एक अख़बार का अंत
टेलीफ़ोन के आविष्कार से 33 साल पहले 1843 में शुरू हुआ अख़बार 'न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड' टेलीफ़ोन हैकिंग कांड की वजह से बंद हो गया. लोगों के मोबाइल मैसेज ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से सुनने का मामला इतना बढ़ा कि रविवारीय अख़बार के मालिक रुपर्ट मर्डोक ने इसे बंद करने की घोषणा कर दी.
जिस अख़बार की 25 लाख प्रतियाँ बिकती हों उसके रुतबे का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है, 1930 के दशक में जब ये अख़बार अपनी लोकप्रियता के शिखर पर था तब इसकी 30 लाख प्रतियाँ बिकती थीं. इस रविवार को अख़बार की 45 लाख प्रतियाँ छापी गई हैं ताकि लोग देश की संस्कृति का हिस्सा बन चुके समाचारपत्र की अंतिम प्रति सहेज सकें.
'न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड' के शुरुआती अंकों में ही वेश्यालयों पर पड़ने वाले छापों के विस्तृत वर्णन होते थे, बाद के वर्षों में फुटबॉल खिलाड़ियों, फ़िल्मी सितारों और अमीरों की रंगरलियों के क़िस्से छपने लगे. गंभीर पत्रकारिता वाले उसे 'गटर न्यूज़' और 'ट्रैश' ही मानते रहे लेकिन ब्रिटेन के लाखों कामगारों ने 'न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड' का साथ पीढ़ी-दर-पीढ़ी दिया.
अधनंगी तस्वीरें, लोगों के प्रेमपत्र और रईसों के रेस्तराँ का बिल जैसी चीज़ें छापने वाले इस अख़बार ने कई बड़े घोटालों का पर्दाफ़ाश भी किया जिनमें पिछले साल पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों की स्पॉट फ़िक्सिंग का भंडाफोड़ शामिल है.
2007 में प्रिंस विलियम का एक मोबाइल संदेश सुनकर अख़बार ने ख़बर छापी कि उनके घुटने में तकलीफ़ है जबकि यह बात सिर्फ़ दो-चार लोगों की जानकारी में थी, मामले की जाँच के बाद अख़बार के पत्रकार को मोबाइल हैकिंग का दोषी पाया गया.
वहाँ से शुरू हुआ विवाद अख़बार के 'दी एंड' तक जा पहुँचा, अख़बार चाहे जैसा भी हो, दी एंड सिनेमा के स्क्रीन पर ठीक लगता है, अख़बार के मामले में नहीं, ख़ास तौर पर जब अख़बार 168 साल पुराना हो.

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ये कहा जा सकता है कि मोबाइल हैकिंग के कारण ब्रिटेन का सबसे पुराना अख़बार बंद हो गया है. बात सिर्फ़ इतनी सामान्य नहीं हो सकती है. आजकल प्रिंट मीडिया जिन समस्याओं से दो-चार हो रहा है, उसे देखते हुए किसी ऐसे ही मज़बूत बहाने की तलाश थी जो संयोग से इस कांड के कारण मिल गया. प्रधानमंत्री कैमरन ही नहीं अमेरिका के राष्ट्रपति तक ख़र्च में कटौती और टैक्स वसूली पर जितना ज़ोर दे रहे हैं उससे भविष्य में करोबारियों और राष्ट्रों को गम्भीर चुनौतियों से दो-चार होना ही है. रॉल्स रॉयस और कोरस जैसी कंपनियां यदि बिक चुकी हैं तो ये आसन्न उथल-पुथल का एक संकेत है. ग्रीस समेत यूरोपीय देश जिस दुष्चक्र में फंस चुके हैं उसने अर्थशास्त्रियों की नींदें उड़ा दी हैं. रूपर्ट मर्डोक व्यापारी हैं नफे-नुक़सान को वे इस तरह नहीं देखते कि अख़बार कितना पुराना था अथवा उसकी कैसी प्रतिष्ठा थी. भारत में भी प्रिंट मिडिया के बड़े-बड़े प्रतिष्ठान बंद हो रहे हैं. इस घटना को मोबाइल हैकिंग से जोड़ना अर्द्धसत्य ही है.
ये तो बुरे का फल बुरा होता है को संतुष्ट करनेवाली बात हुई क्योंकि आज का मीडिया किसी सामान्य व्यक्ति के अंतरंग मामलों को भी उजागर करने से भी नहीं चुकता है. उसे तो बस ख़बर चाहिए. वैसी ख़बर जो चटपटी हो. आज का मीडिया अपनी सीमाएं नहीं समझता. वो ख़ुद रहस्य उजागर करता है, ख़ुद ही उसको उछालता है और ख़ुद ही परोक्ष रूप से फ़ैसला भी सुना देता है. लोकतंत्र का एक मज़बूत आधारस्तंभ होकर भी मीडिया राष्ट्रहितों को नज़रअंदाज़ करता है. हालांकि न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड का बंद होना आवश्यक नहीं था क्योंकि अख़बार का इतिहास लंबा और अच्छा रहा है. इस ग़लती को मानकर फिर से अपनी मर्यादाओं को समझते हुए इसे पुनर्स्थापित किया जा सकता है.
राजेश जी| वैसे इंटरनेट पर तो हमें मिल ही जाएंगे इसके बारे में ज्यादा जानकारी| हिंदी में ना मिले अंग्रेजी में होंगे ही| पर आपने जब चर्चा छेड़ी तो हम आपकी ही शब्दों में जानना चाहते हैं विस्तार से| पत्रकारिता के दृष्टि से इस घटना का जरा विस्तार करें| भारत में अगर ऐसा होता तो क्या होता? भारत में ऐसी पत्रकारिता के लिए कितनी जगह है और कितनी जगह बन रही है? भारत में कोई अखबार ऐसे फोन हैकिंग में पाया जाता है तो क्या आपको दिखता है स्वतः मालिक उसे बंद करने का फैसला कर लेते? क्या वाकई ये इतनी बड़ी गलती थी| क्या पाठकों से क्षमा मांग कर अखबार का प्रसारण जारी नहीं रखा जा सकता था? क्या इसके पीछे भी कुछ और वजहें हो सकती हैं|
मीडिया जगत से जुड़े किसी भी व्यक्ति को इस तरह से एक अखबार का बंद होना अच्छा नहीं लगेगा। इसमें काम करने वाले को तो हर्गिज ही नहीं। लेकिन मीडिया में टेलीफ़ोन हैकिंग कांड बेहद ही शर्मनाक बात है। इससे ये पता चलता है कि मीडिया सुर्खियां बटोरने के लिए कैसे गंदा काम कर रहा है। ऐसा ही हमारे देश की मीडिया टीआरपी के चक्कर में कुछ भी टीवी पर दिखाती रहती है। जिसका देश और जनता से कोई सरोकार नहीं होता है। कहने को तो मीडिया ब्राडकास्ट एसोसिएसन का गठन कर दिया गया है। लेकिन क्या ये संस्था मीडिया के मनमाने रवैये पर अंकुश लगा पाई है। इस बात का जवाब आप सभी अच्छी तरह से जानते हैं। राजेश जी आपने बहुत ही सटीक लेख लिखा है। इसके लिए आपको बधाई...। आपने ब्लाग के अंत में लिखा है। "अख़बार चाहे जैसा भी हो, दी एंड सिनेमा के स्क्रीन पर ठीक लगता है, अख़बार के मामले में नहीं, ख़ास तौर पर जब अख़बार 168 साल पुराना हो।" आपकी अच्छी लेखनी के लिए एक बार फिर से बधाई।
इस समय मीडिया का जो रूप देखने में आ रहा है उसे देख कर कभी-कभी तो लगता है कि वो शायद पत्रकारिता के मानदंडों पर खरा नहीं है. हर दिन नया छपने और दिखाने के चक्कर में स्टिंग ऑपरेशन और हैकिंग जैसे हथकंडे अपनाए जा रहे हैं. इसी वजह से कुछ ख़बरें होती नहीं बल्कि उन्हें पैदा किया जाता है. इतने पुराने अख़बार के बंद होने का अफ़सोस तो है लेकिन मर्डॉक ने भी एक मिसाल क़ायम की है. अख़बार पर आरोप लगे और अख़बार बंद.
राजेश जी, आपका दर्द एक संस्था के दफ़न हो जाने का है. ये बात सौ फ़ीसदी सच है कि संस्थाओं पर राजनीति का ख़ूनी शिकंजा छाया रहता है.
कष्टकारी ख़बर है.
राजेश जी, आपका लेख पढ़कर अच्छा लगा पर ऐसा भारत में कब होगा जब पत्रकारिता में छिपे व्यापारियों को दंड मिलेगा. नीरा राडिया प्रकरण में बरखा दत्त का नाम आया. ऐसे ही कितने मामलों में मीडिया पर आरोप लगते हैं और कुछ सच भी साबित होते हैं. मीडिया आधी-अधूरी बात को ख़बर बना कर पेश करती है. कितनी बार ऐसा होता है कि एक व्यक्ति की कही हुई बात अलग-अलग चैनलों पर अलग-अलग मायने के साथ दिखाई जाती है.
रही बात ''न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड'' की तो ऐसे न जाने कितने न्यूज़ ऑफ़ द वर्ल्ड भारत में भी हैं, लेकिन उनका कुछ नहीं होता.
राजेश जी, फ़ोन हैकिंग तो एक बहाना है .सच तो ये है कि ये एक व्यापारिक फैसला है. आने वाले समय में न सिर्फ इंग्लैंड के बल्कि कई देशों के अख़बार बंद होने वालें हैं..इन्टरनेट और टीवी के इस युग में अब इनके खर्चे निकलना कठिन हो गया है. मुनाफ़ा तो दूर रहा आने वाले समय मे इसका असर पत्रिकाओं और शिक्षा की किताबों पर भी पड़ेगा.
यूरोप के प्राचीनतम अख़बार ' न्यूज़ ऑफ द वर्ल्ड ' का इस तरह से विदा लेना अशोभनीय लगा. फोन हैकिंग करने वालों को सख्त-से सख़्त सज़ा दिया जाना चाहिए. पच्चीस से तीस लाख लोगों को दण्डित करना अन्याय हैं. उन निर्दोषों का क्या होगा जो इस अख़बार से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े़ रहे तथा तन मन से सेवा करते रहे ?
बिना किसी तकनीकि के इस अखबार ने अपना एक आयाम बनाया. कितने चेहरे बेनकाब किए. हमें अखबार के बंद होने का बहुत अफ़सोस है. अखबार के मालिक पर ख़ासा दबाव था तभी उन्होंने अखबार बंद कर दिया है.
अख़बार के आतंक का अंत अपने कर्मों से हुआ पर आतंकवाद का अंत भारत में कब होगा राजेश जी?
क्या खूब!
अख़बार समाज का आईना होता है. इतने पुराने अख़बार का बंद होना लोकतंत्र की हत्या है.
राजेश भाई,निश्चित रूप से इस अख़बार का बंद होना दुखद है लेकिन जब बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होए. इस अख़बार ने नैतिकता के नियमों का घोर उल्लंघन किया है इसलिए इसका जो कुछ भी हश्र है वह अस्वाभाविक नहीं है.
कुछ भी हो इससे भारतीय मीडिया को भी सबक लेना चाहिए. बात फोन हैकिंग की हो या फिर मीडिया का अनर्गल प्रलाप, इस पर कुछ बंदिशें होनी ही चाहिए. लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में जानी जाने वाली मीडिया को सच सामने लाने देने की आज़ादी हो, लेकिन इस आज़ादी का दुरूपयोग नहीं किया जाए ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए.