पाकिस्तान, अमरीका और नई सोच
विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता तहमीना जंजुआ का कहना है कि पाकिस्तान की जनता और उसके प्रतिष्ठानों को चरमपंथी गुट अल क़ायदा से ख़तरा है और सेना ने देश को सुरक्षा का आश्वासन दिया है.
उनके इस बयान के बाद सेना, पुलिस और अर्थसैनिक बल सतर्क हो गए हैं लेकिन मूल रुप से इसका अर्थ यह है कि पाकिस्तान आगे भी सिक्योरिटी स्टेट बना रहेगा.
आसान शब्दों में इस अर्थ यह है कि अधिक पैसा सुरक्षा पर ख़र्च होगा. यह बयान आईएसआई के प्रमुख लेफ्टीनेंट अहमद शुजा पाशा के अमरीका से लौट आने के तुरंत बाद दिया गया है.
जिस दिन वो लौटे थे तो विदेशी मामलों की राज्यमंत्री हिन रब्बानी खर ने संसद की स्थायी समिति को बताया था कि अमरीका और पाकिस्तान के संबंध सामान्य हो रहे हैं.
दरअसल अमरीका ने 80 करोड़ डॉलर की सैनिक सहायता रोक ली थी और स्पष्ट रुप से उसी की गुहार लगाने गए शुजा पाशा अमरीका गए थे. क्यों न जाएं, 80 करोड़ डॉलर बहुत बड़ी राशि है भाई.
सैनिक साहयता देने के लिए अमरीका का कोई बयान तो सामने नहीं आया लेकिन दोनों देशों ने ये ज़रुर कहा है कि ख़ुफ़िया अधिकारियों की मुलाकातें सकारात्मक रही हैं.
पैसा तो अमरीका ज़रुर देगा क्योंकि उसके इस क्षेत्र में हित हैं और उसकी सेना पड़ोसी देश अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद है.
पाकिस्तान के पास भी अमरीका से संबंध बेहतर करने और पैसा लेने के सिवा कोई विकल्प भी तो नहीं है.
पाकिस्तान की विडंबना यह है कि वह पिछले छह दशकों से सिक्योरिटी स्टेट बना हुआ है. मेरी पीढ़ी जिसकी आयु 40 वर्षों से कम है उसने अपने देश को हमेशा युद्ध जैसी स्थिति में देखा है.
पिछले छह दशकों से जितना पैसा देश की रक्षा पर ख़र्च हुआ है उसके आधा भी यदि आर्थिक विकास पर ख़र्च होता तो आज पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के सामने हाथ न फ़ैलाने पड़ते.
दुनिया के दो ऐसे देश हैं जिनमें बहुत सी समानताएं हैं, दोनों धर्म के नाम पर बने, दोनों को अमरीका बहुत ज़्यादा पैसे देता है और दोनों के अपने पड़ोसी देशों से संबंध बहुत अच्छे नहीं हैं. एक इस्राईल और दूसरा पाकिस्तान.
यहाँ एक ऐसी विचारधारा है जो सत्ता प्रतिष्ठान पर हावी है, जो पाकिस्तान के परमाणु बम को इस्लामी बम समझने लगी है और अपने पड़ोसी देशों के सामने अपनी ताक़त का प्रदर्शन करती रहती है.
इसी विचारधारा ने पाकिस्तान को सिक्योरिटी स्टेट बना दिया है.
देश की नई पीढ़ी में अब यह सोच आ रही है कि एक तो परमाणु बम फटने से जिनता नुक़सान दूसरों को होगा उतना ही मुसलमानों को भी होगा. इतना ही नहीं युवा लोगों को यह भी समझ में आ चुका है कि कि ईरान और अफ़ग़ानिस्तान को अपने प्रांत बनाना और लाल क़िले पर पाकिस्तान का झंडा फहराना कोई आसान काम नहीं है जैसा कि सेना के लोग दावा करते रहते हैं.

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हफ़ीज़ बहुत अच्छा लिखा.लोगों को सच्चाई समझनी चाहिए तब कार्रवाई करनी चाहिए. उघोगपतियों के दबाव में भारत ने 2008 में युद्ध नही किया.
युद्ध और आतंक खून और अशांति ही देती है .वहीं शांति और विकास सिर्फ़ और सिर्फ़ शांत सोच ही पैदा कर सकते हैं. आज ना ही अमेरिका और ना ही और कोई देश ही किसी को अपने गुलाम बना सकती है. आज पूरा ही विश्व ही मध्य काल से बाहर आ चुका है तभी तो एक नये देश द. सूडान का जन्म हुआ. इसलिए अगर कोई ऐसी सोच रखता है तो वो खुद के साथ ही दूसरे अपने समर्थको को बरगला रहा है.
हफीज चाचड़ साहब ने पाकिस्तान की नई पीढी के सोच में आ रहे बदलाओं को रेखाकिंत करने की कोशिश की है। यह हो सकता है कि पाकिस्तान ने अब तक जो नीतियां अपनार्इ्र उसकी व्यर्थता का ऐहसास लोगों को होने लगा हो,लेकिन इस बदलाव के कारणों को ठीक से नहीं पहचाना गया तो गम्भीर खतरा हो सकता है, और धोखा हो सकता है,लगभग वैसा ही जैसा कि अमेरिका में युद्ध विरोधि प्रदर्शनों से हो जाता है। जब भी गठबन्धन सेना के लोग अफगानिस्तान में मारे जाते हैं तो अमेरिका में युद्ध विरोधि प्रदर्शनों की बाढ सी आ जाती है। जबकि इसका कारण यह नहीं है कि अमेरिका में सभी लोग युद्ध विरोधि हैं कारण सिर्फ इतना होता है कि जब भी अमेरिकी मारे जाते हैं तो उनको दर्द महसूस होने लगता है और जब आम अफगानी मारे जाते हैं तो वे विजेता के दर्प से भर जाते है।लगभग यही हाल पाकिस्तानी जनमानस का भी है । हफीज चाचड साहब को इस नजरिए को भी रेखांकित करना चाहिए था। जहॉ तक धर्म की बात है अब तक यह होता रहा है कि धार्मिक व्यक्ति ने धर्म को निजि सुख मान लिया है और खुद में सिकुडता गया यह भी अधर्म जैसा ही है। जो मक्कार,धूर्त और अवसरवादी है उन्होने धर्म की ऐसी व्याख्या और दुर्गती की जिसका जिक्र किया ही नहीं जा सकता है।इन लोगों ने हिन्दु या मुसलमान को धर्म कहा जबकि ये तो केवल मार्ग हैं जिन पर चलकर व्यक्ति धार्मिक हो सकता है। धार्मिक होने का केवल इतना ही मतलब है कि हृदय को उसकी पवित्रतम स्थिति तक पहुॅचा देना। इसमें लडने-झगडने मतभेद के नाम पर अलग राष्ट्र बना देने की गुजांईस ही कैसे हो सकती है?
इतना सच्चा ब्लॉग मैंने पहले कभी नहीं देखा. सच कहूँ तो पहली बार लगा है कि पाकिस्तान में भी हमारी तरह ही आम आदमी रहते हैं. बस ज़रुरत है तो वहां कि राजनीति को बदलने कि. नेताओं को चाहिए. बहुत अच्छा लिखा सर, धन्यवाद.
बिलकुल सही कहा आपने. पडोसी जितने अच्छे दोस्त हो सकते है और कोई नहीं हो सकता. अगर मुट्ठी भर लोग सोचते है कि धरम के नाम पर देश की तस्वीर बदल जाएगी तो ग़लत सोचते हैं. कहीं कोई आतंकी हमला होता है तो वो धर्म पूछ के नहीं मारता. आज अमरीका और इंग्लैंड को हमारी ज़रुरत है. उन्हें काम चाहिए, व्यापार चाहिए. इसलिए वे कभी पाकिस्तान को ख़ुश करता है और कभी भारत को. सभी अपना फ़ायदा निकालते हैं.
हफीज़ जी, बाकी सब तो ठीक है, लेकिन लाल क़िले पर पाकिस्तान का झंडा फहराना कुछ जमा नहीं. ऐसा लिख कर आप कुछ विशेष लोगों का मनोरंजन भर कर सकते हैं. ये तो सपने में भी सोचना नामुमकिन है.
बहुत ही उम्दा लिखा है हफीज़ भाई. पाकिस्तान के बारे में तो राय देना और राय रखना हमने छोड़ ही दिया है. बस यही कह सकते हैं कि जो भी हो ख़ुदा पाकिस्तान की आवाम को सलामत रखे. क्योंकि सियासी खेल में इनकी कोई गलती नहीं है. और रही अमरीकी मदद की बात तो वो पाकिस्तान लेता ही रहेगा और एक अच्छे वफादार की तरह अमरीका की मदद भी करता ही रहेगा. अब पाकिस्तान इतनी दूर निकल चूका है कि वापस लौटना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन सा है.
जनाब हफीज़ भाई, एक ही शब्द है जो इसमें उपयुक्त है-दिशाभ्रम हो गया है. कभी बचपन में आपको भी होता होगा जब पूरब पश्चिम सा लगता है. लगता है कि मुल्क के लोगों को ख़ुदा की ख़ुदाई पर भरोसा नहीं रहा, सब कुछ वे खुद ही करने लगे हैं.
हफीज मियां, परेशान न हों. अल्लाह पर भरोसा रखे. हफीज, आप माने या नहीं, लेकिन मुझे यकीन है कि आपका मुल्क जिस विचारधारा से पीड़ित है, वो एक दिन हार जाएगी.
हम आपके विचारों से सहमत हैं. और युवा लोग भी बदलाव देखना चाहते हैं और इसे लाना चाहते हैं.
हफीज़ साहब आपने जो कुछ कहा वो सच है. पाकिस्तान एक मुगालते की दुनिया में जी रहा है, लेकिन अब ये सब ज़्यादा दिन चलने वाला नहीं है. पाकिस्तान को अपने मदरसों को ठीक करना होगा. जब तक आधुनिक शिक्षा का अभाव रहेगा, पाकिस्तान कभी भी इससे उबार नहीं पाएगा.
आपकी बीबीसी के ज़ुबैर अहमद को इस ब्लॉग से कुछ सीखना चाहिए. लिखना है तो कुछ ऐसा लिखिए जिससे अमन हो, शांति को बढ़ावा मिले. न कि भड़काऊ और ऐसे मुद्दे जिनका कोई अंत नहीं है. बहुत ही कमाल का ब्लॉग.
प्यारे हफीज़, वाकई में ये बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि पकिस्तान अमरीका से पैसों की भीख मांग रहा है. भगवान उनकी रक्षा करे.
सहमत हूँ आपकी राय से. भारत-पाक का भविष्य युवा पीढ़ी ही निर्धारित करेगी अगर दोयम कूटनीति आड़े न आई तो. इस विषय पर एक सार्थक पहल का जिक्र मैंने अपने ब्लॉग पर भी किया है.
हफीज़ साहब का ब्लॉग सच्चाई बयान करता है. एक बात सच है, अगर आपके अपने पड़ोसी से ही संबंध अच्छे नहीं है तो हमें नहीं लगता की आप खुश रह पाएंगे.
धन्यवाद हफ़ीज़ साहब साहब, युवाओं में आया बदलाव हिना रब्बानी ख़ार में भी दिखे.
आज आप अल -क़ायदा और तालिबान का रोना रो रहे है . पूरी दुनिया को पता है कि अल -क़ायदा और तालिबान को आईएसआई और पाक सेना ने पाला है और पाक जनता को मालूम था और वो चुप बैठी रही . आखि़र क्यों ? क्योंकि पाक जनता में कट्टरवादी लोगों की भरमार है जो इस्लामी आतंकवाद की बात करते है और दुनिया फ़तह करने का सपना देखते है ? समय अभी भी है अगर पाक को बचना है तो वहीं के लोगों को आगे आना होगा . अमरीका से धन लेकर आतंकवादियो की मदद करना अब पूरी दुनिया को पता है . इसका इस्तेमाल इंडिया के खिलाफ सबसे ज़्यादा होता है . एक बात और बताना चाहता हूँ कि कभी सद्दाम और ओसामा अमरीका के बहुत करीब थे , उनका मारा किसने अमरीका ने . एक दिन यही अमरीका पाकिस्तान पर हमला कर बर्बाद कर देगा . यकीन मानिए.
भस्मासुर को वरदान देकर एक बार भोलेनाथ भी ख़तरे में पड़ गए थे. जब भगवान ख़तरे में पड़ सकते हैं तो आम आदमी की क्या बिसात? अलक़ायदा नामक भस्मासुर यदि पाक को असमंजस में डाल रहा है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं. हां यदि अब भी पाकिस्तान नहीं चेतता है तो ये उसका दुर्भाग्य है. मेरी राय में पाकिस्तान को अब नफ़रत का रास्ता छोड़कर अमन के रास्ते पर लौट आना चाहिए. ये रास्ता इतना आसान नहीं होगा. किन्तु पाकिस्तान की अवाम को सलामत रखने का ये आख़िरी विकल्प होगा.
हफ़ीज़ भाई, इतिहास गवाह है कि हमारे आपसी फूट ने अंग्रेजों को यहां पैर जमाने का अवसर प्रदान किया. हमें अब इस भूल को दोहराना नहीं चाहिए .ये आशा की एक किरण है कि उस पार के नई पीढ़ी के लोग भी हमारे जैसी सोच रखते हैं. उम्मीद पर दुनिया क़ायम है. आल्लाताला पाकिस्तान और वहां की अवाम को सलामत रखें. उम्दा लेख के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया.
कुवैत पर कब्ज़ा करने का नतीजा आज इराक़ कितना भुगत रहा है ये सभी जानते हैं और अब हिंदुस्तान, ईरान, अफ़गानिस्तान पर कब्ज़ा करना पाकिस्तान के बस की बात नहीं है. अपना देश तो संभल पाता नहीं चले हैं लाल क़िले पर पाकिस्तानी झंडा फ़हराने. परमाणु बम से कुछ भी नहीं होनेवाला उससे अपनी ही बर्बादी होगी.