SHABBIR KHANNA,RIYADH,SAUDIA ARABIA:

    जु़बैर साहब, यह नफ़रत पहले तो नहीं थी, काश यह नफ़रत पहले हो जाती तो शायद इंडिया आज़ाद भी नहीं होता .कुछ भी हो, जु़बैर साहब मैं आप को सलाम करता हूँ कि आप में सच लिखने की हिम्मत है. शायद आप को बीबीसी की नौकरी भी छोड़नी पड़ सकती है.दुःख इस बात का है कि इंसानियत मर चुकी है और सच लिखने को सीधा धर्म से जोड़ दिया जाता है . आप किस किस की क़लम या आवाज़ को रोकेगें. मुझे बहुत दुःख हुआ कि बीबीसी के श्रोता भी ऐसे विचार रखते है.

  • 32. 22:43 IST, 09 जुलाई 2011 Chandan, Fairfax VA, USA:

    ज़ुबैर जी, मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ. भारतीय पूरी तरह बँटे हुए हैं.अधिकतर ख़ुद को भारतीय नहीं समझते.अमरीकियों को देखिए वो ख़ुद को पहले अमरीकी कहते हैं.

  • 33. 22:45 IST, 09 जुलाई 2011 vikas kushwaha kanpur:

    जुबैर साहब आप ज़रा मो. अतहर खा़न पर गौ़र करिए जो मुंबई हमले को सही बताते है , जो पाकिस्तानी गवर्नर के हत्यारे के समर्थक है और जिन्हें संघ आतंकवादी संगठन लगता है .

  • 34. 23:12 IST, 09 जुलाई 2011 vivek bajpai:

    आप संघ को उल्फ़ा और एलटीटीई के साथ कैसे रख सकते हैं? सिमी कहाँ हैं? उल्फ़ा ,एलटीटीई और माओवादी देश तोड़ने का काम कर रहे हैं. जबकि संघ देश जोड़ रहा है.

  • 35. 23:49 IST, 09 जुलाई 2011 SHAHNAWAZ ANWAR SINTU, SAHARSA BIHAR :

    आप का दर्द हम समझ सकते हैं ,कैसे मुस्लिमों को हिकारत की नज़रों से देखा जाता है ,खून तो तब खौलता है जब हम से भारतीय होने के सबूत माँगा जाता है . लेकिन कसूर उन भारतीयों का नहीं बल्कि उस दोषपूर्ण व्यवस्था का है जिसके महल में ऐसे लोग परवरिश पा रहे है , आज ज़रुरत है कि इसे बदल दिया जाये और ऐसा माहौल बनाया जाये जिसमें एक दूसरे मज़हब या जाति से बैर न हो .

  • 36. 00:02 IST, 10 जुलाई 2011 Sharad Gupta:

    ज़ुबैर साहब , आपने ये ब्लॉग तर्क संगत तरीके से लिखा है और मैं आपसे सहमत हूँ कि धोखेबाज़ वो हैं जो देश को दीमक की तरह चट करते जा रहे हैं. नाम लेने की ज़रूरत नही, भ्रष्टाचार हद पार कर चुका है. हमें एक दूसरे पर भरोसा करना होगा.भेदभाव बंद करना होगा.

  • 37. 00:34 IST, 10 जुलाई 2011 नदीम अख्तर:

    बिन्देश्वर पांडेय ने कहा कि गेहूं के साथ जौ पिसाता है, लेकिन उन्होंने यह कैसे तय कर लिया कि सारे मुसलमान गेहूं और जौ ही हैं. जो आतंकी हैं, उन्हें गेहूं और जौ की संज्ञा दीजिए, बाकि बचे तो गुलाब भी हो सकते हैं. उन्हें आप गेहूं के साथ पीसने की कुटिल नीति क्यों अपना रहे हैं. देश के वांछित आतंकियों की सूची देखिये, उसमें सारे इस्लाम धर्म से ताल्लुक रखने वाले नहीं हैं. 50 फी़सद के आसपास दूसरे धर्म के भी लोग हैं, जो गेहूं और जौ की विशेषता रखते हैं. अगर आपको आतंक और आतंकियों से निजात चाहिए, तो मानसिकता बदल कर बड़े परिदृश्य पर गौ़र करना होगा. घिसी पीटी और नफ़रत का बीज बोने वाली मानसिकता से तौबा कीजिए, तब जाकर जु़बैर साहब की बातें अकल की चौथी मंजिल को पहुंच पायेगी, वर्ना रह जायेंगे ग्राउंड फ्लोर से बहुमंजिली इमारत को ताकते हुए और टोपी गिर जायेगी.

  • 38. 01:08 IST, 10 जुलाई 2011 Vivek kumar:

    मुझे लगता है जहाँ तक इंडिया का सवाल है, तो यहाँ ढेर सारे और अलग- अलग धर्मों से जुड़े़ उग्रवादी हैं लेकिन पूरे संसार में देखा जाय तो ये बात खुल कर सामने आती है कि कुछ न कुछ तो बात मुस्लिम धर्म में ज़रुर है जो 10 साल के बच्चे तक आतंकवाद में लिप्त होते हैं .जहाँ तक अन्य धर्मों की बात है उनका अनुपात मुस्लिम आतंकवादियों की तुलना में नगण्य है . हिन्दू उग्रवाद सिर्फ भारत तक सीमित है पर इस्लामी आतंकवाद विश्व स्तर का है .अन्य धर्म के कट्टरपंथी भी मुस्लिम आतंकवाद को आदर्श मान कर उनसे ही प्रेरित होते हैं .इन आंकड़ों के आधार पर यदि आप मुस्लिम हैं आप का पहनावा आपको सामान्य लोगों से अलग करता है. लोग आपको शक की निगाह से देखते हैं आप से डरते हैं तो इसमें उनकी क्या गलती है. भले ही आप आतंकवादी न हों पर क्या पता कब कोई मुस्लिम बम धमाका कर किसी की जान ले ले .

  • 39. 01:10 IST, 10 जुलाई 2011 नेपथ्य निशांत :

    समस्या मुसलमान और हिंदू में नहीं, धर्म और जाति की बनाई जड़ों में है. जब तक हम और आप चीज़ों को धर्म से जोड़ कर देखेंगे, जाने या अनजाने में समस्या होती रहेगी. आखि़र एक हिंदू का नाम शकील या इमरान और एक मुसलमान का नाम मोहन या गोविन्द क्यों नहीं रखा जा सकता. सच तो यह है कि हमारी सोच का दायरा बचपन से ही सीमित कर दिया जाता है. इसी सोच को खिड़की से जब हम दूसरों को देखते है, तो हमें लगता है ब्रह्मांड की असीम सीमा हमारे धर्म तक है. और दूसरे धर्म का आदमी एलियन है, फिर बहाना चाहे जो भी हो. आशा है,आप सीमित सोच के खिड़कीनुमा दुराग्रहों को उदार मन से क्षमा कर सकेंगे. अब कहेंगे समस्या का समाधान क्या है? मेरे ख्याल से जहाँ तक संभव हो सके, धर्म एवं जाति का परिचय देने से बचा जाये, आखि़र हमसे कोई धर्म पूछे तो सिर्फ "मानव" उत्तर क्यों नहीं दिया जा सकता .क्या उससे भी बड़ा कोई धर्म है. दूसरा समाधान है, धर्म एवं विज्ञान की बहस को बीबीसी जैसी मीडिया को प्रमुखता से उठाना चाहिए, सभी धर्मो के सिद्धांतों, परम्पराओं, ब्रह्मांड एवं मनुष्य की उत्त्पति के बारे में सदियों से बनाये गये विचार को विज्ञान एवं तर्क के कसोटी पर कसा जाये , जहां परिकल्पना को गणितीय एवं प्रयोग के बुनियाद के बिना कुछ भी प्रमाणिक ना माना जाए. तो शायद सभी धर्म एवं उसकी पहचान गैर प्रासंगिक होने लगेगी. और शायद एक ऐसा समाज बन सके जहाँ वोट, मकान या शादी के लिए किसी से धर्म एवं जाति के पूछताछ को लोग जरुरत ही ना समझे. लेकिन सवाल यह भी है कि बीबीसी के पत्रकार इस ब्लॉग के आगे व्यापक संदर्भ में इस बहस को आगे बढाएंगे?

  • 40. 01:22 IST, 10 जुलाई 2011 Shadab:

    मुसलमान दो शब्दों से बना है मुसल + ईमान यानि कि पूरा ईमान ,इसका दूर- दूर तक आतंकवाद से कोई नाता नही है .

  • 41. 08:43 IST, 10 जुलाई 2011 amit batra srikaranpur raj:

    टिप्पणियों का असर होता है, ये देखकर अच्छा लगा . इस बार आपका लहज़ा कम तल्ख़ी लिए हुए और ब्लॉग ज़्यादा विस्तृत सोच वाला लगा,लेकिन उम्मीद करूँगा कि आप और बड़े नज़रिये से इन चीज़ों को देखें.

  • 42. 09:58 IST, 10 जुलाई 2011 naval joshi:

    कुछ लोग मुसलमानों की ओर से स्वयंभू पैरोकार हैं और कुछ हिन्दुओं की ओर से जबकि इनके पास किसी की ओर से इस तरह पैरोकारी करने का अधिकार नहीं है. सूत न कपास जुलाहों में लठ्ठमलठ्ठा. हिन्दू या मुसलमान कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं है कि कोई भी उसमें किस्मत आज़मा ले और बिल्ली के भाग से यदि छींका टूट गया तो कोई पद मिल जाऐगा.हिन्दू या मुसलमान हो पाना एक उपलब्धि जैसा है.ऊपर वाले ने एक ज़िन्दगी दी है जो इसमें सफल हो गया वही सच्चा मुसलमान और हिन्दू है. लगभग तीन घंटों में जिस तरह परीक्षा दी जाती है वैसी ही परीक्षा है यह. लेकिन कुछ लोग आंकडे देकर खुद को साबित करना चाहते हैं हिन्दू या मुसलमान की अर्न्तधारा से इनको कुछ भी लेना-देना नहीं है. आंकडे देने में तुमसे बेहतर कहने वाले और हमसे बेहतर सुनने वाले आये और आकर चले गये.

  • 43. 10:36 IST, 10 जुलाई 2011 kuldeep srivastava:

    जु़बैर जी,कोई आपकी बात से इत्तेफाक रखे, न रखे, मैं रखता हूं,क्योंकि मैंने ऐसा होते देखा है... मेरा एक प्रिय मित्र जो खु़द एक ब्राह्मण है, अपने भाई के दोस्त को सिर्फ इसलिए साथ रख रहा है क्योंकि वो एक मुसलमान है और उसे इसी कारण से दिल्ली जैसे शहर में घर किराए पर नहीं मिल रहा है. हद तो तब हो गई जब एक प्रापर्टी डीलर को मैं और मेरा दोस्त ये समझाते समझाते थक गए कि इसी देश में कलाम और अशफ़ाक जैसे लोग भी पैदा हुए हैं ,जिनकी वजह से आज भी सर फख्र से ऊंचा हो जाता है,लेकिन उसने एक न सुनी और उसे साथ रखने के लिए पासपोर्ट और वीज़ा दोनों अपने पास रख लिया.सवाल इसका नहीं कि आप और 'वो'दोनों मुसलमान हैं और एक हिन्दू उसे अपने यहां किराए पर नहीं रख रहा है. सवाल तो उस कुत्सित मानसिकता का है जो तेजी से लोगों के दिमाग में घर कर रहा है. बदलना सोच को है क्योंकि उसके बाद न कोई हिन्दू होगा न मुसलमान होगा तो एक इंसान जो दूसरे इंसान की कद्र करेगा...

  • 44. 11:15 IST, 10 जुलाई 2011 Sandeep:

    मेरी समझ मैं एक बात नहीं आती कि धर्म के नाम पर सबसे ज़्यादा विवाद मुस्लिम धर्म में ही क्यों होते है. कहीं न कहीं इस समुदाय में देशप्रेम की भावना में कमी दिखाई देती है. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ इतने आन्दोलन चल रहे हैं क्या आपने मुस्लिम समुदाय के किसी को इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते देखा. वो तो ये भी नहीं समझ पाते कि उनकी धर्म के प्रति इसी भावना को उनकी कमज़ोरी बनाकर लोग उनका वोटके लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. कुछ तो महज़ उनको लुभाने के लिए ओसामा को जी कहने में भी संकोच नहीं करते.

  • 45. 12:02 IST, 10 जुलाई 2011 Md.Imteyaz Alam:

    आपने बिलकुल सही कहा , मुसलमान क्यों सफाई दें कि वो बेक़सूर है. इस मुल्क के लिए मुसलमानों ने कितनी क़ुर्बानी दी है,ये भी याद रखना चाहिये .

  • 46. 14:51 IST, 10 जुलाई 2011 Mohd Shahid:

    भारत के अन्दर रहने वाला मुस्लिम यहाँ इत्तेफ़ाक से नहीं बल्कि अपनी इच्छा से है .हमारे बुजुर्गो ने भारत को अपना वतन माना इसलिए भारत में रहे. मगर अफ़सोस कुछ कट्टरपंथियों और उनकी सरकारों ने मुस्लिमो को भारतीय नहीं माना और आज तक हर कदम पर हमसे वफ़ादारी के सुबूत मांगे जाते रहे .अफ़सोस अफ़सोस अफ़सोस ,उस कौम से वफ़ा के सुबूत मांगे गए जिसने अपनी पीढियां इस मुल्क के लिए कुर्बान कर दी.

  • 47. 15:01 IST, 10 जुलाई 2011 himmat singh bhati:

    ज़ुबैर साहब ,हिन्दू हिन्दू में भेदभाव है और मुसलमानों की भी यही हालत है ,किस धर्म में भेद नहीं.गोरों में भी भेदभाव है ,हाँ यह कम किया जा सकता है पर ख़त्म नहीं किया जा सकता , क्योंकि हमारी मानसिकता ही कुछ ऐसी बनी हुई है. जन्म से ही हम बच्चों की ऐसी मानसिकता बना देते है और शिक्षा देते समय भी. यह शिक्षित लोगो की देंन है तो कुछ कट्टरपंथियो की,सभी जाती और धर्मो से जुड़े़ लोगों के नासमझ बच्चों को अलग छोड़ दो उनमें कोई भेद नहीं दिखाई देगा.

  • 48. 15:45 IST, 10 जुलाई 2011 Anas:

    ज़ुबैर साहब,आप अपनी राय नरेन्द्र मोदी पर ज़रूर दें कि क्या वो हत्यारे नहीं है. उन्हें कौन सज़ा देगा ?

  • 49. 16:25 IST, 10 जुलाई 2011 siddharth joshi:

    कोई बच्चा यदि अपनी मॉ के पास रोता हुआ आये और कहे कि मुझे एक बच्चे ने चिढाया है, तो बात समझ में आती है. मॉ जानती है कि बाल मन को कोई चोट लगी है वह इसे पुचकारती और दुलराती है. लेकिन उस मुद्दे में नहीं जाती है कि किसने क्या कहा, क्योंकि इसका कोई रेडिमेड समाधान भी नही हैं जैसे-जैसे बच्चे को समझ में बातें आने लगती है वह बिना मॉ से पूछे सारी समस्याओं को समझता जाता है और शेखी भी नहीं बघारता कि मैने किसको कैसे पराजित किया. यह लगभग दिनचर्या का हिस्सा जैसा हो जाता है लेकिन बीबीसी के वरिष्ठ पत्रकार बात का इस कदर बतंबड़ बना देगें यह जानकर दुख तो नहीं लेकिन हैरानी जरूर हुई. प्रतिक्रिया में आपने जिस तरह के सवाल उठाये है. मुझे अपना यह मत जाहिर करने में अब कोई संकोच नहीं है कि कुछ लोग बेशक धार्मिक होने का भ्रम पाले हों , लेकिन ऐसा हो पाना अभी इनके लिए दूर की कौड़ी जैसा है.जो वास्तव में मुसलमान या हिन्दू हो गया तो वह लोगों को मुसलमान या हिन्दू की नज़र से नहीं देख पाता है. यह काम केवल मोटी बुद्धि के लोगों का है या कहा जा सकता है कि बुद्धिहीनों का है. हिन्दू या मुसलमान होने का मतलब है कि आप जीवन उर्जा कैसे पाते हैं और उसका उपयोग कैसे करते है. लेकिन आज कुछ लोगों ने इसको मुखौटे की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. अन्दर से तो वे वैसे ही हैं जैसा उन्हें नहीं होना चाहिए. इसलिए जब कहीं फॅसने कर स्थिति आती है तो ये लोग नारा लगाने लगते हैं कि हिन्दू ख़तरे में हैं या इस्लाम ख़तरे में है, जैसे कि ये ही हिन्दू या मुसलमान का पर्यायवाची हो गये हों. जब इन्हें कहीं कोई फायदा होता है तब उसे अपनी जेब में रखते हैं. उस समय से लोग उसे इस्लाम या हिन्दुत्व के नाम समर्पित नहीं करते हैं और कहीं कोई इनकी निजी समस्या होती है तो पहाड़ सिर पर उठा लेते हैं.

  • 50. 16:36 IST, 10 जुलाई 2011 Udai Raj:

    ज़रा मुझे कोई मुसलमान भाई ये बताये कि किस हिन्दू राजा ने किसी और देश में जाकर आक्रमण किया , जब कि इह्तिहस के पन्नों में मुसलमानों के अत्याचार भरे पड़े है . ज़ुबैर जी आपके बरगलाने से कुछ नहीं होगा .

  • 51. 16:51 IST, 10 जुलाई 2011 nitin chauhan:

    ज़ुबैर अहमद साहब, आप तो अमरीका से आते ही छा गए, बीबीसी की नौकरी में आनंद भी आ रहा होगा, अब तो आपका ब्लॉग भी लोकप्रिय होता जा रहा है और हो भी क्यों ना, आख़िर आप भी वही कर रहे है जो सभी राजनीतिक दल करते है, "हिंदू- मुस्लिम", "भेद भाव" . आप लोग सांत्वना व सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए ये ओछा खेल क्यों खेलते है ? लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं वाले रास्तों मैं चौथा स्तम्भ कहे जाने वाला मीडिया दिशा और दशा दोनों से ही भटक चुका है और आप भी उसी को प्रोत्साहित करने में लगे है. शर्म आती है जब आप जैसे पढ़े लिखे "कलम को ताक़त" कहने वाले उसका ग़लत इस्तेमाल करते है, मेरी आप से हाथ जोड़ कर विनती है कृपा कर अपनी कलम का सही इस्तेमाल करें !

  • 52. 18:34 IST, 10 जुलाई 2011 Sunil Kumar Singh, Renukoot, UP:

    आपका लेख निष्पक्ष न होकर बदले की भावना से प्रेरित लगता है. जब एक सिने अभिनेता को भी एक सोसाइटी में घर नहीं मिला तो उसने भी धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाया था. आपका केस भी कुछ इसी तरह का जान पड़ता है. भारत में ये पुरानी परम्परा है कि यदि आप मुस्लिम समुदाय से है और आपको कोई भी परेशानी चाहे जिस भी कारण से हो उसे धार्मिक भेदभाव करार दिया जाता है . इस तरह आप कोई पहले व्यक्ति नहीं है.

  • 53. 20:35 IST, 10 जुलाई 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    इस्लामी आतंकवाद और कट्टरपंथ, ये शब्द बहुत कहे जा रहे हैं. कहने वालों का तर्क है कि मुसलमानों को आतंकवाद कि प्रेरणा इस्लाम से मिलती है. लेकिन मुसलमानों ने इस्लाम से प्रेरणा लेकर बहुत से काम किए हैं उन्हें इस्लामी क्यों नहीं कहा जाता? ताजमहल को इस्लामी ताजमहल, जीटी रोड को इस्लामी जीटी रोड, 1857 की जंग, जिसमें हजा़रों मुसलमान शहीद हुए, उसे इस्लामी जंग-ए-आज़ादी क्यों नहीं कहा जाता? मुसलमानों की ये चीज़े राष्ट्र की धरोहर हैं और आतंकवाद इस्लाम कि धरोहर है? अन्य आतंकियों के धर्म का नाम क्यों नहीं आता. आखिर किस आधार पर जनाब ओसामा को आतंकवादी कहा जा रहा है और अमरीका को नहीं कहा जा रहा है. अगर कोई संगठन निर्दोष लोगों का खून बहाए तो उसे आतंकवादी संगठन कहते हैं, लेकिन जब कोई शक्तिशाली देश बिना किसी कारण के किसी देश पर हमला करके नागरिकों का खून बहाता है तो उसे आतंकवादी क्यों नहीं कहा जाता? शायद इसलिए कि वो शक्तिशाली है और दोष हमेशा कमज़ोर को दिया जाता है. जनाब ओसामा ने आतंक नहीं फैलाया बल्कि अमरीका जैसे आतंकी से लड़ कर दुनिया पर एहसान किया. अगर ओसामा चरमपंथी थे तो अफ़गानिस्तान, इराक़, लीबिया और बहुत सारे देशों पर हमले का ज़िम्मेदार अमरीका चरमपंथी क्यों नहीं है. भारत के लोग बॉलीवुड की बजाय हॉलीवुड को पसंद कर सकते हैं, भारतीय कंपनियों को छोड़ कर विदेशी माल खरीद सकते हैं तो पाकिस्तानी टीम का समर्थन क्यों नहीं कर सकते?. भारत में बहुत से लोग पाकिस्तान विरोधी भावना के शिकार हैं. भारतीय फिल्मों में भी पाकिस्तान को ख़लनायक कि तरह दिखाया जाता है.

  • 54. 23:41 IST, 10 जुलाई 2011 abdullah mansoor:

    संसार में सब से ज़्यादा मुस्लिम आजकल पाकिस्तान में मारे जा रहें हैं और ये मुसलमान किसी काफिराना ताकत के द्वारा नहीं बल्कि मुसलमानों द्वारा ही मारे जा रहे हैं.पाकिस्तान नफ़रत से जन्मा था और यही नफ़रत उससे आज खा रही है और हमें नहीं भूलना चाहिए इस्लाम के नाम पे बना पाकिस्तान एक काफिर ईसाई मुल्क अमरीका की खै़रात पर ज़िंदा है लेकिन एक बात तय है पाकिस्तान पूरी तरह न तो बर्बाद होगा और न ही पूरी तरह से स्थापित हो पाएगा वो हमेशा ही जेली की तरह रहेगा.

  • 55. 01:59 IST, 11 जुलाई 2011 Sunil Kumar Singh, Renukoot, UP:

    मेरे भाई मोहम्मद अतहर खान, पाकिस्तान पूरी दुनिया के सामने बेनकाब हो चुका है क्योंकि वो भारत ही नहीं पूरी दुनिया में आतंकवाद का निर्यात करता है. पाकिस्तान केवल भारतीय फिल्मों के लिए ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के लिए खलनायक है . पाकिस्तान का समर्थन करने के लिए आपके पास कोई वजह नहीं है सिवाय कि वो एक मुस्लिम देश है इसके बावजूद भी कि पाकिस्तान की नीतियों के वजह से ज़्यादातर निर्दोष मुस्लिम मारे जा रहे है . हाँ एक बात और पाकिस्तान का समर्थन करने से पहले एक बात ज़रूर देखिये कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का क्या हाल है.

  • 56. 04:59 IST, 11 जुलाई 2011 Amit:

    अतहर साहब इतना भी नाराज़ मत होइये. हर उस विचारधारा जिससे नफ़रत फैले उसकी निन्दा होनी चाहिये. चाहे वो धर्म हो या माओ . आप हर बुरी बात के लिये अमरीका को दोष देने लगते है हमें कु्छ अपनी ग़लतिया भी तो देखनी चाहिये. पाकिस्तान भारत के खि़लाफ नफ़रत फ़ैलाने के लिये आतंकवाद से लेकर धर्म सब कुछ इस्तेमाल कर रहा है. सलमान तासीर के मारे जने के समय भी मैने आपकी बाते सुनी और आपका साफ साफ कहना था कि सब कुछ का़नून के हिसाब से सही हुआ है पर आज आप देखिये पाकिस्तान का क्या हाल है खु़द पाकिस्तान के अखबार अब लिख रहे है कि सरकार धर्म के नाम पर आतंकवाद को बांट रही है. हर धर्म में अच्छी और बुरी बातें है हमें वाद विवाद करने और अपनी कमिया दूर करने के लिये तैयार रहना चाहिये. मैने पाया है ज़्यादातर समय लोगो का ये मानना है मेरा धर्म महान है और बाकी सबका बेकार है पर ये तो अच्छी बात नही है ना. दुनिया के कइ देशों में धर्म के नाम पर संगीत को पाप कहते है पर ये तो पागलपन ही है ना. हमें सब धर्मो और सब लोगों का सम्मान करना चहिये ना कि उन्हें नीचा समझना चाहिये चाहे वो कोइ भी हो.

  • 57. 08:51 IST, 11 जुलाई 2011 Iqbal Ahmad, Asansol, WB:

    अर्धसत्य झूठ से भी ज़्यादा भयानक होता है. मीडिया ने पिछले कुछ सालों में मुसलमानों की वीभत्स छवि बनाने का क़ायम किया है. पत्रकार जे डे की हत्या इसका ताज़ा उदाहरण है सुरक्षा एजेंसियों ने फट से इसका आरोप इंडियन मुजाहेदीन पर थोप दिया जबकि कुछ ही देर में पता चल गया कि ये निराधार था.

    मरे साथी गुप्ताजी ने कहा कि मुसलमान चार शादी कर दस-दस बच्चे पैदा करते हैं. मैने कहा कि हाँ मेरी चार बीवियाँ है. उन्होंने कहा क्या बात करते हैं. मैनें कहा हक साहब को दस बच्चे हैं. उन्होंने कहा मैं आप जैसे मुसलमानों की बात नहीं कर रहा. मैने उनसे कहा कि आप जनगणना रिपोर्ट देखें वहां कहा गया है कि मुसलमानों में महिला-पुरूष का औसत 1000:990 है. अगर एक मुसलमान चार शादी कर लेता है तो ज़ाहिर है तीन दूसरे को विवाह के लिए लड़की ही नहीं मिलेगी.

    लोगों में बातचीत को बढ़ाकर एक दूसरे को समझने की ज़रूरत है.

  • 58. 08:56 IST, 11 जुलाई 2011 Dr.Lal Ratnakar:

    वाह ज़ुबैर भाई, आपने जो कुछ लिखा वह बिलकुल सच है और गीता हाथ में लेकर बोलना हो तो भी, 'यह केवल और केवल मुसलमान के लिए ही नहीं है, हज़ारों सालों से से इस देश में गै़र बराबरी का बोलबाला है, आज भी मंगत कोरी की याद आती है तो दिल दहल जाता है, घटना 'अमेठी' की है मुसलमानों की बस्ती से सटा हुआ कोरियों का मोहल्ला और थोड़ी दूर आर्य समाज मंदिर, उसी परिसर में मेरा आवास, अगल बगल बनिया,बामन, कायस्थ और ठाकुरों के परम्परावादी मोहल्ले. जहाँ अक्सर मंगल कोरी की सम्मानजनक उठक बैठ और वह दिन जब 'शाहिद' ने बताया कि यही मंगल रात में मुस्लिम मोहल्ले में ' सूअर......'को और उसके कटे अंगों को फेंकता है,
    आश्चर्यजनक ये था. दिन भर भारतीय जाति व्यवस्था को गाली बकते नहीं थकता था मंगल. वी.पी. सिंह का हिमायती,साम्प्रदायिकता के विरोध में जुलूस, लब्बो लुबाब यह कि सामाजिक स्तर पर भारत 'नफ़रत' और अपमानित करने की मानसिकता का देश है. गाँव से लेकर उच्च अकादमियों तक ही नहीं राष्ट्रीय पुरस्कारों पर आये दिन उंगलियाँ उठती हैं, यहाँ किसी को भी जो 'उनकी जाति धर्म और समूह को नहीं स्वीकारता' को किराये पर ही नहीं, मौलिक हक़ नहीं मिलते. मंगल कोरी कि तरह .........जब मैंने मंगल से सहमते हुए प्रेम से पूछा क्या 'रात में तो उसने कहा उस दिन ज़्यादा पिला दिया था.' ये भारतीय जब पी कर कोई काम करते हैं तो उन्हें यह याद नहीं रहता कि वह क्या कर रहे हैं. भले ही वह चरणामृत ही क्यों न हो. अतः आप मुसलमानों कि व्यथा को लिखते वक्त बड़े व्यापक समाज को भूल गए हैं कि उन्हें बगल में बैठने नहीं देते.

  • 59. 10:46 IST, 11 जुलाई 2011 आदर्श राठौर:

    देश में आतंकवाद है ही नहीं. अगर होता तो आज क़त्ल-ए-आम मचा होता. जनता को बांटने की साज़िश के अलावा कुछ नहीं है ये. आप इस पोस्ट पर आए कॉमेन्ट्स से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि राजनेताओं कि ये साज़िश सफल भी हुई है.

  • 60. 11:04 IST, 11 जुलाई 2011 Sumit:

    भारत में शांति के लिए ज़रुरी है कि आप और आप के मुसलमान भाई भारत से चले जाये.

  • 61. 12:25 IST, 11 जुलाई 2011 jagat:

    भारत के लोगों को उसकी धार्मिक उदारता के बदले अपने देश के टुकडे़ करवाने पडे़ है यह पीड़ा क्या कम है?

  • 62. 12:51 IST, 11 जुलाई 2011 VICTOR:

    ज़ुबैर साहभ आप पत्रकार नहीं मुसलमानों के नुमाइंदे लग रहे हैं.

  • 63. 13:27 IST, 11 जुलाई 2011 D Chandra:

    चाहे जो भी हो, बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी हीं. आपने अपनी बात की, लोगों को अपनी और उनकी बात लगी. बस भीड़ गए. ज़रा दोनों कानों के बीच के मशीन पर भी जोड़ दें और केवल बातों और लांछनों से आगे बढें. तोहमतों के कीचड़ से चोंगे ही गंदे होंगें. ज़रूरत हिन्दू या मुसलमान बनकर सोचनें की नहीं बल्कि एक संवेंदनसील इन्सान की तरह सोचने की है. जु़बैर भाई के दिल में कुछ घटनाओं के कारण दर्द हुआ, यहाँ उन्होंनें अपनी बात कुछ मरहम के आस में राखी होगी न की अपने जैसे कुछ और घाव पैदा करने के लिए. मेरे हिसाब से बातें तो हों पर आखं के बदले आँख की नहीं बल्कि कुछ सृजनात्मक हल की जिसमें हरेक भारतवासी आपने आप को भारतीय कह कह कर संबोधित करे न कि हिन्दू या मुसलमान.

  • 64. 13:54 IST, 11 जुलाई 2011 नदीम अख्तर:

    जुबैर साहब के विचारों का भी कुछ लोगों ने बेहद छिछले तरीके विरोध किया है, जो इस बात का द्योतक है कि आज भी एक वर्ग विशेष पुरातन मानसिकता से ग्रस्त है. उसे सच्चाई स्वीकारने में इतनी तकलीफ है कि वह ज़हर उगलने से पहले यह भी नहीं देख रहा है कि उसकी कठदलील कहीं नहीं टिकटी. मैं समझता था कि बीबीसी ने पाठकों का एक संभ्रांत वर्ग तैयार किया है, लेकिन यह मेरा भ्रम था. हिन्दी पट्टी में जो जड़ता है, उससे न बीबीसी मुक्त हो सकता है और न ही कवि सम्मेलनों का मंच. जो लोग मुद्दे से हटकर लेखक को सिर्फ इसलिए गाली दे रहे हैं कि उन्होंने "सच का सामना" करवाया है, वे वास्तव में सिर्फ सामान्य साक्षर लगते हैं. बौद्धिकता के तो दूर-दूर तक दर्शन नहीं होते.

  • 65. 14:33 IST, 11 जुलाई 2011 rohit:

    आप एक बात बताएं क्या मुंबई में सभी हिंदुओं को घर मिल जाता है? क्या किसी मुस्लिम मुहल्ले में हिंदू को घर मिल सकता है? आपकी सबसे बड़ी परेशानी है कि आप हर बात में धर्म को आगे लाते हैं.

  • 66. 15:45 IST, 11 जुलाई 2011 pawan rai:

    यह एक लड़ाई छिड़ गई है. आतंकवाद को धर्म से जोड़कर देखा जा रहा है. मुझे लगता है कि जो लोग ऐसा कर रहे हैं, चाहे वो हिंदू हों या मुसलमान, अपने धर्म का पूरी तरह से पालन कर रहे हैं. सबको ये समझना चाहिए कि आतंकवाद एक ग़लत सोच के कारण है न कि किसी धर्म से जुड़े़ रहने के कारँ.

  • 67. 16:01 IST, 11 जुलाई 2011 neeru:

    अगर सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं भी हैं तो उन्हें कुछ लोगों के किए की क़ीमत तो चुकानी होगी. ये ग़लत है लेकिन यही सच्चाई है.

  • 68. 18:16 IST, 11 जुलाई 2011 vikas kushwahakanpur:

    कुछ लोग कह रहे हैं कि मुसलमानों को यहां से चले जाना चाहिए जो कि पूरी तरह ग़लत है. ऐसे लोगों की संख्या न के बराबर है. इनकी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए.

  • 69. 20:18 IST, 11 जुलाई 2011 vijay mohan:

    जुबेर भाई और यहां अपनी बात रख रहे सभी दोस्तो,
    हिंदू और मुसलमानों के बीच नफरत के कारण इतिहास में हैं, जिनकी जड़ें 13 सौ साल पुरानी हैं। जो लोग फरमा रहे हैं कि मुसलमानों ने मुल्क के लिए कितनी कुर्बानियां दीं, उनकी नजर बहुत पास का देखती है और वह भी सिर्फ एक आंख से। हकीकत कड़वी है और वो ये कि मुसलमानों ने इस मुल्क की कुर्बानी ली है, लेकिन वे हमलावर बाहरी मुसलमान थे। मुहम्मद बिन कासिम, मेहमूद गजनवी, मुहम्मद गौरी, इल्तुतमिश से लेकर तुगलक और बाबर तक। सबूत के तौर पर आप सब साहेबान वे दस्तावेज पढि़ए, जो अब अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की पहल के चलते हिंदी में मुहैया हैं। ये सात सौ साल की दिल्ली में मुस्लिम सुलतानों व बादशाहों की हुकूमत की जीती जागती दास्तानें सामने रखते हैं। ये उसी दौर के कलमनवीसों ने लिखे हैं। अख्तर अब्बास रिजवी साहब को सलाम, जिन्होंने इसका तजुर्मा अरबी-फारसी से ङ्क्षहदी में करने की जहमत की। दोस्तो मंदिरों की मूर्तियों को तोडक़र मस्जिदों की सीढिय़ों पर हजारों दफा चुनवाया गया और उसके बांट बनाकर मांस तोलने के लिए कसाइयों को दिए गए। हिंदुओं के कत्लेआम के किस्से पढ़ लेंगे तो सो नहीं पाएंगे। लेकिन इसके लिए वही बाहरी मुस्लिम कुसूरवार हैं। आज के 99 फीसदी भारतीय, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी मुस्लिम तो उन अभागे हिंदू पूर्वजों के ही वंशज हैं, जिन्हें जहालत के उसी दौर में लालच और डर के चलते अपनी बल्दियतें बदलनी पड़ीं। हमें इनसे क्यों नफरत होनी चाहिए? मेरे कई मुस्लिम दोस्त हैं, जो मानते हैं कि उनके पूर्वज हिंदू ही थे। लेकिन वे कहते हैं कि सूफी संतों के प्रभाव में उनके परदादाओं ने अपना मजहब बदला। यह एकदम गलत है। जो नामी-गिरामी सूफी आज खुदा की तरह पूजे जाते हैं, वे भी सुलतानों की मदद से सिर्फ इस्लाम को फैलाने के एक सूत्रीय कार्यक्रम में लगे रहे। लालच और भय के अंतहीन अंधेरे में स्वभाव से अहिंसक रहे हिंदुओं को धर्म बदलने पर मजबूर किया जाता रहा। मैं जुबेर में, अहमद में, खलील में, खालिद में, शाहरुख में, सलमान में अपने उन्हीं मजबूर पूर्वजों का चेहरा देखता हूं। मुझे इनसे कतई नफरत नहीं जागती। मैं उनसे मोहब्बत करता हूं और उनकी नादानी पर दया।

  • 70. 20:45 IST, 11 जुलाई 2011 vijay mohan:

    मेहरबानी करके अगर पढ़ ली हो तो मेरी प्रतिक्रिया भी दोस्तों के बीच बांटने के लिए जारी कर दीजिए।

  • 71. 01:35 IST, 12 जुलाई 2011 ram kripal deoria:

    ज़ुबैर जी, एक मुसलमान होते हुए एक पत्रकार होने का काम भी बख़ूबी निभा दिया.

  • 72. 12:37 IST, 12 जुलाई 2011 saket bhardwaj:

    मुस्लिम देशों में आप देख सकते हैं कि वो आपस में लड़ते रहते हैं. इराक़ पर अमरीका ने हमला किया ये ग़लत है लेकिन इराक़ में रोज़ बम धमाके होते हैं ये अमरीका नहीं करता. ये काम वहां के स्थानीय चरमपंथी संगठन करते हैं और उसके शिकार होते हैं वहां के आम लोग. ये वक़्त वाकई मुसलमानों के सोचने का है.

  • 73. 01:26 IST, 13 जुलाई 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    ये सच है कि बादशाहों ने मुल्क को जीता लेकिन सूफ़ियों ने दिलों को जीता. पृथ्वीराज चौहान के विरोध के बावजूद हज़रत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती से प्रभावित होकर 90 लाख लोगों ने अपनी मर्ज़ी से इस्लाम कुबूल किया. इनमें पृथ्वीराज चौहान के जादूगर जयपाल भी शामिल थे. हज़रत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती तो फ़कीर थे, उनके पास तो कोई लश्कर नहीं था. ये बिलकुल ग़लत है कि इस्लाम तलवार के ज़ोर से फैला है क्योंकि इस्लाम तो ज़बरदस्ती करने की इजाज़त ही नहीं देता.
    इस्लाम कहता कि जब कभी हमला करना पड़े तो
    1. औरतों, बच्चों और ज़ईफ़ों पर हाथ मत उठाओ.
    2. पेड़ों को मत काटो, फसलों को बर्बाद मत करो.
    3. जो लोग अपनी इबादतगाहों में पूजा कर रहे हों, उन्हें नुकसान मत पहुंचाओ.
    4. जो लोग हथियार डाल दें, उन्हें नुकसान मत पहुंचाओ.
    5. सिर्फ़ तलवार उठाने वालों से ही जंग करो.
    लेकिन ताज्जुब होता है जब आप कहते हैं मुस्लिम सुल्तानों ने देश को लूटा है?
    मुस्लिम बादशाहों ने भारत को ख़ून पसीने से सींच कर सोने की चिड़िया बनाया. सड़क, सराय, महल और क़िले बनवाए. भारत की जितनी प्रगति इस्लामी हुक़ूमत में हुई उतनी कभी नहीं हुई. वर्तमान आप देख ही रहे हैं.
    आप मुसलमानों पर दया बिलकुल न करें, क्योंकि हमें फ़ख्र है कि हमारे पूर्वजों ने इस्लाम क़ुबूल किया. मेरे पूर्वजों ने 300 साल पहले इस्लाम क़ुबूल किया था वो भी बिना किसी भय और लालच के क्योंकि वे शक्तिशाली जमींदार थे और आज भी दोनों खानदानों (मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिम) के पास बराबर ज़मीन है. (मुसलमान होने की वजह से हमें उनसे ज़्यादा ज़मीन नहीं मिली). दया तो मुझे आती है अपने उन पुरखों पर जो रोशनी आने के बावजूद भी अंधेरे में रह गए. जो अपने बनाने वाले की बजाय उसको पूजते रह गए जिसको उन्होंने (पुरखों) ने खुद बनाया. मैं उनसे मोहब्बत करता हूं और उनसे हिदायत (रोशनी) पाने का इंतज़ार.

  • 74. 19:09 IST, 13 जुलाई 2011 Raza Malik:

    ज़ुबैर भाई आपने ठीक लिखा है . कश्मीरी पंडितो का दर्द कोई नहीं बोलता , जिन्हें अपने ही घर से भगा दिया गया . ये किराये का घर न मिलने पर रो रहे हैं . कभी किसी कश्मीरी पंडित के घर जाओ जो अपना घर-बार होते हुए भी धक्के खा रहे है . जुबैर अहमद जैसे लोगो को तो शर्म आनी चाहिए जो ऐसा ब्लॉग लिख कर लोगो में भेदभाव बढ़ा रहे हैं . दूसरो को बोल रहे है कि पैसे लेते है भ्रष्टाचार करते है और देश द्रोही बनते है परन्तु अपने को नहीं देख रहे की ख़ुद क्या रहे है.

  • 75. 23:23 IST, 13 जुलाई 2011 Akash:

    भारत के सभी मुसलमान गद्दार है. गद्दारी यह है कि वो पाकिस्तान परस्ती दिखाते हुए आतंकवादिओं को हिंदुस्तान में लेकर आते है. मुसलमानो का तो इस देश में यह इतिहास रहा है. अफगानों और पर्शियन हमलावरों को यही भारत पर हमला करके हिंदुओं की शक्ति छीनने लाये थे.

  • 76. 23:42 IST, 13 जुलाई 2011 rashish:

    मुसलमानों ने 13-7-11 को मुंबई पर हमला करके एक बार फिर दिखा दिया.

  • 77. 14:23 IST, 14 जुलाई 2011 sam pandit, siwan:

    प्यारे भाइयों,आप लोग इन्टरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं ,निश्चित ही थोड़ा दिमाग ऊपर वाले ने दिया होगा. अपना दुख सहकर समाज में भाई-चारा फैलाये ,ये हमारा कर्त्तव्य होना चाहिए. समाज को सुधारना हमारा ही काम है ,हम कम से कम ऐसी बातें न करें,गुज़ारिश है सभी भाइयों से, मैं विश्वास दिलाता हूँ कि जल्द ही अपने देश से भेद -भाव ,भ्रष्टाचार और सभी समस्याए ख़त्म हो जाएंगी, बस आप लोग अच्छे लोगों का साथ दे , और वोट ज़रुर दें. मेरी बाते हवाई नहीं है और ये होकर रहेगा क्योंकि इसके लिए मैने काम करना शुरू कर दिया है.

  • 78. 14:59 IST, 14 जुलाई 2011 Pranshu:

    मोहम्मद अतहर खान आप औरंगजे़ब को भूल रहे है उन्होंनें क्या किया . कैसे हिन्दुओं को मुस्लिम बनाया . अगर मुस्लिम ऐसे न होते तो सिख कभी नहीं बनते . सिख धर्म हिन्दुओ की रक्षा करने के लिए बना .गुरु गोविन्द सिंह को भी थोडा याद कर लो .. आप सरासर ग़लत बात कह रहे हो. मेरे बहुत से दोस्त मुस्लिम है उनके और हमारे रीति रिवाज मिलते है और वो मानते भी है कि उनके पूर्वज हिन्दू ही थे . वो तो उनको ज़बरदस्ती परिवर्तित कर दिया गया . आप लोगो के लिए दारुलउलम का फ़तवा ही काफी होता है कुछ भी करने के लिए . वो चाहे ग़लत हो या सही. और बराबरी का हक़ तो आपके मजहब मैं ही नहीं है . आप लोग इतने देश भक्त हो तो वन्देमातरम् क्यों नहीं गाते . इतने सारे मुस्लिम भाइयों ने टिपण्णी की है पर किसी ने भी कभी भारत माता की जय या वन्देमातरम् नहीं कहा . क्यों .. सोचो ज़रा ...
    मुझे पता है कि कहने से कोई देशभक्त नहीं हो जाता पर वही आप बार बार कहोगे तो लगाव हो ही जाएगा ..सो अब अपने मुस्लिम होने का रोना छोडो और कुछ रचनात्मक काम करो .

  • 79. 15:30 IST, 14 जुलाई 2011 Ravi Kumar:

    तेरह जुलाई की घटना के बाद आपको आपका जवाब मिल ही गया होगा की जनमानस के ह्रदय में क्या पीड़ा होती है जब ऐसी घटनाएं होती हैं.

  • 80. 17:09 IST, 14 जुलाई 2011 jane alam:

    प्यारे देशवासियों, मैं आप सब से संयम बरतने की अपील करता हूँ.

  • 81. 13:07 IST, 15 जुलाई 2011 AMEER KHUSRO:

    मुझे तो भारत सरकार पर पूरा भरोसा और यक़ीन है.

  • 82. 00:49 IST, 17 जुलाई 2011 Mohammad Athar Khan Faizabad Bharat:

    मेरा मानना है कि सुल्तान औरंगजेब एक इंसाफ पसंद बादशाह थे और उनकी निजी जिंदगी फकीरों की तरह थी. वो अपना ख़र्च कुरान शरीफ लिखकर और टोपी सिल कर चलाते थे. उनकी बीवी घर का काम खुद करती थी. उन्हें बदनाम किया गया है वो किसी के साथ ज़बरदस्ती कर ही नहीं सकते. ये सही है कि हमारे पूर्वज हिंदू थे और अभी भी रीति रिवाज मिलते है लेकिन अगर ज़बरदस्ती हुई होती तो हम फिर धर्म न बदल लेते? मुसलमान दारुल उलूम का फतवा न माने तो किसका फतवा माने? मार्गदर्शन करना दारुल उलूम की ज़िम्मेदारी है. फतवे को गलत कहने वाले आप कौन होते है? इस्लाम तो आया ही है बराबरी और इंसाफ कायम करने के लिए.
    रही बात वन्देमातरम की, तो वन्देमातरम कहना देश भक्ति की सनद नहीं है.
    वन्देमातरम का मतलब ये है कि "मै मात्रभूमि की वंदना (पूजा) करता हूँ लेकिन मुसलमान सिर्फ अल्लाह की पूजा करते हैं. हम अल्लाह के सिवा न किसी की पूजा कर सकते हैं और न ही कह सकते हैं. इसी लिए हम वंदेमातरम नहीं गाते. हम मुसलमान होने का रोना नहीं रो रहे हैं, हमें तो फख्र है मुसलमान होने पर. इतिहास देख लीजिये कि हमने कितने रचनात्मक कार्य किये है. भारत के पास जो भी धरोहर है वो मुसलमानों की ही दी हुई है.

  • 83. 19:07 IST, 18 जुलाई 2011 vijay mohan:

    मुइनुद्दीन चिश्ती से लेकर निजामुद्दीन औलिया तक तमाम सूफी फकीर सुलतानों के दौर में थे। सुलतान और उनके सिपहसालार उनके कदमों में गिरे तो पराजित हिंदुओं के दिलो-दिमाग पर उनका असर कायम हुआ। ये मैं नहीं कह रहा हूं, जिस दस्तावेज का जिक्र मैंने किया है, उनमें हजारों जगह लिखा है कि वे सिर्फ इस्लाम की सोचते थे, इंसानियत की नहीं। काफिर और जिम्मी कहकर सदियों तक दुतकारे गए हिंदुओं के सामने जजिया और खराज की जबर्दस्त वसूली का विकल्प ही बचा था। इससे बचने के लिए इस्लाम का पत्ता फैंका गया। हारी हुई बस्तियों की हजारों औरतों और बच्चों को गुलाम बनाने की दर्दनाक दास्तानें इन दस्तावेजों में दर्ज हैं हुजूर। 23 हजार मंदिरों को तोड़ा गया। हजारों पर मस्जिदें तान दी गईं। बेबस और बेइज्जत धर्मांतरित हिंदू माथे से टीका पौंछकर इन्हीं इबादतगाहों में सिर पर टोपी लगाकर आने लगे। जब भी कहीं कोई जबर्दस्ती करता है तो पूरे हिंदुस्तान में मार-मार कर मुसलमान बनानेे की कहावत दोहराई जाती है। यह तरीका और तहजीब थी एक मजहब की दूसरे मुल्क में तशरीफ लाने की। इस्लाम की जिस रोशनी की बात करते मुस्लिम अघाते नहीं हैं, मेहरबानी करके देखें कि उस रोशनी के दायरे में आने के बाद अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बंाग्लादेश जैसे तमाम मुस्लिम बहुल मुल्क दुनिया को कौन सी रोशनी से जगमगा रहे हैं? वे घटिया दर्जे के मुल्कों में शुमार हैं। अगर इस्लाम की नजर में यही रोशनी है तो आज के 90 करोड़ हिंदु, सिख और ईसाई खुशनसीब हैं, जो इसकी चपेट में आने से बच गए। मेरी गुजारिश है कि 1870 के बंगाल में रहे एक आईसीएस अफसर विलियम डब्ल्यू हंटर का वह दस्तावेज जरूर पढि़ए, जिसमें उन्होंने अंग्रेजों के आने के बाद फटेहाल हुए बंगाल के नवाबों की हकीकत तह में जाकर तलाशी। लगता है आपने मौर्यों और गुप्तों के समय के हिंदुस्तान के बचे-खुचे सबूत नहीं देखे, न ही इतिहास पढ़ा। जरा सांची-सारनाथ के स्तूप और अजंता-एलोरा जाइए और इस्लाम की पैदाइश से पहले के हिंदुस्तान की समृद्धि के सबूत अपनी आंखों से देखिए। मैंने पहले ही कहा कि आप महानुभावों की नजर दूर का नहीं देखती और जो देखती है वह भी सिर्फ एक आंख से। बुरा मत मानिएगा। जो भी हुआ, हम आज वक्त को पलट नहीं सकते। वह हम सबका साझा अतीत है।

  • 84. 00:33 IST, 23 जुलाई 2011 sachin:

    ये कार्रवाई करने का समय है , न कि आरोप- प्रत्यारोप का. धमाकों के लिए राजनेता ज़िम्मेदार हैं. वो नही चाहते कि सभी धर्म एक साथ रहें ताकि वो चुनावों में इसका फ़ायदा उठा सकें. अब जाग जाओ.

  • 85. 01:56 IST, 23 जुलाई 2011 mcapatna:

    भाइयों मु़झे लगता है कि हिन्दुओं और मुस्लिमो के बीच का भेदभाव पढ़े लिखे लोगो में ही ज़्यादा फैला है . मैं अगर अपने गाँव की बात करूँ तो वहाँ ऐसा कुछ नहीं है .रही बात घर न मिलने की तो कई लोग तो बैचलर को घर नहीं देते हैं, तो कई लोग फैमली वालों को नहीं . अभी जो लोग अपनी राय दे रहे है वो क्या अपने को मुसलमानों और हिन्दुओं का लीडर मान रहे है .सभी धर्मो में अच्छे और बुरे लोग है .हमें महात्मा गाँधी पर गर्व है तो एपीजे पर नाज़ है तो मदर टेरेसा कोई गै़र नहीं .

  • 86. 02:09 IST, 25 जुलाई 2011 Gaurav Singh:

    श्री अहमद द्वारा लिखे गए इस लेख से मुझे ज़रा सी भी दिक्कत नहीं है.उन्होनें जो लिखा है वैसा कुछ (या कई)जगहों पर होता है और ये भेदभाव (जो की सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं है) सिर्फ़ हिंदुस्तान में ही नहीं, बल्कि विकसत देशों में भी होता है.मैं एक दफ़ा लंदन के ईस्ट हेम नामक इलाके में गया और एक दुकान के बाहर किराए के मकानों के इश्तेहार देखे - वहां के कई भारतीय/पाकिस्तानी/बंगलादेशी मूल के मकान मालिकों ने इश्तेहार के नीचे लिख रखा था - "फॉर साउथ एशियन्स ओनली".जुबेर साहब को जिस भेदभाव से दिक्कत है वो यहाँ भी है और मेरे मुताबिक़ दोनों गलत हैं.
    ये धर्म,जाति और क्षेत्र के आधार पर होने वाले भेद भाव वक्त के साथ कम हो जाएगे.हमें इन बातों का हौवा नहीं बनाना चाहिए. इस समय देश के पास कई और मुद्दें हैं जो इन छोटी बातों से बहुत ज्यादा ज़रूरी हैं.

  • 87. 02:46 IST, 25 जुलाई 2011 Ajeet S Sachan:

    जुबैर सहाब,जिस तरह से हर घर का कुछ इतिहास होता है उसी तरह से इस देश का भी कुछ काला इतिहास है जो हम सभी ने अपने-अपने तरीकें से समझ रखा है.मेरी गुज़ारिश यहीं है कि इस इतिहास से पर्दा न ही उठाए तो वह सभी के लिए अच्छा होगा. आप ख़ुद ही देख रहे है कि किराए पर घर ना मिलने वाली बात कहा तक पहुंच गई है.कृपया अब इस तरह के विषय पर लिखने से पहले सोचे की कहीं गलत संदेश तो नहीं जा रहा है.

  • 88. 04:01 IST, 26 जुलाई 2011 Mohammed Murshid Saudi Arbia:

    एक दम सही लिखा है राजेश जी. पहले तो ये साफ हो जाना चाहिए कि ये चरमपंथ है क्या. नक्सलियों की ओर से रोज़ लोगों को मारा जाता है. साध्वी प्रज्ञा सरीखे लोग धमाकों के सिलसिले में पकड़े जाते हैं. हिंदू-मुसलमानों को अलग करके रख दिया गया है.

  • 89. 19:31 IST, 26 जुलाई 2011 राहुल कुमार:

    आपके पिछले और इस पोस्ट की सभी बातों से सौ फ़ीसदी सहमत हूं... और जो उलट-सुलट कह रहे हैं उनको तर्क देना...भैंस के आगे बीन बजाने के बराबर ही होगा ज़ुबैर भाई...

  • 90. 14:10 IST, 27 जुलाई 2011 Suman:

    मस्जिदों में सिर्फ़ नमाज़ अदा करने से ही धर्म का पालन नहीं हो जाता. धर्म का मतलब है मनुष्य के लिए मन में भावना रखना. मुझे आपके विचार जानकर बहुत अटपटा सा लगा.

  • 91. 00:48 IST, 28 जुलाई 2011 neetesh singh:

    जुबैर सहाब की बात सौ प्रतिशत सच है.इस देश को रिश्वतखोरों से ख़तरा है.

  • 92. 02:03 IST, 29 जुलाई 2011 prem raj:

    जुबैर सहाब मैं आपके साथ हूँ. लोगों का नज़रिया बदलने की देर है और वह बदलेगा.

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