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तार-तार लोक लेखा

रेहान फ़ज़लरेहान फ़ज़ल|शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011, 18:26 IST

लोक लेखा समिति की रिपोर्ट पर सरकार और विपक्ष के बीच हो रही तीखी नोक-झोंक ने संसदीय मूल्यों को एक बार फिर तार-तार करने में कोई कसर नहीं रख छोड़ी है.

यह पहला मौक़ा नहीं है जब लोक लेखा समिति ने सरकार को आड़े हाथों लिया हो, लेकिन इससे पहले कभी भी मतदान करा कर पूरी रिपोर्ट को ख़ारिज कर नया अध्यक्ष चुनने की न तो कोई कोशिश हुई है और न इसकी कभी नौबत आई है.

बूटा सिंह जब लोक लेखा समिति के अध्यक्ष थे तो उन्होंने भी ताबूत घोटाले में सरकार के ख़िलाफ़ इतनी ही डैमेजिंग रिपोर्ट पेश की थी. समिति के बहुत से सदस्य उस रिपोर्ट के मसौदे से सहमत नहीं थे.

उन्होंने अपनी असहमति ज़रूर दर्ज कराई थी लेकिन अध्यक्ष को पद से हटाने की मुहिम की नौबत नहीं आई थी. मज़े की बात यह है कि जब टू जी घोटाले की संसदीय समिति से जाँच कराने की माँग उठी थी तो सरकार की तरफ़ से कहा गया था कि इस घोटाले की जाँच लोक लेखा समिति द्वारा होनी चाहिए. यहाँ तक कि प्रधानमंत्री तक इस समिति के सामने पेश होने के लिए तैयार थे.

लोक लेखा समिति के तथाकथित मत विभाजन की तरफ़ ध्यान दिया जाए तो विचारधारा के स्तर पर हमेशा एक दूसरे का विरोध करने वाली भारतीय जनता पार्टी और मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी एक ही मंच पर हैं जबकि उत्तर प्रदेश मे एक दूसरे की धुर विरोधी समझे जाने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी इस मुद्दे पर काँग्रेस के साथ खड़ी दिखाई दे रही हैं.

यह दोनों पार्टियाँ राज्य स्तर पर काँग्रेस को अपना विरोधी मानती हैं लेकिन केंद्र में उनके सहयोगी दलों की तरह काम कर रही हैं.समाजवादी पार्टी जिसके 22 सांसद हैं अपने आपको नौ सांसदों वाली एनसीपी से कम बेहतर राजनीतिक स्थिति में पा रही है और इसी लिए कांग्रेस से क़रीबी राजनीतिक समझ बनाने के लिए बेताब है.

इसको राजनीतिक अवसरवादिता नहीं तो और क्या कहेंगे कि उन्होंने पीएसी में सरकार के ख़िलाफ़ सबसे मुखर आवाज़ अपने सांसद रेवतीरमण सिंह से कहा कि वह मुरली मनोहर जोशी के ख़िलाफ़ यूपीए की लड़ाई में उनका साथ दें. बहुजन समाज पार्टी के राजनीतिक क़दम हमेशा इस बात पर निर्भर करते हैं कि उनकी नेता मायावती को केंद्र से क्या दरकार है.

सरकार और विपक्ष की लड़ाई मे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को सरकार को मुसीबत से उबारने के कई मौके और मिलेंगे और ज़ाहिर है कहने वाले तो कहेंगे कि हर राजनैतिक समर्थन की कोई न कोई क़ीमत तो होती है.

टिप्पणियाँटिप्पणी लिखें

  • 1. 00:41 IST, 30 अप्रैल 2011 naval joshi:

    रेहान जी के इस आंकलन से सहमत होना कठिन है,क्या संसदीय मूल्य इतने नर्म-नाज़ुक होते हैं कि ज़रा सी बात में तार-तार हो जांए? और यदि किसी संसदीय दल ने बचकानी हरकत की होती तो ज़रूर यह सवाल बन सकता था. जिन लोगों के व्यवहार से चिंतित होकर आपने ये बात कही है क्या आप उन्हें संसदीय पार्टियां मानते हैं? वास्तव में आपसे असहमति का यही बिन्दु है. हमारी नज़र में तो इनमें से कोई भी पार्टी संसदीय रह गयी है या नहीं, इस बात को स्पष्ट करने का समय आ गया है. कोई दल एक खानदान के इर्द-गिर्द घूम रहा है,कोई एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूम रहा है किसी का आधार जाति है तो कोई एक सम्प्रदाय का झंडा उठाये घूम रहा है. कौन सी पार्टी है जो संसदीय होने का दावा कर सकती है? संसद भवन में इन पार्टियों के सदस्य बैठते हैं इससे ही ये संसदीय हो गये यह कहना थोडा ज़्यादती है. संसद ,प्रजातंत्र और लोकमत इन शब्दों का अपना मूल्य है यह एक पैमाना है जिससे कि समाज और राजनीति की हालत को जॉचा जा सकता है. लेकिन कुछ लोगों के बचकाने व्यवहार से इन शब्दों की महिमा कम नहीं हो जाती. ये पार्टियां चाहती हैं कि आम लोग इन्हें प्रजातंत्र ,लोकमत और संसदीय परम्पराओं का प्रतीक समझें और इनके व्यवहार को ही प्रजातंत्र और संसदीय परम्पराएं मान लें जबकि यह गलत है.ये लोग संसदीय परम्पराओं के वाहक नहीं हैं,इनके आधार पर परम्पराओं का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता है बल्कि परम्पराओं के आधार पर इनका मूल्यांकन किया जाना चाहिए.

  • 2. 10:25 IST, 30 अप्रैल 2011 Shashi Bhushan Singh, Sitab Diara, Saran, Bihar:

    राष्ट्रीय सम्मान व लोकतान्त्रिक व्यवस्था को शर्मशार करना भारतीय राजनीति की परम्परा बनती जा रही है. कई राज्यों में तो जूते-चप्पल चले, माइक, कुर्सी एक दूसरे पर फेकें गए. यहाँ तक कि सबसे बड़ी पंचायत 'संसद भवन' में भी नेताओं ने इसके नमूने पेश किये है. कुछ नेताओं ने तो इसे अपनी पहचान का ज़रिया ही बना लिया है. असंसदीय भाषा तथा व्यवहार इनका संस्कार बन गया है. हद तो ये हो गई है कि अपने स्वार्थ सिद्धि के लिये ये किसी भी हद तक जा सकते है. न तो इन्हें अपने पद का ख्याल है और न ही कर्तव्यों का बोध. ऐसे कई नेता गण हमारी संसद और विधान सभाओं की शोभा बढ़ा रहे है, जिन्हें राष्ट्र् गान तक याद नही. अपनी ही संसद में अपने ही नेताओं द्वारा हमारा संविधान रोज तार- तार हो रहा है. जहाँ तक वर्तमान भारतीय राजनीति का सवाल है तो सभी एक जैसे है. ऐसी व्यवस्था और परिस्थिति में संसदीय मूल्यों का तार-तार होना बड़ी बात नहीं है. ज़रुरत है एक सम्पूर्ण क्रांति की.

  • 3. 15:46 IST, 30 अप्रैल 2011 ajaysingh:

    सब एक ही थाली के हैं.

  • 4. 16:17 IST, 30 अप्रैल 2011 ashok pandey:

    मै नवल जोशी से सहमत हूँ.और यह भी कि राज्य विधानसभा और लोकसभा चुनावो में निर्धारित मत और सीटें प्राप्त कर लेने से ही कोई राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पार्टी नहीं बन जाती.यह भी देखना निहायत ही जरूरी है कि उक्त पार्टी भारतीय संविधान ,राष्ट्रीय आदर्शों ,जनतांत्रिक मूल्यों और जनता की वास्तविक आकांक्षाओं का सम्मान और प्रतिनिधितित्व भी करती हैं या नहीं .

  • 5. 21:01 IST, 30 अप्रैल 2011 braj kishore singh,hajipur,bihar:

    रहन भी आपने गलत व्यक्तियों पर सही आरोप लगाए हैं.भारत के राजनीतिज्ञों में नैतिकता की तलाश करना ही मूर्खता है.

  • 6. 21:50 IST, 30 अप्रैल 2011 प्रांशु प्रियदर्शी :

    रेहानजी आप कुछ हद तक सही भी हैं और कुछ गलत भी.वैसे संसदीय मूल्य हमेसा तार-तार हुआ है भारत में.देश आजाद होने के बाद कुछ दिनों तक देश के लिए सोचा गया था,फिर पार्टी के लिए सोचा जाने लगा फिर नेता लोग सरकार के लिए सोचने लगे अब तो हर कोई सिर्फ अपने लिए सोचता है यहाँ.अगर आप दो महान दार्शनिक अरस्तु और चाणक्या के रिसर्च को पढ़ें तो आप पाएँगे की राजतन्त्र ,प्रजातंत्र से बेहतर होता है.अरस्तु ने तो यहाँ तक बोला था कि प्रजातंत्र मूर्खों की शासन है.कभी-कभी मुझे भी ये सही लगता है.अभी दो साल से जो हमारे देश में नौटंकी चल रही है इससे तो राजतन्त्र ही बेहतर होता.हमारे देश की जो एक साल की बज़ट है उससे ज्यादा घोटाला है जबकि सब कुछ साफ़ नहीं है.रही बात सपा और बसपा के समर्थन की तो इनलोगों की चाभी कांग्रेस ने अपने हाथ में रखी है,समय आने पर घुमा देती है.यही कारन है कि सारे चोर पार्टी न चाहते हुए भी चोर पार्टी का समर्थन करती है.इस समय हमारे देश को एक तानासाह कि जरुरत है जो सबसे पहले इन चोरो को गोली मरवा दे और सिर्फ देश के लिए सोचे.हमारे देश में नौकरी ख़त्म करने कि उम्र है ६२ क्युकि इसके बाद लोगो का दिमाग सही से काम नहीं करता लेकिन आप हमारे प्रधानमंत्री और दुसरे नेता कि उम्र देखें कितनी है, सायद यही कारन है उनके दिमाग सही से काम नहीं कर रहे हैं और ये सब लोग सठिया गए हें.

  • 7. 00:21 IST, 01 मई 2011 VIVEK, HYDERABAD:

    जब मूल्यों का मतलब सिर्फ़ फ़ायदा हो जाए तो नैतिक मूल्यों को नेता क्यों मानें. हम हर बात के लिए नेताओं को दोषी ठहराते हैं और उनसे नैतिकता की अपेक्षा करते हैं. लेकिन अपनी ज़िंदगी में हमारा इससे कोई वास्ता नहीं रहता. यह मामला भी कुछ ऐसा ही है. जब सत्ता अपनी हो तो कुछ भी करें सब सांविधानिक है.

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