इस विषय के अंतर्गत रखें अप्रैल 2011

तार-तार लोक लेखा

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011, 18:26

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लोक लेखा समिति की रिपोर्ट पर सरकार और विपक्ष के बीच हो रही तीखी नोक-झोंक ने संसदीय मूल्यों को एक बार फिर तार-तार करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी है.

यह पहला मौक़ा नहीं है जब लोक लेखा समिति ने सरकार को आड़े हाथों लिया हो, लेकिन इससे पहले कभी भी मतदान करा कर पूरी रिपोर्ट को ख़ारिज कर नया अध्यक्ष चुनने की न तो कोई कोशिश हुई है और न इसकी कभी नौबत आई है.

बूटा सिंह जब लोक लेखा समिति के अध्यक्ष थे तो उन्होंने भी ताबूत घोटाले में सरकार के ख़िलाफ़ इतनी ही डैमेजिंग रिपोर्ट पेश की थी. समिति के बहुत से सदस्य उस रिपोर्ट के मसौदे से सहमत नहीं थे.

उन्होंने अपनी असहमति ज़रूर दर्ज कराई थी लेकिन अध्यक्ष को पद से हटाने की मुहिम की नौबत नहीं आई थी. मज़े की बात यह है कि जब टू जी घोटाले की संसदीय समिति से जाँच कराने की माँग उठी थी तो सरकार की तरफ़ से कहा गया था कि इस घोटाले की जाँच लोक लेखा समिति द्वारा होनी चाहिए. यहाँ तक कि प्रधानमंत्री तक इस समिति के सामने पेश होने के लिए तैयार थे.

लोक लेखा समिति के तथाकथित मत विभाजन की तरफ़ ध्यान दिया जाए तो विचारधारा के स्तर पर हमेशा एक दूसरे का विरोध करने वाली भारतीय जनता पार्टी और मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी एक ही मंच पर हैं जबकि उत्तर प्रदेश मे एक दूसरे की धुर विरोधी समझे जाने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी इस मुद्दे पर काँग्रेस के साथ खड़ी दिखाई दे रही हैं.

यह दोनों पार्टियाँ राज्य स्तर पर काँग्रेस को अपना विरोधी मानती हैं लेकिन केंद्र में उनके सहयोगी दलों की तरह काम कर रही हैं.समाजवादी पार्टी जिसके 22 सांसद हैं अपने आपको नौ सांसदों वाली एनसीपी से कम बेहतर राजनीतिक स्थिति में पा रही है और इसी लिए कांग्रेस से क़रीबी राजनीतिक समझ बनाने के लिए बेताब है.

इसको राजनीतिक अवसरवादिता नहीं तो और क्या कहेंगे कि उन्होंने पीएसी में सरकार के ख़िलाफ़ सबसे मुखर आवाज़ अपने सांसद रेवतीरमण सिंह से कहा कि वह मुरली मनोहर जोशी के ख़िलाफ़ यूपीए की लड़ाई में उनका साथ दें. बहुजन समाज पार्टी के राजनीतिक क़दम हमेशा इस बात पर निर्भर करते हैं कि उनकी नेता मायावती को केंद्र से क्या दरकार है.

सरकार और विपक्ष की लड़ाई मे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को सरकार को मुसीबत से उबारने के कई मौके और मिलेंगे और ज़ाहिर है कहने वाले तो कहेंगे कि हर राजनैतिक समर्थन की कोई न कोई क़ीमत तो होती है.

अन्ना हज़ारे की मुहिम उत्तर प्रदेश में

रामदत्त त्रिपाठीरामदत्त त्रिपाठी|मंगलवार, 26 अप्रैल 2011, 12:51

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भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे की तोप का मुंह अब उत्तर प्रदेश की ओर है. वे इसी शुक्रवार को बनारस से अपनी मुहिम शुरू करेंगे. अन्ना हजारे का काफिला बनारस से सुल्तानपुर होते हुए रविवार पहली मई को लखनऊ में सभा करेगा.

मायावती ने अन्ना हजारे से सीधे मोर्चा लेते हुए प्रस्तावित जन लोक पाल विधेयक की मसौदा समिति में दलित प्रतिनिधि न होने के लिए उन्हें गुनहगार बता दिया है. साथ ही समिति के संदिग्ध सदस्यों से दूरी बनाने की सलाह भी दी है.

मायावती की आपत्ति और सलाह अपनी जगह. लेकिन इस बात से कौन इनकार करेगा कि उत्तर प्रदेश पिछले कई सालों से लगातार भ्रष्टाचार में डूबता जा रहा है. मायावती ने स्वयं हाल ही में अपने दो मंत्रियों को भ्रष्टाचार के आरोप में हटाया है.

हर जुबान पर चर्चा है कि उत्तर प्रदेश में सरकारी विभागों से अवैध वसूली के आरोप लगते रहे हैं. और यह भी किस तरह दो बिजनेस परिवार यहाँ हर सरकारी ठेका पा रहे हैं.

इससे पहले जो सरकार थी उस पर भी दो चार बिजनेस घरानों को ही फायदा पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं. पूर्ववर्ती सरकार के साथ कम कर चुके दो पूर्व मुख्य सचिवों को भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जाना पड़ा.

सीबीआई सुप्रीम कोर्ट में कई बार कह चुकी है कि वर्तमान मुख्यमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में उसकी चार्ज शीट तैयार है.

सुप्रीम कोर्ट के ही आदेश पर सी बी आई इनसे पहले वाले मुख्यमंत्री के खिलाफ भी आय से अधिक मामले की जांच कई साल से कर रही है.

सरकार जनता के पैसे से चलती है. सरकारी सेवक और जन प्रतिनिधि जनता के टैक्स के पैसे से वेतन और तमाम सुख सुविधाएँ पाते हैं. लेकिन वही नागरिक जब किसी काम से, मसलन राशन कार्ड , जाति प्रमाणपत्र, जन्म- मृत्यु प्रमाणपत्र , पासपोर्ट और ड्राइविंग लाइसेंस आदि के लिए सरकारी दफ़्तर जाता है तो उसे परेशानी का सामना करना पड़ता है.

कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश की जनता भी भ्रष्टाचार से आजिज है. लोगों को अन्ना हजारे से बहुत उम्मीदें भी हैं. लेकिन अब अन्ना हजारे की अपनी टीम के कई सदस्य जिस तरह संदेह के घेरे में आ गए हैं, उससे उनके आंदोलन में वह धार नहीं रही जो जंतर मंतर से उठी है.

लेकिन हमें तो हीरो चाहिए

विनोद वर्माविनोद वर्मा|मंगलवार, 19 अप्रैल 2011, 02:09

टिप्पणियाँ (54)

मेरा दिल टूट गया है. शायद बहुत से लोगों का टूट गया हो.

क्यों न टूटे जब राहुल गांधी कह दें कि वे हीरो नहीं बनना चाहते.

भारत का मीडिया ज़्यादातर उन्हें भारत के अगले प्रधानमंत्री के रुप में देखता है. कांग्रेस का इतिहास और वर्तमान राजनीतिक समीकरण बताते हैं कि इस राह में कोई बाधा भी नहीं है.

नेहरु-गांधी परिवार ने आज़ादी के बाद सबसे लंबे समय तक भारत की कमान संभाली है. उसी विरासत के स्वाभाविक उत्तराधिकारी कह रहे हैं कि भारत की व्यवस्था में बहुत कुछ सड़ गया है, जीर्ण-शीर्ण हो गया है और वे उसे ठीक करना चाहते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश वीआर कृष्णा अय्यर ने उनसे पूछा था कि अन्ना हज़ारे का मामला इतना क्यों बढ़ा और वे क्यों ख़ामोश हैं? एक अच्छे राजनीतिक की तरह राहुल गांधी ने उन्हें चुप करवा दिया है और कहा है कि वे एक विचारशील भारतीय की तरह मनन कर रहे हैं और वे (जस्टिस अय्यर की तरह) पत्र लिखकर मुक्त नहीं हो सकते.

अभी-अभी भारतीय समाज को अपना नया हीरो मिला है. अन्ना हज़ारे के रूप में. बहुत से विवादों के बीच भी वह अन्ना हज़ारे से अभिभूत है.

भारतीय मिथक और इतिहास दोनों में प्रमाण मौजूद हैं कि भारत अनिवार्य रुप से एक व्यक्ति पूजक समाज है. वह रास्ते से पहले रास्ता दिखाने वाले की तलाश करता है. वह किसी प्रतीक पुरुष (और यदाकदा नारी भी) के साए में अपने को सुरक्षित महसूस करता है. वह अपने लिए एक हीरो चाहता है.

ऐसे में राहुल गांधी कह रहे हैं कि वे हीरो नहीं बनना चाहते. ख़ामोशी से काम करना चाहते हैं.

राहुल गांधी इससे पहले क्या करते रहे हैं? वे किसी दलित के घर खाना खाने गए तो ये सुनिश्चित कर लिया कि मीडिया इस ख़बर को प्रकाशित ज़रुर करे. उन्होंने सर पर दो धमेला मिट्टी ढोई तो पहले सुनिश्चित कर लिया गया कि टेलीविज़न वाले इसे देश को दिखा ज़रुर दें. यहाँ तक कि ट्रेन में सफर किया तो उनके मैनेजरों ने ये ख़बर मीडिया को पहुँचाने का पूरा इंतज़ाम किया. वे किसी खेल के आयोजन में पहुँचे तो आम दर्शकों के बीच बैठकर लोगों को यह दिखाने की कोशिश ज़रुर की कि वे आम लोगों के भी क़रीब हैं. विपक्षी दलों को लगा कि यह सब हीरो बनने की कोशिश है.

लेकिन अब उन्होंने साफ़ कर दिया है कि वे हीरो नहीं बनना चाहते. लोगों को जवाब मिल गया होगा कि राष्ट्रमंडल खेलों के घोटाले पर, 2जी स्पेक्ट्रम के घोटाले पर, सीवीसी की नियुक्ति पर और अन्ना हज़ारे के अनशन पर वे चुप क्यों रहते हैं.

अब लोगों को शक करना चाहिए कि अन्ना हज़ारे और उनके साथ जुड़े नागरिक समाज के लोग क्या सचमुच इस देश से भ्रष्टाचार को ख़त्म करना चाहते हैं या फिर उनकी मंशा हीरो बनने की है.

शायद वो कहावत ठीक हो कि जो गरजते हैं वो बरसते नहीं. इसलिए राहुल गांधी गरजते नहीं. शायद किसी दिन एक साथ बरसें, घनघोर घटा के साथ बरसें. सीधे प्रधानमंत्री बनकर इस देश का उद्धार करें.

राहत की बात सिर्फ़ इतनी है कि राहुल गांधी ने ये नहीं कहा है कि वे प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते. मनमोहन सिंह इस बात का गवाह हैं कि अब भारत का प्रधानमंत्री ज़रुरी नहीं कि देश का हीरो भी हो.

तो देशवासियो अगर आपको सड़ी गली या बदबूदार या जीर्ण शीर्ण व्यवस्था को ठीक करने के लिए किसी हीरो की तलाश है तो माफ़ कीजिए राहुल गांधी उपलब्ध नहीं हैं. कोई और दरवाज़ा देखिए.

अब तो बड़े हो जाओ

ज़ुबैर अहमदज़ुबैर अहमद|शनिवार, 16 अप्रैल 2011, 09:45

टिप्पणियाँ (14)

अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पिछले हफ़्ते बजट पारित करवाने की कोशिश में कांग्रेस के सदस्यों को कुछ कड़े शब्द कहे जिन में से एक था 'ग्रो अप'.

स्कूली बच्चों की तरह दोनों पक्ष के कांग्रेस के सदस्यों के बीच लड़ाई देख कर राष्ट्रपति की बात सही लगी.

मैं बिल्कुल यही वाशिंगटन में रह रहे भारतीय और पाकिस्तानी पत्रकारों और राजनयिकों से भी कहूंगा - 'ग्रो अप'.

ये लोग एक दूसरे से मिलते तक नहीं. एक दूसरे के बारे में वही ग़लतफ़हमियां रखते हैं जो कम पढ़े लोग रखते हैं.

एक दूसरे से उसी तरह से रूठ कर रहते हैं जिस तरह से स्कूल के बच्चे रहते हैं.

अगले महीने मुझे पत्रकार बने 23 साल हो जाएंगे. पत्रकारिता की पढ़ाई के समय हमें बताया गया था की एक पत्रकार निष्पक्ष होता है. वो पहले पत्रकार होता है फिर एक मुसलमान या हिन्दू, भारतीय या पाकिस्तानी.

मैं तो अब तक इस पाठ को नहीं भूला हूँ, लेकिन अपने इर्द-गिर्द इसकी धज्जियां उड़ते ज़रूर देखी हैं. अफ़सोस होता है, मन को दुख पहुँचता है.

मुझे मुंबई से वाशिंगटन आये लगभग एक साल हुआ है. यहाँ पहली बार मैं भी लड़खड़ाने के कगार पर खड़ा हूँ.

दरअसल भारत और पाकिस्तान से आकर यहां रह रहे पत्रकार इतने बड़े देश भक्त हो गए हैं (कम से कम वो तो यही समझते हैं) जितना वो अपने देशों में रहते समय कभी नहीं थे.

मैं दोनों तरफ के पत्रकारों से मिला तो एक दूसरे की बुराई सुनी और एक दूसरे के देश के बारे में ग़लतफ़हमियाँ महसूस कीं.

और तो और ये देखकर और भी हैरान हो गया की दोनों देशों के दूतावास एक दूसरे के पत्रकारों को प्रेसवार्ता में नहीं बुलाते.

यह बचकाना हरकतें दोनों तरफ से खुल कर होती हैं.

हाँ, मेरी ओर एक बीबीसी पत्रकार की हैसियत से दोनों तरफ़ के लोगों ने दोस्ती का हाथ बढाया.

मैंने सोचा मौका अच्छा है, दोनों तरफ़ को मिलाने की कोशिश कर डालो. ख़ुद अपने घर पर मैंने दूसरे विदेशी पत्रकारों के साथ भारतीय और पाकिस्तानी पत्रकारों को घर पर दावत दे डाली.

नर्वस भी था की कहीं आपस में झगड़ा न हो जाए. कश्मीर से लेकर हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिकता पर गर्मागर्म बहस हुई, लेकिन एक और मुलाक़ात के बाद दोस्तियां भी बनीं और कुछ हद तक ग़लतफ़हमियाँ भी दूर हुईं.

लेकिन आपसी अविश्वास अब भी है.

मां बाप और सुख दुख

सुशील झासुशील झा|मंगलवार, 12 अप्रैल 2011, 17:03

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ज़िंदगी मां के आँचल की गांठों जैसी है. गांठें खुलती जाती हैं. किसी में से दुःख और किसी में से सुख निकलता है.

हम अपने दुःख में और सुख में खोए रहते हैं. न तो मां का आँचल याद रहता है और न ही उन गांठों को खोलकर मां का वो चवन्नी अठन्नी देना.

याद नहीं रहती तो वो मां की थपकियां. चोट लगने पर मां की आंखों से झर झर बहते आंसू. शहर से लौटने पर बिना पूछे वही बनाना जो पसंद हो. जाते समय लाई, चूड़ा, बादाम और न जाने कितनी पोटलियों में अपनी यादें निचोड़ कर डाल देना.

याद रहता है तो बस बूढे मां बाप का चिड़चिड़ाना. उनकी दवाईयों के बिल, उनकी खांसी, उनकी झिड़कियां और हर बात पर उनकी बेजा सी लगने वाली सलाह.

आखिरी बार याद नहीं कब मां को फोन किया था. ऑफिस में यह कहते हुए काट दिया था कि बिज़ी हूं बाद में करता हूं. उसे फोन करना नहीं आता. बस एक बटन पता है जिसे दबा कर वो फोन रिसीव कर लेती है. पैसे चाहिए थे. पैसे थे, बैंक में जमा करने की फुर्सत नहीं थी.

भूल गया था दसेक साल पहले ही हर पहली तारीख को पापा नियम से बैंक में पैसे डाल देते थे. शायद ही कभी फोन पर कहना पडा हो मां पैसे नहीं आए.

शादी हो गई है. बच्चे हो गए हैं. नई गाड़ी और नया फ्लैट लेने की चिंता है. बॉस को खुश करना है. दोस्तों को गार्डेन पार्टी देनी है. बीवी को छुट्टियों पर गोवा लेकर जाना है.

मां बाप बद्रीनाथ जाने के लिए कई बार कह चुके हैं लेकिन फुर्सत कहां है. ऑफिस बहाना है. समय है लेकिन कौन मां के साथ सर खपाए. बुढ़िया बोर कर देती है नसीहत दे देकर.

पापा ऑफिस के बारे में इतने सवाल करते हैं कि पूछो मत. कौन इतने जवाब दे. शाम को व्हिस्की का एक गिलास लगाना मुहाल हो जाता है. अपने घर में ही छुपते रहो पीने के लिए.

भूल गया पापा अपनी सिगरेट हम लोगों से छुपा कर घर से बाहर ही पीकर आते थे. न जाने हमने कितने सवाल पूछे होंगे मां-बाप से लेकिन शायद ही कभी डांट भरा जवाब मिला हो.

लेकिन हमारे पास उन्हें देने के लिए कुछ नहीं है. हमारे बटुओं में सिर्फ़ झूठ है. गुस्सा है...अवसाद है... अपना बनावटी चिड़चिडापन है. उनकी गांठों में आज भी सुख है दुःख है और हम खोलने जाएं तो हमारे लिए आशीर्वाद के अलावा और कुछ नहीं.

अगले महीने मदर्स डे है....साल में एक बार मदर्स डे के नाम पर ही एक बार मां के आंचल की गांठें खोलने की ज़रुरत सभी को होनी चाहिए.

सवा अरब बेचारे और एक अन्ना हज़ारे

विनोद वर्माविनोद वर्मा|शुक्रवार, 08 अप्रैल 2011, 10:52

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उम्मीदें जाग गई हैं. सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या हमारे यहाँ भी तहरीर चौक होगा?

माहौल पूरा है. थोड़ा दिल्ली के जंतर मंतर पर, थोड़ा इधर-उधर के शहरों में और सबसे ज़्यादा टेलीविज़न के स्क्रीनों पर. अख़बारों ने भी माहौल बनाने की पूरी कोशिश की है.

लेकिन जनता अभी थोड़ी दूर से देख रही है. सोच रही है कि शायद हमारे यहाँ भी तहरीर चौक हो जाएगा.

जो लोग अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन के समर्थन में निकल रहे हैं उनकी संख्या अभी हज़ारों में भी नहीं पहुँची है.

हमारी आबादी के नए आंकड़े अभी-अभी आए हैं. एक अरब 21 करोड़ यानी लगभग सवा अरब. इस सवा अरब लोगों में से अभी कुछ हज़ार लोग भी जंतर मंतर या इंडिया गेट पर इकट्ठे नहीं हो रहे हैं.

वह कहावत चरितार्थ होती दिख रही है, देश में भगत सिंह और गांधी पैदा तो हों, लेकिन पड़ोसी के घर में.

मिस्र की आबादी से तुलना करके देखें, वहाँ की कुल आबादी है आठ करोड़ से भी कम. यानी अपने आंध्र प्रदेश की आबादी से भी कम.

लेकिन वहाँ तहरीर चौक पर एकबारगी लाखों-लाखों लोग इकट्ठे होते रहे. उन्हें वहाँ इकट्ठा करने के लिए किसी नेता की ज़रुरत नहीं पड़ी. वे ख़ुद वहाँ आए क्योंकि उन्हें लगा क्योंकि परिवर्तन उनकी अपनी ज़रुरत है.

भारत की जनता के लिए अन्ना हज़ारे को आमरण अनशन पर बैठना पड़ा है.

फिर भी इकट्ठे हो रहे हैं कुछ सौ लोग.

ब्रिटेन से एक पत्रकार ने पूछा कि दिल्ली में ही एक करोड़ से ज़्यादा लोग रहते हैं और जितने लोग इकट्ठे हो रहे हैं वो तो बहुत ज़्यादा नहीं है, तो क्या अभी लोगों को भ्रष्टाचार अपना मुद्दा नहीं लगता?

जिस देश में अधिसंख्य जनता सहमत है कि देश में भ्रष्टाचार असहनीय सीमा तक जा पहुँचा है. सब कह रहे हैं कि नौकरशाहों से लेकर राजनेता तक और यहाँ तक न्यायाधीश तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. हर कोई हामी भर रहा है कि इन राजनेताओं को देश की चिंता नहीं.

भ्रष्टाचार के आंकड़ों में अब इतने शून्य लगने लगे हैं कि उतनी राशि का सपना भी इस देश के आम व्यक्ति को नहीं आता.

उस देश में जनता इंतज़ार कर रही है कि इससे निपटने की पहल कोई और करेगा.

ख़ुद अन्ना हज़ारे कह रहे हैं कि जितना भी समर्थन मिल रहा है, उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी. वह तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को भी नहीं थी और न विपक्षी दलों को.

लेकिन जितने भी लोग निकल आए हैं उसने लोगों को जयप्रकाश नारायण से लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह की याद दिला दी है.

लोग तहरीर चौक को याद कर रहे हैं, बिना ये समझे कि वहाँ परिस्थितियाँ दूसरी थीं. लेकिन वे मानने लगे हैं कि तहरीर चौक यानी परिवर्तन.

अन्ना हज़ारे ने एक लहर ज़रुर पैदा की है. लेकिन अभी लोग उन लहरों पर अपनी नावें निकालने को तैयार नहीं हैं.

भारत का उच्च वर्ग तो वैसे भी घर से नहीं निकलता. ज़्यादातर वह वोट भी नहीं देता. ग़रीब तबका इतना ग़रीब है कि वह अपनी रोज़ी रोटी का जुगाड़ एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ सकता.

बचा मध्य वर्ग. भारत का सबसे बड़ा वर्ग. और वह धीरे-धीरे इतना तटस्थ हो गया है कि डर लगने लगा है.

सरकार के रवैये से दिख रहा है कि वह देर-सबेर, थोड़ा जोड़-घटाकर लोकपाल विधेयक तैयार करने में अन्ना हज़ारे एंड कंपनी की भूमिका स्वीकार कर लेगी.

उस दिन अन्ना हज़ारे का अनशन ख़त्म हो जाएगा. अन्ना हज़ारे रालेगणसिद्धि लौट जाएँगे. पता नहीं इन सवा अरब बेचारों का क्या होगा.

पूरा हुआ ख़्वाब

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|रविवार, 03 अप्रैल 2011, 23:05

टिप्पणियाँ (27)

उन्होंने जो कहा वह पूरा कर दिखाया.

इसके बावजूद कि भारत विवादास्पद परिस्थितियों में टॉस हार गया.

इसके बावजूद कि आखिरी पाँच ओवरों में माहेला जयवर्धने और परेरा की आतिशी बल्लेबाज़ी ने करीब करीब मैच भारत की पहुँच से बाहर पहुँचा दिया.

इसके बावजूद कि पारी की दूसरी ही गेंद पर ख़तरनाक सहवाग पैवेलियन लौट गये.....
और इसके बावजूद कि 31 का स्कोर पहुँचते पहुँचते महान तेंदुल्कर ने भी श्रीलंका के फ़ील्डरों को अपनी पीठ दिखा दी.....

पूरे वानखेड़े स्टेडियम के साथ साथ पूरे भारत में सन्नाटा पसर गया.

पर तभी अब तक साधारण फ़ॉर्म में चल रहे गौतम गंभीर और विराट कोहली ने तय किया कि दो अप्रैल का दिन उनका दिन होगा.

अच्छा ये होता कि गंभीर शतक लगाते लेकिन उनके 97 रन किसी शतक से कम नहीं थे. 114 के स्कोर पर जब विराट विदा हुए तो धोनी ने युवराज को भेजने के बजाय अपने आप को प्रमोट किया और करीब करीब हर बॉल पर रन बनाते हुए भारत के स्कोर को श्रीलंका के स्कोर के नज़दीक ले गए.

अंतत: धोनी ने छक्का लगा कर भारत को छह विकेट से जीत दिलवाई.

भारतीय क्रिकेट को दरकार थी आत्मविश्वास से भरपूर खिलाड़ियों की. 1983 में विश्व कप जीतने वाली कपिल की टीम में भी इस जज़्बे की कमी थी. सौरव गाँगुली ने इस प्रक्रिया की शुरुआत की थी जिसे फ़िनिशिंग टच दिया धोनी के रणबाँकुरों ने.

इस फ़ाइनल का डिफ़ाइनिंग मोमेंट था जब पूरी भारतीय टीम ने सचिन को कंधे पर बैठा कर पूरे मैदान का चक्कर लगाया. गावस्कर ने कहा इस तरह के क्षण किसी खिलाड़ी के जीवन में एकाध बार ही आते हैं.

मैच के बाद वह पिच तक गए.... इसकी मिट्टी को छुआ और उसे अपने माथे से लगा लिया.

वानखेड़े पर सचिन अपना सौंवा शतक भले ही न लगा पाए हों लेकिन उनका विश्व कप जीतने का सपना इस धरती पर ज़रूर पूरा हुआ. अभी वह रिटायर नहीं होने जा रहे.

रिकॉर्ड तोड़ने के और भी कई मौके उनके पास आएंगे. उनको और सारे भारत को बधाई!

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